अनेक प्रकार की भाषाएं, रीति रिवाज, खान-पान, रहन-सहन, लोकगीत,नृत्य, धर्म, संप्रदाय, सामाजिक संरचनाएं और संस्थाएं इस देश को बेहद बहुलतावादी और वैविध्यपूर्ण राष्ट्र बनाती है। इस विशाल, बहु भाषाई, बहु सांस्कृतिक देश की अपनी विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, दार्शनिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, जनसांख्यिकी और भाषाई विभिन्नताएं, विषमताऐ और विशेषताएं विद्वमान है। जो इस देश की विविधता में एकता की खूबी को प्रदर्शित करती है।
भारत की सामाजिक संरचना स्वयं में काफी जटिल है। देश में समाज बहुत सारे वर्गों उप वर्गों में बटा हुआ है, इसी तरह यहां समाज में ग्रामीण, उपनगरीय, नगरीय, महा नगरीय, जनजातीय, पहाड़ी कैसे वर्गों में विभाजित हुआ है। भारत में सामाजिक वर्ग भेद के साथ अंदरुनी अंतर्द्वंद भी बहुत ज्यादा है,जैसे कि एकल परिवार और संयुक्त परिवार जातिवादी जाति विहीन समाज ग्रामीण नगरीय द्वंद विवाह सन्यास का द्वंद जो अनेक रूपों में भारतीय समाज में जनमानस के रूप में दिखाई देता है और यह द्वंद स्वतंत्रता के पश्चात से दिखाई देने लगा है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जहां ग्राम स्वराज को आर्थिक विकास की धुरी मानते हुए सर्वोदय पंचायती राज स्वरोजगार एवं परस्पर सहयोग को बढ़ावा देना चाहते थे,दूसरी तरफ पंडित जवाहरलाल नेहरू का झुकाव औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े क्षेत्र को तीव्र औद्योगिकरण , कल कारखानों को मजबूत करने की ओर था। इसीलिए भारतीय समाज में मिश्रित अर्थव्यवस्था की नई व्यवस्था के माध्यम से इसका समुचित समाधान निकाला गया था।
भारत के राजनीतिक द्वंद भी बहुतायत में रहे हैं। आजादी से पहले कांग्रेस के गरम पंथ हुआ नरम पंथ का द्वंद चलता रहा है और पूर्ण स्वराज की मांग का उहापोह तथा आजादी के बाद संविधान निर्माण के समय संविधान की संघात्मक तथा एकात्मक रचना का विवाद या समाजवाद पूंजीवाद का द्वंद इसी तरह भारत दोनों में उलझता रहा है, और उसके बाद समाधान निकाल कर उससे बाहर भी आया है। भारत धार्मिक ,दार्शनिक व आध्यात्मिक दृष्टि से एक बेहद समृद्ध राष्ट्र रहा है।
विश्व के चार प्रमुख धर्मों हिंदू, सिख, बौद्ध ,जैन की जन्मस्थली भारत ही रही है। इसी तरह भारत वेद पुराणों, उपनिषदों ,ब्राह्मणों, समितियों और आरण्यकों के प्राचीन साहित्य से लबालब भी रहा है। इसके अलावा इस्लाम ,ईसाई ,पारसी जैसे धर्मों को देश में स्वयं सम्मानित कर अपनी मुख्यधारा में समाहित भी किया है। भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेश नीति के मामले में गुटनिरपेक्षता की नीति को अपना कर किसी भी गुट में न रहते हुए स्वतंत्र विकास की नीति को अपनाया था। जो कालांतर में भारत की विदेश नीति का आधार स्तंभ रहा है।
भारत में बहुआयामी विविधता भी रही है। स्वतंत्रता संग्राम में राजनेताओं ने जहां एक स्वर में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का पक्ष लिया था वहीं दूसरी तरफ देश के कुछ हिस्सों में हिंदी विरोधी आंदोलन तक हुए हैं। भारत में संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा देते हुए कुल 22 भारतीय भाषाओं को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कर भाषाई सौहार्द्र और समन्वय का बखूबी परिचय भी दिया है। और भारत में भारतीय संस्कृति के बहुलतावादी चरित्र को बनाए रखने की भविष्य में भी निरंतर आवश्यकता बनी रहेगी। भारतीय समाज की विविधता पूर्ण सांस्कृतिक,साहित्यिक, दार्शनिक व्यवस्था के बीच विद्वानों ने चिंतन मनन कर किसके बीच का समाधान भी निकाला है एक का सबसे बड़ा उदाहरण भारत में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को महत्व देते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था का अंगीकार करना है।

भारत की विजेताओं के विभिन्न नेताओं ने भारत देश के अंदरूनी मामले को लेकर देश की अर्थव्यवस्था सामाजिक व्यवस्था तथा राजनीतिक व्यवस्था को काफी मजबूत तथा पुख्ता भी किया है। भारत की विविधता में एकता के सिद्धांत पर चलते हुए भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था सामाजिक व्यवस्था राजनीतिक व्यवस्था तथा विदेशी नीति पर एक मजबूत आधार स्तंभ रखकर अपनी विश्व में एक अलग छवि तथा स्थान बनाया है। भारत में अनेक विविधताओं विषमताओं को विशेषता बनाकर समाधान अपने बीच ही खोज कर विश्व को एक कीर्तिमान बनाकर दिखाया है।
आज भारत मैं इतनी बड़ी जनसंख्या और विभिन्न जातीय धर्म संस्कृति भाषाएं होने के बावजूद एकजुटता की नई मिसाल दिखाकर विश्व के किसी भी देश को टक्कर देने की स्थिति में है। भारत आज विकासशील देशों में अग्रणी देश माना जाता है। भारत की यही विविधता,विषमता ,साइंस, टेक्नोलॉजी,मेडिकल साइंस तथा सामरिक क्षेत्र में अद्भुत एकजुटता किसी भी देश के आक्रमण का सामना करने के लिए सीना तान कर खड़ा होने की शक्ति सामर्थ और ताकत भी प्रदान करता है।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने जितनी प्रगति और वैश्विक स्तर पर विदेशी देशों का विश्वास अर्जित किया है वह निसंदेह भारत की प्रजातांत्रिक लोकतांत्रिक परंपरा के कारण ही है। भारत की विविधता में एकता भारत की एक बड़ी शक्ति है जिसे हमें निरंतर बनाए रखना होगा तब जाकर हम किसी भी देश के सामने सिर उठाकर खड़े हो सकते हैं।
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बराक और मणिपुर का संबंध ऐतिहासिक है। सरकार की नई नीति में मणिपुर और बराक दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार में विशेष भूमिका निभा सकते हैं। इसके अलावा, दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापार और संस्कृति का आदान-प्रदान बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने टिप्पणी की कि बराक मणिपुर फ्रेंडशिप एसोसिएशन इस संबंध में एक विशेष भूमिका निभा सकता है।
मणिपुर की अनेक विशेषताएं होते हुए भी विभिन्न कारणों से उस प्रकार से आर्थिक विकास नहीं हो पा रहा है। इसी तरह बराक वैली में काफी संभावनाएं होने के बावजूद आर्थिक रूप से सुधार नहीं हो रहा है। लेकिन क्या यह विकास आपसी सहयोग से संभव है, उन्होंने टिप्पणी की।

कार्यक्रम केआरसी फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया गया। मणिपुर के एक अन्य प्रमुख उद्यमी निंगबाम इराबंत ने मैनेजिंग ट्रस्टी विश्वदीप गुप्ता द्वाराआयोजित बैठक में कहा कि मणिपुर और बराक के आर्थिक विकास के लिए मानसिकता में बदलाव की जरूरत है। मणिपुर और बराक की जनसंख्या बराबर है लेकिन मणिपुर में समतल भूमि की मात्रा कम है। लेकिन बराक के पास काफी समतल जमीन है। मणिपुरियों में प्रतिभा और मेहनत करने की क्षमता है और बराक के लोगों में भी मेहनत करने की क्षमता और ईमानदारी है।
इसलिए इन दोनों मामलों के बीच की खाई को आदान-प्रदान के जरिए पाटा जा सकता है। उन्होंने कहा, वह पिछले बीस साल से बराक के दुर्गम इलाकों में आ-जा रहे हैं। बराक में सड़क की समस्या है। लेकिन यहां के लोगों में विकास की अपनी मांगों को मनवाने की प्रवृत्ति नहीं है। नतीजतन, कोई सुधार नहीं है। इसलिए, उनका मानना है कि बराक और मणिपुर के बीच एक निकट संचार प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है।

