वह हमेशा से चाहते रहे हैं देश के ग्रामीण क्षेत्र खासकर अनुसूचित जाति जनजाति में शिक्षा का शत प्रतिशत प्रचार-प्रसार हो जिससे आडंबर ,अंधविश्वास तथा समाज में व्याप्त कुरीतियों से बचाया जा सके एवं उन्हें उच्च शिक्षा देकर समाज के उच्च स्थानों में स्थापित किया जा सके। उनका उद्देश्य यह भी रहा है कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त अंधविश्वास एवं गलत व्यसन आदि से छात्रों को बचाकर उनका सर्वांगीण विकास कर समाज में उचित स्थान में स्थापित करें।
चूंकि शुक्ला जी ग्रामीण पृष्ठभूमि से रहे हैं अतः उनकी सदैव इच्छा रही है कि ग्रामीण क्षेत्र में उच्च शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार हो और इसी संदर्भ और दिशा में उच्च शिक्षा विभाग में अपनी सेवा काल में सार्थक तथा अनथक प्रयास भी किए हैं। जिसके लिए वे छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में लगातार अपनी सेवाएं देकर प्रयासरत रहे हैं। वे खुद भी व्यक्तिगत तौर पर कई छात्रों को आर्थिक सहयोग देकर आगे पढ़ने ,बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे हैं।
इस दिशा में इनके परिवार के सदस्यों ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है उनके एक भाई आध्यात्मिक दिशा में एक स्थापित नाम हैं एवं इसके अलावा ऑर्थोपेडिक सर्जन के रूप मे, आईएएस अधिकारी के रूप में, बैंक में महाप्रबंधक तथा महाविद्यालय शिक्षा में प्राध्यापक रूप में सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।शिक्षा की लगाई गई यह बेल अब पूरे परिवार में लहलहा रही है उनके पुत्र, पुत्र वधू, पुत्री, दामाद तथा भाइयों के पुत्र पुत्रियां उच्च पदस्थ डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासनिक सेवा में अपनी सेवाएं समाज में दे रहे हैं। वे लगातार शिक्षा के क्षेत्र में लोगों को विशेषज्ञ सलाह देते रहते हैं और स्त्री शिक्षा के बड़े हिमायती भी हैं।
ग्रामीण परिवेश में किसान परिवार में जन्म लेकर डॉक्टर अंजनी कुमार शुक्ल ने प्राथमिक तथा हायर सेकेंडरी राहोद ग्राम जिला जांजगीरसे प्राप्त की। 1971 में स्नातक परीक्षा ग्राम खरौद के महाविद्यालय से उत्तीर्ण कर स्नातकोत्तर राजनीति शास्त्र में की इसके पश्चात सीएमडी कॉलेज बिलासपुर से पॉलिटिकल साइंस में स्नातकोत्तर उपाधि में प्रावीण्य सूची में तृतीय स्थान प्राप्त किया था। उसके पश्चात विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से राजनीति शास्त्र में एम,फिल कर प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
डॉ अंजनी कुमार शुक्ला ने 1990 में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर से राजनीति शास्त्र में ही पीएचडी कर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की ,उल्लेखनीय है कि ग्रामीण परिवेश से निकले एक कृषक पुत्र द्वारा शिक्षा के उच्चतम प्रतिमान स्थापित कर छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश के कई कॉलेज में व्याख्याता, प्राध्यापक ,परियोजना अधिकारी, कुलसचिव एवं स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राचार्य का दायित्व ईमानदारी ,लगन एवं सत्य निष्ठा से सुशोभित किया,उन्हें उनकी विशिष्ट योग्यता, लगन तथा लगातार इमानदारी पूर्वक सराहनीय कार्य करने के फल स्वरुप अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा के रूप में पदस्थ किया गया ।
उसके पश्चात उन्हें उनकी उच्च गुणवत्ता की सेवा का ध्यान रखते हुए विश्वविद्यालय ने महाविद्यालय विकास परिषद रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर के संचालक का पद सौंपा, उन्हें 2017 अप्रैल में महामहिम राज्यपाल छत्तीसगढ़ शासन रायपुर द्वारा छत्तीसगढ़ निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग रायपुर का अध्यक्ष यानी चेयर पर्सन नियुक्त किया गया। यह किसी ग्रामीण परिवेश के विद्यार्थी के लिए जिसने अपनी शिक्षा दीक्षा ग्राम के स्कूलों में प्राप्त कर शिक्षा के प्रति अपनी लगन को दर्शाते हुए एक नया कीर्तिमान बनाया।

वे सर्वप्रथम तत्कालीन मध्यप्रदेश के अधीन रायपुर जिले की भगवान राजीव लोचन की पवित्र नगरी राजिम के एक निजी महाविद्यालय से अपनी सेवाएं प्रारंभ कर अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा तक की यात्रा में दो बार लोक सेवा आयोग की परीक्षा जिसमें प्रथम बार व्याख्याता एवं द्वितीय परीक्षा में प्रोफेसर पद के लिए चयनित हुए और फिर उसके बाद इनकी पदोन्नति लगातार होती रही। वे कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय रायपुर के कुलसचिव भी रहे।
सीधे ,सरल,सौम्य एवं नियमित दिनचर्या के धनी डॉ,अंजनी शुक्ला जी संस्कृत तथा गीता के एक अच्छे ज्ञाता भी हैं उन्हें गीता के श्लोकों का कंठस्थ ज्ञान है।इसके अलावा डॉक्टर शुक्ला लोक सेवा आयोग छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश के विशेषज्ञ चयनकर्ता एवं परीक्षक भी हैं उन्हें समय-समय पर साक्षात्कार के लिए एवं लोक सेवा आयोग के पदों के परीक्षार्थियों के चयन के लिए आमंत्रित किया जाता है।
इसके अतिरिक्त वे आमंत्रण पर कई महाविद्यालय में व्याख्यान देने के लिए अपनी सेवाएं प्रदान करते रहते हैं। डॉक्टर अंजनी कुमार शुक्ला का स्कूली शिक्षा से लेकर अब तक का जीवन शिक्षा मानवता एवं मानवीय संवेदनाओं को समर्पित रहा है आज भी लगातार लोगों को शिक्षा के प्रति एवं मानवीय संवेदना के प्रति प्रोत्साहित करते रहते हैं वह युवाओं के प्रेरणा स्रोत और ऊर्जा स्रोत भी हैं। उनके शतायु होने की शुभकामनाओं के साथ मंगलकामनाएं।
]]>इसके अलावा पूर्व में एक नाबालिक बालिका साक्षी को प्रेम प्रसंग के चलते युवक द्वारा चाकू तथा पत्थरों से सरेराह भीड़ के बीच मौत के घाट उतारना एक दर्दनाक तथा भयावह घटना है। क्या हम मानव से पशु हो चुके हैं जो जो महिलाओं की इस तरह दर्दनाक हत्या करने और सार्वजनिक तौर पर बेइज्जत करने पर आमादा हैंl
इसके पूर्व भी एक युवती श्रद्धा की एक प्रेमी युवक द्वारा शरीर के 34 टुकड़े कर खौफनाक हत्या कर दी गई थी. ऐसा लगता है मानो समाज में कोई सुरक्षा व्यवस्था है ही नहींl दूसरी तरफ देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल लाने वाली साक्षी मलिक विनेश फोगाट और अन्य महिला भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृज भूषण सिंह के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर महिला तथा पुरुष पहलवानों द्वारा लगातार धरना प्रदर्शन किया जा रहा था बड़े संघर्षों और प्रयासों के बाद बृजभूषण सिंह के खिलाफ एफ आई आर के तहत कार्यवाही की जा रही है।
