ऐसे महान कलाकार का जन्म खंडवा में लेना किसी ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। इसे खंडवा की साहित्यिक, संस्कृति, विभूतियों का पुण्य ही कहा जा सकता है। बहरहाल किशोर दा का जन्म 4 अगस्त,1929 को खंडवा के बाम्बे बाजार मार्ग निवासी कुंजलाल गंगोली के घर हुआ था।
किशोर के पिता कुंजलाल गांगुली वकील और मां गौरी देवी धनाढ्य परिवार से ताल्लुक रखती थीं। किशोर चार भाइयों में सबसे छोटे थे। सबसे बड़े अशोक, उसके बाद सती देवी और फिर अनूप।
किशोर अभी बच्चे ही थे, जब अशोक कुमार बड़े फिल्म अभिनेता बन गए थे। अनूप को भी शौक था। भाइयों के साथ किशोर को भी फिल्म और संगीत का शौक हो गया। केएल सहगल के फैन थे। उन्हीं की तरह गाने की कोशिश करते थे और पढ़ाई जारी थी। इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज से वो ग्रेजुएट हुए। अभी वो किशोर कुमार नहीं बने थे। आभास ही थे। वो बंबई आ गए। बॉम्बे टॉकीज के लिए कोरस गाना शुरू किया। उन्होंने नाम भी बदल लिया। यहां अशोक कुमार काम करते थे। 1948 में फिल्म आई जिद्दी। इसके लिए खेमचंद प्रकाश के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार ने अपना पहला गाना गाया – मरने की दुआएं क्यों मांगूं।
आज वह भले ही हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनकी खूबसूरत पंक्तियों ने उन्हें आज भी अपने चाहने वालों के दिलों के जिंदा रखा है। किशोर कुमार फिल्मी जगत की एक ऐसी धरोहर हैं, जिन्हें शायद फिर संवारने में कुदरत को भी कई सदियां बीत जाएंगी। उनकी जादुई आवाज आज भी लोगों के सिर चढ़कर बोलती है। आज उनके जन्मदिन के खास मौके पर हम आपके सामने उनके कुछ ऐसे बेहतरीन नग्में पेश करने जा रहे हैं, जिन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता।
गायन में योडलिंग शैली इजाद करने का श्रेय भी किशोर दा को ही जाता है, उनके गीतों की यही एक महत्वपूण् विशेषता भी रही कि योडलिंग शैली के उनके गाये गीत केवल वहीं गा सकते थे, उनकी नकल आज तक कोई भी नहीं कर पाया। वे पुरुषों की आवाज तो निकालते थे ही गायन में भी कभी-कभी महिला गायिका की आवाज भी खुद ही निकाल लिया करते थे। वे सुगम संगीत के गायक तो थे ही क्लासिकल (शास्त्रीय) संगीत पर आधारित गीत गाने में भी सफल रहे थे।

वे कभी झरने के ताजे पानी की तरह बहते तो कभी तूफानी हवाओं की तरह उडने लगते थे, इसे केवल उनके गीत ही महसूस करा सकते हैं। ऐसे महान गायक एवं हरफानमौला कलाकार जिसने अपनी जन्मभूमि खंडवा का नाम रोशन करने में कोई कसर नही छोडी लेकिन खंडवावासी उनकी स्मृतियों को सहेजकर रखनें मे भी सफल नहीं हो सके। इसका उदाहरण उनका पैतृक निवास गौरीकुंज बाम्बे बाजार, गौरीकुंज आडिटोरियम सिविल लाईन स्थित है जो खुद अपनी दुर्दशा को बयां कर खण्डवासियो का सर शर्म से झुका रहा है। बहरहाल किशोर दा की आवाज अमर है और आकाशवाणी, दूरदर्शन एवं आडियो-वीडियो, सी।डी। के माध्यम से हवा में तैरकर हमारा मनोरंजन कर रही है एवं करती रहेगी।
]]>एम्बुलेंस दादा के नाम से मशहूर करीमुल हक एक ऐसी मिसाल बन गए हैं जो एम्बुलेंस सेवाएं प्रदान करने के साथ-साथ वर्तमान सामाजिक परिदृश्य को सुधारना चाहते हैं, सभी में जागरूकता पैदा करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने अपने आप को पूरी तरह से समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। अपने गांव में “मानव सेवा सदन” की स्थापना उनकी इसी इच्छा शक्ति का सबूत है। हक का एकमात्र इरादा एम्बुलेंस सेवा तक ही सीमित नहीं है, उनके पास लोगों और समाज के उत्थान के लिए बहुत सारे भावी योजनाएं भी हैं जिन्हें हमने उनसे विस्तार से जानने की कोशिश की। पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं करीमुल हक के साथ हुई बातचीत के कुछ अंश:

आप पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हैं। आपके कार्य को सभी ने स्वीकार किया है। अब आप खुद को कहां पाते हैं और भविष्य में स्वयं को कहां देखना चाहेंगे?
