
फेस्टीवल के उद्घाटन वाले दिन यानी शुक्रवार को असम की मशहूर गायक-संगीतकार जुबली बरुआ और उनका बैंड इस फेस्टीवल में आकर्षण का केन्द्र बना। शुक्रवार की रात उन्होंने एक के बाद एक गाने गाकर लोगों का खूब मनोरंजन किया। जुबली ने अपने प्रोग्राम की शुरुआत ‘दिल्ली दिल्ली’ से की, जिसके बाद उन्होंने पैरों को थिरकाने वाला “बगूरम्बा” और “माहोत बोंदू” गाया।
इन गानों ने उस शाम के लिए लोगों का मूड बना दिया। इसके बाद उन्होंने “खामोशियां”, “लाल मेरी”, “मधु दानव”, “व्ही आर द वर्ल्ड” और आखिर में अपने प्रोग्राम को विराम देते हुए बेहतरीन बीहू गाना गाया। दर्शकों में कई ऐसे थे, जो पहली बार जुबली की परफॉर्मेंस देख रहे थे और कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने भी दर्शकों को निराश नहीं किया।

शिव तांडव पर मां-बेटी की जोड़ी मारामी और मेघरंजनी मेधी ने कथक किया, जिसे दर्शकों ने जी-भरकर सराहा।
फेस्टीवल का दूसरा दिन भी उत्साह और उमंग से भरा रहा। इस दौरान फेस्टीवल में आने वाले मेहमान लोगों के प्रदर्शन के लिए रखे गए इस क्षेत्र के धनी और रंगीन टेक्स्टटाइल, हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट की एक झलक पाने के लिए कॉम्प्लेक्स में उमड़ रहे थे। फोक डांस, क्षेत्र के टॉप डिज़ाइनरों द्वारा पेश किया गया फैशन शो और जॉन ओनाम के लाइव म्यूज़िकल परफॉर्मेंस के साथ-साथ मणिपुर से आए बैंड ने भी इस समारोह में ग्लैमर जोड़ दिया।
सीईओ, नेफ्ट और सेलिब्रेटिंग नॉर्थ ईस्ट के क्यूरेटर विक्रम राय मेधी ने कहा, “मैं वापस दिल्ली आकर बहुत उत्साहित हूं। इस शहर ने हमेशा से ही हमें खूब प्यार दिया है। यहां गज़ब की ऊर्जा है और हमें पॉज़िटिव साइन मिल रहे हैं। लाइव म्यूज़िक और परफॉर्मेंस ने फेस्टीवल के एहसास को और बढ़ा दिया है। कुल मिलाकर, मैं इसके नतीजे से बहुत अधिक खुश हूं। हमारी कोशिशों को पहचाना गया है और मेरे लिए यही सफलता है।”
यह फेस्टीवल 19 तारीख को कुछ डांस और निज़ामी बंधुओं और ग्रुप की लाइव म्यूज़िक परफॉर्मेंस के साथ खत्म होगा। इस दौरान क्षेत्र के कुछ बेहतरीन डिज़ाइनर जैसे परिणिता बरुआ, जाह्नवी स्वरगियारी, अनामिका डेका, प्रीति चक्रवर्ती और गोन निजी फैशन शो भी पेश करेगें। इस दौरान नेफ्ट का विशेष ब्लैक कलेक्शन भी लॉन्च किया जाएगा।
]]>हाल ही में एक प्रमुख बॉलीवुड पत्रिका की 50 वीं वर्षगांठ पर आयोजित एक शानदार कार्यक्रम में ट्रेलर को लांच किया गया, जिसमें रेखा, अनिल कपूर, शत्रुघ्न सिन्हा, कबीर बेदी, मनोज बाजपेयी, कार्तिक आर्यन, भूमि पेडनेकर, वाणी कपूर, नरगिस फाखरी, अनुपम खेर, बोमन ईरानी, सोनू सूद और रवीना टंडन जैसे बॉलीवुड ए-लिस्टर्स ने हिस्सा लिया। ट्रेलर को सभी कलाकारों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली।

फिल्म की मार्मिक कहानी बताती है कि कैसे चाय जनजाति के लोग उचित शिक्षा, और भूमि अधिकारों जैसे कई मानवाधिकारों से वंचित और उपेक्षित हैं । फिल्म असमिया और सदरी में फिल्माई गई है, जो असम की चाय जनजाति द्वारा बोली जाने वाली भाषा है।
निर्माता पंकज महंत ने कहा कि “इस धरती पर हर व्यक्ति के दिन की शुरुआत एक कप चाय से होती है – कुछ को इससे ऊर्जा मिलती है, कुछ इसके साथ जागा हुआ महसूस करते हैं। इस चाय को बनाने में जो मेहनत और मुश्किल होती है वह अतुलनीय है। यह फिल्म मिनी इस बारे में बात करती है। एक चाय मजदूर अपने जीवन में कठिनाइयों और चुनौतियों से गुजरता है – कैसे समुदाय का एक अभिन्न अंग होने के बाद भी, उन्हें हर बुनियादी मानव अधिकार से उपेक्षित किया जाता है”