एक अन्य वक्ता हरन डे ने कहा कि सिलचर-इम्फाल रोड के सुधार के लिए पैसा आवंटित किया गया है, अगर यह सड़क बेहतर हो जाती है, तो संचार और व्यावसायिक क्षेत्रों का विस्तार होगा। बैठक की शुरुआत में उद्देश्य बताते हुए बिस्वदीप गुप्ता ने कहा कि विभाजन के परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल समेत शेष भारत से भारत का संपर्क टूट गया। ऐसा लगता है कि यह जानबूझकर किया गया है।
डॉ. दुबली सिंह ने उनकी बात से सहमति जताई। उन्होंने कहा, संचार व्यवस्था को दुरुस्त किया जाना चाहिए। और वर्तमान सरकार यही चाहती है कि हम इस अवसर का लाभ उठाएं। इस अवसर पर वाइस चेयरमैन स्वर्णाली चौधरी सहित गणमान्य लोगों ने भी अपनी बात कही।
]]>वह समय चला गया जब किसी घर में कन्या के पैदा होने से पूरे परिवार में मातम छा जाता था अब भारत में धीरे-धीरे सामाजिक परिवेश में लिंग भेद बदलने लगा है स्थिति यह है कि शिक्षित परिवार केवल एक संतान ही पैदा करना चाहती है चाहे वह कन्या हो या बेटा। अब परिवार में कन्या पैदा होने से खुशियां मनाई जाती है और पुरातन सोच अब धीरे-धीरे सामाजिक परिवेश को मस्तिष्क के मूल्यांकन के साथ बदलते जा रही है। पुरुष प्रधान समाज में नारी को पूज्या कह कर बहला दिया जाता था और उसे घर की चहारदीवारी में सीमित कर दिया गया था।

यही कारण था कि वे पुरुषों की बराबरी मैं ना आकर बहुत पिछड़ गई और देश की समग्र विकास की स्थिति एकांगी हो गई थी। समाज यह भूल गया था कि जिन हाथों में कोमल चूड़ियां पहनी जाती हैं वही हाथ तलवार भी उठा कर युद्ध में एक वीरांगना की भूमिका निभाती है, इसकी सर्वश्रेष्ठ उदाहरण रजिया बेगम और रानी लक्ष्मीबाई रही हैं। मनुस्मृति पर यदि आप नजर डालेंगे तो पाएंगे कि उसमें स्पष्ट कहा गया है कि जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है।
प्राचीन भारत में नारी शिक्षा का काफी प्रचार प्रसार किया गया था इसके कई प्रमाण भी हैं कि वेद की रिचाओं का ज्ञान नारियों को था इसमें कुछ महत्वपूर्ण नारियां समाज के लिए एक उदाहरण बन गई थी उनमें मैत्री, गार्गी, अनुसूया, सावित्री, आदि उल्लेखनीय हैं। वैदिक काल के विद्वान मुंडन मिश्र की पत्नी उदय भारती ने प्रकांड पंडित विश्व विजयी आदि शंकराचार्य को भी शास्त्रार्थ में भरी सभा में पराजित किया था ।
इसीलिए वेदों और पुराणों में भी उल्लेखित है की बालिका शिक्षा समाज के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला होता है। नारी के उत्थान में कई कुप्रथा कुठाराघात करती रही हैं, जो नारी के विकास में बाधा बनकर सामने आई थी इनमें बाल विवाह सबसे बड़ा अवरोध बना था और इसी का प्रतिफल है कि नारी पुरुष के समाज में काफी पिछड़ गई थी।
महादेवी वर्मा ने नारी शिक्षा को पुरुष शिक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण बताया था उन्होंने कहा था स्त्री को शिक्षित बनाना एक पुरुष को शिक्षित बनाने से ज्यादा आवश्यक और महत्वपूर्ण है यदि एक पुरुष शिक्षित -प्रशिक्षित होता है तो उससे एक ही व्यक्ति को लाभ होता है किंतु यदि स्त्री शिक्षित होती है तो उससे संपूर्ण परिवार शिक्षित हो जाता है. उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण बात कही नारी को अशिक्षित रखना समाज के लिए अपराध के समान है।
समय के परिवर्तन के साथ साथ नारी का महत्व अब पूरे तौर पर समझा जा रहा है आज समाज तथा देश में नारियां सर्वोत्कृष्ट कार्य कर रही है। समाज हो या विज्ञान या राजनीति अथवा समाज सेवा संपूर्ण क्षेत्र में आज नारियां पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर सर्वश्रेष्ठ कार्य कर रही है। मैडम क्यूरी, कल्पना चावला, इंदिरा गांधी, श्रीमति भंडार नायके, सरोजनी नायडू, कस्तूरबा गांधी जैसी महिलाएं राष्ट्र का मार्गदर्शन करने का काम करती रही है।
महात्मा गांधी ने स्वयं कहा है कि जब तक भारत की महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में काम नहीं करेगी तब तक भारत का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। आज का सबसे ताजा उदाहरण कॉमनवेल्थ गेम में महिला क्रिकेट टीम ने फाइनल में प्रवेश किया है और गोल्ड मेडल की तालिका में साक्षी मलिक बहनो, फोगाट बहनों ने विश्व में भारत का नाम ऊंचा किया है।

पी वी संधू, वित्त मंत्री सीतारमण स्मृति ईरानी और मंत्रिमंडल में शामिल महिलाएं किसी से पीछे नहीं हैं। और सबसे ताजा उदाहरण भारत की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने महिला होकर महिलाओं का नाम राष्ट्र की प्रथम पंक्ति में दर्ज कर देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया है। उन्होंने भारत के लिए एक स्वर्णिम इतिहास भी बनाया है।अब भारत में नारियों की स्थिति प्रथम पंक्ति में मानी जाती है। ऐसे में भारत में नारी शिक्षा, उनकी सहभागिता तथा उनकी आत्म निर्भरता भारत के भविष्य की शक्तिशाली ऊर्जा एवं संपत्ति ही होगी।भारत की नारियों को नमन, प्रणाम एवं अभिनंदन।
]]>फाल्गुन लगते ही होली का हुड़दंग शुरू हो जाता था। मंदिरों में भी फाल्गुन आते ही ‘फाग’ शुरू हो जाता था। होली के लोकगीत गूंजते थे। शाम होते ही ढप-चंग के साथ जगह-जगह फाग के गीतों पर पारंपरिक नृत्य की छटा होली के रंग बिखेरती थी। होली खेलते समय पानी की खेली में लोगों को पकडक़र डाल दिया जाता था। कोई नाराजगी नहीं, सब कुछ खुशी-खुशी होता था। वसंत पंचमी से होली की तैयारियां करते थे। चौराहे पर समाज के नोहरे व मंदिरों में चंग की थाप के साथ होली के गीत गूंजते। रात को चंग की थाप पर गैर नृत्य का आकर्षण था। बाहर से फाल्गुन के गीत व रसिया गाने वाले रात में होली की मस्ती में गैर नृत्य करते थे।
पहले की होली और आज की होली में अंतर आ गया है, कुछ साल पहले होली के पर्व को लेकर लोगों को उमंग रहता था, आपस में प्रेम था। किसी के भी प्रति द्वेष भाव नहीं था। आपस में मिल कर लोग प्रेम से होली खेलते थे। मनोरंजन के अन्य साधनों के चलते लोगों की परंपरागत लोक त्योहारों के प्रति रुचि कम हुई है। इसका कारण लोगों के पास समय कम होना है। होली आने में महज कुछ ही दिन शेष हैं, लेकिन शहर में होली के रंग कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। एक माह तो दूर रहा अब तो होली की मस्ती एक-दो दिन भी नहीं रही। मात्र आधे दिन में यह त्योहार सिमट गया है। रंग-गुलाल लगाया और हो गई होली।