मुझे पता ही नहीं था कि पद्मश्री पुरस्कार क्या होता है या किसी को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाना कितने सम्मान की बात है। इसलिए कोई ख़ास अनुभूति नहीं होती है, मैं अभी भी वैसा ही हूं जैसा पहले था। लेकिन इतना तो सच है कि इस पुरस्कार ने मेरे काम को एक व्यापक स्तर प्रदान किया और इस क्षेत्र में बड़े स्तर पर कार्य करने के लिए मुझे प्रोत्साहित किया है। इस पुरस्कार ने मुझे अपने गांव में एक अस्पताल बनाने और कुछ किलोमीटर की दूरी पर मौजूद एक उप-विभागीय अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं में सुधार करवाने की ताकत दी है। इसकी वजह से ही सरकार का भी इस ओर ध्यान गया है, उसने हमारी बात को गंभीरता से लिए है। उम्मीद तो जगी है, अब देश के कुछ प्रसिद्ध निजी अस्पताल और नर्सिंग होम आगे आए हैं।
अब, मैं गंभीर रूप से बीमार रोगियों को बेहतर उपचार के लिए इन अस्पतालों तक पहुंचने में मदद करने में ज्यादा सक्षम हूं। मैं इन रोगियों के इलाज में होने वाले खर्चों को भी ध्यान में रखता हूं, इसलिए मैंने अपने घर में एक डिजिटल प्रयोगशाला बनाई है। इससे न केवल मेरे क्षेत्र के लोग बल्कि आसपास के गांवों वाले भी इससे काफी लाभान्वित होते हैं। इस डिजिटल परीक्षण सुविधा का लाभ उठाने के लिए लगभग पांच से सात गांवों के लोग हर रोज हमारे यहां आते हैं। हमारे गांव में महीने में दो बार स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जाते हैं। हमारे मानव सेवा सदन का मूल उद्देश्य उन 20 सुदूर गांवों तक अपनी सेवाएं प्रदान करना है जहां मूल स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध नहीं हैं।
पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त होने के बाद क्या आपको लगता है कि समाज के विकास के लिए आपको अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए?
मेरे द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवा को और व्यापक बनाने की जरूरत है, मुझे लगता है इसे सिर्फ एक गांव या किसी एक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी पहुंचे। दूरदराज के कई गांवों में अभी भी सड़कें नहीं हैं। गंभीर रोगियों की सेवा के लिए मेरे परिवार के सदस्य भी इसमें शामिल हैं और उन्होंने खुद को इस कार्य के प्रति समर्पित करने का फैसला किया है। पद्मश्री पुरस्कार मिलने के बाद समय के साथ लोगों की हमसे उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं। लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए एक समग्र जागरूकता और सामाजिक विकास होना जरूरी है इसी कारण मैंने अपने परिवार के सदस्यों को इस अभियान में शामिल करने की कोशिश की है।

समाज के विकास के लिए सभी पक्षों में आपने किस पर सबसे अधिक बल दिया है?
किसी अस्पताल को बनाने के लिए फंड की जरूरत होती है। बेहतर और सुसज्जित सुविधाओं से युक्त अस्पताल को बनाने में लगभग 40 लाख की एकमुश्त राशि की आवश्यकता होती है। पद्मश्री पुरस्कार मिलने के बाद मैंने मरीजों के परिवार द्वारा मिली सहयोग राशि से अस्पताल निर्माण के प्रारंभिक कार्य को शुरू किया। अस्पताल में ‘डायग्नोसिस’ सुविधा भी है। समाज में व्यापक स्तर पर विकास के लिए अस्पताल बनाना मेरा उद्देश्य है। मेरे लिए आराम हराम है। इसके अलावा हमने अपने क्षेत्र में आठ प्राथमिक विद्यालय भी बनाए हैं जो बच्चों को बुनियादी शिक्षा प्रदान करते हैं। बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं, यदि कोई उन्हें उचित शिक्षा दे सके, तो बड़े स्तर पर विकास संभव है। दूरदराज के गांवों में जहां माता और पिता दोनों ही काम करते हैं वहां के ज्यादातर बच्चे उपेक्षित हैं। मेरा मानना है कि इन बच्चों को उनके बेहतर भविष्य के लिए शिक्षित किया जाना चाहिए। इन बच्चों को पढ़ाने के लिए मैं गांवों की महिलाओं को अपने साथ जोड़ता हूं। ईमानदारी से कहूं तो इस पद्मश्री ने लोगों की सेवा करने के अनेकों रास्ते खोल दिए हैं।
अपनी सेवा से समाज के भविष्य को आकार देने के लिए आपके मुताबिक कौन से अन्य उपाय हो सकते हैं?