बात यहां तक पहुंच गई थी कि वे अपनी कड़ी मेहनत तथा खून पसीने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा के बाद देश के लिए प्राप्त किए मेडल को हरिद्वार जाकर गंगा में विसर्जित करने के लिए मजबूर हो गई थी उन्हें समझा-बुझाकर ऐसा करने से रोक तो लिया गया है पर क्या न्याय में देरी न्याय के विमुख होना नहीं है, इसी तरह मणिपुर में हिंसा के खिलाफ मीराबाई चानू तथा अन्य 11 मेडलिस्ट ने अपने पदक वापस करने की घोषणा कर दी है।
स्थिति बड़ी अराजक एवं भयावह है देश में सुरक्षा तथा कानून व्यवस्था एकदम लचर हो गई है। महिलाएं असुरक्षित है और न्याय के लिए बाट जोहने पर मजबूर है। हम कागज में महिला सुरक्षा स्त्री सशक्तिकरण महिला भागीदारी की बढ़-चढ़कर बात करते हैं पर धरातल पर वेबसाइट के विपरीत और चिंतनीय है।
देश की विशाल जनसंख्या मैं 50% की भागीदारी रखने वाली राष्ट्र की संवेदनशील माताएं ,बहने अपने मूल तथा सार्थक अधिकार की तलाश में अभी भी संविधान और सरकार की तरफ आस लगाए इंतजार में बैठी हुई है। स्त्रियों का एक बड़ा तबका अभी भी अपनी स्वतंत्रता एवं मौलिक अधिकार से वंचित है। महिलाओं का विकास जितना विशाल आभासी रूप से दिखाया जा रहा है, वास्तविकता एवं धरातल पर स्थिति वैसी नहीं है। महिलाओं के भौतिक रूप से विकास के लिए एक जन अभियान और पृथक समेकित योजना की आवश्यकता देश में होगी तब जाकर महिलाओं के सशक्तिकरण की बात अपनी मूल भावना को प्राप्त कर पाएगा।
वर्तमान में भारत की विशाल जनसंख्या में 45% से 50% भागीदारी महिलाओं की है । महिलाओं को अभी उनके हक का अधिकार एवं भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, ऐसे में रक्षा प्रतिरक्षा क्षेत्र में महिलाओं की भर्ती एक अच्छे संकेत के रूप में सामने आ रही हैl आज के समय में महिलाएं सभी क्षेत्रों में साहस, शौर्य और ऊर्जा का बेहतरीन प्रदर्शन करते आ रही हैं, महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर काम में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
अब इसमें सशस्त्र बलों यानी डिफेंस सर्विस भी अछूता नहीं रहा सबसे बड़ी बात स्वतंत्र भारत की दूसरी रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण बनी थी इसके पूर्व श्रीमती इंदिरा गांधी प्रथम रक्षा मंत्री रही थीl अब कोई भी क्षेत्र ऐसा अछूता नहीं रहा जहां महिलाओं ने अपनी सशक्त दस्तक ई पहचान ना कराई हो, यह तो पूर्व से ही कहा गया है यदि आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं तो सिर्फ एक पुरुष शिक्षक होता है किंतु यदि आप किसी महिला को सर्वांगीण शिक्षा देते हैं तो आने वाली संपूर्ण पीढ़ी को शिक्षित कर रहे हैं ।
नारी शक्ति को अब ज्यादा दिनों तक देश की प्रगति विकास के योगदान से परे नहीं रखा जा सकता हैl परिवार की धुरी महिलाएं होती है परिवार से घर बनता है धर से समाज और समाज और संपूर्ण समाज से एक सशक्त राष्ट्र की बुनियाद रखी जाती है। इस तरह देश की बुनियाद ही स्त्री सशक्तिकरण हैl महिलाएं अच्छी तरह समझती हैं कि घर से लेकर देश की सीमा तक उन्हें व्यवहार कर देश के विकास और उसकी रक्षा में उन्हें किस तरह योगदान देना है। महिलाओं के बिना देश की प्रगति एवं विकास की कल्पना सर्वथा बेमानी हैl
सशक्त माताएं सशक्त राष्ट्र का निर्माण करती हैंl और सीमा रक्षा बलों में महिलाओं की भागीदारी इसका एक बड़ा उदाहरण और प्रतिफल है इन उदाहरणों में से प्रथम लेफ्टिनेंट सुनीता अरोड़ा ,प्रथम एयर मार्शल पद्मावती बंदोपाध्याय ,कैप्टन मिताली मधुमिता ,भारत में आए अमेरिकी राष्ट्रपति को गार्ड ऑफ ऑनर देने वाली प्रथम विंग कमांडर पूजा ठाकुर ऐसे अधिकारियों के नाम है जिन्होंने रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है एवं महिलाओं के प्रति सारी अवधारणाओं को गलत साबित कर एक सशक्त छवि को निरूपित किया हैl
महिलाओं की शारीरिक बनावट तथा उनके शारीरिक विन्यास को देखते हुए प्रतिरक्षा सेवा में उनकी भूमिका बहुत कम रही है,हम मां दुर्गा भवानी की पूजा करते हैं और महिलाओं को कमजोर समझते हैं। किंतु उनकी शक्ति को उनकी भागीदारी को अंततः स्वीकार किया गया और 1992 में पहली बार भारतीय सेना में महिलाओं के लिए द्वार खोले गए एवं 25 महिला कैंडिडेट को ऑफिसर ट्रेनिंग एकेडमी गया में ट्रेनिंग दी गई इसके पूर्व सिर्फ चिकित्सा सेवा में महिलाओं को नियुक्त किया जाता रहा है।
सेना में इनकी भागीदारी होते हुए भी इन्हें पुरुषों के समान अधिकार नहीं दिए गए थे, महिलाएं रक्षा सेवा में विधिक, शिक्षा, इंजीनियरिंग, इंटेलिजेंस तथा ऐयर सिग्नल कोर में अपनी सेवाएं देती रही हैं ।महिलाओं को केवल शॉर्ट सर्विस कमिशन जाने की 14 साल तक के लिए कमीशन किया जाता रहा जबकि पूरे समय के लिए केवल पुरुषों को ही सेना में भर्ती किया जाता थाl 2008 में उच्च न्यायालय के निर्देश पर महिलाओं को परमानेंट कमिशन पर रखा जाने लगा।
यह नारी सशक्तिकरण के लिए एक सशक्त मील का पत्थर साबित हुआl सेना की सैन्य प्रमुखों की समिति ने सशस्त्र बलों में महिलाओं की नियुक्ति पर स्थाई कमीशन की सिफारिश तो की किंतु इन्हें लड़ाकू सैनिकों की भूमिका देने से इनकार कर दिया उसके पीछे यह दलील दी गई की महिलाओं को लड़ाई के मैदान में भेजना उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए ठीक नहीं एवं देश की संस्कृति के अनुसार महिलाओं को दुश्मन से लड़ने भेजना अथवा दुश्मन द्वारा पकड़े जाने पर उचित नहीं होगा।
इसलिए महिलाओं को फ्रंटलाइन में नियुक्त किया जाना उचित नहीं होगा किंतु बाद में कुछ संशोधन किए जाने के पश्चात महिला अधिकारी कॉम्बैट जोन में पदस्थ की जाने लगी किंतु समाज का नजरिया महिलाओं के संदर्भ में बदलने लगा एवं 2016 में सशस्त्र बलों के कॉम्बैट क्षेत्र में महिलाओं को नियुक्ति देने की बात स्वीकार की गई इसमें दुनिया में कुछ देश ही हैं जिन्होंने महिलाओं को वार फ्रंट पर नियुक्त किया है।
पूर्व के थल सेना प्रमुख बिपिन रावत ने भी कहा था कि हम महिला और पुरुष को समान रूप से देखना चाहते एवं इसके लिए जल थल और वायु सेना एक रूपरेखा तैयार कर रही है जिसके सुखद परिणाम भी होंगे,सशस्त्र बलों में महिलाओं की भागीदारी मजबूत रूप से सामने आएगी एवं पुरुषों की भांति देश की रक्षा तथा दुश्मनों से लोहा लेने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगीं।
]]>भारतीय बैंकों में बचत की दर काफी ऊंची है और इसके अलावा मध्यमवर्गीय बचत से भारत में समृद्धि और विकास की अपार संभावनाएं मौजूद है। विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा जो कि इन दिनों तीसरी जी-20 वित्त मंत्रियों तथा केंद्रीय बैंक के गवर्नर ओं की बैठक में भाग लेने के लिए गांधीनगर गुजरात आए हुए हैं उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करने क्षेत्रीय समृद्धि को बढ़ावा देने और विकास के कार्यों को आगे बढ़ाने में सराहनीय कार्य किए हैं ।
