याद कीजिए जियो ने जब टेलीकॉम इंडस्ट्री में कदम रखा था तो वह एक स्टार्टअप कंपनी की रूप में सामने आई थी और देखिये आज उसकी क्या हैसियत है। अब यह भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी बन गई है, जिसके पास 34 करोड़ उपभोक्ता हैं।
पिछले कुछ महीनों से रिलायंस जियो अपने जियो गीगाफाइबर प्लान पर काम कर रहा था और अब उसे भी लॉन्च कर दिया। जिसके जरिए आप तमाम एचडी और प्रीमियम चैनल देख सकेंगे। जियो ने तो यह भी ऑफर दे दिया है कि जिस दिन कोई मूवी रिलीज होगी, उसी दिन आप उसे अपने घर में बैठे-बैठे देख सकेंगे। यानी सिनेमाहॉल जाने की जरूरत नहीं होगी। यानी हो सकता है कि कुछ सिनेमाघरों में ताले लग जाएं। लेकिन मुकेश अंबानी ने जियो की वार्षिक जनरल मीटिंग में एक के बाद कई ऐसी घोषणाएं कर दी हैं, जो पूरे डिजिटल जगत के परिदृश्य को ही बदल कर रख देगा।
आइए अब यह भी जान लेते हैं कि जिओ की राह आसान बनाने वाला कौन है? हमारे जनमानस में एक धारणा घर कर बैठी है कि ट्राई जनता के हित में ही फैसला करती है और वह टेलीकॉम कंपनियों पर लगाम कसने के लिए ही कार्य कर रही है। जबकि असल में यह मानना ही नहीं चाहिए कि ट्राई जनता के हित में ही फैसला करती है। इसकी कई वजह भी हैं क्योंकि ट्राई के मैंडेट में ही लिखा है कि उसे जनता के साथ बाजार और सर्विस प्रदाताओं के हितों का भी ध्यान रखना है जिससे बाजार का संतुलित विकास हो सके।
पिछले साल के आखिर में ट्राई ने एक ऐसा आदेश दिया जिससे सालों से जमे जमाए केबल कारोबारियों का धंधा एक झटके में तबाही के कगार पर आ गया। ट्राई ने ऐसा नियम बनाया जिसके अनुसार फ्री टू एयर चैनल लेने पर भी ग्राहकों को न्यूनतम 154 रुपए चुकाने थे। ट्राई ने यह भी दावा किया कि नए नियम लागू होने के बाद ग्राहक सिर्फ उन्हीं चैनलों का पैसा देंगे, जिन्हें उन्होंने चुना है लेकिन जीएसटी समेत कैपिसिटी फीस ही 153 हो रही है और ऐसे में चुनिंदा चैनल लेने पर ही बिल आसानी से 300 रुपये के पार कर जाता है।
कुछ समय पहले रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने ट्राई के प्लान के बाद की परिस्थितियों पर एक सर्वे किया तो सामने आया कि इससे ग्राहकों का बिल 25 फीसदी या उससे ज्यादा बढ़ गया है। और उच्च मध्यवर्गीय घरों में जहां 2 या 2 से अधिक टीवी थे वहां तो यह बिल लगभग दोगुना आने लगा। कमाल की बात यह है कि जिस कदम से सबसे बड़ा फायदा ग्राहकों को मिलना वाला था उसके बजाए फायदा लोकप्रिय चैनलों को मिला। अभी तक फ्री टू एयर चल रहे कई सारे टीवी चैनलों ने खुद को पेड चैनल में परिवर्तित कर लिया है। उनका मुनाफा बढ़कर 94 रुपये प्रति महीने तक पहुंच गया।
पिछले साल ही रिलायंस केबल डीटीएच बिजनेस में उतरने की पूरी तैयारी कर चुका था और इधर ट्राई के आदेश के कारण ग्राहकों को डीटीएच की महंगी सर्विस लेने की आदत पड़ चुकी है यानी सारी परिस्थितियां जियो फाइबर के अनुकूल हैं
जियो गीगा फाइबर, फाइबर टु द होम यानी एफटीटीएच पर आधारित है। यानी जियो फाइबर एक ही केबल से टीवी सेटअप बॉक्स के साथ साथ इंटरनेट, टेलीफोन की भी सुविधा देगा। यानी पहले लोग वाई-फाई, टीवी और लैंडलाइन के अलग-अलग खर्च करते थे, वो अब नहीं करना पड़ेगा। इससे हाई स्पीड कनेक्टिविटी मिलेगी और ऑनलाइन स्ट्रीमिंग-गेमिंग भी पहले से बेहतर होगी। इसके अलावा स्मार्ट होम डिवाइस भी कनेक्ट कर सकेंगे।
हालांकि अभी प्लान की घोषणा नहीं हुई है लेकिन सूत्रों के अनुसार जियो फाइबर के प्लान 700 रु से शुरू हो रहे हैं जिसमें सिर्फ ब्रॉडबैंड की सुविधा बताई है, यानी आपको केबल वाली सुविधा वाला प्लान चाहिए तो शुरुआत में न्यूनतम 1000-1200 तक हर घर से मिल सकते हैं जिसे जियो के ग्राहक हंसकर देने को तैयार हो जाएंगे।
15 अगस्त पर बहुत सारी घोषणाएं की जा सकती हैं। कई अच्छी ख़बरें सुनने को मिल सकती हैं। लेकिन ट्राई का प्रतिस्पर्धा के माहौल को दरकिनार करना कई सवाल खड़े करता है। इसके बीच जियो गीगाफाइबर प्लान देश को एक विशेष दिशा में ले जाने वाला सबसे बड़ा कदम साबित होगा। वह जो दिखाएगा वही आप देखेंगे, वह जो बताएगा वही आपको पता होगा। आप एक कम्पनी की विचारधारा के अधीन हो जाएंगे क्योंकि यह व्यवस्था सत्तापक्ष को बहुत भाती है।
]]>साफ सफाई सभी की दिनचर्या का आवश्यक हिस्सा रहा है। पर देखने में ये आ रहा था कि सफाई का यह सिविक सेंस केवल घरों तक ही सीमित रहा है। आम नागरिक की सोच ये रही है कि मेरा घर साफ रहे बाकी सड़क, पार्क, पहाड़, नदी या तालाब गंदे होते हैं तो मेरी बला से। आजादी के बाद से ही अधिकांश नागरिकों का यह बेपरवाह नजरिया ही भारत खासकर उत्तर भारत के चुनिंदा शहरों को कुरूप बना रहा था। दक्षिण भारत हो या पूर्व या पश्चिम वहां के सभी शहर आज कचरे के ढेरों से घिरे नजर आते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ या ऐसे किसी शहर जहां पान का शौक हो, कोई कार्यालय, स्कूल, अस्पताल, पार्क, गली, बाजार ऐसा नहीं मिलेगा जहां पीक के दर्शन न हों। मनाही के बावजूद चोरी से पीक देने का कुटिल आनंद लेने वाले भी कम नहीं। आजकल कारों में अमिताभ बच्चन स्टाइल ओपन बार बना कर दूसरों के घरों के आगे चोरी से बीयर या दारू की बोतल, प्लास्टिक के गिलास और खाने की झूठी प्लेटें फेंक कर निकल लेने का नया चलन शुरू हुआ है।

यह काम वर्ष 2014 की गांधी जयंती से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो शुरू कर दिया है। उन्होंने हर देशवासी से स्वच्छ भारत अभियान का अंग बनने का आह्वान किया है। महात्मा गांधी ने कहा था कि क्लीन इंडिया बनाने के लिये हर देशवासी को हाथ से हाथ मिला कर कड़ी मेहनत करनी चाहिये। पर अगर हर देशवासी सफाई के प्रति लापरवाह हो जाये । तो कितने भी सफाई कर्मी तैनात कर लीजिये स्वच्छ भारत का सपना पूरा नहीं किया जा सकता। पहले बापू और अब मोदी ने खुद हाथ में झाडू़ लेकर देशवासियों को यह समझाने की कोशिश की है कि सफाई किसी एक वर्ग की ही जिम्मेदारी नहीं बल्कि हरेक शहरी का यह दायित्व बनता है कि कम से कम वो गंदगी तो न फैलाये। यह काम छोटे लोगों का ही नहीं सभी का है और बहुत बड़ा काम है।
