जबकि रक्षा मंत्री ने कहा ‘‘यदि पाकिस्तान के साथ कोई बात होगी तो वह केवल पाक-अधिकृत कश्मीर के बारे में होगी अन्य किसी बारे में नहीं।’’ और अंततः गृह मंत्री ने संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पेश करते हुए पाक-अधिकृत कश्मीर के बारे में नीतिगत बयान दिया। एक सांसद के प्रश्न के उत्तर में शाह ने जोर देकर कहा जब हम कश्मीर की बात करते हैं तो उसमें पाक-अधिकृत कश्मीर और अक्सई चिन भी शामिल हैं।

ये बयान केवल दिखावा नहीं। पाकिस्तान सन 1947 से भारतीय कश्मीर पर कब्जा करने का प्रयास कर रहा है और अब भारत द्वारा पाक-अधिकृत कश्मीर को वापस लेने के प्रयासों के व्यापक अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव होंगे। यह किस प्रकार हमारी विदेश नीति और सामरिक संबंधों को प्रभावित करेगा और इस कदम के क्या परिणाम होंगे? अंतर्राष्ट्रीय निकायों और राष्ट्रों के काूननों के बावजूद प्रबुद्ध राजनीतिक दार्शनिक इसया वलिंग की गैलिक प्रिंस की सूक्ति अभी भी लागू होती है और वह सूक्ति है कि ताकतवर का विशेषाधिकार है कि वह कमजोर से अपनी आज्ञा का पालन करवाता है और इसी के अनुसरण में इजराइल ने अपनी राजधानी तेल अवीब से जेरूुशलम स्थानांतरित करी जबकि जेरूशलम पर मुसलमान और यहूदी दोनों अपना दावा करते हैं और यह दोनों धर्मों का धार्मिक केन्द्र है। इसी के आधार पर चीन हांगकांग में लोकतंत्र की मांग कर रहे नागरिकों का दमन कर रहा है अैर 1979 में सोवियत संघ द्वारा अफगानिस्तान पर हमले के समय से यह महाशक्तियों की प्रतिद्वंदिता का मंच बन गया है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां पर सैन्य शक्ति या मजबूत राजनीतिक गठबंधन के माध्यम से कोई देश अपने लक्ष्य प्राप्त करता है।
पक-अधिकृत कश्मीर के मामले में भारत सामरिक गठबंधन या सैन्य कार्यवाही अथवा दोनों मार्ग अपना सकता है। गृह मंत्री, विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री के बयानों से लगता है कि दोनों मार्ग खुले हुए हैं और सैन्य कार्यवाही के साथ साथ कूटनीति भी चलती है। भारत देर सवेर पाक-अधिकत कश्मीर को वापस लेने के लिए कदम उठाएगा और भारत के कदम के पक्षों में क्या कारक होंगे? इसमें सबसे महत्वूपर्ण कारक अमरीका द्वारा पाक-अधिकृत कश्मीर के बारे में भारत का समर्थन करना है।
इस बात की संभावना है कि अमरीका भारत के पक्ष में होगा। अमरीका अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुला रहा है और वहां पर उसे काफी नुकसान हो रहा है। उसके लिए यह एक और वियतनाम बन गया है और इसलिए वह चिंतित है। डोनाल्ड ट्रंप ने चुनावी वायदा किया था कि वह अफगानिस्तान में अमरीकी सैनिकों की संख्या कम करेगा और 2020 में दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव लडने से पूर्व वे इस वायदे को पूरा करना चाहते हैं किंतु तभी ऐसा कदम उठा सकते हैं जब वहां तालिबान पर अंकुश लगाने के लिए कोई विकल्प हो। इसके लिए अमरीका पाकिस्तान पर निर्भर है किंतु अमरीका पाकिस्तान के पाखंड और दोगलेपन को समझ गया है इसलिए अमरीका ने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देना लगभग बंद कर दिया है। साथ ही पाकिस्तान को चीन का संरक्षण प्राप्त है।