इसे केवल एक विचार मत बनने दो, मुझे लगता है कि यह समाज की जरूरत है। मेरे गांव धोलाबारी और आसपास के 20 गांवों में पीने के पानी की बहुत कमी थी। इसके समाधान के लिए अमेरिका के एक बंगाली वैज्ञानिक ने हमें अपना सहयोग दिया। अब धोलाबारी और बारघोरिया के वन क्षेत्रों में लोगों को बहुतायत मात्रा में पानी की आपूर्ति हो रही है। इनमें से अब हर गांव को 20 हजार लीटर पानी मिल रहा है। यह केवल उस अमेरिकी वैज्ञानिक की मदद से ही संभव हो पाया है। यहां तक कि हमने समाज के असहाय बुजुर्गों के लिए ओल्ड एज होम बनाने की पहल भी की है। सरकारी सहायता पर आश्रित रहने या प्रतीक्षा करने के बजाय हमने पहले से ही अपने शुभचिंतकों और कई अन्य एनजीओ का सहयोग लेना ज्यादा मुनासिब समझा। अब तो समाज का एक समग्र विकास ही मेरा एकमात्र उद्देश्य है।
]]>जी हां, हम बात कर रहे हैं लखनऊ में रहने वाले कपिल यादव की। यह जवान छोरा जो आया तो था यहां अपने काम की तलाश में, लेकिन उसने अपनी सूझ-बूझ और सृजन के हुनर से एक नई सोच को जन्म दे दिया। उन्होंने पुराने कार्डों, अखबारों, पत्रिकाओं इत्यादि से कलात्मक व उपयोगी चीजों को न केवल बनाया अपितु एक नवीन तकनीक का सृजन कर उसे ‘कट एंड पेस्ट टू डेकोरेट’ नाम दिया यानी सजावट के लिए चीजों को काटो और चिपकाओ।

‘काटो और चिपकाओ’ की इस तकनीक से तैयार नाना प्रकार की कलात्मक वस्तुओं से एक ओर आप अपने और दूसरों के घरों को सजा सकते हैं। दूसरी ओर आप इसे हॉबी कोर्स के रुप में अपनाकर दूसरों को प्रशिक्षण दे सकते हैं। आप चाहें तो व्यवसाय के रुप में इसे अपनाकर आत्मनिर्भर भी बन सकते हैं।
‘कट एंड पेस्ट’ की तकनीक क्या है और इसकी भविष्य में क्या संभावनाएं हो सकती हैं? इन्हीं सबको को विस्तार से जानने के लिए हमने बात की कपिल यादव से। पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं उस बातचीत की कुछ अंश:
‘कट एंड पेस्ट’ का विचार आपके मन में कैसे आया?

काम की तलाश में मैं गांव से लखनऊ आया हुआ था, यहां आकर नौकरी की तलाश करने के दौरान कार्ड्स को काटने की प्रक्रिया को नजदीक से देखा। मेरे मन में भी उनकी कटिंग से जुड़े विभिन्न पहलुओं और लीक से हटकर कुछ अलग बनाने की इच्छा हुई लेकिन कैंची कैसे पकड़ते हैं, कागज को किस तरह से काटा जाता है? इसका कोई आइडिया नहीं था। पहली बार कैंची पकड़ी, टेड़ा-मेड़ा ही सही हर आकार की कटिंग कर डाली और आज कैंची से खेलना (काम करना) मेरा पेशा तो है ही शौक भी है।
आप अपने इस काम में कौन-कौन सी बेकार की वस्तुएं इस्तेमाल करते हैं और किन चीजों के लिए बाजार पर निर्भर रहते हैं?
इसमें वेडिंग, बर्थडे, न्यू ईयर कार्ड्स, पुराने कैलेंडर्स, न्यूजपेपर्स, मैंगजीन्स आदि का इस्तेमाल अधिक होता है। इसके अलावा फेवीकोल, धारधार कैंची, पेन्ट, ग्लोसी पेपर्स, टैग, बटन, रिबन, टेप व अन्य सजावटी सामान को हम लखनऊ, दिल्ली, कोलकाता और मथुरा के बाजारों से मंगवाते हैं।
अब तक कौन-कौन सी वस्तुएं बना चुके हैं?

पुराने कार्ड्स से अलग-अलग तरह के लिफाफे (गिफ्ट व थीम बेस्ड), बुकमार्क, टैग्स, बैचेस, वाल हैंगिग, शो पीस, पेपर वेट्स, पेपर बैग्स व लैम्पस इत्यादि बनाये हैं।
इन आइटम को बनाते समय किन-किन बातों का ख्याल रखते हैं और किस तरह की मुश्किलें सामने आती हैं?