फिल्म का निर्माण पीएम एसोसिएट्स के असमिया अभिनेता पंकज महंत ने किया है और इसकी कहानी खुद अरुणजीत बोरा ने लिखी है। इसमें उर्मिला महंत, बलराम दास, धनंजय देबनाथ, नाबा महंत और पंकज महंत प्रमुख भूमिकाओं में हैं।
‘मिनी’ को युवा और डायनेमिक कैमरामैन अनिरुद्ध बरुआ द्वारा फिल्माया गया था और रंतु चेतिया द्वारा एडिट किया गया है। साउंड डिजाइनिंग और मिक्सिंग देबोजीत चांगमई और अमृत प्रीतम द्वारा की गई है, जबकि म्यूजिक बैकग्राउंड स्कोर नेशनल अवॉर्ड विनर तराली शर्मा द्वारा तैयार किया गया है।
फिल्म को 200 साल पुराने ब्रिटिश बंगले के अंदर असम के एक चाय बागान में एक खूबसूरत स्थान पर शूट किया गया है।
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“लिओ टॉलस्टॉय कहते हैं कि हम जिस रचना को पढ़ते हैं और उसे पसंद करते हैं तो उसे पसंद उसके मूल स्वरूप में किया जाना चाहिए उस स्वरूप में नहीं कि हम जैसा पढ़ना चाहते है वैसा पढ़ें” इस कालजई कृति के बारे में मैं यह धारणा बना सकता हूं कि यह रचना समय के कोहासे को चीरती हुई हमारे मानव मस्तिष्क में समा जाती है। इन रचनाओं के संचित सरोकार हर बार हमारे साथ जुड़कर एक नया विस्तार पाती जाती हैं।
हमें किताब से संघर्ष करना पड़ता है उस से पीछा छुड़ाने के लिए, पर किताब हमारे जेहन में कितने गहरे बैठ जाती है कि वह किन्हीं भी संदर्भों में हमसे अलग नहीं हो पाती है और इस रचना वाली की यही सबसे बड़ी विशेषता है एक बार पढ़ लेने के बाद उसका आस्वाद मन मस्तिष्क से बाहर नहीं निकल पाता। कोविड-19 के भयावह काल के समय लेखक द्वारा समय का सर्वाधिक सदुउपयोग करते हुए सुभाषित कथनावली की रचना की गई थी, यह कृति इनकी पूर्व में लिखित दो कृतियों “नयन द्वी शतक” और “लाडली लल्ला” जो विशुद्ध रूप से रीतिकालीन प्रेम रस की रचनाएं थी उनसे हटकर नैतिकता और आध्यात्मिकता जैसे गूढ विषय पर लिखी गई है। भौतिकवादी दृष्टिकोण से परे इसका विषय वस्तु नैतिकता तथा आध्यात्मवाद है।इस कृति में1 ख्याति प्राप्त लोगों के मुहावरों कथनों, उपदेशों का समावेश किया गया है।

शास्त्र अनंत हैं विद्या अनेकों प्रकार की है किंतु जीवन बहुत थोड़ा है, बाधाएं अनेक हैं ,इसीलिए जो साबुत है उसे ग्रहण कर लेना चाहिए जैसे हंस दूध और पानी से दूध पी लेता है बाकी शेष छोड़ देता है” उसी तरह श्री राम आचार्य जी ने वेदों, उपनिषदों रामायण, महाभारत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों से चुनिंदा उदाहरणों ,दृष्टांतों के श्रेष्ठ संदर्भों को संकलित कर नवीन तरीके से इस कृति में पिरोया है, इस रचना में सभी छंद नैतिकता से बंधे हुए और आध्यात्मिकता से अच्छादित भी हैं,जिसमें स्पष्ट रूप से जीवन की पद्धति उचित साधनों का मनोरंजक वर्णन एवं मार्गदर्शन भी है।
सुभाषित कथनावली में अधिकांश रचनाएं दोहे चौपाई छंद की पुरानी शैली में की गई है और कुछ रचनाएं राधेश्याम रामायण तर्ज पर कुंडलियां, सवैया आदि में की गई है। यह केवल इस उद्देश्य से की गई है कि कठिन विषय को सरल तरीके और मनोरंजन, बोधगम्य तरीके से पाठकों के समक्ष रखा जा सके। यह तो स्पष्ट है की रचनाएं दूसरों के कथन पर आधारित जिसमें विषय अध्यात्म दर्शन पहले से विद्यमान है और इन्हीं विषयों और भावों और विचारों को लेखक ने अपनी शैली में विभिन्न छंदों और भावों विचारों में डालकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। किसी भी काव्य प्रयोजन को मनोरंजन के साथ-साथ उद्देश्य एक उपदेश भी होना चाहिए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का मर्म होना चाहिए।