अजय बंगा ने कहा कि विश्व बैंक भारत के आर्थिक रूप से वृद्धि को लेकर वे काफी आशावादी हैं और भारत को इन प्रयासों में तेजी लानी होगी। उन्होंने कहा कि भारत करोना महामारी के समय पैदा हुई चुनौतियों से मजबूत बनकर उभरा है और भारत वैश्विक स्तर पर कायम आर्थिक सुस्ती के बीच बहुत अच्छे कार्य कर रहा है जिसे उसे आगे रखने में काफी मदद मिलेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर काफी सुस्ती होने के बावजूद अपने घरेलू उत्पाद की वजह से सुरक्षित है।
भारत को चीन प्लस 1 रणनीति का फायदा उठाना चाहिए 3 प्लस 1 रणनीति का मतलब है कि अब दुनिया के विकसित देशों की कंपनियां अपने निर्माण केंद्र के तौर पर चीन के साथ किसी अन्य देश को भी जोड़ना चाहती है और वर्तमान समय में भारत देश ही एक संभावित विकल्प बनकर उभरा है भारत को इस रणनीति का अवसर 10 वर्षों तक नहीं खुला रहेगा यह अवसर केवल 3 से 5 वर्ष तक ही खुला रह सकता है जिसका भारत को पूरा फायदा उठाना चाहिए।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मार्टिन वुल्फ ने तो स्पष्ट रूप से कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से दुनिया में तेजी से बढ़ती हुई एक ताकत बनकर उभर रहा है और यही संभावनाएं पश्चिमी देशों को भारत पर दांव लगाने के लिए आकर्षित कर रही है उन्होंने कहा कि भारत की बढ़ती जनसंख्या और उसकी बचत करने क्षमता को देखते हुए भारत आगामी एक या दो दशक में विश्व की तीसरी आर्थिक शक्ति बन सकता है ।
अर्थशास्त्री तथा टिप्पणी कार मार्टिन वुल्फ़ ने कहा की आगामी दशकों में भारत की अर्थव्यवस्था और आबादी दोनों तेजी से बढ़ेगी और इसी के दम पर भारत चीन को बराबरी की टक्कर दे सकेगा इसके अलावा भारत के पश्चिमी देशों जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया ,फ्रांस ,कनाडा, इंग्लैंड, इजराइल और खाड़ी के देशों से आर्थिक संबंध काफी मजबूत हैं। पश्चिमी देश आने वाले समय में भारत को चीन की टक्कर देने वाला देश मान रहे हैं और अपना निवेश तथा समर्थन देने की पूरी संभावना तलाश रहे हैं।
भारत पश्चिमी देशों के लिए आर्थिक निवेश के लिए एक प्रमुख गंतव्य की तरह दिखाई दे रहा है जो भारत के लिए और उसके भविष्य के लिए बड़ा सकारात्मक पक्ष होगा। इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड, विश्व बैंक और तमाम अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत देश के बैंकों का बहीखाता बेहतर हो गया है और बैंकों की जमा पूंजी भी अच्छी खासी है इसके अलावा सकल वृद्धि भी एक बार फिर से बेहतर आकार ले रही है।
भारत के रणनीति कूटनीतिक तथा आर्थिक व्यवसायिक संबंध विश्व के प्रमुख देशों से बहुत ही मुकम्मल हो गए हैं जिससे भारत को पश्चिमी देशों के इन्वेस्टमेंट का बड़ा केंद्र माना जा रहा है यदि पश्चिमी देश चीन के अलावा भारत को एक इन्वेस्टमेंट का बड़ा विकल्प मानती है तो भारत को विश्व की तीसरी आर्थिक महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता है।
]]>भारत अब आर्थिक तथा सामरिक तौर पर शक्तिशाली राष्ट्र बन गया हैl फ्रांस में वहां के राष्ट्रीय दिवस पर बेस्टिलडे परेड पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गेस्ट ऑफ ऑनर दिया गया और वहां के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा भी गया है। इसके पहले फ्रांस में इस दिवस पर इंग्लैंड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और इजरायल के प्रधानमंत्री को ही यह अवसर प्राप्त हुआ था उस हिसाब से भारत के लिए यह बड़ा गौरवशाली दिवस था।
इसके अलावा फ्रांस तथा अमेरिका से भारत में अरबों डॉलर के रणनीतिक समझौते भी किए जिससे सामरिक तौर पर भारत एक मजबूत राष्ट्र बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी को अब तक 17 राष्ट्रों ने अपना सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया है। यह सम्मान भारत की 141 करोड़ जनता का भी सम्मान है। निश्चित तौर पर यह गौरव की बात है। भारत ने वैश्विक परिदृश्य में सफलता की नई ऊंचाइयों को छू कर नए आकाश में प्रवेश किया है। मैं किसी व्यक्ति विशेष अथवा राजनीतिक पार्टी का प्रशंसक अथवा हिमायती नहीं रहा हूं पर भारत ने पिछले एक दशक से सफलता के कई सोपानो को सफलतम तरीके से छुआ है।
हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव वर्ष मना रहे हैं हैं पर इस अमृत महोत्सव के पीछे हमें यह नहीं भूलना है कि भारत देश अब एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में वैश्विक स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुका है। अब समय आ गया है कि भारत के तमाम बुद्धिजीवियों,नौजवानों के वैज्ञानिकों और शिक्षित देशवासियों को वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर होने की क्षमता को द्विगुणित करना होगा और विश्व के एक प्रबल नेता की तरह हमें अपनी शक्ति प्रदर्शित करनी होगी।
कई वर्षों की परतंत्रता के बाद अनेको जीवन का बलिदान देने और विभिन्न कठोर संघर्षों के बाद हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई है। इस स्वतंत्रता और स्वाधीनता के मूल्य और इसकी अंतर्निहित शक्ति को देश के नौजवानों,शिक्षित नागरिकों को आत्मसात कर इसे पहचानना होगाl समाज के हर वर्ग की खून पसीने और पीढीयों के संघर्ष के बाद प्राप्त स्वतंत्रता को हमें देश की एकता, अखंडता एवं सामाजिक समरसता की शक्ति से चिरकाल तक स्थाई रूप से बनाए रखना है।
स्वतंत्रता के महत्व को समझ कर भारत को वैश्विक स्तर पर श्रेष्ठतम मुकाम पर पहुंचाना होगा तब जाकर स्वाधीनता के सही मायने फलीभूत होंगे। हमें स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष और बलिदान को किसी भी क्षणों में नहीं भुलाना चाहिए, हमें हाथ में रखकर किसी ने परोस के स्वतंत्रता नहीं दी है, इसके लिए बहाये हुए खून पसीने को विश्मृत न कर के इस की आन बान शान को हमेशा ऊंचा रखना होगा। कभी स्वतंत्रता पर खतरा ना आए इसके लिए यह हमारे देश के दिग्दर्शकों को अपनी कर्मठ जिजीविषा से बनाए रखना होगा।
स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद हमारी एकता, अखंडता एवं एकरूपता मजबूत हुई है, पर कतिपय राजनैतिक मंसूबों के कारण आज हम सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता, जातीयता और अलग-अलग भाषाओं के संघर्षों से गुजर रहे हैं। हम आज मंदिर ,मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च के विवाद को लेकर विवाद ग्रस्त हो जाते हैं । कभी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी,मराठी,तेलगु,और कभी असमी भाषा के असमंजस में फंस कर एक दूसरे का विरोध जताना शुरू कर देते हैं।