जैसे-जैसे परंपराएं बदल रही है, रिश्तों का मिठास खत्म होता जा रहा है। जहां तक होली का सवाल है तो अब मोबाइल और इंटरनेट पर ही ‘हैप्पी होली’ शुरू होती है और खत्म हो जाती है। अब पहले जैसा वो हर्षोल्लास नहीं रह गया है। पहले बच्चे टोलियां बनाकर गली-गली में हुड़दंग मचाते थे। होली के 10-12 दिन पहले ही मित्रों संग होली का हुड़दंग और गली-गली होली का चंदा इकट्ठा करना और किसी पर बिना पूछे रंग उड़ेल देने से एक अलग प्यार दिखता था। इस दौरान गाली देने पर भी लोग उसे हंसी में उड़ा देते थे। अब तो लोग मारपीट पर उतारू हो जाते हैं।
पहले परायों की बहू-बेटियों को लोग बिल्कुल अपने जैसा समझते थे। पूरा दिन घरों में पकवान बनते थे और मेहमानों की आवभगत होती थी। अब तो सबकुछ बस घरों में ही सिमट कर रह गया है। आजकल तो मानों रिश्तों में मेल-मिलाप की कोई जगह ही नहीं रह गई हो। मन आया तो औपचारिकता में फोन पर हैप्पी होली कहकर इतिश्री कर लिए। अब रिश्तों में वह मिठास नहीं रह गया है।
यही वजह है कि लोग अपनी बहू-बेटियों को किसी परिचित के यहां जाने नहीं देते। पहले घर की लड़कियां सबके घर जाकर खूब होली की हुल्लड़ मचाती थीं। अब माहौल ऐसा हो गया है कि यदि कोई लड़की किसी रिश्तेदार के यहां ही ज्यादा देर तक रुक गई तो परिवार के लोग चिंतित हो जाते हैं कि क्यों इतना देर हो गया। तुरंत फोन करके पूछने लगते हैं कि क्या कर रही हो, तुम जल्दी घर आओ। क्यों अब लोगों को रिश्तों पर भी उतना भरोसा नहीं रह गया है।
दूसरी ओर, होली के दिन खान-पान में भी अब अंतर आ गया है। गुझिया, पूड़ी-कचौड़ी, आलू दम, महजूम (खोवा) आदि मात्र औपचारिकता रह गई है। अब तो होली के दिन भी मेहमानों को कोल्ड ड्रिंक्स और फास्ट फूड जैसी चीजों को परोसा जाने लगा है। वहीं, होलिका के चारों तरफ सात फेरे लेकर अपने घर के सुख शांति की कामना करना, वो गोबर के विभिन्न आकृति के उपले बनाना, दादी-नानी का मखाने वाली माला बनाना, रंग-बिरंगे ड्रेस में अपनी सखी-सहेलियों संग घर-घर मिठाई बांटना, गेहूं के पौधे भूनना और होली के लोकगीतों को गाना। अब यह सब परंपराएं तो मानो नाम की ही रह गए हैं।
होली रोपण के बाद से होली की मस्ती शुरू हो जाती थी। छोटी बच्चियां गोबर से होली के लिए वलुडिये बनाती थी। उसमें गोबर के गहने, नारियल, पायल, बिछिया आदि बनाकर माला बनाती थी। अब यह सब नजर नही आता है। होली से पूर्व घरों में टेशु व पलाश के फूलों को पीस कर रंग बनाते थे। महिलाएं होली के गीत गाती थी। होली के दिन गोठ भी होती थी जिसमें चंग की थाप पर होली के गीत गाते थे। होली रोपण से पूर्व बसंत पंचमी से फाग के गीत गूंजने लगते थे। आज के समय कुछ मंदिरों में ही होली के गीत सुनाई देते हैं। होली के दिन कई समाज के लोग सामूहिक होली खेलने निकलते थे। साथ में ढोलक व चंग बजाई जाती थी, अब वह मस्ती-हुड़दंग कहां?
अब होली केवल परंपरा का निर्वहन रह गया है। हाल के समय में समाज में आक्रोश और नफरत इस कदर बढ़ गई है कि संभ्रांत परिवार होली के दिन निकलना नहीं चाहते हैं। लोग साल दर साल से जमकर होली मनाते आ रहे हैं। इस पर्व का मकसद कुरीतियों व बुराइयों का दहन कर आपसी भाईचारा को कायम रखना है।

आज भारत देश मे समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। बात सामाजिक असमानता की करें, इसके कारण समाज में आपसी प्रेम, भाईचारा, मानवता, नैतिकता खत्म होती जा रही हैं। कभी होली पर्व का अपना अलग महत्व था, होलिका दहन पर पूरे परिवार के लोग एक साथ मौजूद रहते थे। और होली के दिन एक दूसरे को रंग लगा व अबीर उड़ा पर्व मनाते थे। लोगों की टोली भांग की मस्ती में फगुआ गीत गाते व घर-घर जाकर होली का प्रेम बांटते थे।
अब हालात यह है कि होली के दिन 40 फीसदी आबादी खुद को कमरे में बंद कर लेती है। हर माह, हर ऋतु किसी न किसी त्योहार के आने का संदेशा लेकर आती है और आए भी क्यों न, हमारे ये त्योहार हमें जीवंत बनाते हैं, ऊर्जा का संचार करते हैं, उदास मनों में आशा जागृत करते हैं। अकेलेपन के बोझ को थोड़ी देर के लिए ही सही, कम करके साथ के सलोने अहसास से परिपूर्ण करते हैं, यह उत्सवधर्मिता ही तो है जो हमारे देश को अन्य की तुलना में एक अलग पहचान, अस्मिता प्रदान करती है। होली पर समाज में बढ़ते द्वेष भावना को कम करने के लिए मानवीय व आधारभूत अनिवार्यता की दृष्टि से देखना होगा।
]]>भारत में सर्वे के अनुसार बुजुर्गों और नौजवान पीढ़ी के बीच संवाद हीनता एक चिंताजनक स्वरूप ले चुका हैl बुजुर्ग एकाकीपन से अब मानसिक रोगों के शिकार होने लगे हैं। जिन बुजुर्गों को चलने फिरने और बाहर जाने में परेशानी होती है उनके लिए नौजवान पीढ़ी के साथ संवाद हीनता परेशानी का एक बड़ा सबक बन चुका हैl महिला तथा पुरुष बुजुर्गों के साथ यह समस्या बृहद रूप लेकर सामाजिक समस्या बन गई हैl बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं इनका जीवन के हर दृष्टिकोण में संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
इसी तरह बच्चों को नैतिक तथा बुनियादी शिक्षा देकर उन्हें देश का अच्छा नागरिक बनाने की जिम्मेदारी भी दम पत्तियों पर होती है पर वर्तमान में बच्चे मां बाप से दूर होते जा रहे हैं और बुजुर्ग अपनी संतानों से मोबाइल ,व्हाट्सएप फेसबुक और इंटरनेट ने नौजवान पीढ़ी और बुजुर्गों के बीच एक बड़ा संवाद हीनता का संकट पैदा कर दिया है।