मैथिलीशरण गुप्त जी की इस बात के अनुसरण में इस रचना यात्रा में नैतिकता एवं आध्यात्मिकता जैसे कठिन और कठोर विषय पर रची गई रचनाओं को साधन मनुष्यों के लिए बोधगम्य बनाकर तो बंधों के साथ रचा गया है,जिससे पाठक वृंद मनोरंजन के रसास्वादन के साथ आनंदित भी होते हैं। पाठकों की सुविधा की दृष्टि से इसे बोधगम्य सरल सुलभ बनाने हेतु महान पुरुषों, संतों, महात्माओं के प्राचीन किस्से कहानियां भी उदाहरण स्वरूप उद्धृत किए गए हैं जिसमें बोधगम्यता बनी रहे। यह एक ऐसी कृति है जो अपने को कालजई स्तर पर खड़ा होने की कोशिश करती है यह एक सार्वभौमिक की धारणा को लेकर आगे चलती है इसके उदाहरण जरूर सनातनी और द्वापर तथा त्रेता युग के पात्रों के संदर्भ में है पर रचनाओं को नए युग के साथ अनमोल रिश्ता बनाते देखते हैं।

एवं यह रचनाएं नवीन संदर्भों की प्रतीत होती है ऐसा नहीं है कि रचनाएं तथा संदर्भ पुराने होने से संपूर्ण किताब प्राचीन काल की प्रतीत हो ऐसा कदापि नहीं है इस किताब को पढ़कर हम नए नए संदर्भों को विस्तार भी देते हैं। इस किताब को पढ़कर प्राचीन संदर्भों का स्मरण हो आता है जैसे धर्मवीर भारती का अंधा युग या शिवाजी सावंत का उपन्यास मृत्युंजय का कई अर्थों में पुनर परीक्षण और उसका तमाम सामाजिक सरोकारों के साथ विस्तारीकरण ही होता पाया गया है।
लेखक ने इतनी कठिन तथा विशेष वर्ग के लिए अपनी काव्यात्मक कृति लिख कर आलोचना,समालोचना को खुले तौर पर आमंत्रित भी किया है क्योंकि यह कृति विद्वतजनों को ही रास आएगी, लेखक का मानना है की हिंदी साहित्य में रीतिकाल के पश्चात ही भक्तिकाल आया क्योंकि रीति की अधिकता को मानव समाज पचा नहीं पा रहा था और इसके कारण पतन की ओर अग्रसर हो गया था इसी तरह इन्हें आशा है की वर्तमान में समाज भौतिकवादिता से ऊबकर नैतिकता तथा आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख होगा और इसी संदर्भ में इनकी रचनाओं में इस भाव का आदित्य प्रस्फुटित दिखाई देता है ।
नैतिकता तथा आध्यात्मिकता इन रचनाओं के उद्देश्य हो सकते हैं पर इनकी रचनाएं मनोरंजन का आस्वाद भी लेकर चलती हैं इस किताब में काव्य रचनाओं का शुभारंभ गणेश तथा सरस्वती की वंदना से होकर 112 काव्य पुष्प ,आत्म ज्ञान ही सर्वोच्च ज्ञान हैं नामक रचना से खत्म होता है। इन्होंने चाणक्य नीति मैं माता को सत्य, पिता को ज्ञान ,धर्म को भ्राता, दया को मित्र बताया है। इसी तरह जीवन के चार सुखों में सर्वोत्तम निरोगी काया को ही बताया है एवं अर्धांगिनी को भी सर्वश्रेष्ठ इंगित किया है और चरित्र के कलंक को सबसे बड़ा कलंक दर्शाया है जो सत्य भी है। कलंक या अपमान को गोस्वामी तुलसीदास ने अपने शब्दों में कहा यद्यपि जग रुदन दुख नाना, सबसे कठिन जाति अपमाना।
एक काव्य रचना में लेखक ने कहा है भगवान की मर्जी ही भक्तों की मर्जी उन्होंने ईश्वर की आराधना में लिखा है प्रभु जो तेरी इच्छा जो मेरी इच्छा जो तू चाहे वही करूं कर लो थोड़ी प्रतीक्षा, सामवेद में ईश्वर के प्रति अच्छी व्याख्या की गई है उन्होंने लिखा है “ईश्वर ना तो हमसे बहुत दूर है और ना ही कठिनाइयों से प्राप्त होता है, वह तो आपके हृदय के भीतर ही है और आत्मानंद के रूप में प्रत्यक्ष है” किताब में उल्लेखित 112 काव्य रचनाओं का उल्लेख करना यह संभव नहीं है पर यह तो तय है की विचारधारा लेखनी और शिल्प के संदर्भ में श्री राम आचार्य एक बड़े योद्धा हैं यह कृति उनके भाषा साहित्य की अंतिम परिणति नहीं है यह प्रगतिशील लेखन कला अभी और भी प्रगति को प्राप्त होगी।