उक्त भू-राजनीतिक परिदृश्य ने पाकिस्तान के बारे में अमरीका की सरदर्दी बढा दी है। डोनाल्ड ट्रंप और अमरीकी सामरिक नेतृत्व के पास भारत के पक्ष में आने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है ताकि तालिबान को निष्क्रिय करने में मदद मिले और इस क्षेत्र में चीन की वर्चस्ववादी महत्वाकांक्षा पर अंकुश लगे। इस बात की पूरी संभावना है कि पाक-अधिकृत कश्मीर को वापस लेने में अमरीका भारत का समर्थन करेगा क्योंकि इससे भारत की अफगानिस्तान तक सीधी पहुंच हो जाएगी और ऐसा ही मत सुब्रमणियम स्वामी ने व्यक्त किया है जो अमरीकी दृष्टिकोण से अवगत हैं। अमरीका चाहता है कि भारत अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप करे किंतु भारत ने अभी तक इस मामले में अपनी अनिच्छा व्यक्त की है।
बदले भूसामरिक परिदृश्य में हो सकता है भारत अमरीका की इस राय को माने और उसके बदले पाक- अधिकृत कश्मीर के संबंध में अमरीका का समर्थन मांगे। कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के बाद भारत पाक- अधिकृत कश्मीर को वापस लेने का लक्ष्य रखेगा क्योंकि इससे चीन और पाकिस्तान की तुलना में भारत को सैन्य लाभ मिलेगा। इस पर चीन की प्रतिक्रिया का अंदाजा लगाना कठिन है। चीनी अवसरवादी होते हैं और बहुत कम लोग चीन की सोच को समझ पाए हैं। इसलिए यूरोपीय और अमरीकी देश चीनी अर्थव्यवस्था का निर्माण कराने पर खेद व्यक्त करते हैं क्योंकि यह विश्व शांति और सुरक्षा के लिए संभावित राजनीतिक खतरा बन गया है। अन्य देशों के भूभाग पर सर्वाधिक दावा चीन का है।
इसलिए भारत को चीन को अलग थलग करने के लिए मेहनत करनी होगी। मेरी राय है कि भारत कई बार चीन भारत संबंधों के बारे में लपरवाह बन जाता है। चीन के साथ इसी तरह की कूटनीति जारी रहेगी किंतु हमें यह समझना होगा कि चीन भारत के लिए संभावित खतरा है। इस क्षेत्र में एक अन्य हितधारक रूस है। भारत ने रूस के साथ पुरानी मैत्री विकसित करने का प्रयास किया है। कश्मीर मुद्दे पर भी रूस ने भारत का समर्थन किया है और हम यह मान सकते हैं कि पाक-अधिकृत कश्मीर में भारत की कार्यवाही को वह अपना पूर्ण समर्थन देगा।
कूटनीतिक दृष्टि से भारत को पाक अधिकृत कश्मीर की वापसी के लिए सैनिक और कूटनयिक मार्ग अपनाना होगा। उसे विश्व को समझाना होगा कि पूरा कश्मीर कानूनी रूप से भारत का है और इसका उल्लेख कश्मीर के भारत में विलय पत्र में है जिस पर तत्कालीन महाराजा ने हस्ताक्षर किए थे और कश्मीर विधान सभा ने उसका समर्थन किया था और इसी तरह अन्य रजवाडे भी भारत में शािमल हुए थे। पाकिस्तान का कश्मीर पर कोई दावा नहीं है।
हमारी उदारता और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के प्रति आदर को देखते हुए कुछ लोग कहेंगे कि नेहरू ने इस मुद्दे पर विवाद की गुंजाइश पैदा की। अब भारत इस अपूर्ण ऐतिहासिक कार्य को पूरा करना चाहता है। दूसरी ओर कश्मीर के राज्यपाल की तरह आप यह भी कह सकते हैं कि पाक-अधिकृत कश्मीर के लोग भारत के साथ मिलना चाहते हैं। इसलिए भारत को भारत में तथा पाक-अधिकृत कश्मीर में कश्मीरी भाई बहनों पर ध्यान रखना होगा। कश्मीरी लोगों को यह अहसास होना चाहिए कि उनका भविष्य भारत के साथ है इसलिए कश्मीर में शीघ्रातिशीघ्र सामान्य स्थिति बहाल की जानी चहिए और भारत इस दिशा में निरंतर कदम उठा रहा है।
शायद इसलिए कि मोदी सरकार के इस कदम से कश्मीर में अब इनकी राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं बची है। लेकिन क्या यह सब इतना आसान था? घरेलू मोर्चे पर भले ही मोदी सरकार ने इसके संवैधानिक कानूनी राजनैतिक आंतरिक सुरक्षा और विपक्ष समेत लागभग हर पक्ष को साधकर अपनी कूटनीतिक सफलता का परिचय दिया है लेकिन अभी इम्तिहान आगे और भी हैं।