मूलतः हमें राष्ट्रीय अखंडता को बनाए रखने के लिए सांप्रदायिकता के विद्वेष, ईर्ष्या, जलन और सीमा तथा भाषाई विवाद से परे हटकर देश में अखंडता, सांप्रदायिक सद्भावना का एक शुद्ध वातावरण समाज में तैयार करना होगा, जिसके फलस्वरूप हम विकास की मुख्यधारा में अपना व्यक्तिगत योगदान राष्ट्र के प्रति दे संके। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी ने कहा था कि “भारत संपूर्ण विश्व में एक अकेला ऐसा राष्ट्र है जहां मंदिरों ,मस्जिदों, गिरजाघरों और गुरुद्वारों का एक एकात्मक सह अस्तित्व कायम है”।
वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर आतंकवाद शांति सद्भावना एवं किसी भी राष्ट्र की अखंडता एकता एकरूपता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। आतंकवादी कभी अमेरिका और कभी भारत के दिल्ली, मुंबई और अनेक प्रदेशों को अपना निशाना बनाकर आतंक फैलाने का प्रयास करते हैं और आतंकवाद ने कई राज्यों में अपार जनहानि तथा संपत्ति की क्षति पहुंचाई है।
इसके अतिरिक्त अलगाववादियों ने भी राष्ट्रीय एकता अखंडता को भंग करने का पुरजोर प्रयास किया है। राजनीतिक पार्टियों के मंसूबों तथा उनकी महत्वाकांक्षाओं के कारण भी अलग-अलग जातियों संप्रदाय तथा पूजा के पवित्र स्थानों को लेकर समाज को अलग करने का बीजारोपण भी किया है।
राजनीतिक पार्टियों के चंद राजनेता वोट बैंक बनाने के लिए कभी अल्पसंख्यकों में अलगाव के बीच बोलने का प्रयास करते हैं। कभी आरक्षण के नाम पर पिछड़े वर्गों को देश की मुख्यधारा से बहकाने का प्रयास करते हैं, और कभी किसी विशेष जाति प्रांत या भाषा के हकदार बन कर देश की एकता, अखंडता को खंडित करने का पुरजोर प्रयास करते हैं।
यह अत्यंत निंदनीय एवं चिंतनीय सामाजिक पहलू है, जिस संदर्भ में हमें गहन विचार करने की आवश्यकता भी है। सामाजिक स्तर पर हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एवं अन्य वर्ग सुचारू रूप से भाईचारे में अखंड विश्वास रखते हैं एवं सामान्य जीवन करने में विश्वास रखते हैं। पर राजनैतिक मंसूबों के कारण कुछ राजनेता इन सभी संप्रदायों को आपस में लड़वाकर अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास करते हैं।
पर यह एक अत्यंत विचारणीय पहलू है कि राष्ट्रीय अखंडता एकता तथा सहयोग को बनाए रखने के लिए केवल राजनेता या प्रशासनिक अधिकारियों का कार्य न होकर हम सबका यह कर्तव्य भी है कि हमें एकजुट होकर राष्ट्र सर्वोपरि की भावना को सदैव बनाए रखने का सतत प्रयास करना चाहिए।
हम यदि ऐतिहासिक रूप से देखें की अनेक धर्मो जातियों और अनेक भाषाओं वाला भारत देश पूर्व में अनेक विसंगतियां के बावजूद सदैव एकता के सूत्र में बंधा रहा है। भारत देश में पूर्व में भी अनेक विदेशी जातियां आई और धीरे-धीरे भारत की मूल धारा में समाहित होती गई। भारत में आगमन के साथ इन्हीं जातियों की परंपराएं, विचारधाराएं, संस्कृति, संस्कार भारत की मुख्य धारा में एक रूप हो गई और भारत की सांप्रदायिक सौहार्द की भावना आज भी वैसी की वैसी ही है।
भारत के जिम्मेदार नागरिक होने के कारण हमारी बड़ी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम इस देश की अखंडता एकता समरूपता और परंपरा को मजबूत बनाकर विश्व के सामने एक मिसाल के रूप में पेश करें। यह सार्वभौमिक सत्य है कि कोई देश यदि संगठित एक रूप और शक्तिमान होता है तो सारा विश्व उसकी इस ऊर्जा शक्ति को चिन्हित कर उसका सम्मान करता है।
और उस पर आक्रमण या किसी भी तरह के प्रतिबंध लगाने से भयभीत रहता है। जब तक हम एकता के सूत्र में बंधे तब तक हम मजबूत एवं शक्तिशाली हैं और जब हम खंडित या विघटित हुए तब तब देश कमजोर हुआ है। अब हमें इन विघटनकारी ताकतों और विध्वंस कारी शक्तियों को नियंत्रण में लाकर इन्हें देश से बाहर भगाना होगा और इन पर प्रभावी नियंत्रण कर के देश की संप्रभुता एकता को बनाए रखना होगा। इसके लिए देश के संचार माध्यम, मीडिया, साहित्यकारों, कलाकारों को राष्ट्रीय एकता के लिए अपने को समर्पित भाव से सामने लाकर देश की सेवा करनी होगी।
]]>यह ऐसा तो है नहीं कि अति वर्षा कई सालों में एक बार होती हो, वर्षा, बाढ़ तथा लैंडस्लाइडिंग का प्रकोप हर वर्ष अखबारों में हम पढ़ते हैं और लोगों की मृत्यु होती है तो ऐसे में केंद्र तथा राज्य सरकारों को आपस मैं सामंजस्य कर इस त्रासदी तथा विपदा का पहले से प्रबंध करने की आवश्यकता होनी चाहिए जिससे आमजन को जान माल का कम से कम नुकसान हो सके ।
आपदा सदैव अनअपेक्षित घटना होती है। जो मानवीय नियंत्रण से बाहर तथा प्राकृतिक व मानवीय कारकों द्वारा मूर्त रूप दी जाती है। प्राकृतिक आपदा अल्प समय में बिना किसी पूर्व सूचना के घटित होती है, जिससे मानव जीवन के सारे क्रियाकलाप अवरुद्ध हो कर,जान और माल की बड़ी हानि होती है ।आपदा की गहनता, विशालता एवं निरंतरता मानव जीवन तथा समाज, देश को बड़ी हानि पहुंचाते हैं, एवं उस देश की आर्थिक स्थिति में गहरी चोट करते हैं। इन प्राकृतिक आपदाओं से देश की प्रगति पर चोट पहुंचती है। तथा राष्ट्र को आर्थिक रूप से बहुत पीछे खींच कर ले जाती है।
आपदा प्रबंधन में जापान से सीख ली जा सकती है। क्योंकि जापान आपदा प्रबंधन में विश्व में अग्रणी देश माना जाता है। जापान पृथ्वी के ऐसे क्षेत्र में अवस्थित है, जहां भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी जैसी प्राकृतिक आपदाएं सदैव आती रहती हैं। जापान में आपदा प्रबंधन की अत्याधुनिक तकनीक को याकोहामा रणनीति कहा जाता है।
जापान में आपदा प्रबंधन की साल भर नियमित रूप से मॉनिटरिंग कर एक्सरसाइज की जाती रहती है, एवं आपदाओं पर निरंतर निगरानी तथा नजर रखी जाती है,एवं इसके निदान के लिए पूर्व से ही सुनियोजित योजना बनाकर नागरिकों को सुरक्षित कर लिया जाता है। भारत को भी इसी तरह आपदा प्रबंधन को अपनाकर हमें बाढ़, अतिवृष्टि, लैंडस्लाइडिंग तथा भूकंप से पूरी क्षमता कथा विशेषताओं के साथ सामना करना चाहिए।
आपदाओं के प्रति मानवीय सभ्यता के संदर्भ में समाज के आर्थिक सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग को ज्यादा प्रभावित करती है। एवं समाज का सबसे संवेदनशील तबका यानी वृद्ध व्यक्ति, महिलाएं, बच्चों, दिव्यांग लोगों को प्राकृतिक आपदाओं से सबसे ज्यादा खतरा बना रहता है। आपदा के समय सबसे ज्यादा निम्न आय वर्ग का व्यक्ति तथा मजदूर तबके का व्यक्ति सबसे ज्यादा प्रभावित होकर उसकी दिनचर्या समूह रूप से छिन्न-भिन्न हो जाती है, एवं आर्थिक साधन भी नष्ट हो जाते हैं, जिससे उसे आजीविका का एक बड़ा भय सताने लगता है।