कई बार कटिंग करते समय डिजाइन्स अलग हो जाती हैं इसलिए कटिंग करते समय सजग रहना बेहद जरुरी होता है। इसके साथ आइटम सुन्दर और आकर्षक भी दिखने चाहिए, वजह यह है कटिंग तो सभी कर लेते हैं लेकिन सफाई वाली कटिंग (कुशाग्रता से कटिंग) सभी के लिए मुश्किल होटी है और मेरा मानना है कि अगर सजगता और कुशाग्रता आपके काम में है तो आप उस चीज को बना सकते हैं जो आपको ही नहीं सामने वाले को भी स्वतः आकर्षित करेगी। कई चीजें तैयार करने में काफी वक्त लग जाता है इसलिए धीरज भी रखना होगा। दरअसल मुश्किलें तो हर काम में आती हैं। चूंकि शीशे को दबाना और मोड़ना संभव नहीं है इसलिए शीशे के आइट्म तैयार करने में अनेक मुश्किलें आती हैं। इसके अलावा हम वेस्ट मेटेरियल से जो चीजें तैयार करते हैं, उनकी अत्यधिक डिमांड होने से हमें कई आर्डर कैंसिल भी करने पड़ते हैं।

आप क्या छात्र-छात्राओं को प्रशिक्षित करते हैं और क्या आपने किसी प्रदर्शनी में भी हिस्सा लिया है?
लखनऊ में लगभग 8-10 स्कूल-कालेज जैसे एपी सेन कालेज, आर्ट्स कालेज, स्टडी हाल, अवध डिग्री कालेज आदि में छात्रों को कट एंड पेस्ट के बारे में जानकारी दी है और उन्हें प्रशिक्षण भी दिया है। इसके अलावा नारी शिक्षा निकेतन के एनएसएस कैम्पस और राजभवन लखनऊ में आयोजित शाक एवं पुष्प प्रदर्शनी में हमें सम्मिलित होने का अवसर भी मिला है।
बच्चों के लिए यह तकनीक किस तरह से लाभप्रद है?
कोई भी इस काम को कर सकता है, लेकिन बच्चों के लिए यह बहुत रुचिकर और लाभप्रद है। वे अपनी छुट्टियों के दौरान अपने फ्रेंड्स व रिलेटिव्स के लिए बर्थडे कार्ड्स, गिफ्ट्स व अन्य कलात्मक चीजें बना सकते हैं। इससे उनके समय का सदुपयोग होगा। अपनी बनाई चीजों से अर्जित प्रशंसा उन्हें आगे बढ़़ने और कुछ नवीन करने की प्रेरणा भी देगी।
आजकल क्या-क्या बना रहे हैं? और कुछ नया बना रहे हैं?
आजकल नोट्सबुक्स, लाइटिंग रंगोली बेहद लोकप्रिय है, जिसके लिए हमने पुराने बेकार कम्प्यूटर फ्लोपीज और ऑडियो कैसेटस का इस्तेमाल किया है। इसके अतिरिक्त पुराने फायल रोल्स, मोटे वेडिग कार्ड्स, कलर्ड शीट्स, कलर्ड मैगजीन्स से तैयार कोस्टर्स, पेनस्टैंड्स, फोटोफ्रेम, नेपकिन बास्केट्स ये समस्त चीजें भी लोग बहुत पसंद कर रहे हैं। अलग-अलग आकार के भगवान श्रीगणेश की लगभग 1000 कार्ड्स अब तक मैं तैयार कर चुका हूं और आजकल पुराने रिकार्ड्स से कुछ नया करने की योजना है। देखते हैं क्या नया बनता है।

इस विधा के साथ-साथ आप पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए जागरुकता अभियान भी चला रहे हैं, लोगों को क्या संदेश देते हैं?
किसी भी चीज का उपयोग करने के बाद यह आप पर निर्भर करता है कि किस तरह से आप उसका सही इस्तेमाल करते हैं। आज के आधुनिकीकरण और तकनीकी युग में अनेक सुविधाएं हैं, अनेकानेक माध्यम हैं, लेकिन आजकल शादी-विवाह जैसे सुअवसरों पर अत्यधिक वृहत आकार और अधिक से अधिक पृष्ठों के वेडिंग कार्ड्स छपने का चलन है, जिनमें अत्यधिक रासायनों का भी इस्तेमाल होता है। जितना अधिक पृष्ठ इस्तेमाल करेंगे उतने ही अधिक पेड़ कटेंगें और यदि नदी में इन्हें प्रवाहित करते हैं तो यूज्ड केमिकल्स नदी के जल को प्रदूषित कर देंगे। इसलिए सभी से गुजारिश है कि कम से कम पेपर का प्रयोग करें और इस्तेमाल करने के बाद उसे दोबारा प्रयोग में लायें। सच मानिए, हमेशा एक नवीन वस्तु आपके समक्ष तो होगी ही, साथ ही स्वच्छ, स्वस्थ और सुरक्षित पर्यावरण में आपका यह अमूल्य योगदान आजीवन आपको आनंदित करता रहेगा।
]]>गिरिडीह जैसे देश के एक सुदूर इलाके का शिक्षक परमेश्वर यादव आज एक सेलिब्रिटी है। लोग उसे जानते हैं, उसके प्रशंसक हैं। कैसा महसूस करते हैं आप?