बुजुर्ग यदि अपने मन की बात किसी से कह नहीं सकेंगे तो उन्हें मानसिक रूप से बीमारी का संकट हो सकता है। नौजवान पीढ़ी को खाली समय में मोबाइल कंप्यूटर में फेसबुक व्हाट्सएप इंस्टाग्राम से ही फुर्सत नहीं है। ऐसे में बुजुर्गों के लिए यह संकट और गहराने का खतरा बढ़ता जा रहा हैl उल्लेखनीय है कि बुजुर्गों का अनुभव उनका ज्ञान परिवार,समाज तथा देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैl
देश की संस्कृति में बुजुर्गों का सम्मान और इज्जत उनकी रक्षा निहित हैl करोना की तीसरी लहर से भारतीय समाज में निवास कर रहे बुजुर्गों की बड़ी संख्या को हमें सुरक्षित और महफूज रखना है। वह वटवृक्ष की तरफ हम सबका मार्गदर्शन करते हैं ,अतः हमारा प्रथम कर्तव्य होगा कि हम वृद्धजनों की हर संभव रक्षा कर उनकी इज्जत, तवज्जो करेंl इसके साथ ही हमें बच्चों तथा नौजवानों की भी रक्षा करनी होगीl भारत सरकार की लगातार चेतावनी और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी निर्देशों की अवहेलना अभी भी भारत देश में जारी हैl सैकड़ों लोग मौत के मुंह में समा चुके हैंl
हमें कोविड-19 के आतंक के साए को भी नहीं भूलना चाहिए।हमे लगातार सावधानी रख कोविड-19 के प्रोटोकॉल का अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ संगठन की गाइडलाइंस के अनुसार अपना आचरण रखना होगा। अन्यथा कोविड-19 की तीसरी लहर फिर भारत के निवासियों को परेशान कर सकती है। भारत में कोविड-19 की तीसरी लहर की शुरुआत बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों तक हो चुकी है। इसके लिए हमें अतिरिक्त सावधानी रखनी होगी। मैंने पहले भी कहा था कि करोना का केरल हॉटस्पॉट बन चुका है। अब दिल्ली, मुंबई चेन्नई अहमदाबाद तथा पूर्वोत्तर राज्य मैं भी कोविड-19 की तीसरी लहर के आंकड़े डरावने हो गए हैं। करोना का डेल्टा वैरीअंट यानी करोना की तीसरी लहर हर जगह फैलने लगी हैl अब यह संक्रमण भारत के महानगरों में फैलने की आशंका को लेकर आया है
दिल्ली ,मुंबई कोलकाता, अहमदाबाद,चेन्नई से कोविड-19 की तीसरी लहर अपना पैर पसार चुकी है। और यदि आपने अपने चेहरे पर मास्क नहीं लगाया, लगातार हाथ नहीं धोया, लोगों से 2 गज की दूरी नहीं रखी और भीड़ भाड़ में जाने से नहीं बचे, तो निश्चित तौर पर कोविड-19 का डेल्टा वैरीअंट को आने से कोई नहीं रोक सकता है । वैसे भी विश्व में इंडोनेशिय,मलेशिया,थाईलैंड, ब्रिटेन, फ्रांस, ब्राजील, अर्जेंटीना,अमेरिका मैं डेल्टा वैरीअंट के तेजी से हजारों प्रकरण बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
अमेरिका डेल्टा वैरीअंट के संक्रमण का भयानक प्रकोप झेल रहा है। भारत में भी पूर्वांचल प्रदेशों में मिजोरम,असम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा में तीसरी लहर के आसार स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। ब्रिटेन, अमेरिका,और फ्रांस जैसे उच्च शिक्षित देशों के नागरिकों ने लॉकडाउन हटते ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस का उल्लंघन कर कोविड-19 की तीसरे संक्रमण की लहर को आमंत्रित कर लिया है। अमेरिका के स्वास्थ विभाग के वैज्ञानिक डॉ मूर्ति ने यहां तक कहा कि अमेरिका तथा यूरोपीय देशों को तीसरी लहर के अल्फा बीटा गामा कप्पा और डेल्टा वैरीअंट से बचने के लिए इंजेक्शन का बूस्टर डोज लगाना पड़ेगा, तभी लोगों की जान बच पाएगी।
24 करोड़ आबादी वाला उत्तर प्रदेश अब तक करोना की लहर से लड़कर उसे दबाने में काफी हद तक सफल रहा है। खुलेआम पर्यटन स्थलों पर मौज मस्ती करने वाले अमीर लोग अपना इलाज तो आसानी से करवा लेंगे पर सबसे बड़ी मुसीबत गरीब तथा सर्वहारा वर्ग के लिए होगी जि ऐसे में यदि भारत में कोविड-19 की तीसरी लहर पर्यटन स्थलों में घूमते हुए बेखौफ लोगों से भारत फिर फैलती है, तो आम जनता का जीवन यापन कठिन तथा दुष्कर हो जाएगा।

और जिंदगी बचाने के लिए त्राहिमाम त्राहिमाम होने की पूरी संभावना है। देश में कोरोना की प्रथम लहर के थोड़े से नियंत्रण में आने के बाद सरकारों और आला अधिकारियों को यह गलतफहमी हो गई थी,कि करोना पूरी तरह नियंत्रित हो गया है। और वापस लौटकर नहीं आएगा। इसीलिए उन्होंने बाजार, आम सभाएं, शादी समारोह, होटल, टॉकीज,बड़े बड़े मॉल को खोलने की तथा ग्राहकों को आमंत्रित करने की अनुमति दी थी।
और नीति निर्माता, राज्य सरकारों, केंद्र सरकार तथा मंत्रालय में बैठे बड़े-बड़े आला अधिकारियों ने कभी कल्पना ही नहीं की थी कि करोना की दूसरी लहर भी आएगी, और इसी के चलते उन्होंने न तो कोई दूरदर्शी नीति बनाई और ना ही इससे बचने के किसी उपाय पर विचार ही किया ।यह उनकी सबसे बड़ी गलती थी, तथा अदूरदर्शिता भी थी ।
लेकिन करोना कि दूसरी लहर ने संक्रमण की जो तबाही मचाई और लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया , अब कोविड-19 की तीसरी लहर भी इसी तरह के संक्रामकता लाने वाली है। यह तीसरी लहर का वैरीऐट बच्चों तथा युवा बुजुर्ग लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगा, और इसके कोई लक्षण भी नहीं दिखाई देंगे, कोविड-19 की पहली लहर में संक्रमण दस दिन तक अपने उफान पर रहता था अब दूसरी लहर में 5 दिन में या पूरे शबाब पर आ जाता है, तीसरी लहर में न जाने यह दो या तीन दिन में अपना सर्वाधिक असर दिखाने वाला होगा, ऐसे में तीसरा संक्रमण कॉल बहुत ज्यादा डरावना और संक्रमण का होगा,वह दूसरे संक्रमण काल से भी ज्यादा मौत देने वाला होगा।
ब्रिटेन की वैज्ञानिक शोध पत्रिका लेसेंट ने बताया कि ब्रिटेन फ्रांस बच्चों के लिए वैक्सीन बनाने में सफल हो गए हैं। एवं ब्रिटेन में बच्चों को वैक्सीनेशन देने की अनुमति देने की तैयारी चल रही है भारत के नौजवान बुजुर्ग और बच्चे बड़ी तादाद में मौजूद हैं उन सब की रक्षा करना हमारा नैतिक दायित्व है। खास तौर पर बुजुर्गों की जो शारीरिक रूप से कमजोर एवं अक्षम होते हैं उनकी तरफ विशेष ध्यान देकर हमें उनकी रक्षा करनी होगी यह हमारा प्रथम दायित्व होगा।
]]>करेला ऊपर से नीम चढ़ा अमेरिका, ब्रिटेन और तमाम यूरोपीय देश यूक्रेन को बढ़-चढ़कर आर्थिक तथा सामरिक मदद करने में लगे हुए हैं खबर यह भी है कि अमेरिका तथा ब्रिटेन जैविक हथियार रूस के विरुद्ध यूक्रेन को सप्लाई करने की मनह स्थिति बना चुके हैं ऐसे में वैश्विक शांति को बहुत बड़ा खतरा हो जाएगा फिर स्थिति संभाले नहीं संभल पाएगी। अभी फिर वर्तमान में अमेरिका और ब्रिटेन यूक्रेन को बड़ी मदद करने को तैयार हो गए हैं।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक यूक्रेन के यात्रा के दौरान कई लाखों पाउंड और हथियारों की मदद का वादा कर आए हैं. जाहिर तौर पर यूक्रेन का हौसला काफी बढ़ा हुआ है हालाकी यूक्रेन ने रूस के साथ युद्ध में भारी तबाही का सामना करना पड़ा है नुकसान दोनों देशों को बहुत हुआ है वैसे भी युद्ध में कुछ हासिल होता नहीं है पर युद्ध रोकने के बदले अमेरिका ब्रिटेन और यूरोपीय देश अभी भी यूक्रेन को उकसाने में लगे हुए जो विश्व शांति के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकता है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कभी भी अपनी सनक में परमाणु बम का इस्तेमाल कर पूरी मानव जाति को खतरे में डाल सकते हैं,ऐसे में भारत ही एक ऐसा देश है जो युद्ध रोकने के लिए दोनों देशों की मदद कर सकता हैl
रूस, यूक्रेन युद्ध तात्कालिक कारणों से नहीं हो रहा है, इसके पीछे अमेरिका की षड्यंत्र वादी नीतियों की कई साजिशें अंतर्निहित हैंl अमेरिका सदैव रूस को वैश्विक जन मंच पर नीचा दिखाना चाहता रहा है। जिस तरह पूर्व में सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक रूस( यू,एस.एस.आर) के उसने कई टुकड़े करवाएं थे, उसी मंसूबों को लेकर आगे बढ़ते हुए उसने लगभग 26 स्थानों पर जैविक बम बनाने के केंद्र अलग-अलग देशों में स्थापित कर रखे हैं, ताकि जब भी मौका लगे अमेरिका उस देश से दुश्मन देशों पर जैविक हथियारों से हमला कर उनकी स्थिति कमजोर कर अपनी नीतियों का गुलाम बना सके l
यूक्रेन में भी तीन महत्वपूर्ण स्थानों में अमेरिका जैविक हथियार बनाने के केंद्र चला रहा था। निश्चित तौर पर रुस को इसकी जानकारी लग चुकी थीl इन जैविक हथियारों का प्रयोग यूक्रेन में रखने का अमेरिकी मकसद सिर्फ और सिर्फ यही था कि इन हथियारों का प्रयोग या तो वह बेलारूस अथवा रूस पर करना चाह थाl रूस अमेरिका के इस षड्यंत्र को अच्छे से समझ चुका था। दूसरी तरफ यूक्रेन को अमेरिका तथा यूरोपीय संगठन और नैटो की दोस्ती पर अंधा भरोसा थाl