इस विशाल अभियान को अंजाम तक पहुंचाने के लिये केन्द्र सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में भी कोई कोर कसर बाकी नहीं रख रही है। सभी सरकारी, गैर सरकारी और निजी प्रयासों को पूरी मदद देने को तैयार है। हरेक नागरिक को बस यह समझना होगा कि घर के साथ ही बाहर की सफाई एक सामाजिक जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि यह काम किसी एक के बस का नहीं है। देश के सवा सौ करोड़ देशवासियों को मिल कर ही यह काम करना होगा। गंदगी के कारण ही हर देशवासी हर साल पांच हजार रुपये दवाओं पर खर्च करता है। ऐसा विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है।
पर क्लीन इंडिया अभियान को साकार करने के लिये अभी लम्बा सफर तय करना है। हो सकता है कि आदत के गुलाम अधेड़ों को सफाई का सबक सीखने में परेशानी हो। ऐसे में इस अभियान का फोकस घर और स्कूल को भी बनाया जाना चाहिये। हर घर में माता पिता अपने बच्चों को शुरू से ही स्वच्छता का पाठ पढ़ायें साथ ही उन्हें यह सिखायें कि घर के बाहर भी स्वच्छता रखना उतना ही जरूरी है। अभिभावकों के साथ ही शिक्षक भी स्कूल में बच्चों को सफाई के मैनर्स सिखाये। पांच दस सालों के बाद जब यही बच्चे बड़े होकर समाज का हिस्सा बनेंगे तब नयी पीढ़ी क्लीन इंडिया या स्वच्छ भारत के संस्कार के साथ सामने आयेगी। हम भारतीय जब विदेशों में जाते हैं तो वहां सफाई के सारे कायदे कानून सिर झुका कर मान लेते हैं। पर अपने देश में कचरा फैलाने में शान समझते हैं। आइये ये मान लें कि क्लीन इंडिया सबकी जिम्मेदारी है।
]]>यकीनन राज्यसभा में जो भी गृहमंत्री अमित शाह ने कहा और किया यह वाकई बड़ा और बोल्ड कदम है क्योंकि अभी तक मोदी सरकार का रुख यह रहा है कि दो तिहाई बहुमत होने पर धारा 370 को हटाया जाएगा। दूसरी बात यह है कि अभी तक 370 को हटाने के लिए संविधान संशोधन की बात की जाती रही हैं। अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को लेकर कहा था कि सालों से बने रहने के चलते अब यह धारा एक स्थायी प्रावधान बन चुकी है, जिससे इसको खत्म करना असंभव हो गया है इसलिए सरकार के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चेलेंज जरूर किया जाएगा।
गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में जम्मू कश्मीर संशोधन विधेयक 2019 पेश किया और बहस के बाद पास भी हो गया। अनुच्छेद 35 ए और धारा 370 के एक खंड को छोड़कर बाकी को समाप्त कर दिया गया है। जम्मू-कश्मीर को विभाजित कर दिया गया है, अब लद्दाख और जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश होंगे। एक विधानसभा रहित और एक विधानसभा सहित। जहां तक 370 का सवाल है तो जब इसे लागू किया गया था, तभी इसे अस्थायी बनाया गया था। दशकों तक किसी भी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। अब जब सरकार ने इसे खत्म करने का फैसला किया है, तो तमाम राजनीतिक दल हो हल्ला कर रहे हैं। संविधान और कश्मीरी अवाम की दुहाई दे रहे हैं । पर उन्हें इतना तो सोचना ही चाहिए कि सरकार ने अगर इतना बड़ा फैसला लिया है तो संविधानिक और कानूनी पहलुओं का अध्ययन ज़रूर किया होगा।
अब इस फैसले से कई सारे बदलाव भी देखने को मिलेंगे। जम्मू-कश्मीर पहले राज्य था अब केंद्र शासित प्रदेश हो गया। मुख्यमंत्री का पद समाप्त हो गया। राज्यपाल का पद समाप्त हो गया। दिल्ली की तरह उपराज्यपाल का पद होगा और पुलिस केंद्र सरकार के पास होगी। जम्मू कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश होगा। लद्दाख अलग केंद्र शासित प्रदेश होगा। लद्दाख में विधानसभा नहीं होगी।
कश्मीर के मसले पर सरकार का ये क़दम निश्चित ही ऐतिहासिक और अभूतपूर्व तो है। इससे पहले किसी भी सरकार ने अनुछेद 370 को इस क़दर को हटाने का साहस या दुस्साहस कभी नहीं किया था। एक वजह यह भी थी कि बाक़ी सरकारें संवैधानिक तरीक़े से इससे पार पाने का दिखावा करती थीं जबकि इस सरकार ने संविधान के लूपहोल का फ़ायदा उठाकर ऐसा कर दिया। ठीक वैसे ही जैसे आर्टिकल 35-a को लाया गया था। साल 1954 में नेहरु मंत्रिमंडल ने राष्ट्रपति आदेश के ज़रिए इस आर्टिकल को लागू किया था, अब मोदी मंत्रिमंडल ने भी राष्ट्रपति आदेश के ज़रिए ही इसे हटा दिया है।
लेकिन संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है कि प्रस्ताव में अनुच्छेद 370 को पूरी तरह से नहीं हटाया गया है। उनके मुताबिक, अनुच्छेद 370 तीन भागों में बंटा हुआ है। जम्मू-कश्मीर के बारे में अस्थाई प्रावधान है जिसको या तो बदला जा सकता है या फिर हटाया जा सकता है।
वहीं अमित शाह के बयान के मुताबिक 370(1) बाकायदा कायम है सिर्फ 370 (2) और (3) को हटाया गया है। दरअसल 370(3) में प्रावधान था कि 370 को बदलने के लिए जम्मू और कश्मीर संविधान सभा की सहमति चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि 35A के बारे में यह तय नहीं है कि वह खुद खत्म हो जाएगा या फिर उसके लिए संशोधन करना पड़ेगा।
इस आदेश के बाद राज्य के पुनर्गठन की राह भी अब आसान हो चली है जो संघ की पुरानी चाहत है। लेकिन मूल सवाल वहीं खड़ा है। कश्मीर का जो विलय कुछ तकनीकी ख़ामियों के चलते ‘विशेष’ माना जाता है, क्या वह सारी कमियां सिर्फ़ एक राष्ट्रपति आदेश से दूर हो जायेंगी? इस आदेश से आर्टिकल 35a तो ख़त्म हो जाएगा लेकिन कश्मीर को मिले कई अन्य विशेषाधिकार बरक़रार रहेंगे।
इन तकनीकी पहलुओं के अलवा सबसे अहम बात है घाटी का माहौल। ये किसी से छिपा नहीं है कि घाटी में आम युवा ख़ुद को भारत से उस तरह जुड़ा हुआ नहीं मानता जैसे अन्य भारतीय मानते हैं। उसके मन में भारत के प्रति कई सवाल हैं। ऐसी मनोदशा वाले युवाओं के बीच इस फ़ैसले के क्या परिणाम होंगे, अंदाज़ा लगाना ज़्यादा कठिन नहीं है।