भारत के भू भाग का लगभग 58% क्षेत्र भूकंप की संभावना वाला क्षेत्र है, जिसमें हिमालयिन क्षेत्र,पूर्वोत्तर राज्य, गुजरात का कुछ क्षेत्र, अंडमान निकोबार द्वीप समूह भूकंप की दृष्टि से सबसे सक्रीय क्षेत्र रहें है। देश के 65 से 68% भूभाग पर कभी कम कभी ज्यादा भीषण रूप से सूखा पड़ता है, इसी तरह भारत के पश्चिमी और प्रायद्वीपीय राज्य में मुख्यतः शुष्क तथा अर्ध शुष्क न्यून नमी वाले क्षेत्र सूखे से सदैव प्रभावित रहते हैं।
बाढ़ से प्रभावित भूमि का विस्तार क्षेत्र देश के 12% है, यानी 7 करोड़ हेक्टेयर जमीन में भूकंप आने की संभावना सदैव बनी रहती है। हिमालय क्षेत्र देश के पर्वतीय क्षेत्र मैं भूस्खलन की गंभीर समस्या की संभावना सदैव बनी रहती है। देश के विशाल तटवर्ती क्षेत्र में चक्रवात तथा सुनामी की भयावह स्थिति की संभावना सदैव बनी रहती है।
अब भारत में विश्व के साथ-साथ करोना संक्रमण की भयानक महामारी से प्रभावित होकर हजारों लाखों नागरिकों की जान गवा कर इस आपदा से जंग लड़ रहा है, यह कोविड-19 की महामारी या आपदा प्राकृतिक है या मानव निर्मित यह तो भविष्य ही बताएगा, किंतु इस महामारी ने पूरे वैश्विक स्तर पर आकस्मिक रूप से मानव जीवन में मृत्यु का तांडव मचा के रख दिया है।
ऐसी ही अनपेक्षित आपदाओं का पूर्वानुमान अथवा आकलन किया जाना पहले से संभव नहीं हो सकता है। ऐसे में राष्ट्रीय अन्य योजनाओं के साथ-साथ आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर अत्यधिक सावधानी पूर्वक योजना तथा विभाग बनाने चाहिए, देश में जापान जैसे देश की तरह आपदा प्रबंधन से निपटने के लिए अत्याधुनिक आपदा प्रबंधन सिस्टम को तैनात कर तैयार रखने की आवश्यकता होगी।
भारत को आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विभाग को चुस्त-दुरुस्त तथा अत्याधुनिक तकनीक से युक्त रखने की आवश्यकता है। तूफानी चक्रवात,सुनामी,भूस्खलन, भूकंप, सूखा बाढ़ के अलावा अब कोविड-19 यानी करोना संक्रमण जैसी खतरनाक बीमारियां भारत देश को अपना निशाना बना कर रखा है ।
ऐसे में भारत में मध्यम दर्जे का या निम्न दर्जे का आपदा प्रबंधन सिस्टम किसी भी काम का ना रहेगा, एवं इससे भारी जानमाल की हानि होने की संभावना सदैव बनी रहेगी। भारत में आपदा प्रबंधन के लिए 1990 में कृषि मंत्रालय के अंतर्गत डिजास्टर मैनेजमेंट सेल स्थापित किया गया था। लेकिन 1993 में लातूर के भूकंप तथा 1998 में मालपा के भूस्खलन तथा 1999 में ओडिशा में सुपर साइक्लोन तथा 2001 में भुज के भूकंप के बाद देश में एक मजबूत आपदा प्रबंधन की व्यवस्था की जरूरत को महसूस करते हुए जे,सी, पंत जी की अध्यक्षता में हाई पावर कमेटी की रिपोर्ट में एक सुव्यवस्थित तथा व्यापक सिस्टम तथा विभाग की स्थापना की आवश्यकता प्रतिवेदित की गई थी।
2002 में आपदा को देश की आंतरिक सुरक्षा का मामला मानते हुए आपदा को गृह मंत्रालय के अंतर्गत समाविष्ट किया गया। आपदा प्रबंधन के इतिहास में 2005 में एक बड़ा परिवर्तन लाया गया भारत सरकार ने आपदा को अपनी कार्ययोजना के एक चक्रीय क्रम के रूप में प्रबंधित किया, जिसमें आपदा आ जाने के बाद इसके बचाव, नुकसान की भरपाई, निदान तथा आपदा आने के पूर्व की तैयारी तथा योजना को मूर्त रूप देने का एक सुनियोजित तरीका तैयार किया गया था।
आपदा से खतरे का स्तर सभी इंसानों के लिए सदैव एक जैसा होता है। किंतु समाज के विभिन्न वर्गों में खतरे से निपटने तथा जूझने की क्षमता अलग-अलग होती है। निम्न वर्ग का तबका अन्य लोगों की अपेक्षा आपदा से ज्यादा प्रभावित होता है। अतः सरकार को गरीब तथा वंचित वर्ग के तबके के लिए आपदा प्रबंधन में विशेष प्रावधान दिया जाना चाहिए।
आपदाओं के प्रबंधन एवं अनुसंधान व त्वरित कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान तथा राष्ट्रीय आपदा कार्रवाई बल का गठन किया गया है। यह आपदा राशि कार्रवाई बल पर किसी खतरनाक आपदा की स्थिति में रासायनिक, जैविक, परमाणु विकिरण तथा अन्य प्राकृतिक एवं मानव निर्मित आपदा के संबंध में विशिष्ट कार्यवाही के निर्वहन का उत्तरदायित्व है। ईस संस्था ने बंगाल तथा उड़ीसा के तटीय क्षेत्र में आई सुनामी में काफी बड़ी संख्या में लोगों की जान भी बचाई है।
चक्रवाती तूफान से निपटने में हमारे समुचित प्रयासों ने यह सिद्ध कर दिया है कि हाल के वर्षों में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। परंतु पिछले 1 वर्षों से करोना संक्रमण से हुई बड़ी संख्या में मृत्यु ने देश को हिला कर रख दिया है। और कोविड-19 की प्रथम लहर के बाद द्वितीय लहर ने मृत्यु का तांडव मचा कर देश में हाहाकार मचा दिया है ।
कोविड-19 की पहली लहर के बाद एवं दूसरी लहर के मध्य देश के आपदा प्रबंधन सिस्टम को पहले से ही सावधान तथा सचेत रहकर पूरी की पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए थी ।अगर आपदा प्रबंधन सिस्टम को लगातार मॉनिटर किया जाता एवं उस सिस्टम के अधिकारी जिम्मेदार व्यक्ति सचेत एवं सजग रहते, तो द्वितीय लहर में इस तरह हड़कंप संक्रमण एवं मृत्यु का सामना नहीं करना पड़ता।
भारत को आपदा प्रबंधन के सिस्टम पर फिर से आंकलन कर एक नई व्यूह रचना बनाकर गरीब तबके निचले व्यक्ति तथा समग्र रूप से मानव जाति की सुरक्षा के लिए नए-नए उपाय करने चाहिए। क्योंकि आपदा कभी बताकर नहीं आती।इसी तरह कोविड-19 की तीसरी लहर की आशंका को ध्यान में रखते हुए हमें इसकी तैयारी पूर्व से ही कर लेना चाहिए अन्यथा हाथ मलने के अलावा अपने पास कुछ ना रह जाएगा।
]]>वैदिक दर्शन और अध्यात्म दर्शन भारतीयता का ऐतिहासिक परिचायक है। आध्यात्मिक शक्ति एवं वैदिक ऊर्जा के कारण भारत के महापुरुष सदैव सच्चरित्र और ब्रह्मचर्य का पालन करते आए हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने भी सत चरित्र को अपने जीवन का अंग बना कर अनेक वैदिक ग्रंथों की रचना भी की है जो प्रत्येक भारतीय जनमानस के लिए मार्गदर्शक ग्रंथ बन गए हैं।
रामकृष्ण परमहंस, मां शारदा, विवेकानंद, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं अनेक ऐसे विद्वान हैं जिन्होंने सत्चरित्र और अध्यात्म के दम पर भारत को विश्व में सर्वोच्च मुकाम भी दिलाया है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा है की सच्चरित्र केवल एक व्यक्ति का ना होकर संपूर्ण राष्ट्र का होना चाहिए।
अनेक यूरोपीय विद्वानों ने और भारतीय अध्यात्म के मनीषियों ने सत और चरित्र को अपने जीवन में आत्मसात करने के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए और दोनों को मिलाकर सत्चरित्र शब्द को बड़े विस्तार से समझाया है। अध्यात्म और योग शक्ति ही मनुष्य को सच्चरित्र बनाने में हमेशा मददगार रही है क्योंकि अध्यात्म से व्यक्ति की एकाग्रता तथा ज्ञान में वृद्धि होकर मन ईश्वर के प्रति श्रद्धानवत होता है और ईश्वर के प्रति जो व्यक्ति अगाध श्रद्धा रखता है वह सदैव अपने चरित्र के प्रति विशेष सावधान रहकर सच्चरित्र व्यक्तित्व ही बनाता है।