वह रूस की चेतावनी को लगातार अनसुनी कर नैटो देशों सदस्य बनने का मैराथन प्रयास कर रहा थाl रूस को यूक्रेन तथा यूक्रेन में रहने वाले पूर्व रूसी नागरिकों की यह हरकत नागवार गुजरीl रूस पिछले कई वर्षों से यूक्रेन को यूरोपीय देशों तथा नेताओं से संपर्क न रखने के लिए तथा अमेरिकी नियंत्रण को यूक्रेन से हटाने के लिए यूक्रेन के हुक्मरानों को चेतावनी देता रहा है। पर व्लादीमीर जेलेंस्की के राष्ट्रपति बनने के बाद यूक्रेन की रूस विरोधी हरकतें तथा प्रतिक्रिया तेज होकर अमेरिकी समर्थन में ज्यादा होने लगीl
अमेरिका रूस पर दबाव डालने के लिए यूक्रेन को अपना सामरिक अड्डा बनाने के षड्यंत्र के तहत यूक्रेन की लगातार आर्थिक सामरिक मदद कर रहा था। जाहिर तौर पर रूस अमेरिका की हरकत को पिछले कई वर्षों से पैनी नजर रख यह अनुभव कर रहा था कि अमेरिका के रूस के प्रति इरादे ठीक नहीं हैं। रूस ने पिछले कई वर्षों से यूक्रेन को संभलने तथा अमेरिका से अलग होने की समझाइश भी दी थी। जेलेंस्की ने रूस में रूसी भाषा पर प्रतिबंध लगाकर रूस को और क्रोधित कर अपना घोर विरोधी बना लिया था।
जिसकी परिणति आज यूक्रेन बहुत बुरी तरह से भुगत रहा हैl रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने राष्ट्र के विभाजन का दर्दनाक स्वरूप देखा था ।वह अब रूस को फिर से उसी रूप में संयुक्त करना चाहता है ।रूस ने सदैव यूक्रेन को नाटो देशों का सदस्य न बनने देने पर अपने वीटो पावर का इस्तेमाल किया। दूसरी वजह यह भी थी कि यूक्रेन से होकर जर्मनी तक रूस की गैस तथा तेल की पाइप लाइन बनाकर वह यूरोपीय देशों को कच्चा तेल तथा गैस सप्लाई बड़े आर्थिक आधार पर कर रहा थाl
तीसरी वजह रूस यूक्रेन युद्ध की यह रही कि रूस ने सदैव यूक्रेन को चेतावनी दी थी कि अमेरिका को यूक्रेन में सामरिक महत्व का अड्डा ना बनाने दिया जाए जाहिर तौर पर यूक्रेन के सारे प्रशासन पर अमेरिका के इशारे पर गतिविधियां निर्धारित की जाती रही हैं। इससे रूस को अपने अस्तित्व पर खतरा नजर आने लगाl इसके अलावा बाहुबली रूस यूक्रेन को सबक सिखाने के साथ यूरोपीय देशों तथा अमेरिका को भी सबक सिखाना चाहता हैl 20 दिनों के यूक्रेन से युद्ध में रूस ने अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा एवं अन्य यूरोपीय देशों को यह बहुत बेहतर तरीके से समझा दिया है कि रूस अभी भी सुपर पावर है एवं आर्थिक प्रतिबंधों से उस पर कोई तात्कालिक प्रभाव नहीं पड़ने वाला हैl
पर यह तो निश्चित हो गया की यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की सारी भ्रांतियां, भ्रम एवं मुगालता इस युद्ध की विभीषिका और बड़े आर्थिक नुकसान से दूर हो गया कि मौका पड़ने पर रूस और नैटो देश के साथ अन्य यूरोपीय देश उसको खुल कर सैन्य मदद करेंगे पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। ये सारे देश यूक्रेन को युद्ध लड़ते देख सिर्फ बाहर खड़े होकर तमाशाबिन बने रहे,और सिर्फ उकसाने का काम ही करते रहे, किसी ने भी इस युद्ध में यूक्रेन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर रूस के विरुद्ध मैदान में युद्ध करने की हिम्मत नहीं दिखाई।
ये तो यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की और वहां की आम जनता का साहस, आत्मविश्वास एवं लड़ने की अदम्य इच्छा शक्ति के कारण ही रूस की सेना के विरुद्ध 8 माह से लड़ाई लड़कर टिके हुए हैंl अब समझौते के लिए रूस ने कड़ी 4 प्रतिबंधात्मक शर्तें रख दी हैं जिससे यूक्रेन पूरी तरह अमेरिका, नेटो देश तथा यूरोपीय देशों से अलग-थलग पड़ कर रूस की इच्छाओं के अनुरूप भविष्य तय करेगाl यूक्रेन सिर्फ अमेरिकी विस्तार वादी षड्यंत्र तथा उसके द्वारा रूस के विरुद्ध की गई अन्य साजिशों का खामियाजा भुगत रहा है और जान-माल तथा बड़े आर्थिक नुकसान को झेल रहा है।
]]>नतीजतन आज भी लोग केमिकल युक्त पैकेट बंद दूध व दूध से बने पदार्थ घरों में उपयोग करने के लिए मजबूर हैं। पशुपालकों को दूध का सही दाम कभी मिला नहीं। पशुपालन लगातार महंगा होता जा रहा है। दुधारू पशुओं के बांझ बनने पर लोग उन्हें आवारा घूमने के लिए छोड़ देते हैं।सरकार ने सूअर पालन के साथ भेड़ बकरी पालन और गायों के लिए गोशालाओं का निर्माण किया जा रहा है। लेकिन ये कदम पर्याप्त नहीं हैं। दुग्ध क्रांति सफल हो भी कैसे, क्योंकि प्रदेश के लगभग सात हजार गांव, ढाणी, कस्बों और शहरों में से केवल आधे से भी कम गांव में पशु अस्पताल खोले गए हैं।
प्रदेश का बहुत बड़ा क्षेत्र अब भी ऐसा है जहां पशु चिकित्सा हेतु कोई पशु अस्पताल नहीं है। इसके अतिरिक्त यदि रात्रि समय कोई पशु बीमार पड़े तो उसका इलाज कहां कराएं, यह पशुपालकों की गंभीर समस्या है। पशु चिकित्सालयों में चिकित्सकों और वीएलडीए के पद खाली पड़े हैं जिन्हें भरा नहीं जा रहा है। ऐसे में पशु पालकों को सही सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।सर्पदंश और बिजली करंट से किसी दुधारू पशु की मौत पर चिकित्सक पशु पालक को आर्थिक मदद मिलने की संस्तुति करते हैं।