]]>विशेषकर तब जब देश के स्थापित नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री द्वारा अनैतिक व असंवैधानिक ही नहीं बल्कि अवैज्ञानिक टिप्पणी की जाती है तो उन युवाओं की राजनीति में कमी खलती है जो नैतिक, संवैधानिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ-साथ शिक्षित भी हैं और समझदार भी।
इसका एक कारण यह है कि भारत में राजनीती का माहौल दिन प्रतिदिन दिन बिगड़ रहा है और सच्चे राजनीती लोगों की जगह सत्ता लालसा और धन के लालची लोगों ने ले ली है। ऐसे हालातों में देश के युवाओं को ही खुद देश के लिए कुछ कर गुजरने के पाठ पढ़ने होंगे।
दरअसल आज समाज में राजनीति अछूत होती जा रही है। तकरीबन आज हर घर में बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी बनाने के सपने देखे जाते हैं। कोई भी अभिभावक या परिवार कभी अपने बच्चे को यह नहीं कहता कि मेहनत से पढ़ो, तुम्हें राजनीति करना है। इस बात को नकारते हुए कि भारत आज युवा शक्ति के मामले में दुनिया में सबसे अधिक समृद्ध है। जबकि यही स्थिति भारत को विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण दिशा दे सकती है। यह संभव तभी हो पाएगा, जब देश, समाज, राजनीतिक दल युवाओं को प्राथमिकता देंगे। युवाओं को शुरू से ही मौका देंगे और वहीं दूसरी ओर युवा विकास एजेंडा तय करने के लिए अपने आपको देश और राजनीति को समर्पित करेगा।
सवाल यह है क्यों ज़रूरी है युवाओं का राजनीति में आना? ऐसे पढ़े लिखे युवाओं का राजनीति में आना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वर्तमान राजनीति को हास्य-व्यंग के मकड़जाल से निकालकर देश के वास्तविक मुद्दों पर लाना और उसे नया आयाम देना देश की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
जब देश के किसी राज्य का मुख्यमंत्री किसी विचारधारा को थोपने की जल्दबाज़ी में अतीत काल की उपलब्धियों को देश की युवा पीढ़ी के सामने अवैज्ञानिक तरीके से परोसे तो वैसी स्थिति में सूझ-बूझ वाले युवा आगे आएं, और देशहित के लिए सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेकर ऐसे ज्ञानियों को उनकी औकात बता दें।
जब देश के राजनेता किसी काल्पनिक राष्ट्र को गढ़ने की बात करें, लोगों को अराजक बनाने का काम करें तो इन हालातों में देश के समझदार युवाओं को राजनीति में आकर प्रेम, सौहार्द और सहिष्णुता का प्रतीक बनकर शांति का संदेश देना चाहिए। दरअसल देश को किसी और काल्पनिक राष्ट्र की कोई आवश्यकता नहीं है।
क्या वर्तमान राजनेता अपने भाषणों की अमर्यादित भाषा से देश की युवा पीढ़ी को गंदी राजनीतिक विरासत नहीं दे रहे हैं? क्या देश के नेता एक दूसरे को चोर और नीच कह कर भाषा का स्तर नीचे नहीं गिरा दिए हैं? आप ही बताइए, जिनकी भाषा का स्तर गिरा हुआ हो वो देश का स्तर ऊपर कैसे ला सकते हैं? प्रदूषण के कारण बड़े शहरों में बच्चे ज़हरीली हवा में सांस ले रहे हैं, क्या ये मुद्दा नहीं है? महिलायें और बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं, उनका यौन शोषण किया जा रहा है, क्या ये मुद्दा नहीं है?
जागो मोहन प्यारे! इन मुद्दों पर बात करने के लिए मोहन को जागना ही होगा, युवाओं को राजनीति के अग्निकुंड में उतरना ही होगा। देश को एक नई राजनीतिक दिशा देकर देश की दशा को बदलना होगा। युवा ही इसकी दिशा बदल सकते हैं। अच्छी पढ़ाई और ज्ञानवान यूथ को इसके प्रति सोचना होगा। सत्ता का मोह छोड़कर जनता और समाज के हितों के बारे में सोचना होगा। इसके बाद समाज में बदलाव निश्चत होना तय है।
]]>जिन्हें इस बात की चिंता है कि मोदी अब अचानक मध्यमार्ग से वामपंथ की ओर झुक सकते हैं और लोकलुभावनवाद में फंस सकते हैं उनका भय भी निराधार हो सकता है। मोदी ने जिस नये भारत की बात कही है उसका खाका अभी ठीक से सामने आना बाकी है लेकिन एक साफ समझदारी है कि प्रधानमंत्री अब सब्सिडी और रेवड़ियां बांटने वाली संस्कृति से दूर जा रहे हैं। यही उनके अपनाये जाने वाले नये सुधारों का स्पष्ट संकेत है।
हां, गरीबों को देने के लिये अमीरों से ठोक कर लेने में कोई संकोच नहीं करेंगे। उनके इस अभियान में मध्यवर्ग को भी थोड़ी कीमत चुकानी होगी।
इसके अलावा उनकी युवाओं से उम्मीद कि वह रोजगार मांगने के बजाये रोजगार पैदा करें एक और संकेत है। वे चाहते हैं कि यह देश सरकारी नौकरियों की निर्भरता वाली संस्कृति से दूर हटें और वह जाति तथा सम्प्रदायों पर आधारित आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त करने की ओर बढ़ना चाह रहे हैं। मिनिमम गर्वन्मेंट और मैक्सिमम गर्वनेंस का फलसफा अब भारत ही नहीं सारी दुनिया पर सिर चढ़ कर बोल रहा है।
परमानेंट नौकरी पाते ही हरामखोरी और मक्कारी की बुरी आदत ने कुख्यात बाबूडम को जन्म दिया है। बाबूडम या नौकरशाही या लालफीताशाही ने भ्रष्टाचार को घुन की तरह भारतीय समर्थों की नसों में घोल दिया है। अपने विजय संबोधन में मोदी ने कहा था कि इस देश के गरीबों ने अब ऐसे नेताओं को पसंद करने की मानसिकता त्याग दी है जो उन्हें कुछ देता हो। इसकी बजाये गरीब आदमी कठोर मेहनत से तरक्की करना चाह रहा है। वह कह रहा है कि मेरे लिए अवसर पैदा करो मैं मेहनत से उसे पाल पोस कर बड़ा कर दूंगा।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जिस व्यक्ति की मदद की जा रही है वह पूरी तरह निर्भर होने के बजाये खुद अपनी मदद के लिए मेहनत कर रहा है या नहीं। आरंभ में यह सुनिश्चित करने के लिए कि सब्सिडी और रियायतें सही जगह तक पहुंच रहीं हैं या नहीं। प्रधानमंत्री ने जनधन, आधार और मोबाइल वाली जाम की तिकड़ी का सहारा लिया। जनधन के तहत खोले गये पच्चीस करोड़ बैंक खातों, बायोमैट्रिक पहचान और मोबाइल फोन से प्रधानमंत्री ने गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी और लाभों के मामले में छोटी-सी क्रांति की है।