इनकी हर रचना एक नए उदित प्रकाश को जन्म देती है और नई दिशा दर्शन की ओर ले जाती है श्री राम आचार्य के साहित्य काल का मूल्यांकन समकालीन कवियों के साथ बड़े सम्मानजनक तरीके से किया जा सकता है। किताब में बोधगम्यता का काव्यात्मक रूप प्रस्तुत किया गया है। संपूर्ण किताब आध्यात्मिक सनातन उद्देश्य को लेकर चली है जोकि समाजिक परिष्करण का बीड़ा उठाकर नए परिवेश में कविताओं को जन्म देती है ऐसे में थोड़ा भटकाव भी आ जाता है आज कविता केवल मनोरंजन के लिए लिखी जा रही है छायावाद में उद्देश्य पर कविताएं लिखी जाती रही थी। प्रिंटिंग कमाल की है और अशुद्धि न्यून है। इसकी कीमत ₹500 आम पाठक की पहुंच से बाहर है। पुस्तक काफी कष्ट साध्य के बाद पाठकों के हाथ में आई है। पाठकों को मेरी यही सलाह होगी कि वे खरीद कर ही पढ़े और उसका संपूर्ण आनंद ले।
]]>इस प्रतिष्ठित पुरस्कार को प्राप्त करते हुए चिरंजीवी ने अपने प्रशंसकों को भी तहेदिल से धन्यवाद दिया जिन्होंने उन्हें राजनीति से वापस आने के बाद भी स्वीकार किया। इन जाने-माने अभिनेता ने कहा, ‘मुझ पर बरसाया गया ये प्यार और स्नेह बहुत बड़ा है। मैं इस इंडस्ट्री में 45 साल से ज्यादा वक्त से हूं, इनमें से एक दशक मैंने राजनीति में बिता दिया। जब मैं फिल्म उद्योग में वापस आया, तो मुझे संदेह था कि लोग मुझे कैसे स्वीकार करेंगे। लेकिन मेरे प्रशंसकों की ओर से मिलने वाले प्यार और स्नेह की मात्रा कभी नहीं बदली है। उनके दिलों में मेरा वजूद हूबहू बरकरार था। मैं वादा करता हूं कि मैं आपको फिर कभी नहीं छोड़ूंगा, मैं यहां आपके साथ रहूंगा।”

चिरंजीवी ने ये पुरस्कार प्राप्त करने के बाद उन्हें मिले समर्थन और जीवन भर के अनुभव के लिए सरकार और फिल्म उद्योग का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “मैं अपना सिर झुकाता हूं और आप में से हर एक को धन्यवाद देता हूं। अगर किसी के मन में सिनेमा उद्योग में आने की ख्वाहिश है तो इसमें जरूर आएं। ये एक भ्रष्टाचार रहित पेशा है।
आपकी अंतरात्मा को कभी कोई अपराध बोध नहीं होगा। अगर आपके पास प्रतिभा है, तो आप यहां दिखा सकते हैं और आप आसमान की ऊंचाई पर पहुंचेंगे।”चार दशकों से ज्यादा के एक शानदार फिल्मी करियर में, चिरंजीवी ने तेलुगु में 150 से ज्यादा फीचर फिल्मों के साथ-साथ हिंदी, तमिल और कन्नड़ की कुछ फिल्मों में अभिनय किया है।


इस वृत्तचित्र के पीछे की प्रेरणा के बारे में निर्देशक ने कहा, “जीवन में कभी हार न मानने वाली लड़कों की भावना और उनकी प्रेरणा ने मुझे भी प्रभावित किया है। ये लड़के अपने कष्ट के बारे में शिकायत करना बंद कर देते हैं। शिकायतें करने के बजाय वे चुनौतियों का सामना करते हैं और दिलों को जीत लेते हैं।”
यह यात्रा लगभग छह वर्षों में पूरी हुई, जिसका हवाला देते हुये जैकब वर्गीज़ ने कहा कि वे बाबू और मानिक नाम के लड़कों से मिले थे, जो उस समय 12 वर्ष के थे। वे एचआईवी पॉजीटिव बच्चों के एक यतीमखाने में रहते थे। वर्गीज़ा ने कहा, “उनमें से एक बच्चे को तो पैदा होते ही त्याग दिया गया था और दूसरा बच्चा अपने परिवार तथा भविष्य को लेकर भयभीत था। जब मैं उन बच्चों से मिला, जिनका एचआईवी पॉजीटिव पैदा होने में कोई कसूर नहीं था, तो सबसे पहला विचार मेरे मन में आया कि ये कैसे अपनी जिंदगी जियेंगे, कैसे जिंदा रहेंगे और कब तक जिंदा रहेंगे।” वर्गीज़ ने कहा, “हमारे पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं।”