अगर किसी गर्भवती दुधारू पशु की मौत गंभीर बीमारी से होने पर पशु चिकित्सक ऐसी कोई रिपोर्ट तैयार नहीं करते हैं, ऐसे में पशु पालकों को हजारों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। वर्तमान दौर में सरकार की ओर से पशुपालकों को ऐसी कोई भी सुविधा फिलहाल उपलब्ध नहीं करवाई जा रही है।वैटरनरी सर्जन को चूंकि नॉन प्रैक्टिस अलाउंस मूल वेतन में जोड़कर दिया जाता है इसलिए उनका वेतन लाखों में है जबकि वीएलडीए सहित अन्य कर्मचारियों को मिलने वाला वेतनमान ऊंट के मुंह में जीरा डालने वाली बात है।
पशु पालकों को जब भी ऐसे स्टाफ को अपने बीमार मवेशियों की जांच करने के लिए घर बुलाना पड़ता है, तब उन्हें अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। पशु चिकित्सालयों में बहुत कम दवाइयां उपलब्ध रहने की वजह से पशुपालकों को मेडिकल स्टोरों से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। एक तो दवाईयों की खरीददारी, ऊपर से स्टाफ को भी पैसे देने पड़ते हैं। ऐसे में पशु पालकों को सरकार की तरफ से कौनसी सुविधाएं मिल रही हैं, जिससे दुग्ध क्रांति प्रदेश में लाई जा सके।
राष्ट्रीय कृत्रिम गर्भाधान योजना के तहत पशुपालकों को घर-द्वार पर ही निशुल्क गर्भधारण की सुविधा दी गई है। इसके तहत पशुओं को टैग लगाए जाते हैं। कहने का मतलब है कि दुधारू पशुओं के कानों में यह टैग लगाकर उनका ऑनलाइन पंजीकरण भी किया जा रहा है। इस योजना का उद्देश्य उच्च गुणवत्ता और उत्तम नस्ल की संतति करके दुग्ध उत्पादन में बढ़ोतरी की जा सके। प्रत्येक जिला के पशुपालकों को प्रजनन योग्य गाय और भैंस को उत्तम नस्ल के वीर्य गुणों की मदद से निशुल्क गर्भधारण की सुविधा दिए जाने का लक्ष्य सरकार ने रखा है।
सरकार द्वारा वीएलडी डिप्लोमा कोर्स हेतु निजी संस्थानों को मान्यता प्रदान की जा रही है जहां से प्रति वर्ष हजारों डिप्लोमा धारक कोर्स करके निकलते हैं लेकिन इन डिप्लोमा धारकों के डिप्लोमा के पंजीकरण और संचालन हेतु कोई परिषद का गठन न होने से इनको बड़ी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन को पशु चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए यह बहुत जरूरी है।
इसके साथ ही नये पशु अस्पतालों का निर्माण और उनमें आवश्यक स्टाफ की नियुक्ति, आवश्यक दवाईयों की उपलब्धता,हर पशु का बीमा, खण्ड स्तर पर पशु धन मेलों का आयोजन और पालकों को हरसंभव मदद मुहैया करवाकर उन्हें दूध का सही दाम मिलना जरूरी है। किसानों, पशुपालकों की सुविधाओं के लिए पूर्व वर्षों में कृषि मेलों का आयोजन किया जाता था। मेलों में पशु पालकों को सब्सिडी पर दुधारू पशु दिए जाते थे। पशु चिकित्सालयों में औजार, कृषि बीज, दवाइयां और उर्वरक दिए जाते थे।
वर्तमान समय में ऐसा बहुत कम देखने को मिल रहा है। पशु चिकित्सालयों में पशुपालकों को सुविधाएं नहीं मिलने की वजह से लोग पशुपालन से विमुख हो रहे हैं। हरियाणा जैसे राज्य, जहां बेरोजगारी की बड़ी समस्या है, में पशुपालन रोजगार का बड़ा साधन है। इसलिए इस बार के बजट में इसके लिए अलग प्रावधान होना चाहिए।
]]>भारत स्वतंत्रता के बाद हरित क्रांति सातवें दशक के प्रारंभ के बाद ही खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन सका, इसके साथ ही भारत में खुशहाली की स्वाभाविक तौर पर वृद्धि हुई, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी कहा था कि “एक राष्ट्र की शक्ति उसकी आत्मनिर्भरता में है दूसरों से उधार लेकर काम चलाने में नहीं”,पाकिस्तान की स्थिति बिल्कुल ऐसी ही है वह अभी तक स्वतंत्रता के बाद से 75 वर्ष के बाद भी संपूर्ण रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है, वह कर्जे से डूब गया है और अपने देश में खर्चा चलाने के लिए पूरी दुनिया से उधार मांगते हुए घूम रहा है। पाकिस्तान आत्मनिर्भर नहीं होने का एवं उधार की जिंदगी जीने का एक बहुत बड़ा उदाहरण है।
जबकि भारत देश विज्ञान, टेक्नोलॉजी, मेडिकल साइंस,इंजीनियरिंग और कृषि सेवा, खनिज,स्पेस रिसर्च में पूर्णता आत्मनिर्भर होकर विकसित देशों के बराबर खड़ा हुआ है। यह देशवासियों और देश के लिए अत्यंत गौरव का विषय है। आत्मनिर्भरता या स्वावलंबन किसी भी देश की प्रगति विकास तथा और उसके नागरिकों की जिंदगी की जिजीविषा है जिससे वह संघर्ष कर आगे बढ़ता है। इतिहास गवाह है कि किसी भी महान लेखक को महान बनने तक निरंतर मेहनत कर किताबें लिखने का का श्रम करना पड़ा एवं आत्मनिर्भरता की स्थिति में विचार कर अपने विचारों को लिपिबद्ध करना पड़ा तब जाकर वह महानता की श्रेणी को प्राप्त कर सका।
इसी तरह कोई छात्र अपने जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है तो उसे स्वयं परीक्षा में शामिल होना पड़ेगा एवं परीक्षा में मनोवांछित सफलता प्राप्त कर उसे स्वयं अध्ययन करना होगा। इसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र में भी मनुष्य को आत्मनिर्भर होकर मेहनत कर दीक्षित सफलता प्राप्त करनी पड़ेगी।