प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रणाली ने सुनिश्चित किया है कि सब्सिडी लाभार्थी के खाते में सीधे भेजी जाये ताकि इससे रिसाव और भ्रष्टाचार खत्म हो सके।
इस प्रणाली के तहत अब तक चौरासी योजनाओं और कार्यक्रमों में बत्तीस करोड़ से लाभार्थियों को डेढ़ लाख करोड़ से ज्यादा की धनराशि हस्तांतरित की जा चुकी है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण देश में एलपीजी सिलेडरों का वितरण है। करीब डेढ़ करोड़ लोग ऐसे थे जिन्होंने सब्सिडी छोड़ने की प्रधानमंत्री की अपील को सुना और माना। इससे अपने आप एक हजार आठ सौ करोड़ रुपये की बचत होने लगी। इसके अलावा तीन सौ चार करोड़ फर्जी कनेक्शन खत्म करवाये जिससे बचत में भारी इजाफा हुआ।
प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे जीने वाले डेढ़ करोड़ परिवारों को गैस कनेक्शन दिये जिसमें पहला सिलेंडर मुफ़्त दिया। उत्तर प्रदेश में भारी संख्या में बीपीएल परिवारों को इसका लाभ मिला जिसके कारण अधिकतर परिवारों ने चुनाव में भाजपा को वोट दिया।
मोदी का 2022 तक नये भारत का सपना इस बात पर टिका है कि उन्होंने जो सौ से ज्यादा योजनाएं लागू की हैं उनमें वो कैसा प्रदर्शन करते हैं। मोदी ने इनपुट और आउटपुट के बजाये सारा ध्यान नतीजों पर देना शुरू किया है।
मोदी को अगर किसी ने सबसे ज्यादा झटका दिया है तो वह है नौकरशाही। अब बड़े कार्यक्रमों के लिए मोदी को उच्चस्तरीय व्यवसायिक लोगों की मदद लेनी होगी। मोदी को अपने नये भारत की दृष्टि सामने रखनी चाहिए और क्रियान्वयन के लिए ठोस लक्ष्य तैयार करने चाहिए। इससे ज्यादा अहम सवाल ये है कि इन योजनाओं से कितने रोजगार पैदा होंगे। साथ ही योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों को ही मिले। पता चला है कि इतनी पेशबंदी के बाद भी भ्रष्टाचारी चोर दरवाजे खोल ले रहे हैं। उनमें सत्तासीन भाजपा के लोग भी शामिल हैं। देखना है मोदी सरकार अपनों पर ही अंकुश कैसे लगा पायेगी।
]]>बिहार के राज्यपाल लालजी टंडन पटना के एक महिला कॉलेज में मुख्य अतिथि बन कर गए थे तो उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि बतौर राज्यपाल बिहार में यह उनका आखिरी कार्यक्रम है। सूत्रों के मुताबिक कार्यक्रम के दौरान ही उनके एक कारिंदे ने उन्हें बताया – सर, आपका ट्रांसफर हो गया है मध्य प्रदेश। हैरान लालजी टंडन ने पूछा-बिहार कौन आ रहा है। जवाब मिला, फागू चौहान। राजनीति के दिग्गज लालजी टंडन को शायद समझने में जरा-सी भी देर नहीं लगी कि केंद्र में बैठी उनकी सरकार का इरादा क्या है।
गुजरात की पूर्व सीएम आनंदीबेन पटेल अभी मध्य प्रदेश की राज्यपाल हैं। उनका तबादला उत्तर प्रदेश कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश में राम नाईक का कार्यकाल खत्म, आनंदीबेन पटेल को नया राज्यपाल बनाया। पश्चिम बंगाल में केसरीनाथ त्रिपाठी का कार्यकाल खत्म हुआ जगदीप धनखड़ को नियुक्त किया गया। त्रिपुरा में कप्तान सिंह सोलंकी का कार्यकाल खत्म, रमेश बैंस को राज्यपाल बनाया गया, वहीं नगालैंड में पद्मनाभ आचार्य का भी कार्यकाल पूरा होने पर आरएन रवि को राज्यपाल नियुक्त किया है।
आप जानते ही होंगे कि उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी और नागालैंड के राज्यपाल पद्मनाभ आचार्य का कार्यकाल खत्म हो रहा है। पांच अन्य राज्यों के राज्यपाल भी अगले दो महीनों में रिटायर होंगे। गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा का 30 अगस्त 2019 को कार्यकाल खत्म हो रहा है। गुजरात के ओम प्रकाश कोहली 15 जुलाई, कर्नाटक के वजुभाई रुडा भाई वाला 31 अगस्त, केरल के राज्यपाल जस्टिस पी सदाशिवम चार सितंबर, महाराष्ट्र के राज्यपाल विद्यासागर राव का कार्यकाल 29 अगस्त को खत्म हो रहा है।
बीजेपी यह मानकर चल रही है कि बिहार में अगले साल होने वाले चुनाव में भी इसका फायदा मिल सकता है। यूपी के फागू चौहान लोनिया (पिछड़ी) जाति से आते हैं। वह 1985 में चौधरी चरण सिंह के साथ जुड़कर पहली बार विधायक बने थे। वह जनता दल और बीजेपी के साथ बसपा में भी रहे हैं। बिहार में पिछड़ों के समीकरण को साधने के लिए बीजेपी के लिए यह दांव मददगार साबित हो सकता है।
दरअसल फागू चौहान उत्तर प्रदेश के सीटिंग विधायक हैं। वे उत्तर प्रदेश पिछडा वर्ग आयोग के अध्यक्ष भी हैं। आजमगढ से लेकर मऊ तक के इलाके में वे प्रमुख ओबोसी नेता हैं। फागू चौहान उत्तर प्रदेश की चौहान जाति से आते हैं जिसे बिहार में नोनिया जाति के नाम से जाना जाता है। बिहार में ये अति पिछड़ी जाति है और इस जाति के वोटरों की तादाद भी ठीक-ठाक है। नोनिया या बेलदार को निषाद यानि मल्लाह जाति की उप जाति भी माना जाता है। ये बिहार का बड़ा वोट बैंक है। बीजेपी का नेतृत्व ये मान रहा है कि 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव उसे अकेले लड़ना पड़ सकता है।
किसी सीटिंग विधायक या सांसद को इस्तीफा दिलाकर राज्यपाल बनाने का वाकया देश ने कभी कभी ही देखा होगा। परंपराओं के मुताबिक राज्यपाल जैसे प्रमुख संवैधानिक पद पर पर्याप्त सियासी या प्रशासनिक अनुभव वाले नेता की ही नियुक्ति होती है। फागू चौहान कभी मंत्री नहीं रहे । लेकिन बीजेपी के मिशन बिहार में फागू चौहान सबसे ज्यादा फिट बैठ रहे थे। लिहाजा उन्हें विधायकी छोड़ कर राजभवन में बिठाने का फैसला ले लिया गया। जबकि लालजी टंडन बीजेपी के अगले मिशन में बिहार में फिट नहीं बैठ रहे थे। अचानक उन्हें मध्यप्रदेश भेज दिया गया है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी के बीच जारी खींचतान के बीच टंडन की तैनाती का खास महत्व है।
सूत्रों का कहना है कि कर्नाटक के बाद अब बीजेपी का अगला निशाना मध्य प्रदेश होने वाला है। बीजेपी के पक्ष में समर्थन जुटाने की जिम्मेदारी दे कर ही लालजी टंडन को मध्यप्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है। अब तक मध्य प्रदेश की राज्यपाल को अब उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके पीछे भी बीजेपी का पिछड़ा दांव ही है।