– अच्छा लगता है। और यह स्वाभाविक भी है, जब आप कुछ नया और अच्छा करने की कोशिश करते हैं और दुनिया आपके काम को सराहती है तो खुशी होती है। मुझे जो प्रसिद्धी मिली है, वह मेरे काम से मिली है। उस काम से जिसे लेकर मैं गंभीर रहा हूं और जिसके अच्छे नतीजे पाना मेरा मक़सद रहा। संतोष है कि काम के नतीजे भी मिले और मुझे एक पहचान भी।
आपके तो अमिताभ बच्चन और कुमार विश्वास जैसे लोग भी फैन हैं। क्या कहेंगे?
– खुद को सौभाग्यशाली समझता हूं कि इतने महान लोगों ने मेरी प्रशंसा की, मेरा उत्साह बढ़ाया। मेरे काम को सराह कर इन्होंने मुझे प्रोत्साहित ही किया है।
आप अपने पढ़ाने के मनमोहक अंदाज़ के कारण सुर्खियों में हैं। आखिर क्या है यह अनोखा तरीका?
– मैं हमेशा से यह महसूस करता रहा हूं कि जब तक आप छात्रों को रुचिकर तरीके से, उनके साथ घुल-मिलकर नहीं पढ़ायेंगे तब तक वे आपकी दी शिक्षा को पूर्णरूपेण नहीं ग्रहण कर पायेंगे। खासकर, अंग्रेजी-गणित जैसे विषयों में इसकी विशेष दरकार है। लिहाजा, मैंने संगीत को माध्यम बनाया और इसी के जरिये उन्हें अंग्रेजी के अल्फाबेट्स और गणित की गुत्थियां समझाने की कोशिश की।
आपके पढ़ाने के इस नवीन प्रयोग के कैसे नतीजे देखने को मिले?
– नतीजे संतोषप्रद रहे। बच्चों ने पढ़ाई में रुचि दिखायी और पाठ उन्हें समझ में भी आया। अगर मैं सामान्य तरीके से उन्हें यह सिखाने की कोशिश करता, तो शायद ऐसे सकारात्मक नतीजे नहीं मिलते। मैं चाहता हूं कि सुदूर इलाके के बच्चे भी अंग्रेजी पढ़ें। आगे बढ़ें।
आप गाकर पढ़ाते हैं, क्या आपने संगीत की भी शिक्षा ली है?
– नहीं, संगीत की विधिवत शिक्षा मैंने नहीं ली है मगर रुचि बचपन से रही। बचपन में जब स्कूल जाता था, तभी से ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सेदारी किया करता था। गीत भी गाता था। वैसे मेरा मानना है कि संगीत हर इंसान के जीवन का हिस्सा होता है। कुछ इसे स्वयं तक सीमित रखते हैं, कोई इसे बाहर भी विस्तार देता है। मैंने बच्चों को पढ़ाने में इसका इस्तेमाल किया।

पता चला कि आप अभी भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं?
– जी हां, मैं डीएलएड का प्रशिक्षण ले रहा हूं। वैसे इससे पहले मैंने विज्ञान से इंटरमीडिएट और अंग्रेजी से स्नातक की शिक्षा ग्रहण की है।
आपका जो वीडियो वायरल हुआ, वह शायद डीएलएड प्रशिक्षण के दौरान का ही था?
– जी बिल्कुल। हमारे डीएलएड प्रशिक्षण का गिरिडीह प्लस टू उच्च विद्यालय में सेंटर है। वहीं प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षु शिक्षकों व प्रशिक्षकों के सामने हमें बच्चों को पढ़ाना था। मैं अपने तरीके से गीत के जरिये बच्चों को पढ़ा रहा था। इसे मेरे साथ प्रशिक्षण ले रहे वीरेंद्र कुमार वर्मा जी ने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया और सोशल मीडिया पर डाल दिया। इसी के बाद अचानक मैं लोगों की नज़रों में आ गया।
वैसे आप तो पहले से ही इस तरीके से अपने छात्रों को पढ़ाते रहे होंगे?
– जी हां, मैं गुलीडाडी के जिस आरपी प्रोग्रेसिव पब्लिक स्कूल में पढ़ाता हूं वहां मैं अपने छात्रों को इसी तरह पढ़ाया करता हूं। उन्हें पाठ समझाने के लिए नये-नये तरीके ढूंढता रहता हूं, उसे अमल में लाता रहता हूं।
देश में शिक्षा की मौजूदा स्थिति पर क्या कहना चाहेंगे?