लेकिन उन्हें तब बहुत अचरज हुआ कि ये लड़के कैसे इतना साहसी हैं और कैसे वे अपनी मनपसंद गतिविधियों में हिस्सा लेकर लड़ने के लिये संकल्पित हैं। वे दौड़ते हैं और इस तरह अपने संकल्प को व्यक्त करते हैं। निर्देशक ने बताया कि ये लड़के धीरे-धीरे कदम बढ़ाकर इस बड़ी मंजिल तक पहुंचे हैं। पहले ये 10 किलोमीटर लंबी दौड़ में हिस्सा लेते थे और आगे चलकर हाफ मैराथन, यानी 21 किलोमीटर की दौड़ में हिस्सा ले रहे हैं।

उनकी यात्रा की बारीकियां साझा करते हुये वर्गीज़ ने कहा कि इन लड़कों ने छोटे पैमाने पर शुरूआत की थी। उन्होंने कहा, “जब हम धारा में बहने के लिये तैयार हुये, तो मैं उनके साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ा। मैं उनके मिशन के साथ पांच महाद्वीपों और 12 देशों में गया। मैं बस, उनके साथ-साथ चलता रहा और उनकी जिंदगी को उतारता रहा।”
अपने लक्ष्य को हासिल करने पर आमादा उन लड़कों के स्वास्थ्य के बारे में जब पूछा गया, तो निर्देशक ने कहाः “खेल को उन लोगों ने विश्वास और दम-खम बनाने के माध्यम के रूप में चुना। लेकिन इन सबसे ऊपर उनके रोग के साथ जो कलंक जुड़ा है, सबसे ज्यादा तो उसी ने उन्हें प्रेरणा दी है। यह कलंक ही उन्हें सही पोषण और व्यायाम के बारे में सकारात्मक दिशा में ले जा रहा है।”
वर्गीज़ ने कहा कि रोग से शरीर को उतना नुकसान नहीं होता, जितना नुकसान उससे जुड़े कलंक से होता है, जो मनोवैज्ञानिक स्तर पर प्रभाव डालता है। उन्होंने कहा कि मनोवैज्ञानिक पक्ष पर बहुत काम करने की जरूरत होती है, क्योंकि ये लड़के इस सच्चाई के साथ बढ़ रहे हैं कि उनके परिवार ने बिना किसी कसूर के उन्हें त्याग दिया है।
वर्गीज़ ने कहा कि रोग से जुड़े सामाजिक कलंक और भेदभाव की भावना उन लड़कों से उनकी छोटी-छोटी खुशियां तक छीन लेते हैं। इसके पीछे गलतफहमियों का बहुत हाथ होता है। उन्होंने कहा कि एचआईवी, कुष्ठ जैसी बीमारियों के बारे में बहुत गलतफहमियां हैं, जिनके कारण ये लोग जीवन को पूरी तरह जी नहीं पाते तथा यहां तक कि उन्हें अपने कई अधिकारों से भी वंचित होना पड़ता है।

इन लड़कों में जो भारी बदलाव आया और जो आशा की महान यात्रा बनी, उसके बारे में वर्गीज़ ने कहा कि ये लड़के यतीमखाने में रहने वाले इसी तरह के बच्चों के लिये रोल मॉडल हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि ये लड़के अपनी अंतिम सांस तक इसी तरह दौड़ते रहेंगे और अनेक लोगों की प्रेरणा बनेंगे।
निर्देशक जैकब वर्गीज़ पुरस्कृत भारतीय फिल्म निर्माता, निर्देशक और लेखक हैं, जो अपने संवेदनशील लेखन तथा बेहतर फिल्मों के लिये जाने जाते हैं। वे कन्नड़ फिल्म उद्योग के उच्च गुणवत्ता युक्त सिनेमाई मनोरंजन के लिये प्रसिद्ध हैं। वर्गीज़ प्रायः ऐसे विषयों पर फिल्म बनाते हैं, जिन्होंने उनके दिल को छुआ हो या कोई ऐसा व्यक्तित्व हो, जो उनको प्रेरित करता हो।
वे कहते हैं, “ऐसी फिल्मों पर जो खर्च आता है, वह पैसा भी शायद आपको वापस न मिले। साथ ही ऐसी फिल्मों को प्रदर्शित करने का कोई जरिया भी नहीं होता, बस यही महोत्सव होते हैं।” उन्होंने कहा कि बाबू और मानिक की यह असली कहानी है। वे चाहते थे कि तथ्य सामने आयें, इसलिये यह वृत्तचित्र बनाया है।
आयुष्मान का प्रदर्शन गोवा में आयोजित होने वाले 53वें भारत अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के गैर-फीचर श्रेणी के इंडियन पैनोरामा के तहत हुआ।