आनंदी बेन का अभी लंबा कार्यकाल बाकी है। इसके बावजूद यहां खाली हो रही राज्यपाल की कुर्सी पर उनकी तैनाती की गई है। गुजरात की पूर्व सीएम आनंदी बेन कुर्मी जाति से हैं और पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की करीबी मानी जाती हैं। यूपी में कुर्मी प्रदेश अध्यक्ष की तैनाती के बाद आनंदी बेन पटेल की नियुक्ति के भी गहरे सियासी मायने हैं।
दरअसल, बीजेपी को अब तक चुनाव में पिछड़ों का ही फायदा मिलता आया है। इस वजह से वह इन्हें एकजुट करने में जुटी है। घोसी से विधायक फागू चौहान को बिहार का राज्यपाल बनाए जाने के बाद यूपी में एक और विधानसभा सीट खाली हो जाएगी। ऐसे में 13 सीटों पर उपचुनाव होंगे। विधानसभा की 11 सीटें सांसदों के विधायक बनने और एक सीट विधायक को अयोग्य घोषित किए जाने के कारण खाली चल रही हैं।
]]>कई सालों से मीडिया के माध्यम से हमें बताया जाता रहा है कि हमारी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर दुनिया में चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। हमें यह भी खुशी हो सकती है कि अब हम दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की बैठकों में बुलाए जाने लगे हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ के विश्व खाद्य कार्यक्रम के आंकड़े भी याद रखने चाहिए कि विश्व के 27 प्रतिशत से ज्यादा कुपोषित लोग भारत में बसते हैं।
एफएओ के महानिदेशक जोस ग्रैजियानो डा सिल्वा ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, ‘दुनिया भर में मोटापे की समस्या तेज रफ्तार से बढ़ रही है। खासतौर से बच्चों में मोटापा महामारी की तरह उभर रहा है। विभिन्न देशों को मोटापे पर अंकुश लगाना होगा और सुनिश्चित करना होगा कि फूड प्रॉडक्ट्स के बारे में सही जानकारी मिले।’
वहीं पिछले साल जारी वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2018 के अनुसार, भारत में कुपोषण खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। पूरी दुनिया में कुपोषण के कारण अविकसित रह जाने वाले बच्चों की कुल संख्या में लगभग 31 प्रतिशत बच्चे भारतीय हैं। कुपोषण पीड़ित बच्चों की संख्या के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है।
इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के अध्ययन पर आधारित इस रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर 5 साल से कम उम्र के 8 मिलियन बच्चे स्टंटिंग और 50.5 मिलियन बच्चे वेस्टिंग का शिकार हैं। वहीं कुपोषण के कारण ओवरवेट होने वाले बच्चों की संख्या भारत में 10 लाख से अधिक है जिसके कारण भारत उन 7 देशों में शामिल है जहां कुपोषण के कारण ओवरवेट बच्चों की संख्या अधिक है।
हालांकि लेकिन सच यह है कि किसी भी देश की सबसे बड़ी ताक़त वहां की जनता यानी मानव संसाधन होता है। जिस देश के पास जितने ज़्यादा काम करने वाले लोग होते हैं, वह देश उतना ही ज़्यादा ताक़तवर और मज़बूत होता है। भारत को हमेशा इसी ख़ूबी का लाभ मिलता रहा है। लेकिन भारत के सामने एक चीज़ है जो हमेशा से ही राह का रोड़ा बनती रही है – वह है कुपोषण।

यदि दुनिया में भूखे लोगों की आबादी में भारत की हिस्सेदारी देखें तो यह कुल 24 फीसदी के करीब बैठती है। इस बारे में दुनिया के विशेषज्ञों की चिंता जायज है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पोषण की अपर्याप्तता के कारण साल 2050 तक भारत की तकरीबन 5.30 करोड़ से अधिक आबादी प्रोटीन की कमी से जूझ रही होगी। उस हालत में जबकि आज भी हमारा देश कुपोषण, भुखमरी, गरीबी, निरक्षरता, लिंगभेद, पर्यावरण विनाश और जानलेवा बीमारियों को नियंत्रित करने व देश की अधिकांश आबादी को पीने का साफ पानी मुहैया कराने में नाकाम है। अगर सच को स्वीकारें तो शुद्ध पेयजल आज भी एक चैलेंज है। इस मामले में लाख दावों के बावजूद लगातार हम पिछड़ते ही जा रहे हैं। जबकि यहां हर साल होने वाली 21 लाख बच्चों की मौत का कारण कुपोषण ही है।
भारत में औसतन कोई भी व्यक्ति अधिक पौष्टिक नहीं है। अधिकांश कुपोषण से पीड़ित हैं कारण सामान्य वर्ग को संतुलित आहार नहीं मिलता और निम्म व गरीबों को जब पर्याप्त भोजन नहीं मिलता तो वे कुपोषण की श्रेणी में आते हैं। सभी सरकारों का लक्ष्य रहा है कि कुपोषण से कोई पीड़ित न हो, क्योंकि इसके कारण कुपोषण के कारण शरीर में प्रतिरोधक क्षमता न होने से रोगग्रस्त शीघ्र होते हैं और शीघ्र मृत्यु के शिकार होते हैं। यह स्थिति जन्म के समय से शुरू होती हैं और पांच वर्ष के पहले बहुत से बच्चे मर जाते हैं या बीमार रहते हैं। इसी समय उन्हें पर्याप्त पोषण की जरुरत होती है। हालांकि सरकार लोक कल्याणकारी होने से अलग-अलग प्रकार का पोषण आहारशालाओं में देती है।
कुछ मामलों में पिछले सालों में हमने तरक्की की है, मसलन सफाई और पीने के साफ पानी की स्थिति बेहतर हुई है और बच्चों के बढ़ने पर इनका अच्छा असर हुआ है, लेकिन सही पोषाहार की कमी की दिक्कत वैसी ही बनी हुई है। यह इस वजह से है कि लंबे वक्त से खाद्य सुरक्षा सरकारों की प्राथमिकता में नहीं रही है। सार्वजनिक वितरण व्यवस्था बेहतर होने की बजाय बदतर हुई है, न तो इससे खाद्यान्न की और न उस पर खर्च होने वाले पैसे की बर्बादी रुकी है, न भूखे लोगों तक अनाज पहुंचा है। वह देश आखिरकार मजबूत कैसे होगा, जिसकी एक-तिहाई आबादी अस्वस्थ और कमजोर है।
एम्स के आहार विज्ञान विभाग व राष्ट्रीय पोषण संस्थान द्वारा पांच साल तक के आयु वाले बच्चों पर किया अध्ययन स्थिति की भयावहता को दर्शाता है। उसके अनुसार 63 फीसदी बच्चों का कद उनकी उम्र के मुकाबले कम है, 34 फीसदी बच्चे ज्यादा कमजोर हैं, 51 फीसदी का वजन कम है और 73 फीसदी का बॉडी मॉस इंडेक्स असामान्य है। यानी वह जन्म से ही किसी न किसी बीमारी के चंगुल में हैं। हालिया जन्मे बच्चों में कुपोषण, रक्त अल्पता, नेत्र कमजोरी या अंधता, कम वजन के मामलों में इस अध्ययन में कोलकाता पहले, दिल्ली दूसरे, चेन्नई तीसरे और बंगलुरु चौथे स्थान पर है।