– शिक्षा की वर्तमान हालत से तो सभी अवगत ही हैं। कभी हमारा देश शिक्षा के मामले में विश्वगुरु हुआ करता था, नि:संदेह उसमें गिरावट आयी है। आज के दौर में शिक्षा का मतलब महज डिग्री हासिल करना रह गया लगता है। जबकि इसका मक़सद विकास और राष्ट्रनिर्माण होना चाहिए। विकास से मेरा तात्पर्य सर्वांगीण विकास है, मानसिक और बौद्धिक विकास भी।
कहां कमी रह गयी कि शिक्षा की ऐसी हालत हो गयी है?
– नीति-नियंताओं ने शायद नीतियां बनाने पर तो जोर दिया मगर उसे धरातल पर तरीके से उतारने में कसर रह गयी। अगर बहुआयामी प्रयास होते तो स्थिति ऐसी न होती। फिर भी अच्छी बात है कि कमियों को समझते हुए अच्छा करने के प्रयास होते रहे हैं, हो रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे स्थिति में सुधार होगा।
]]>– जो कुछ मैंने किया और जो कर रहा हूं, उसे सफलता-असफलता के नज़रिये से कभी नहीं देखा। मैंने इसे अपना कर्तव्य माना, पौधे लगाना और उनकी परवरिश करना। मैं तो बस अपना काम करता रहा। जाहिर है, उन पौधों को बढ़ते और जंगल में तब्दील होते देखना अच्छा लगता है। एक सुकून मिलता है, लेकिन अभी भी बहुत काम बाकी है। असम के साथ-साथ भारत के अन्य राज्यों और पूरी दुनिया में अभी यह काम बाकी है। मेरा मानना है कि जब तक पूरी दुनिया हरियाली की चादर न ओढ़ ले, तब तक मेरा काम अधूरा है। यह हम सभी का दायित्व है- प्रकृति का ख्याल रखना। हम सब इसी प्रकृति का हिस्सा हैं। मेरा मानना है कि अगर दुनिया का हर इंसान अपना दायित्व निभाये, तो हर जगह धरती हरी-भरी होगी और उस पर पलने वाली ज़िंदगी भी।
आखिर कब और कैसे आप इस सफर पर निकले?
– मैं इसी जगह पैदा हुआ था। यह क्षेत्र वन्य प्राणियों और कई तरह के पेड़-पौघों के लिए प्रसिद्ध था। यहां हर किस्म के फल मिलते थे। उन दिनों कोलकाता से जहाज भी आया करते थे, रेलवे स्टेशन भी था। लेकिन 1965 में भयंकर बाढ़ आयी और 10 किमी का इलाका पूरी तरह नदी में बह गया। रेलवे स्टेशन और जहाज घर भी नहीं रहा। कई दूसरे परिवारों की तरह हमारा परिवार भी माजुली में जाकरबस गया और मैं अपनी पढ़ाई के लिए बालीगांव चला गया। मैंने 10वीं पास की है। उन दिनों मिशिंग जनजाति के लोगों का पेशा गाय, भैंस और सुअर पालना था, जो आज भी कइयों की आजीविका का जरिया है। कुछ अरसे बाद जब मैं अपनी गायों और भैंसों को चराने के क्रम में अपने जन्मस्थान गया, तो वह इलाका नदी का बनाया हुआ एक रेगिस्तान-सा नज़र आया। 1979 में एक और बाढ़ आयी। जून-जुलाई की इस बाढ़Þ के बाद जब पानी सूखा, तो रेत की गर्मी की वजह से कई सांप मरे पाये गये। जानवरों को तड़पता, मरता हुआ देख कर मैं दुखी और बेचैन हो गया। सोचने लगा कि अगर गर्मी में ये लाचार सांप मर सकते हैं, तो एक दिन इंसान भी मारा जाएगा। मैंने कुछ करने की ठान ली। अपने गांव से 5 किमी की दूरी पर देवरी जाति के बुजुर्गों से मिला। उनसे सलाह लेने के लिए कि मुझे क्या करना चाहिए। उन्होंने कहा, दुनिया की सबसे ऊंची उष्ण घास लगाओ। मेरे नन्हें दिमाग में यह बात समझ में नहीं आयी। तब उन्होंने मुझे रेतीले द्वीप में लगाने के लिए 50 बांस के बीज और 20 बांस के झाड़ दिये। मैंने उन्हें वहीं लगा दिया, जहां सांपों को दफनाया गया था और हर रोज़ उसे पानी देने लगा। पानी देने के लिए मिट्टी का घड़ा और बर्तन का इस्तेमाल किया, जिसमें छोटा सुराख किया गया था। इस तरह बांस के पौधे बढ़ने लगे और पेड़ों का समूह जंगल का रूप लेता गया।
क्या कभी ऐसा भी लगा कि आप जो चाहते हैं, वह शायद न हो पाये? क्या किसी मोड़ पर हौसला टूटता नज़र आया?