फिल्म के बारे में – निर्देशक- जैकब वर्गीज़
निर्माताः दिनेश राजकुमार एन, मैथ्यू वर्गीज़, नवीन फ्रांको
पटकथाः जैकब वर्गीज़
सिनेमाटॉग्राफरः जैकब वर्गीज़
संपादनः कलवीर बिरादर, अश्विन प्रकाश आर
सारः यह ग्रामीण भारत के वंचित वर्ग वाले एचआईवी पॉजीटिव दो 14 वर्षीय बच्चों की कहानी है। उनमें से एक बच्चे को तो पैदा होते ही त्याग दिया गया था और दूसरा बच्चा अपने परिवार तथा भविष्य को लेकर भयभीत था। दौड़ने से प्रेरणा लेकर, वे सामाजिक कलंक और भेदभाव का सामना करते हुये लोगों में जागरूकता तथा विश्व में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास करते हैं। निर्माताः दिनेश राजकुमार एन वरिष्ठ पत्रकार, सिनेमाटॉग्राफर और पुरस्कार प्राप्त फिल्म निर्माता हैं। उन्हें दो बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है –आंधीयुम (2008) और ड्रिब्लिंग विद देयर फ्यूचर (2016) के लिये।
]]>जी हां, हम यह मानते हैं कि एक पहलू जो फिल्म समारोहों को विशेष बनाती है, वह है उनके द्वारा हमारे सामने पेश किया गया उत्कृष्ट कलात्मकता का उदार संग्रह। इस 53वें संस्करण में, भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के विभिन्न लक्ष्यों में से एक लक्ष्य है – भारतीय और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ कृतियों से भारतीय और विदेशी दर्शकों को परिचित कराना।
तो, यह रहा। अब जबकि हम फिल्मों के उत्सव की शुरुआत कर रहे हैं, हम आपके लिए इस महोत्सव का पैलेट प्रस्तुत करते हैं। भारतीय सिनेमा और अंतराष्ट्रीय सिनेमा के कैटलॉग पर एक नज़र डालें।
यह रहा इफ्फी 53 के लिए भारतीय सिनेमा का कैटलॉग: यहां क्लिक करें
यह रहा इफ्फी 53 के लिए अंतरराष्ट्रीय सिनेमा का कैटलॉग: यहां क्लिक करें
हम आशा करते हैं कि यह गोवा में व्यक्तिगत रूप से इफ्फी में भाग लेने वाले सभी लोगों को अधिक से अधिक खूबसूरत फिल्मों को चुनने में मदद करेगा। तो हो जाइए तैयार, इस फिल्म महोत्सव से प्रेरित होने हेतु अपनी आकांक्षाओं के आधार पर अपने उत्सव की योजना बनाने के लिए।
और अगर आप गोवा में व्यक्तिगत रूप से इस महोत्सव में भाग नहीं ले रहे हैं, तो हम आशा करते हैं कि यह पेशकश आपको शरीर से नहीं तो कम से कम मन, हृदय और आत्मा से इसमें भाग लेने के लिए प्रेरित करेगी।
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]]>स्रोत पर कचरे गीले और सूखे कचरे को अलग करने के इस व्यापक जागरूकता अभियान में पूरे भारत से लगभग 45,000 स्कूलों के 75 लाख से अधिक छात्रों ने भाग लिया। कचरा मुक्त शहरों का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए यह अभियान आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा चलाया गया। इतना ही नहीं, हजारों की संख्या में नागरिकों, समुदायों और संगठनों ने अपने शहर के शहरी स्थानीय निकायों, नगर निगमों के नेतृत्व में उत्साहपूर्वक भागीदारी निभाई।