यह क्या साबित करता है कि महानगरों में जहाँ स्वास्थ्य सुविधाएँ अन्य नगरों से बेहतर है, यह हालत है, उस दशा में छोटे नगरों, कस्बों और गांव-देहात की स्थिति की भयावहता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। यह रिपोर्ट प्रमाण है कि देश में 5 साल तक के बच्चों में रक्ताल्पता, एनीमिया, अंधता और कुपोषण का ग्राफ कम होने के बजाय दिनों-दिन तेजी से बढ़ता जा रहा है। आंकड़े सबूत हैं कि ग्रामीण बच्चे ही नहीं, शहरी बच्चे भी कुपोषणता के चंगुल में हैं।
वहीं स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार देश में पांच साल से कम उम्र के 50 फीसदी बच्चे और 30 फीसदी गर्भवती महिलायें कुपोषित हैं। इसमें ज्यादातर वह गरीब परिवार हैं जो अपने भोजन में पौष्टिकता को शामिल नहीं कर पाते। इसका अहम कारण महिलाओं का निम्न जीवन स्तर, उचित स्तनपान न कराया जाना, पूरक आहार का अभाव व उनमें पोषण सम्बन्धी जानकारी का न होना है।
यूनिसेफ की प्रोग्रेस फॉर चिल्ड्रेन रिपोर्ट में चेतावनी देते हुए कहा गया है कि यदि नवजात शिशु को आहार देने के उचित तरीके के साथ-साथ स्वास्थ्य के प्रति कुछ साधारण-सी सावधानियां बरत ली जायें तो भारत में हर वर्ष होने वाली पांच वर्ष से कम आयु के छह लाख से ज्यादा बच्चों की मौत को टाला जा सकता है।
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन का कहना है कि भारत में कुपोषित लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है। जबकि हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी 2022 तक कुपोषण का खात्मा चाहते हैं। वे कहते हैं कि कुपोषण से निपटने के लिये केन्द्र और राज्यों के बीच सभी योजनाओं में समन्वय बहुत जरूरी है।
कुपोषण की स्थिति पर कोई चार साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था- ‘एक ओर देश में हर साल उचित भंडारण के अभाव में लाखों टन अनाज सड़ जाता है जबकि दूसरी ओर करोड़ों भारतीयों को भूखे पेट सोना पड़ता है।’ देश की सर्वोच्च अदालत की इस कठोर टिप्पणी के बाद भी आज तक हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। भंडारण की बदइंतजामी के चलते अनाज के सड़ने और लोगों के भूख से मरने-बिलबिलाने का सिलसिला लगातार जारी है।
]]>आज़ादी के बाद इस सेवा को भारतीय हुक्मरानों ने शहीद भगत सिंह के शब्दों में ऐसे भूरे साहबों की जमात को बाकायदा मान्यता दे दी और सेवा का नाम आईएएस कर दिया। हालांकि आजादी के बाद भारत को ऐसे हृदयहीन प्रशासकों के बजाय विषय विशेषग्य प्रबंधकों की जरूरत थी जो व्यवस्थित तरीके से देश और देशवासियों को विकास की राह पर ले जा सकें।
देश में 15 अप्रैल 2019 को एक ऐसा ही फैसला किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने उस दिन 9 लोगों को बिना परीक्षा, साक्षात्कार के सीधे आईएएस बनाया और सीनियर आईएएस की पोस्ट दे दी। लेटरल-एंट्री के तहत प्राइवेट सैक्टर से इन 9 प्रोफेशनल लोगों को सीधे ही सरकारी मंत्रालयों में संयुक्त सचिव बनाया गया जिन पर यूपीएससी की परीक्षा, इंटरव्यू के द्वारा आईएएस अधिकारी बनाए जाते रहे हैं। इस प्रक्रिया के तहत बीते हफ्ते मोदी ने दुबारा देश की कमान संभालने के बाद 40 और विषय विशेषज्ञों को सीधे आईएएस बना कर ब्यूरोक्रेसी की इस नयी परंपरा को और बल दे दिया गया।

प्राइवेट सेक्टर के पेशेवरों का स्तर वैसा ही हो, इसलिए निजी क्षेत्र के आईएएस के चयन की प्रक्रिया भी संघ लोक सेवा आयोग ने संचालित की। पहले चरण में जिन्हें आईएएस बनाया गया है वो हैं-अंबर दुबे (नागरिक विमानन), अरुण गोयल (वाणिज्य), राजीव सक्सेना (आर्थिक मामले), सुजीत कुमार बाजपेयी (पर्यावरण, जंगल और जलवायु परिवर्तन), सौरभ मिश्रा (वित्तीय सेवाएं) और दिनेश जगदाले (नई और नवकरणीय ऊर्जा)। इसके साथ ही सुमन प्रसाद सिंह को सड़क एवं परिवहन, हाइवे मंत्रालय में ज्वाइंट डायरेक्टर के तौर पर नियुक्ति मिली है। जहाजरानी मंत्रालय में भूषण कुमार को नियुक्ति दी गई है। साथ ही कृषि, सहयोग और किसान कल्याण मंत्रालय के लिए कोकली घोष को चुना गया है।
केंद्र सरकार के कार्मिक मंत्रालय ने जून 2018 में निजी क्षेत्र से ‘सीधी भर्ती’ व्यवस्था के जरिए ज्वाइंट सेक्रेटरी रैंक के पदों के लिए आवेदन मांगे थे जिसके लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख 30 जुलाई 2018 रखी गई थी। तब मोदी सरकार की काफी आलोचना हुई थी। इसके तहत ऐसे लोगों को आवेदन करने योग्य माना गया है, जिन्होंने संघ लोकसेवा आयोग की सिविल सर्विस परीक्षा पास नहीं की। इन पोस्ट के लिए कुल 6,077 लोगों ने आवेदन किए थे, जिनमें से 9 जनों का चयन किया गया। इससे पहले भी कई अफसरों को इस तरह की जिम्मेदारी दी गई है, किंतु इतने बड़े पैमाने पर पहली बार निजी क्षेत्र से अफसरों का चयन हुआ है।
हालांकि ये कोई एकदम नयी परंपरा नहीं है और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले जिनका चयन हुआ था उनमें प्रमुख निजी क्षेत्र के विशेषग्य डॉ. मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहूवालिया, बिमल जालान, विजय केलकर, आरवी शाही, परमेश्वरन अय्यर और राजेश कोटेचा जैसे लोगों के नाम शामिल हैं।
सब जानते हैं इनमें से डॉ. मनमोहन सिंह बाद में देश के वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री बने। परमेश्वरन अय्यर अभी स्वच्छता सचिव हैं और राजेश कोटचा आयुष मंत्रालय संभालते हैं।
यही नहीं इससे पहले कई बार यूपीएससी को खत्म करने की मांग भी की जा चुकी है। निजी और सरकारी क्षेत्र से ये बात बार बार उठती रही है कि भारत की अफसरशाही अंग्रेजों वाली ब्रिटिश सेवा के लिए बनाई गई थी। भारत की आजादी के बाद इसको खत्म कर देना चाहिए था। सिंगापुर के निर्माता ‘ल्यू क्यू यान’ ने तो भारत की असफलता के लिए इन्हीं ब्यूरोक्रेट्स को जिम्मेदार ठहराया था। आधुनिक युग में किसी योजना या परियोजना के लिए उस कार्य में निपुण विशेषज्ञ की जरूरत होती है।