यह कहावत एकदम सत्य प्रतीत होती है की “सद्गुण है सच्ची संपत्ति दुर्गुण बड़ी विपत्ति” यह तो निश्चित है की सदाचारी परोपकारी संयमशील, इमानदार ,निष्ठावान नागरिक सच्चरित्र होकर एक महान राष्ट्र को जन्म देता है ।वहीं दुष्ट चरित्र व्यक्ति काम, क्रोध, कामना और लालच में पड़कर अपनी जिंदगी को नर्क बना कर दिया सदैव अशांत रहता है, अशांत नागरिक किसी भी कार्य में स्थिरता अथवा प्रगति प्रदान नहीं कर सकता है, वह अपने समाज तथा देश को कमजोर करने का ही कार्य करता है।
धन और संपत्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण चरित्र को बलवान बनाने वाली आध्यात्मिक शिक्षा ही है। धन-संपत्ति नष्ट होने पर किसी भी व्यक्ति का बड़ा नुकसान नहीं होता पर यदि चरित्र चला जाए तो उसका सम्मान यश तथा सामाजिक स्थिति एकदम निकृष्ट बन जाती है उसका समाज में अपमान होने लगता है, ऐसे में कोई भी व्यक्ति या नागरिक समाज में सिर उठाकर नहीं चल सकता ।ऐसा व्यक्ति समाज के उत्थान में कोई योगदान देने के काबिल नहीं रह जाता।
इसलिए मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी एवं महत्वपूर्ण आवश्यकता आध्यात्मिक शिक्षा एवं चरित्रवान जीवन है। सुभाष चंद्र बोस,महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, सरोजनी नायडू और अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में सच्चरित्र जीवन और मानसिक आध्यात्मिक शक्ति एवं ऊर्जा के कारण ही स्वतंत्रता संग्राम में पराधीन भारत को स्वतंत्रता दिलवाई थी।
किसी भी देश के नागरिक को एक दिन में सच्चरित्र नहीं बनाया जा सकता बल्कि बालकों को बाल्यकाल से ही नैतिक शिक्षा से शिक्षित किया जाकर सदाचार का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। यह सर्वविदित है कि मनुष्य के चरित्र और व्यक्तित्व पर देश परिस्थितियां शिक्षा और समाजिक व्यवहार का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है और नैतिकता सदाचार का पाठ किसी भी व्यक्ति को एक दिन में नहीं पढ़ाया जा सकता है।
दुष्ट चरित्र पुरुष समाज में कभी भी प्रसिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता सदैव अपनी बदनामी के कारण सिर झुका कर छुप कर घूमता है, इसीलिए भारतीय चिंतकों, मनीषियों ने लिखा और कहा है की चरित्र सदाचार की रक्षा मनुष्य को संपूर्ण प्रयास कर निरंतर करते रहना चाहिए। क्योंकि नागरिकों का नैतिक और सदाचारी स्वभाव और व्यवहार राष्ट्रीय संपत्ति होता है और यही संपत्ति राष्ट्र को एक सशक्त राष्ट्र और उत्कृष्ट देश बनाने में सदैव सहायक होता है।
आध्यात्मिक शिक्षा सदाचार सद्गुण और चरित्र यह मनुष्य के बहुत ही महत्वपूर्ण आंतरिक तत्व हैं और इसी से मनुष्य का सकारात्मक व्यक्तित्व निर्मित होकर महान राष्ट्र की पृष्ठभूमि को अवलंबित करता है। देश का सद्गुणी सदाचारी सच्चरित्र व्यक्ति है देश को विकास की ओर सदैव ले जा सकता है एवं एक सशक्त राष्ट्र भी बनाने में मदद करता है। इसलिए अध्यात्म चरित्र तथा नैतिक शिक्षा को किसी भी राष्ट्र में प्राथमिकता देकर पुष्पित और पल्लवित किया जाना चाहिए।
]]>कठिन तथा विषम परिस्थितियों में मनुष्य को अपने मनोबल को सदैव विनम्रता,संयम और साहस के साथ ऊंचा रखना चाहिए।अपने द्वारा की गई मेहनत पर विश्वास एवं निरंतरता रखनी होगी। तब जाकर ही जीवन में सफलता के पल आपके सामने आएंगे l निराशा, हताशा और हीन भावना को कठोर श्रम के बलबूते पर ही विजय प्राप्त की जा सकती हैl
जीवन में उतार-चढ़ाव, कठिन समय और विषम परिस्थितियां आती ही रहती हैंl संकट का समय विषम परिस्थितियां जीवन के अलग-अलग पहलू हैं ।इनसे जूझ कर जो मानव आगे बढ़ता है, वह उच्च मनोबल वाला साहसी व्यक्ति होता है। व्यक्ति के जीवन में साहस, उच्च मनोबल ही सफलता की कुंजी है।
जिस भी व्यक्ति ने विषमताओं में रास्ता निकलने का साहस करके आगे बढ़ने का प्रयास किया है वही सफल हुआ है। हमेशा सफलता का मूल आत्मविश्वास, कठिन श्रम और उच्च आदर्श वाले व्यक्ति की प्रेरणा ही सफलता दिलाने वाली होती है। मनुष्य को कभी भी किसी भी परिस्थिति में मन से हार नहीं माननी चाहिए।
उसे सदैव प्रयासरत रहकर परिश्रम तथा जुझारू पन से हर परिस्थिति का सामना कर सदैव अपने लक्ष्य के प्रति अग्रसर होते रहना चाहिए। मनुष्य को अपनी हर हार, हर पराजय से कुछ ना कुछ सीख लेनी चाहिए एवं इससे अनुभव प्राप्त कर फिर से खड़ा होने एवं उस पराजित मनोदशा से छुटकारा पाकर फिर से लड़ने की ऊर्जा एवं शक्ति प्राप्त करनी चाहिए, यह सफलता का बड़ा मंत्र है।
सर्वप्रथम मनुष्य अपने मनोबल से किन्हीं भी परिस्थितियों को जीतने का साहस रखता है, इसीलिए मनोबल मनुष्य की पहली आवश्यकता है। मनोबल ही साहस को जन्म देता है और साहस, आत्मबल को और आत्मबल से ही मनुष्य किन्हीं भी परिस्थितियों से जूझना एवं टकराने की क्षमता पैदा करता है।
जब मनुष्य के पास खोने के लिए कुछ ना हो तो वह निश्चिंत होकर साहस, क्षमता एवं संयम से आगे बढ़ने का प्रयास करता है, क्योंकि वह जानता है की पीछे पलट कर उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, शिवाय आगे बढ़ने एवं सफलता के लिए अग्रसर होने के। मनुष्य का मनोबल एवं दृढ़ प्रतिज्ञा ही मनुष्य को सदैव आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देते रहते हैं।
मनुष्य के जीवन का एक तथ्य और भी अत्यंत महत्वपूर्ण है वह है सकारात्मक सोच, जो उसे हमेशा आगे बढ़ने की ओर उत्साहित करती रहती है। सकारात्मक सोच एवं किसी भी परिस्थिति को अपने नियंत्रण में लाने की सुनियोजित योजना मनुष्य में आशाओं को भर देती है एवं परिस्थितियों को चुनौती देने की क्षमता का विकास करती है।
यह मनुष्य ही है जो हर परिस्थिति में साहस और मनोबल के दम पर उससे विजय प्राप्त करता है। मनुष्य के जीवन और पशु के जीवन में यही फर्क है कि मनुष्य के पास सोचने के लिए मस्तिष्क होता है और वह उसके सकारात्मक उपयोग के साथ आगे बढ़ने की क्षमता रखता है। मनुष्य मुस्कुराता, हंसता और खिलखिलाता है। जबकि पशु में मुस्कुराने हंसने की क्षमता नहीं होती, और यही कारण है कि मनुष्य ने विषम परिस्थितियों पर सदैव विजय प्राप्त करने का प्रयास किया है, वह काफी हद तक सफलता पाने में सफल भी हुआ है।

इस तरह वह अगली परीक्षा में जरूर सफल होता है और यही मानव जीवन का सफल अध्याय भी होता है। कुल मिलाकर परिस्थितियां तथा घटनाएं ,दुर्घटनाएं मनुष्य को परिस्थितियों के सामने पराजित करने, झुकाने की कोशिश करती हैं किंतु मानव अपने शारीरिक, मानसिक, नैतिक, चारित्रिक एवं मानसिक आत्मबल से उसे सफलता में बदल देता है।