– मैंने कहा न कि इस सफ़र को एक दायित्व समझ कर शुरू किया था। अंजाम के बारे में कभी नहीं सोचा, बस काम करता रहा। इस काम से एक अजीब-सी दिलचस्पी हो गयी थी। शायद इसीलिए कभी कोई बाधा नहीं आयी। मुझे पता था कि मैं क्या कर रहा हूं। पेड़ ऑक्सीजन देते हैं, जो हर प्राणी के जीवन के लिए आवश्यक है। अगर पेड़ नहीं रहे, तो इस धरती पर इंसान भी नहीं बचेगा और न कोई दूसरा जीव। इसलिए मैं पिछले लगभग 40 वर्षों से लगातार पौधे लगा रहा हूं, उनकी रक्षा कर रहा हूं और उन्हें जंगल में बदल रहा हूं। जैसे-जैसे जंगल आकार लेता रहा, जीव-जंतु यहां आते गये। 2008 में जब पहली बार हाथी आये, तो इसे अपने लिए खतरा मानते हुए लोगों ने जंगल को काटने का प्रयास भी किया। तब मैंने उनसे कहा कि अगर जंगल काटना है, तो उससे पहले मुझे काट दो। उन्हें समझाने की कोशिश की कि हाथी भी हमारी तरह अपना पेट भरने का प्रयास करते हैं। हमने अपने पेट के लालच में उन्हें बेघर कर दिया। भूल यह की मैंने कि अपने आगे उनकी समस्याओं को नहीं समझा, तभी वे हमारे घरों की ओर रुख करते हैं। लेकिन वे तो जंगली जानवर हैं, मनुष्य होने के नाते हमें उनका दर्द समझना चाहिए। अगर हाथी हमारी फसल खा जाते हैं या मकान को नुकसान पहुंचाते हैं, तो हम सभी को मिलकर सरकार से इसके समाधान हेतु मांग करनी चाहिए। गांववालों ने मेरी बात समझी। आज उनकी सोच में परिवर्तन आया है। वे हाथी को भगाते हैं, मगर जंगल काटने की बात नहीं करते। फिर भी यह ज़रूर कहूंगा कि हमारे यहां गांव में ग़रीबी है। एक परिवार की महीने की कमाई 3000 रुपये है। ऐसे में जब हाथी उनकी फसल खा जाते हैं या घरों को नुकसान पहुंचाते हैं, तो उनकी तकलीफें बढ़ जाती हैं।

आपके इस मिशन में सहयोग करने वाले और आपके हौसलों को तोड़ने वालों पर कुछ कहना चाहेंगे?
– शुरुआत के कई सालों तक तो मैं अकेले ही पौधे लगाता रहा। इसलिए शादी भी देर से हुई। 40 साल की उम्र के बाद। बाद में मेरी पत्नी भी मेरे इस काम में कभी-कभी मेरी मदद करती रही। सरकार की तरफ से भी बाद में पौधारोपण का काम हुआ। गांव के कुछ लोग भी इस काम में आगे आये। दरअसल, हमारे गांव में हर आदमी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है। उसे दूसरे कामों के लिए समय नहीं मिल पाता। ऐसे में आप उनको किसी काम के लिए जबरदस्ती नहीं कर सकते।
आपने जंगल तो बसा दिया लेकिन जिस मक़सद से बसाया, उसमें ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ से होने वाली तबाही को रोकना प्रमुख था। क्या वह समस्या खत्म हो गयी?
– मैंने पौधे लगाने की शुरुआत यह सोचकर नहीं की थी कि बाढ़ को रोकना है। लेकिन यह ज़रूर है कि पेड़ों की जड़ें मिट्टी को पकड़ कर रखती हैं, जिससे मिट्टी का बहाव रुकता है। मेरे पौधे लगाने से बाढ़ आना बंद हो गयी या धरती का बह जाना रुक गया, ऐसा तो नहीं मगर ज़रूर इससे हमारे लिए कई जीव-जंतुओं, पक्षियों, प्राणियों के जीने लायक एक धरती बस गयी। आज भी हमारा द्वीप खतरे से बाहर नहीं है। हम आशा करते हैं कि जल्द ही सरकार, ब्रह्मपुत्र नदी से संबंधित अधिकारीगण यहां जंगल बसा कर धरती को बचाने का काम शुरू करेंगे।
पर्यावरण संरक्षण के तौर पर आपकी पहल काबिले तारीफ़ है। क्या अपनी पहल की सफलता से देश के दूसरे हिस्सों में जागरूकता के लिए भी कुछ काम कर रहे हैं?