हमारा देश भारत भी आजादी के बाद से आत्मनिर्भरता की ओर अग्रेषित हुआ आज स्थिति यह है कि वह विश्व में विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ खड़ा हुआ है। तमाम महापुरुषों के जीवन से भी हमें आत्मनिर्भरता तथा स्वावलंबन की शिक्षा मिलती रहती है।महात्मा गांधी अपना कार्य स्वयं किया करते थे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी “दैव दैव आलसी” पुकारा है, तब जाकर उनकी जिंदगी पटरी पर आई और हमें परिश्रम कर आत्म निर्भर होने की शिक्षा प्रदान की थी।
दूसरों पर निर्भरता हमें दूसरों का अनुसरण करने के लिए मजबूर करती है। दूसरों पर निर्भर होने से हमें के अनुरूप ही जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ता है। पराधीनता हमारा आत्मविश्वास सृजनशीलता सोचने की शक्ति को नष्ट कर देती है। गुलामी एक अभिशाप होती है, आत्मनिर्भरता की कमी हमें किंकर्तव्यविमूढ़ बना देती है। दूसरों की कृपा पर जीने वाला व्यक्ति जीवन के अक्षय आनंद से वंचित रहता है। खुद के परिश्रम श्रम से आगे बढ़ने वाला देश या व्यक्ति या समाज सदैव प्रफुल्लित आत्म विश्वासी तथा विकास की ओर सदैव अग्रसर रहता है।
हमें सदैव अपने अंदर के आत्मविश्वास, छिपी हुई क्षमताओं मनोबल का सहारा लेकर आत्मनिर्भर या स्वावलंबी बनने का प्रयास हमेशा करते रहना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य को मनुष्य होने का अधिकार प्राप्त होता है। पराधीन देश सामान्य व्यक्ति सदैव पशु तुल्य होते हैं। जिनका अपना कोई विचार या व्यक्तित्व नहीं हो सकता है। कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता राम सहायक उनके होते, जो होते हैं, आप सहायक, हम सबको स्वयं पर भरोसा रखना आत्मबल बढ़ाने तथा आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा देती रहती हैं।
]]>इसी तारतम्य में पाकिस्तान ने गैस के दाम 30% बढ़ा दिए हैं एवं बिजली की कीमत में ₹ ₹6 का इजाफा किया है। महंगाई और भुखमरी को लेकर पंजाब बलूचिस्तान मैं जनता सड़क पर आ गई है और विद्रोही स्वर उभर कर सामने आने लगे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने स्वीकार किया है कि पाकिस्तान अब चंद दिनों में दिवालिया होने की कगार पर है आटा ₹250 किलो के भाव में भी उपलब्ध नहीं है, चावल कहीं दिखाई नहीं दे रहा है, शक्कर अब वहां कड़वी होने लगी है।
पाकिस्तान के परंपरागत आयरन फ्रेंड ने भी पाकिस्तान से किनारा कर लिया है अब चीन के लिए पाकिस्तान एक दुखदाई मित्र की तरह साबित हुआ जो सिर्फ केवल कटोरा लेकर मांगने की ही फितरत रखता है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत की सरकार ने चीन को वहां चीन तथा पाकिस्तान सिल्क कॉरिडोर के लिए काम करने वाले चीनी कर्मचारियों को साफ-साफ कह दिया है कि उनकी सुरक्षा की गारंटी अब चीन स्वयं अपने सुरक्षा गार्ड रखकर कर ले अब उनकी सुरक्षा की गारंटी राज्य सरकार नहीं उठा सकती है।

उल्लेखनीय है कि पाकिस्तानी रुपया अपने रिकॉर्ड स्तर पर नीचे आ गया है और यदि आईएमएफ उन्हें सहायता नहीं करता है तो यह और नीचे लुढ़क ने की संभावना है। पाकिस्तान ने आईएमएफ के साथ समझौता कर उसकी शर्तों पर अमल करने का प्रयास किया है और इसी के चलते पेट्रोल गैस बिजली के दामों में बढ़ोतरी कर दी है पाकिस्तान की जनता पर अब नया कर्ज लाभ दिया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी के देश पाकिस्तान को किसी भी तरह की मदद करने से इंकार कर चुके हैं अब केवल इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड ही पाकिस्तान सरकार को कुछ दिनों के लिए बचा सकता है लेकिन उनके द्वारा दिए जाने वाले लोन के विरुद्ध पाकिस्तान के पास किसी तरह की कोई गारंटी उपलब्ध नहीं है।
भारत और पाकिस्तान 15 अगस्त 47 को एक साथ आजाद हुए थे मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान को एक इस्लामी राष्ट्र बनाकर आतंकवाद की बुनियाद रखी थी। धीरे-धीरे पाकिस्तान आतंकवाद की राह पर चलने लगा एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी आतंकवादी छवि ने उसके आर्थिक विकास को नेस्तनाबूद कर दिया ।भारत आज वैश्विक स्तर पर एक नई शक्ति बन चुका है दूसरी तरफ पाकिस्तान आज की स्थिति में पूरी तरह से कंगाल होकर पूरी दुनिया के कर्जे में डूबा हुआ कर्जा पटाना तो दूर वह ब्याज बनाने की स्थिति में नहीं है।
पाकिस्तान पाई पाई के लिए मोहताज है आम जनता आटे, दाल ,नमक, शक्कर ,पेट्रोल-डीजल के लिए सड़कों पर प्रदर्शन कर रही हैं। पाकिस्तान के पास अब श्रीलंका जैसे हालात पैदा हुए हैं और दिवालिया होने की कगार पर है अब केवल इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड के सामने दिवालिया होने से बचाने के लिए उनकी शर्तों का पूरा पालन करने की की मजबूरी है अन्यथा पाकिस्तान भी पूरी तरह दिवालिया हो जाएगा।

दिवालिया होने की कगार पर पाकिस्तान होने के बावजूद सहवाज शरीफ स्वतंत्र कश्मीर का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राग अलाप रहे हैं यह उनकी मानसिक स्थिति के दिवालियापन को दर्शाता है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों द्वारा किनारे कर दिया गया है और वह एक आतंकवादी पोषक देश के रूप में भी जाना जाता है। ऐसे में पाकिस्तान को अपने आवाम को बचाने के लिए अपनी नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा अन्यथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी उसे किसी तरह का लोन देने से कभी भी इंकार कर सकता है।
]]>15वीं से 16वीं शताब्दी सीई में, रविदास, जिन्हें रैदास के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय रहस्यवादी कवि-संत थे जिन्होंने भक्ति आंदोलन का नेतृत्व किया। वह एक कवि, समाज सुधारक और आध्यात्मिक व्यक्ति थे, जिन्हें उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के समकालीन क्षेत्रों में एक गुरु (शिक्षक) के रूप में सम्मानित किया गया था। रविदास के जीवन की विशिष्टताएँ विवादित और अज्ञात हैं। उनका जन्म 1450 ईस्वी के आसपास हुआ माना जाता है। उन्होंने जाति और लिंग आधारित सामाजिक बाधाओं को दूर करने की वकालत की और व्यक्तिगत आध्यात्मिक स्वतंत्रता की खोज में सहयोग को प्रोत्साहित किया। रविदास के भक्ति छंद सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में पाए जाते हैं। हिंदू धर्म की दादू पंथी शैली के पंच वाणी शास्त्र में रविदास की बहुत सारी कविताएँ हैं। वह रविदासिया के मुख्य पात्र भी हैं।