अनवरत प्रयासरत व्यक्ति अपने साहस परिश्रम से हर चुनौतियों का सामना कर परिस्थितियों में विजय प्राप्त कर अपने जीवन को सफलता के शिखर पर पहुंचाता है। जीवन में कठिन परिस्थितियों से जूझ कर जो मानव सदैव सफल होता है वह पूरे समुदाय और समाज के लिए एक प्रेरणादाई व्यक्तित्व बन कर पूरे समाज एवं देश को मार्गदर्शन भी प्रदान करता है।
इसीलिए मनुष्य को किन्हीं भी परिस्थितियों में, खासकर विषम परिस्थितियों में अपने मनोबल और साहस को त्यागना नहीं चाहिए। उच्च मनोबल और साहस की ऊर्जा ही मनुष्य को नई दिशा, नए प्रकाश पुंज की ओर अग्रसर करती है।
]]>आत्मनिर्भरता केवल मनुष्य के लिए व्यक्तिगत रूप से ही जरूरी नहीं है, बल्कि राष्ट्र के लिए भी अति आवश्यक है ।एक स्वतंत्र राष्ट्र अपनी जनता को अपनी क्षमता के अनुसार सारी सुविधाएं तथा अन्य जीवन उपयोगी साधन उपलब्ध करा सकता है।
भारत स्वतंत्रता के बाद हरित क्रांति सातवें दशक के प्रारंभ के बाद ही खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन सका, इसके साथ ही भारत में खुशहाली की स्वाभाविक तौर पर वृद्धि हुई, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी कहा था कि “एक राष्ट्र की शक्ति उसकी आत्मनिर्भरता में है दूसरों से उधार लेकर काम चलाने में नहीं”,पाकिस्तान की स्थिति बिल्कुल ऐसी ही है वह अभी तक स्वतंत्रता के बाद से 75 वर्ष के बाद भी संपूर्ण रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है, वह कर्जे से डूब गया है और अपने देश में खर्चा चलाने के लिए पूरी दुनिया से उधार मांगते हुए घूम रहा है।
पाकिस्तान आत्मनिर्भर नहीं होने का एवं उधार की जिंदगी जीने का एक बहुत बड़ा उदाहरण है। जबकि भारत देश विज्ञान, टेक्नोलॉजी, मेडिकल साइंस,इंजीनियरिंग और कृषि सेवा, खनिज,स्पेस रिसर्च में पूर्णता आत्मनिर्भर होकर विकसित देशों के बराबर खड़ा हुआ है। यह देशवासियों और देश के लिए अत्यंत गौरव का विषय है। आत्मनिर्भरता या स्वावलंबन किसी भी देश की प्रगति विकास तथा और उसके नागरिकों की जिंदगी की जिजीविषा है जिससे वह संघर्ष कर आगे बढ़ता है।
इतिहास गवाह है कि किसी भी महान लेखक को महान बनने तक निरंतर मेहनत कर किताबें लिखने का का श्रम करना पड़ा एवं आत्मनिर्भरता की स्थिति में विचार कर अपने विचारों को लिपिबद्ध करना पड़ा तब जाकर वह महानता की श्रेणी को प्राप्त कर सका। इसी तरह कोई छात्र अपने जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है तो उसे स्वयं परीक्षा में शामिल होना पड़ेगा एवं परीक्षा में मनोवांछित सफलता प्राप्त कर उसे स्वयं अध्ययन करना होगा। इसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र में भी मनुष्य को आत्मनिर्भर होकर मेहनत कर दीक्षित सफलता प्राप्त करनी पड़ेगी।
हमारा देश भारत भी आजादी के बाद से आत्मनिर्भरता की ओर अग्रेषित हुआ आज स्थिति यह है कि वह विश्व में विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ खड़ा हुआ है। तमाम महापुरुषों के जीवन से भी हमें आत्मनिर्भरता तथा स्वावलंबन की शिक्षा मिलती रहती है।महात्मा गांधी अपना कार्य स्वयं किया करते थे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी “दैव दैव आलसी” पुकारा है, तब जाकर उनकी जिंदगी पटरी पर आई और हमें परिश्रम कर आत्म निर्भर होने की शिक्षा प्रदान की थी।
दूसरों पर निर्भरता हमें दूसरों का अनुसरण करने के लिए मजबूर करती है। दूसरों पर निर्भर होने से हमें के अनुरूप ही जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ता है। पराधीनता हमारा आत्मविश्वास सृजनशीलता सोचने की शक्ति को नष्ट कर देती है। गुलामी एक अभिशाप होती है, आत्मनिर्भरता की कमी हमें किंकर्तव्यविमूढ़ बना देती है।
दूसरों की कृपा पर जीने वाला व्यक्ति जीवन के अक्षय आनंद से वंचित रहता है। खुद के परिश्रम श्रम से आगे बढ़ने वाला देश या व्यक्ति या समाज सदैव प्रफुल्लित आत्म विश्वासी तथा विकास की ओर सदैव अग्रसर रहता है। हमें सदैव अपने अंदर के आत्मविश्वास, छिपी हुई क्षमताओं मनोबल का सहारा लेकर आत्मनिर्भर या स्वावलंबी बनने का प्रयास हमेशा करते रहना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य को मनुष्य होने का अधिकार प्राप्त होता है। पराधीन देश सामान्य व्यक्ति सदैव पशु तुल्य होते हैं। जिनका अपना कोई विचार या व्यक्तित्व नहीं हो सकता है। कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता –
राम सहायक उनके होते,
जो होते हैं, आप सहायक,
हम सबको स्वयं पर भरोसा रखना आत्मबल बढ़ाने तथा आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा देती रहती हैं।
और एक होने की भावना अन्य सभी तत्वों कारको से अधिक प्रभावशाली और राष्ट्रीय निष्ठा सभी अस्मिताओं से ऊपर तथा श्रेष्ठ होती है। देश के विकास, समृद्धि और आर्थिक क्षेत्र की तथा सामरिक विदेशी शक्ति के विरुद्ध मातृभूमि की रक्षा भी राष्ट्रवाद का एक प्रमुख घटक माना जाता है। पर राष्ट्रवाद को किसी भी स्थिति परिस्थिति में धर्म या जाति से कतई ना जोड़ा जाए, राष्ट्रवाद सार्वभौमिक रूप से जातीय संगठन और धर्म से बहुत ऊपर होता है।
राष्ट्रवाद या राष्ट्रप्रेम के अंतर्गत किसी व्यक्ति विशेष के प्रति आस्था समाहित नहीं होती। राष्ट्रीयता की भावना में देश के प्रति लगन भक्ति तथा समर्पण ही राष्ट्रवाद को जन्म देता है, और राष्ट्रवाद के अंतर्गत धर्म, जाति, वर्ग विभेद राजनीतिक विचारधारा नही होती है।राष्ट्रवाद की अनेक विचारको ने राष्ट्रवाद को राष्ट्र के अंदर राजनीतिक तथा आर्थिक संदर्भों से जोड़ा है।
इतिहास के प्रमुख विचारक “बेनेडिक्ट एंडरसन”ने कहा है कि राष्ट्रवाद को राजनीतिक विचारधारा से जोड़ने के बजाए उसे सांस्कृतिक विचारधारा से जोड़ा जाना चाहिए। राष्ट्रप्रेम को सामूहिक जन के एकीकरण तथा राष्ट्रीय चेतना के विकास को प्रबल करने की एक जन धारा माना गया है। राष्ट्रप्रेम से स्पष्ट हो जाता है की राष्ट्रीय चेतना एवं सामुदायिकता को एक सूत्र में पिरोने का काम राष्ट्रवाद ही कर सकता है।
राष्ट्रवाद की अवधारणा स्वतंत्रता के पूर्व स्वतंत्रता के लिए सभी वर्गों का एकजुट हो जाना तथा वर्ग भेद को मिटाना एवं आपस में आर्थिक सहयोग कर राष्ट्र की अस्मिता को जीवित या पुनर्जीवित करने का कार्य ने ही राष्ट्रप्रेम तथा राष्ट्रवाद को जन्म दिया है। राष्ट्र के रूप में भारत मैं विविध भाषाओं अनेक धर्मों अनेक जाती और प्रांतों का समूह है।
भारत में राष्ट्रवाद के अंतर्गत राष्ट्र की अपनी एक विशिष्ट अवधारणा विकसित की जिसमें बहुजातीयता, धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता जैसे मूल्यों को सहेज कर भारतीय राष्ट्रवाद को जन्म दिया है,जोकि अत्यंत गौरवशाली एवं महत्वपूर्ण है। राष्ट्रप्रेम में व्यक्तिगत या सामूहिक देश के प्रति भक्ति न्योछावर और अपने व्यक्तिगत हितों से बढ़कर राष्ट्रीय चरित्र निर्माण को ही सम्मिलित किया गया हैं, जिससे राष्ट्र दृढ़, समृद्ध और विकासशील होता है।