‘स्वच्छता के दो रंग’ नामक इस अभियान में “हरा गीला, सूखा नीला” का संदेश हर घर तक पहुंचाने का आह्वान किया गया, जिसके तहत हरे डस्टबिन में गीले और नीले डस्टबिन में सूखे कचरे को स्रोत पर ही अलग-अलग करने पर जोर दिया गया। अभियान में 2,000 से ज्यादा शहरी स्थानी निकायों ने 31 राज्यों और केंद्र शाषित प्रदेशों में स्कूलों, समुदायों के साथ घर-घर जाकर जमीनी स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए, जिसमें बताया गया कि जहां कचरा निकलता है, वहीं पर गीले और सूखे को अलग कर दिया जाए, तो उसे आसानी से खत्म या रीसाइकल किया जा सकता है। हर उम्र के छात्रों ने पूरे उत्साह से अभियान में शामिल होकर कई तरह की गतिविधियों में भाग लिया, जिसमें पेटिंग, हस्तशिल्प कला के जरिए गीले कचरे के लिए हरे और सूखे कचरे के लिए नीले रंग के लेबल और स्टिकर बनाए। बच्चों ने सूखे कचरे के इस्तेमाल से डस्टबिन, खिलौने आदि बनाए, नुक्कड़ नाटक किए और अपने घरों तक ’स्वच्छता का उपहार’ स्वरूप लेकर गए।
‘स्वच्छता के दो रंग’ अभियान को शुरू करने के लिए असम के खोवाई में छात्रों ने बापू के स्वच्छ भारत के दृष्टिकोण पर नृत्य नाटिका का प्रदर्शन किया। पटना नगर निगम के स्कूली छात्रों ने ‘वेस्ट टू वंडर’ थीम पर कचरे से कई तरह के मॉडल बनाकर गीले और सूखे कचरे के महत्व को समझाया और छोटा भीम जैसे बच्चों के पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर का इस्तेमाल कर जागरूक किया। दिल्ली के एमसीडी स्कूलों ने पज्जल बनाकर उसे सुलझाने के बहाने खेल-खेल में गीले-सूखे कचरे के बारे में जागरूक किया।

इंदौर, जो स्वच्छता सर्वेक्षण अवॉर्ड्स में छह बार देश के सबसे स्वच्छ शहर का खिताब जीत चुका है और 7-स्टार कचरामुक्त शहर है, उसने एक बार फिर दिवाली के बाद स्वच्छता अभियान में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। कुछ अनूठी पहल भी देखने को मिलीं, जहां एनडीएमसी ने स्वच्छता शुभंकर तैयार किया और उसके जरिए लोधी गार्डन में सुबह के समय टहलने निकले लोगों को गीले-सूखे कचरे को अलग रखने का संदेश दिया। असम के तेजपुर म्यूनिसिपल बोर्ड ने ऐसी जगहों पर बैनर और कियोस्क लगाए, जहां काफी संख्या में लोगों का आवागमन होता है। फोरेस्ट घाट पर सेल्फ सस्टेनेबल लोकलिटी के उद्देश्य से स्वयं सहायता समूह और स्थानीय निवासियों के लिए वर्मी कंपोस्टिंग और पिट कंपोस्टिंग का डेमो देते हुए प्रशिक्षण कार्यक्रम रखा गया। केरल की मलप्पुरम नगरपालिका में अंतरराज्यीय मजदूरों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम रखा गया, जिसमें कचरे को अलग करने के अभियान के बारे में जागरूक किया गया। त्रिची नगरपालिका ने सिनेमा हॉल में ऐसे कियोस्क लगाए, जहां कचरे को अलग करने पर क्विज और इंटरेक्टिव जागरूकता अभियान चलाया। भारतीय डाक के अधिकारियों और कर्मचारियों ने देशभर में स्वच्छता से जुड़ी गतिविधियों में खुद को शामिल कर सक्रिय भागीदारी निभाई। कश्मीर के ओपीएस सेक्टर में सीआरपीएफ के जवानों ने सीआरपीएफ कैंप की सड़कों, बगीचों और परिसरों की सफाई के लिए झाड़ू उठाई।
स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण के इस राष्ट्रव्यापी अभियान ने स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन और पुराने डंपसाइटों में जाने वाले कचरे को कम करने की दिशा में जमीनी कार्रवाई के माध्यम से केंद्रित भागीदारी शुरू की। बड़े पैमाने पर चलाए गए इस जन आंदोलन में सभी क्षेत्रों के नागरिकों ने विशेष तरीके से कचरे को स्रोत पर अलग करने के बारे में जागरूकता फैलाई और अभियान को एक बड़ी सफलता दिलाई। इसका असर जमीनी स्तर पर पहले ही दिखाई दे रहा है क्योंकि राज्यों ने अपनी पूरी ताकत शहरों को कचरा मुक्त बनाने की दिशा में लगानी शुरू कर दी है।