रविदास के जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। विद्वानों के अनुसार उनका जन्म 1450 ई. में हुआ था और उनकी मृत्यु 1520 ई. में हुई थी। गुरु रविदास का दूसरा नाम गुरु रैदास था। उनका जन्म भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में, सर गोबर्धन गाँव में हुआ था, जो वाराणसी के करीब है। श्री गुरु रविदास जन्म स्थान उनके जन्मस्थान का वर्तमान नाम है। उनकी माता माता कलसी थीं, और संतोख दास उनके पिता थे। उनके माता-पिता अछूत चमार जाति से थे क्योंकि वे चमड़ा उद्योग में काम करते थे।
हालाँकि उन्होंने शुरू में एक चमड़े के कार्यकर्ता के रूप में काम किया, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपना अधिकांश समय गंगा नदी के किनारे आध्यात्मिक गतिविधियों में संलग्न होने में बिताना शुरू कर दिया। उसके बाद उन्होंने अपना अधिकांश समय तपस्वियों, साधुओं और सूफी संतों के साथ व्यतीत किया। रविदास ने कम उम्र में ही लोना देवी से शादी कर ली थी। उनके पुत्र विजय दास का जन्म हुआ। कई भक्ति आंदोलन के कवियों की शुरुआती जीवनियों में से एक, अनंतदास परकई, जो अभी भी अस्तित्व में है, रविदास के जन्म की चर्चा करता है।
भक्तमाल जैसे मध्ययुगीन युग के साहित्य के अनुसार, गुरु रविदास ब्राह्मण भक्ति-कवि रामानंद के छात्र थे। उन्हें आम तौर पर कबीर का हालिया समकालीन माना जाता है।फिर भी, प्राचीन साहित्य रत्नावली का दावा है कि गुरु रविदास ने रामानंद से आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की थी और वे रामानंदी सम्प्रदाय वंश के थे। उनके जीवन के दौरान, उनके विचारों और लोकप्रियता में वृद्धि हुई, और लेखन से संकेत मिलता है कि पुरोहित उच्च जाति के ब्राह्मण सदस्य एक बार उनके सामने झुके थे। उन्होंने व्यापक रूप से यात्रा की, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और हिमालय के हिंदू मंदिरों में रुके।
उन्होंने सर्वोच्च प्राणियों के सगुण (विशेषताओं, चित्र सहित) रूपों को त्याग दिया और निर्गुण (सार, गुणों के बिना) रूप पर ध्यान केंद्रित किया। क्षेत्रीय भाषाओं में दूसरों को प्रेरित करने वाले उनके रचनात्मक भजनों के परिणामस्वरूप सभी पृष्ठभूमि के लोगों ने उनसे सबक और परामर्श मांगा। अधिकांश शिक्षाविद इस बात से सहमत हैं कि गुरु नानक – सिख धर्म के संस्थापक, गुरु रविदास से मिले थे। आदि ग्रंथ में गुरु रविदास की 41 कविताएँ हैं, और सिख सिद्धांत उन्हें उच्च सम्मान देते हैं। उनके विचारों और साहित्यिक कृतियों के शुरुआती स्रोतों में से एक ये कविताएँ हैं। प्रेमबोध के नाम से जानी जाने वाली सिख जीवनी, रविदास के जीवन से संबंधित विद्या और कहानियों का एक और महत्वपूर्ण स्रोत है।
उन्हें अपने काम में भारतीय धार्मिक परंपरा के सत्रह संतों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, जिसे 1693 में गुरु रविदास की मृत्यु के 170 से अधिक वर्षों के बाद लिखा गया था। गुरु रविदास के अध्याय अनंतदास और नाभादास के भक्तमाल दोनों में पाए जा सकते हैं। सत्रहवीं शताब्दी से। रविदास के जीवन के बारे में अधिकांश अन्य लिखित स्रोत, जिनमें रविदासी (गुरु रविदास के अनुयायी) भी शामिल हैं, 20वीं शताब्दी की शुरुआत में, या उनके निधन के लगभग 400 साल बाद लिखे गए थे। इस नियम के अपवाद सिख परंपरा के ग्रंथ और ग्रंथ और हिंदू दादूपंथी परंपराएं हैं। रविदास उन संतों में से एक थे जिनके जीवन और कविताओं को इस काम में शामिल किया गया था, जिसे परकस (या परचिस) के नाम से भी जाना जाता है। समय के साथ, अनंतदास की पारसी पांडुलिपियों की नई प्रतियां बनाई गईं, उनमें से कुछ अन्य क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं में थीं।
विन्नंद कैलेवर्ट के अनुसार, पूरे भारत के विभिन्न स्थानों में, गुरु रविदास पर अनंतदास की जीवनी की लगभग 30 पांडुलिपियों की खोज की गई है। इन चार पांडुलिपियों को क्रमशः 1662, 1665, 1676, और 1687 में दिनांकित किया गया है, और सभी पूर्ण हैं। 1687 संस्करण व्यवस्थित रूप से पाठ में विभिन्न स्थानों पर जाति-संबंधी बयानों के साथ छंदों को सम्मिलित करता है, नए आरोप कि ब्राह्मण गुरु रविदास को सता रहे हैं, रविदास की अस्पृश्यता पर नोट्स, यह दावा कि कबीर ने रविदास को विचार प्रदान किए, निर्गुणी और सगुणी विचारों का उपहास,
और अन्य पाठ भ्रष्टाचार: अनंतदास की पारसी का क्लीनर आलोचनात्मक रूप इंगित करता है कि भक्ति आंदोलन के रविदास, कबीर और सेन के विचारों के बीच पहले की तुलना में अधिक समानता है, कैलेवर्ट के अनुसार, जो 1676 संस्करण को मानक संस्करण के रूप में देखता है और बहिष्कृत करता है ये सभी प्रविष्टियाँ उनके रविदास की जीवनी के आलोचनात्मक संस्करण से हैं। खरे द्वारा रविदास पर पाठ्य स्रोतों पर भी सवाल उठाया गया है, जो कहते हैं कि रविदास के हिंदू और अछूत चित्रण पर “आसानी से उपलब्ध और प्रतिष्ठित पाठ्य स्रोत” नहीं हैं।

गुरु रविदास के लेखन के दो शुरुआती स्रोत सिख आदि ग्रंथ और हिंदू योद्धा-तपस्वी संगठन दादूपंथियों की पंचवाणी हैं। आदि ग्रंथ में रविदास की चालीस कविताएँ हैं, और वे उन 36 लेखकों में से एक हैं जिन्होंने इस महत्वपूर्ण सिख धर्म पाठ में योगदान दिया। आदि ग्रंथ से कविता का यह संग्रह विभिन्न विषयों को संबोधित करता है, जिसमें उत्पीड़न और युद्ध से कैसे निपटना है, युद्ध को कैसे समाप्त करना है, और क्या कोई अपने जीवन को सही कारण के लिए देने को तैयार है या नहीं।
अपनी कविता में, रविदास एक न्यायपूर्ण समाज की परिभाषा, दूसरे या तीसरे दर्जे के नागरिकों के बिना, निष्पक्षता की आवश्यकता और सच्चे योगी की पहचान जैसे मुद्दों को संबोधित करते हैं। बाद के युग के भारतीय कवियों द्वारा लिखी गई कई कविताओं को आदरपूर्वक रविदास को सौंपा गया है, हालाँकि गुरु रविदास का इन कविताओं या उनमें निहित अवधारणाओं से कोई लेना-देना नहीं था, जैसे अन्य भारतीय भक्ति संत-कवियों और पश्चिमी साहित्य के लेखकत्व के कुछ उदाहरण।
निर्गुण-सगुण चक्र के विषयों के साथ-साथ हिंदू धर्म के नाथ योग स्कूल की अवधारणाएं गुरु रविदास के गीतों में शामिल हैं। वह अक्सर “सहज” शब्द का प्रयोग करते हैं, जो एक रहस्यमय स्थिति को संदर्भित करता है जिसमें कई और एक के सत्य एकजुट होते हैं। रविदास की कविता भगवान के प्रति असीम प्रेम और भक्ति के विषयों से भरी हुई है, जिन्हें निर्गुण के रूप में चित्रित किया गया है। नानक की कविता के विषय काफी हद तक सिख परंपरा में रविदास और अन्य उल्लेखनीय उत्तर भारतीय संत-कवियों की निर्गुण भक्ति अवधारणाओं के बराबर हैं। करेन पेचिलिस के अनुसार, अधिकांश उत्तर आधुनिक विद्वानों का मानना है कि गुरु रविदास की शिक्षाएँ भक्ति आंदोलन के निर्गुण दर्शन का एक हिस्सा हैं।
निरपेक्ष के चरित्र पर कबीर और रविदास के बीच एक थियोसोफिकल बहस है, विशेष रूप से अगर ब्राह्मण (परम वास्तविकता, शाश्वत सत्य) एक अलग मानवरूपी अवतार या एक अद्वैतवादी एकता है, जो राजस्थान और उत्तर में खोजी गई कई पांडुलिपियों में है। कबीर प्रथम स्थान का समर्थन करते हैं। इसके विपरीत, रविदास कहते हैं कि दोनों दूसरी धारणा पर आधारित हैं। इन ग्रंथों में, कबीर शुरू में जीतते हैं और रविदास स्वीकार करते हैं कि ब्राह्मण अद्वैतवादी है, लेकिन कबीर ने बहुत अंत तक (सगुण गर्भाधान) एक स्वर्गीय अवतार की पूजा को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
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