जिससे राष्ट्रीय संपत्ति सीमाओं और विदेशी आक्रमण के समय राष्ट्र की रक्षा प्रमुख तत्व होते हैं। भारत एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक, प्रजातांत्रिक देश है। राष्ट्रवाद पर राष्ट्रप्रेम भारत के संदर्भ में और गहरा तथा महत्वपूर्ण इसी लिए भी है कि भारत में विभिन्न समुदाय, जाति, धर्म और बोली के लोग निवासरत हैं, एवं भारत के परंपरागत दुश्मन भी युद्ध के लिए घात लगाए बैठे हैं, ऐसे में भारत को विशाल जनसंख्या तथा देश के अंदर फैले बहुत बड़े भूभाग की रक्षा के लिए राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा को मजबूत किए जाने की अत्यंत आवश्यकता है।
ऐसे में भारत के लिए राष्ट्रवाद एक अमोघ अस्त्र की तरह आमजन को एक सूत्र में बांधे रखने देश के प्रति निष्ठा रखने और विपरीत परिस्थितियों में एकजुट होने की प्रेरणा देने के लिए राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रेम की बहुत ज्यादा आवश्यकता होगी। वैसे तो भारत का इतिहास अनेक महापुरुषों,बड़े-बड़े सम्राटों और योद्धाओं की राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण है। पूंजीवाद,मार्क्सवाद और राष्ट्रप्रेम के प्रति पश्चिम के विद्वानों की राय और अवधारणाएं अलग-अलग हैं ।
यूरोपीय विचारकों के अनुसार राष्ट्रप्रेम के कई ऋणात्मक पहलू भी है, भारत राष्ट्र के संदर्भ में राष्ट्रवाद, राष्ट्रप्रेम को सकारात्मक रूप से लेना चाहिए, पर राष्ट्रप्रेम की अवधारणा में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में शासकीय प्रशासक की हठधर्मिता को ना मानना लोकतांत्रिक संगठन में राष्ट्र धर्म का विरोध नहीं माना जाना चाहिए, तभी राष्ट्रप्रेम अथवा राष्ट्रवाद की अवधारणा को सामूहिक रूप से बल मिलेगा और प्रजातांत्रिक संगठन भविष्य में लंबे समय तक जीवित रह सकता है।
]]>आज भी महिलाएं सामाजिक राजनीतिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक सभी मोर्चों और सवालों पर पुरुषों के समकक्ष संघर्ष करती नजर आ रही हैl आज राष्ट्र निर्माण में नारी अपनी भूमिका से न केवल परिचित है बल्कि उसकी गंभीर जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिए भी तत्पर व सक्षम हैl वर्तमान में भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैl भारत विकास की दर आज बड़ी से बड़ी वैश्विक शक्ति से टक्कर लेने की जद पर हैl
विकास की गाथा में देश की आधी आबादी यानी महिलाओं की भूमिका बढ़ती जा रही हैl अनेक सामाजिक आर्थिक विसंगतियों के बावजूद आज हर मोर्चे पर महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी होती दिखाई दे रही हैl यह आत्मविश्वास उन्हें सदियों के संघर्ष के बाद हासिल हुआ है, प्राचीन काल में अपाला तथा गोसा जैसी विदुषी महिलाओं ने अपनी कीर्ति पताका फैलाई थी, भारतीय समाज में उन्हें सम्मान और बराबरी का दर्जा दिया गया है ,परंतु मध्यकाल में भारत अपनी संकुचित एवं संकट दृष्टि का शिकार हो गया था महिलाओं को घर की चारदीवारी में क्या होना पड़ा थाl
इसी के साथ कैद हो गई थी उनकी योग्यता,ऊर्जा,शक्ति, आकांक्षाएं और व्यक्तित्व विकास की संभावनाएंl भारत एवं भारत के बाहर विदेशों में भारतीय मूल की ऐसे सैकड़ों महिलाएं हैं जिन्होंने भारत देश का नाम रोशन किया है उनके नाम की सूची बड़ी लंबी है उनका उल्लेख न करते हुए समग्र रूप से उनका नमन करते हुए यह बताना चाहूंगा कि महिलाएं निरंतर उच्च पदों पर आसीन हो रही है इन सब के साथ सबसे पुराने बजट तथा घर के अर्थशास्त्र को संभालने की भूमिका का भी कुशलतापूर्वक सदियों से प्रबंधन करती आ रही हैl
इसके साथ ही वे अपनी शैक्षणिक योग्यता में निरंतर सुधार कर रही है जनसंख्या गणना के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं, महिलाएं जहां शिक्षा, प्रशासन,मेडिकल क्षेत्र, इंजीनियरिंग, स्पेस रिसर्च, विज्ञान टेक्नोलॉजी और उद्यानिकी ,एग्रीकल्चर, सेरीकल्चर और तमाम क्षेत्रों में असाधारण रूप से शिक्षा प्राप्त कर प्रगति कर रही और उच्च पदस्थ होकर कार्यों का कुशलता से संपादन कर रही हैंl सामाजिक कुरीतियों के विरोध में समाज को आगाह करने और उसका विरोध करने में भी महिलाएं पीछे नहीं है, फिर चाहे वह शनि सिंगनापुर हाजी अली दरगाह या तीन तलाक के मामले में इनकी सजगता ने सामाजिक परिवर्तन लाया है।
सरकार भी इनकी इस भूमिका को स्वीकार करते हुए थल जल और वायु सेना में युद्धक की भूमिका मैं इनकी नियुक्ति कर रही है। हम यदि राजनीतिक क्षेत्र की चर्चा करें तो पंचायती स्तरों पर महिला प्रधानों ने गंभीर परिवर्तन के प्रयास किए, किंतु हमें यहां हमेशा स्मरण रखना चाहिए की देश के आर्थिक विकास में अभी भी महिलाओं को वह भागीदारी व सम्मान नहीं मिल पा रहा है जिसके लिए वह पूर्णरूपेण हकदार है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया की श्रम बल भागीदारी में महिलाओं की भागीदारी 25% से भी कम हो गई है।
महिलाओं को अनेक सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक एवं मनोवैज्ञानिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं को समान पदों पर कार्यरत पुरुषों की तुलना में कम वेतन दिया जाता है तथा अधिकांश शीर्ष पदों पर पुरुषों का कब्जा है के अलावा दुनिया की सबसे कम तनखा वाली नौकरियों में 60% महिलाएं ही हैं।
महिलाओं द्वारा अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए कार्यस्थल पर कार्य करते हुए देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है ।इन परिस्थितियों में महिलाओं द्वारा दिए गए सामाजिक आर्थिक विकास के योगदान को पहचानते हुए सरकार ने मातृत्व लाभ अधिनियम 2016 तथा यौन उत्पीड़न अधिनियम 2013 के माध्यम से अनुकूल वातावरण तथा महिलाओं को मातृत्व अवकाश देने के कई अच्छे प्रावधान भी उपलब्ध कराए हैं।
इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड अपने आंकड़ों से स्पष्ट करता है की किस प्रकार महिलाओं की श्रमबल में अधिक भागीदारी जीडीपी में अप्रत्याशित वृद्धि करता है। पूरा विश्व इस बात से सहमत है की महिलाएं कोमल है पर कमजोर नहीं एवं शक्ति का नाम ही नारी है। हिंदुस्तान के विकास में सही मायने में यदि 50% भागीदारी महिलाओं की हो तो असाधारण क्षमता की धनी महिलाएं इस देश को विश्व के अन्य विकसित देशों में खड़ा कर सकती हैं, जरूरत इनकी शक्ति क्षमता एवं योग्यता को पहचानने की है। 21वीं सदी में विश्व शक्ति रूप भारत के सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक विकास में महिलाओं का सर्वांगीण विकास को आधार बनाकर आर्थिक महाशक्ति के स्वप्न को साकार किया जा सकता है।
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