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]]>ई दिल्ली स्थित साओल हार्ट सेंटर के संस्थापक और निदेशक डॉ. बिमल छाजेड का कहना है कि भोजन में अधिक वसा, व्यायाम की कमी, तंबाकू का सेवन, बीपी, मधुमेह, मोटापा और अत्यधिक तनाव पर नियंत्रण न होने के कारण हृदय रोग होता है। कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड नामक वसा-यदि रक्त में अधिक वर्षों से हृदय की नलियों के अंदर जमा रहती है। हृदय रोगी इन ब्लॉकों के बारे में अनजान रहते हैं जब तक कि यह 70-80 प्रतिशत चरण तक नहीं पहुंचता है – क्यों कि हृदय को इसकी रक्त की आपूर्ति का केवल 20-30 प्रतिशत की ही आवश्यकता होती है। जब तक लक्षण दिखाई देते हैं तब तक ब्लॉक 80 प्रतिशत या उससे अधिक तक पहुंच चुके हैं। तब केवल यही होते हृदय रोगी अस्पतालों में पहुंचते हैं और हृदय रोग विशेषज्ञ इसका उपचार महंगे स्टेंट और बाईपास जैसा उपचार बताते हैं। स्टेंटिंग के बाद भी मरीज उसी जीवन शैली के साथ आगे बढ़ते हैं और स्टेंट को वापस से ब्लॉक कर लेते हैं- इस प्रकार अगला स्टेंट लगाया जाता है। तब आदर्श समाधान क्या हो सकता है?
डॉ. बिमल छाजेड के अनुसार सबसे अच्छा विकल्प हृदय रोगियों की जीवन शैली प्रशिक्षण और उसकी शिक्षा है। हृदय रोगियों में से अधिकांश चिकित्सकीय रूप से निरक्षर हैं-उन्हें कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड्स, व्यायाम, तनाव प्रबंधन कौशल, हृदय रोग को रोकने के लिए योग, मधुमेह, उच्च बीपी, अधिक वनज को नियंत्रित करने के तरीकों और साधनों के बारे में जानने की आवश्यकता है। यदि हदय की धमनी के ब्लॉक उन्नत चरण में हैं, तो उन्हें इष्टतम चिकित्सा प्रबंधन की भी आवश्यकता है।
आठ देशों – बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत और यूनान के 20 अंतर्राष्ट्रीय खरीदारों ने इसमें भाग लिया। त्रिपुरा, असम और अरूणाचल प्रदेश से एफपीसी/एफपीओ के प्रतिनिधियों और 30 से अधिक निर्यातकों ने भी इस बैठक में भाग लिया। एपीडा ने इस क्षेत्र के निर्यातकों की मदद के लिए विभिन्न पहल शुरू की हैं, जिनकी कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में पहचान की गई है।
डॉ. यू.वेंकटेश्वरालू ने कहा कि त्रिपुरा में अनानास, अदरक, हल्दी जैसी विशेष जिंसों के साथ-साथ बागवानी उत्पादों और सुगंधित चावल, अनाज और तिलहनों जैसे उत्पाद मौजूद है। राज्य सरकार बुनियादी ढांचे और रसद सुविधाओं का निर्माण करने के लिए पूरी कोशिश कर रही है। इसके अलावा, रेल और सड़क की बेहतर कनेक्टिविटी तथा सीमा पार कनेक्टिविटी बांग्लादेश से होकर उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है। इससे अनेक व्यापार केन्द्र खुलेगे और सस्ता परिवहन उपलब्ध होगा। त्रिपुरा के कृषि सचिव एम.एल. डे ने कहा कि त्रिपुरा में एक सिरे से दूसरे सिरे तक मूल्य-श्रृंखला उपलब्ध कराई जा रही है।
एनएफआर और एएआई के प्रतिनिधियों ने बताया कि उनके संगठनों ने कार्गों रखरखाव के लिए सुविधाएं जुटाने के लिए विशेष पहल की हैं। आयातकों और खरीददारों ने भी अपने व्यापार तथा विभिन्न जिंसों में अपनी दिलचस्पी के बारे में बताते हुए पूर्वोत्तर क्षेत्र से जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं के निर्यात की संभावनाओं का पता लगाने का भी वायदा किया।
]]>क्रिस्टालीना जॉर्जिवा ने बताया कि विभिन्न देशों की आर्थिक संकट को कम करना उनकी प्राथमिकता होगी। इस अबसर पर उन होने या भी कहा इस आर्थिक मंदी की परिस्थितिओ में से विन्न देशों को उबरने में सहयोग देने के लिए तैयार हैं। वह इससे पहले जनवरी 2017 से विश्व बैंक की मुख्य कार्यकारी अधिकारी थीं ।