हमारे देश में सामान्यत: यह कहा जाता है कि जब शहरी विकास की बात आती है तो उस आदमी को चुनो, जो अनुभवी टाउन प्लानर हो। मगर सिविल सेवा में ऐसा नहीं होता है। विडंबना देखिए, जो आज शहरी मंत्रालय देखता है, वही कल यातायात को संभाल रहा होता है। फिर आजकल इंजिनीयरिंग और डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने वाले भी आईएएस की परीक्षा देते हैं क्योंकि इन विषयों को आईएएस में लेकर ज्यादा नंबर ले आते है और आईएएस बन भी जाते हैं।
पर ऐसा करके एक तो वो विशेषग्य डाक्टर या इंजिनियर पर सरकार और मां-बाप और सरकार द्वारा खर्च किये गए पैसे की बर्बादी करते हैं दूसरे अपने विषय से अलग विभागों के मुखिया बन कर बेअक्ली अफसरी झाड़ते हैं। जैसे मानव के शरीर को विशेषज्ञ डॉक्टर के द्वारा रिपेयर किया जाता है, उसी तरह से क्षेत्र के विशेषज्ञ को ही जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए।
यूपीएससी की इस पहल से एक बात स्पष्ट है कि देश को आगे ले जाने के लिए विशेषज्ञ ही चाहिए। इसको लेकर भले ही आरक्षण विरोध शुरू हो जाए, या इस तरह से प्रचारित किया जाने लगे।
अब इस नयी परंपरा से आईएएस सेवा के उम्मीदवारों में खलबली मचना स्वाभाविक है और विपक्षी राजनितिक दलों ने भी इसे राजनितिक चश्मे से देखना शरू कर दिया है। उनका आरोप लगाया है कि अस्थायी प्रकृति की इस बहाली में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया जाएगा तथा यह एक और संवैधानिक संस्था को बर्बाद करने की साजिश है। प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री एम वीरप्पा मोइली कह रहे हैं कि यह संस्थाओं के भगवाकरण का वर्तमान सरकार का प्रयास है।
जब भी कुछ नया होगा तो ये सब तो होगा ही पर विरोध करने वाले ये क्यों भूल जाते हैं कि उन्ही के दल के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव के समय में इस सार्थक परंपरा का श्रीगणेश हुआ था। देशकाल परिस्थिति के हिसाब से आज त्वरित विकास और समावेशी कल्याण के लिए लालफीताशाही की जकड़ को ढीला करना समय की मांग है।
]]>‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’, ‘ए हैपी वर्ल्ड’ और डिस्टॉपियन विचारक के लेखक, एल्डस हक्सले इंग्लैंड में जन्में एक प्रसिद्ध दार्शनिक थे। वे अपने समय के वैज्ञानिक और तकनीकी विकास से परिचित थे और वह यह भी समझते थे कि भविष्य में उसकी दिशा क्या होगी। उन्होंने ब्रेव न्यू वर्ल्ड के प्रकाशन के 30 साल बाद 1962 में दिए गए अपने कुछ सार्वजनिक में अपनी बेहद उम्दा समझ को साझा किया था। इसे उन्होंने सर्वश्रेष्ठ क्रांति का नाम दिया। यहां क्रांति शब्द का अभिप्राय आतंकी राज के मायनों में विकसित हुआ है। इनमें से एक भाषण 20 मार्च 1962 को अमेरिका के बर्कले लैंग्वेज़ सेंटर में हुआ था, जिसकी रिकार्डिंग बर्कले आर्काइव्स में उपलब्ध है। यहां हम उनके कुछ विचार रखना चाहेंगे जो उनके ही शब्दों में ज्यादा सार्थक नज़र आते हैं:
‘अगली पीढ़ी या उसके बाद, एक ऐसा औषधीय तरीका अपनाया जाएगा जिससे लोग अपनी ग़ुलामी से प्यार करने लगेंगे, बिना आंसुओं के एक तानाशाही स्थापित की जाएगी, कहना चाहिए कि पूरे समाज के लिए एक दुखविहीन अत्याचार स्थल बनाया जाएगा, जहां लोगों की आज़ादी दरअसल उनसे छीनी जाएगी, लेकिन वे उसका आनंद लेंगे, क्योंकि प्रचार या दिमागी भ्रम के ज़रिये उनके भीतर बग़ावत करने की इच्छा को ही ख़त्म कर दिया जाएगा, या औषधीय तरीकों से दिमागी भ्रम को बढ़ा दिया जाएगा।’
क्या यही चीज़ हम आज भारत में देख रहे हैं? इस सवाल का जवाब इतनी आसानी से मिलने वाला नहीं।
हक्सले ने भविष्य की तकनीक के ख़तरनाक इस्तेमाल को लेकर चेतावनी दी थी, ख़ासतौर पर प्रचार और दिमागी भ्रम को फैलाने के लिए संचार तकनीकों के बारे में उनका यह विचार था। भारत में हम इसे विध्वंसक स्तर पर इस्तेमाल होते हुए देख रहे हैं।
वहीं फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्तेयर ने असहमतों के बोलने की आज़ादी का पुरज़ोर समर्थन किया था, उन्होंने हर नागरिक के लिए इस आज़ादी को जरूरी बताया था। कबीर तो उनसे भी आगे निकल जाते हैं। वे कहते हैं कि अपनी समझ को साफ़ रखने के लिए हर मनुष्य को अपने नियरे एक आलोचक रखना चाहिए।
भारतीय सभ्यता की इस समझ से वे लोग अनजान हैं जो फिलहाल सत्तासीन हैं। जनहित में काम करने वाली हुकूमतों के भीतर भी मनमाने तरीके से काम करने और बिना किसी सवाल और जवाबदेही के सत्ता का इस्तेमाल करने की प्रबल इच्छा रहती है। अभिव्यक्ति की आज़ादी उनको कभी रास नहीं आती है। समय-समय पर ऐसी ताक़तों ने कमज़ोर या दंभ से भरे मौक़ों पर अपना यह बदसूरत और दमनकारी चेहरा दिखाया है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले लोगों को अपने रास्ते से हटाने में ज्यादा वक्त नहीं लेती हैं ऐसी शक्तियां। और उन लोगों में खौफ भरने से नहीं हिचकतीं जो शायद कभी इन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
यह सब कुछ बारी-बारी से होता है, ताकि उन लोगों को रोका जा सके जो अपने उपर हुए अत्यचारों को लेकर एक साझा अभियान चलाना चाहते हैं। इसकी शुरूआत उन लोगों से होती है जो सांस्कृतिक रूप से थोड़ा अलग नज़र आते हैं और जो इस वजह से राष्ट्र के उस विचार से सहमत नहीं हो पाते जिसे खोखली और संकुचित सरकारें आगे बढ़ाना चाहती हैं।
पहले किसी व्यक्ति विशेष और फिर विशेष समुदाय को मानवता के दुश्मन के तौर पर दिखाने के लिए वे उनके अलग होने का संदेह पैदा करते हैं और बाद में अपने समुदाय के भीतर अपने जनाधार को मजबूत करते हैं। इस तरह दुश्मनों की सूची लंबी होती चली जाती है। लूथरन पास्टर मार्टिन निमोलर ने अपनी एक कविता में इस प्रक्रिया को नाज़ी जर्मनी के संदर्भ में खूबसूरती से दिखाया है। उस कविता का कुछ अंश इस प्रकार है – पहले वे आए सोशलिस्टों के लिए और मैं चुप रहा क्योंकि मैं सोशलिस्ट नहीं था।
अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति का अधिकार लोकतंत्र और मानव सभ्यता के विकास के लिए बहुत ज़रूरी है। कभी-कभी इन अधिकारों के बड़े समर्थक भी इन्हें बचाने के लिए आगे तो आते हैं लेकिन बिना किसी नतीजे पर पहुंचे खुद को अलग कर लेते हैं। दहशत और शर्म का ऐसा कोई पल हमारे उन अधिनायकों के लिए कभी नहीं आता, जब वे अलग तरह की जीवनशैलियों और अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख़िलाफ़ जान लेने वाली भीड़ को लगा देते हैं।
बीसवीं सदी में, ताकतवर यूरोप और तीसरी दुनिया के देशों को एकाधिकारवादी और सर्वसत्तावादी शासनों की दहशत को झेलना पड़ा। अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ रहे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ अम्बेडकर और सरदार पटेल और टैगोर जैसे बहुतेरे जन बुद्धिजीवी इन अनुभवों को लेकर काफी चौकन्ने थे। इसलिए, उन्होंने अहिंसा और अभिव्यक्ति की आज़ादी में अपनी आस्था जताई। अपनी आंदोलनात्मक गतिविधियों के अलावा तिलक, गांधी, नेहरू ने ख़बरों और विचारों को केन्द्र में रखकर प्रकाशनों की स्थापना की और इसकी वजह से या तो उन्हें जेल जाना पड़ा या फिर उनके प्रकाशनों को बंद करवा दिया गया।
अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति के अधिकार को दरकिनार करते हुए गढ़े हुए मुक़दमों, संस्थाओं का फंड रोकने, ब्लैकमेल और मालिकों पर असहमतों की आवाज़ और अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचला जा रहा है। लेकिन इससे ज़्यादा आश्चर्य की बात यह है कि मीडिया के एक बड़े हिस्से और जनता, ख़ासतौर पर शिक्षित मध्यवर्ग में मौजूदा सत्ताधारियों को सक्रिय समर्थन हासिल है। इसका एक कारण यह भी है कि प्रतिक्रियावादी सामाजिक ताक़तों ने कमज़ोर या दंभ से भरे मौक़ों पर अपना बदसूरत और दमनकारी चेहरा दिखाया है ।
]]>सरकार आखिर किस के लिये होती है। लोकतंत्र की परिभाषा तो यही कहती है कि सरकार आम लोगों यानी कॉमनमैन के लिये होती है। सरकार चलाने वालों का धर्म सूर्य के क्रियाक्लाप जैसा होना चाहिये जो समुद्र से जल राशि को सोख ले और बादलों के माध्यम से समान रूप से बरसात करके सभी को बराबर बांट दे। शासक का भाव परमार्थ का होना चाहिये स्वार्थ का नहीं। तभी लोकतंत्र का सही उद्देश्य साकार हो पायेगा। यह दुखद था कि आजादी के बाद से अब तक समय समय पर लोकतंत्र में भी राजतंत्र और राजवंश की कुपरम्पराएं सिर उठाती रहीं हैं।
बीते लोकसभा चुनाव में कॉमनमैन ने राजवंशीय प्रवृत्तियों पर जिस तरह से अंकुश लगाने का काम किया है वो भारत के लोकतंत्र के परिपक्व होते जाने का सुखद संकेत है।
नेहरू और इंदिरा के प्रधानमंत्रित्व वाली सरकारों के लम्बे समय बाद 2019 के जनादेश को इस दृष्टि से उल्लेखनीय कहा जा सकता है कि किसी एक राजनीतिक दल की सरकार को पूर्ण बहुमत से काम करने का अवसर मिला है। पर नयी बात ये है कि संघवाद को मजबूत करने के नजरिये से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अन्य समान धर्मी दलों को ही नहीं विपक्ष को भी विमर्श में साथ लेकर चलने की बात कह रहे हैं। साथ का मतलब केवल हां हुजूरी नहीं बल्कि अगर सरकार की नीतियों में कोई खामी है तो विपक्ष उस ओर इंगित करे और सार्थक सुझाव दे ताकि देश तरक्की की राह पर आगे बढ़े।
देश के सामने आज विकास के साथ कई समस्याएं मुंह बाये खड़ी हैं। किसान, नौजवान बेहाल है। किसान की आय दूनी कैसे हो और खासकर नौजवान खेती किसानी से कैसे जुड़े यह एक बड़ी चुनौती सामने है। यह सच है कि मशीनीकरण के दौर में हाथों को काम घटे हैं। ऐसे में शिक्षा के मॉडल को बदल कर ऐसा कैसे बनाया जाये जो नये समय के हिसाब से युवाओं को काम की गारंटी दे सकें।
कॉमनमैन की ही नसों में गहराई से घुस चुके भ्रष्टाचार और दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार कैसे किया जाये। सार्थक शिक्षा और स्वास्थ्य को सबको कैसे सुलभ कराया जाये। जाति, धर्म की दीवारों को मिटा कर कैसे सबके अंदर भारतीयता का भाव जगाया जाये।
इन सबके उपर देश की बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं और उपलब्ध संसाधनों का संतुलन साधा जाये। पंचतत्वों से मिल कर बना शरीर जब बच पायेगा तभी तो वसंुधरा को भोग पायेगा। देश के पानी, वायु, वनस्पति पर खतरा मंडरा रहा है। ये तय मान लीजिये कि सारा काम अकेले कोई सरकार नहीं कर सकती है। एक शब्द है सिविक सेंस यानी नागरिक होने का बोध। इसका मतलब है कि किसी देश के नागरिक होने के नाते यदि हमारे अधिकार होते हैं तो कुछ कर्तव्य भी हैं। भारतीय नागरिक जब विदेश जाते है तो न यहां वहां थूकेंगे, गंदगी फैलायेंगे, न उल्टा चलेंगे, न लालबत्ती जम्प करेंगे। पर यही काम जब वो भारत में करते हुए रोके जायेंगे तो धौंस दिखायेंगे कि जानते नहीं मै कौन हूं।
पहली बार हमारे किसी प्रधानमंत्री ने 2014 से स्वच्छता अभियान को कॉमनमैन का आंदोलन बनाया है और योग के जरिये कॉमनमैन की जनरल फिटनेस की चिंता की है वो काबिले तारीफ है। अब देखना ये है कि अपनी दूसरी पारी में वो कैसे देश की साठ परसेंट से उपर युवा आबादी के हाथों को काम का इंतजाम करते है ताकि वे आतंकवाद और नक्सलवाद के झांसे में न आयें। देखना ये भी होगा कि मोदी सरकार 2.0 दुनिया के साथ खासकर पड़ोसियों से अपने संबधों को कैसे नये सिरे से परिभाषित करती है।
परिस्थितियां तो अनुकूल ही कही जायेंगी क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार तो है ही मैन्यूफैक्चरिंग और लघु ओर मझोले उद्योग क्षेत्र में भारत के विकास की संभावनाएं अनंत हैं। सकारात्मक सोच के लिये गुजाइश तो रखनी ही चाहिये।
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