– मैं तो पूरी दुनिया को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना चाहता हूं। मगर शुरुआत पहले अपने घर से ही होनी चाहिए। वैसे हम इस दिशा में भी काम कर रहे हैं और आशा करते हैं कि आगे चलकर ज़रूर हमें अपने मक़सद में कामयाबी मिलेगी। हमारी योजनाओं में बारिश के मौसम में धरती के हर कोने में वन-महोत्सव आयोजित करना शामिल है, जिसके तहत तीन घंटे का पौधारोपण, साथ मिलकर खाना-पीना, खेलना-कूदना और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल है। मेरा विचार है कि पौधा लगाना एक मानसिक उल्लास का कार्य है। हम ऐसे कार्यक्रम को एक बड़ा रूप देकर प्रकृति प्रेम का नया कल्चर देना चाहते हैं। हम स्कूल-कॉलेजों में भी जाते हैं और बच्चों को पेड़ लगाने और उनकी रक्षा करने को प्रोत्साहित करते हैं। हम लोगों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे हमारे पास आयें, हमारा जंगल देखें और हमारे साथ पौधे लगाना सीखें। हमारी योजना में दुनिया के हर हिस्से में प्रत्येक स्कूल में एडमिशन के दौरान छात्रों द्वारा एक पौधा लगाये जाने की बात भी है, जिसकी रक्षा करने और उसे बड़ा करने की ज़िम्मेदारी छात्र या स्कूल के अधिकारी पर होगी।
आपने जंगली जानवरों के जीवन और आजीविका का प्रबंध तो कर दिया, खुद आपके परिवार का गुज़ारा कैसे चलता है?
– जैसा मैंने बताया कि मैं मिशिंग जाति से हूं और पशुपालन हमारा पेशा है। मेरे पास गाय, भैंस और सुअर हैं। हम लोग खेती भी करते हैं और मछली भी पकड़ते हैं। गाय का दूध बेचता हूं, जिससे जीवन की ज़रूरतें पूरी होती हैं। बाज़ार से हम तेल, नमक और माचिस की डिबिया ही खरीदते हैं। बाकी आवश्यकताएं प्रकृति से पूरी होती हैं, जिससे हम कुछ लेते हैं तो उसे वापस करने की कोशिश भी करते हैं।
आपको काफी पुरस्कार मिले हैं, देश–विदेश के मीडिया में जगह भी। सबसे यादगार क्षण आपकी नज़र में?
– जी, पुरस्कार तो कई मिले हैं मुझे, मगर बहुत अहमियत नहीं रखते ये सब मेरे लिए। वैसे भी जब धरती ही नहीं रहेगी, तो पुरस्कारों का क्या होगा? लिहाजा, पर्यावरण और प्रकृति की रक्षा ही सही मायने में पुरस्कार है, जो हमें ज़िंदगी देती है। हां, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के ‘फॉरेस्ट इंडिया’ पुरस्कार की वज़ह से मैं ज़रूर जनता के सामने आ सका। सबसे यादगार पल वह है, जब मुम्बई में एक मंच पर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी ने मेरे सिर पर हाथ रख कर कहा था कि आपने दुनिया का सबसे अच्छा काम किया है।

आपके मिशन को सरकार की तरफ से सहयोग मिला या नहीं? और अगर मिला तो किस तरह का सहयोग मिला?
– देश ने मुझे क्या दिया या देश मुझे क्या देगा, यह मेरी सोच कभी नहीं रही। हमेशा मेरी सोच यह रही कि मैं देश को क्या दे सकता हूं। अगर देश को हरा-भरा बनाने में किसी भी रूप में हमारी ज़रूरत होगी, तो मैं और मेरी टीम सरकार को हर तरह का सहयोग देने को तैयार है। साथ ही आशा करते हैं कि हर राज्य सरकार पर्यावरण संबंधी जागरूकता के लिए वन महोत्सव का आयोजन करे। इसे लोगों तक ले जाने के लिए हम भी सहयोग देने को तैयार हैं।
आप आदिवासी समुदाय से आते हैं। देश में आदिवासियों के सामने मुख्य समस्याएं क्या हैं? और इस दिशा में क्या किया जाना चाहिए?
– मेरे ख्याल से शिक्षा सबसे बड़ी ज़रूरत है आदिवासी समुदाय के लिए। उनके लिए उनके द्वार पर, उनकी ही भाषा में शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए।
कुछ और कहना चाहेंगे? ऐसी बात, जो आप लोगों से कहना चाह रहे हों लेकिन माध्यम नहीं मिल पाया?
– पत्रकारों से कहना चाहूंगा कि पर्यावरण पर लिखना और लोगों को इसके प्रति जागरूक करना भी उनका दायित्व है। हम आशा करते हैं कि वन महोत्सव देश और दुनिया के हर स्थान पर मनाया जाए और इसके लिए मीडिया बहुत सहयोगी साबित हो सकता है।
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