दरअसल पाक की घरेलू राजनीति, उसके चुनाव सब कश्मीर के इर्दगिर्द ही घूमते हैं तो नापाक पाक इतनी आसानी से हार नहीं मानेगा। चूंकि भारत सरकार के इस कदम से अब कश्मीर पर स्थानीय राजनीति का अंत हो चुका है और प्रशासन की बागडोर पूर्ण रूप से केंद्र के पास होगी, पाक के लिए अब करो या मरो की स्थिति उत्पन्न हो गई है। शायद इसलिए उसने अपनी प्रतिक्रिया शुरू कर दी है और वो अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर आकर्षित करने भी लगा है। हालांकि वैश्विक पटल पर भारत की मौजूदा स्थिति को देखते हुए इसकी संभावना कम ही है कि भारत के आंतरिक मामलों में कोई भी देश दखल दे और पाकिस्तान का साथ दे।
बालाकोट स्ट्राइक पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया इसका प्रमाण है। इसलिए जो लोग इस समय घाटी में सुरक्षा के लिहाज से केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदमों जैसे अतिरिक्त सैन्य बल की तैनाती, कर्फ़्यू, धारा 144, क्षेत्रीय दलों के नेताओं की नज़रबंदी को लोकतंत्र की हत्या या तानाशाहपूर्ण रवैया कह रहे हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाक की कोशिश होगी कि किसी भी तरह से घाटी में कश्मीरियों के विद्रोह के नाम पर हिंसा की आग सुलगाई जाए ताकि वो अंतर्राष्ट्रीय मोर्च पर यह संदेश दे पाए कि भारत कश्मीरी आवाम की आवाज को दबा कर कश्मीर में अन्याय कर रहा है।
साथ ही मानवाधिकारों के नाम पर यू एन और अंर्तराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसे संस्थानों को दखल देने के लिए बाध्य करें। इसलिए केंद्र सरकार के इन कदमों का विरोध करके ना सिर्फ वो पाकिस्तान की मदद कर रहे हैं बल्कि एक आम कश्मीरी के साथ भी अन्याय कर रहे हैं। क्योंकि विगत 70 सालों ने यह साबित किया है कि धारा 370 वो लौ थी जो कश्मीर के गिने चुने राजनैतिक रसूख़ वाले परिवारों के घरों के चिरागों को तो रोशन कर रही थी लेकिन आम कश्मीरी के घरों को आतंकवाद अशिक्षा और गरीबी की आग से जला रही थी।
संविधान की धारा 370 और 35 ए ने कश्मीर में अलगाववाद की आग को कट्टरपंथ और जेहाद के उस दावानल में तब्दील कर दिया था कि पूरा कश्मीर हिंसा की आग से सुलग उठा और बुरहान वाणी जैसा आतंकी वहाँ के युवाओं का आदर्श बन गया ।
जब 21वीं सदी के भारत के युवा स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया के जरिए उद्यमी बनकर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भविष्य के भारत की सफलता के किरदार बनने के लिए तैयार हो रहे थे तो कश्मीर के युवा 500 रूपए के लिए पत्थरबाज बन कर भविष्य के आतंकवादी बनकर तैयार हो रहे थे। जी हाँ सेना के एक सर्वे के हवाले से यह बात सामने आई थी कि आज का पत्थर फेंकने वाला युवक ही कल का आतंकवादी होता है।
सरकार के इस कदम का विरोध करने वालों से देश जानना चाहता है कि 370 या 35ए से राज्य के दो चार राजनैतिक परिवारों के अलावा किसी आम कश्मीरी को क्या फायदा मिला? यही कि उनके बच्चों को पढ़ने के लिए अच्छे अवसर नहीं मिले? उन्हें अच्छी चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिलीं? हिंसा के कारण वहाँ का पर्यटन उद्योग पनप नहीं पाया? जो छोटा मोटा व्यापार था वो भी आए दिन के कर्फ़्यू की भेंट चढ़ जाता था?
क्या हम एक आम कश्मीरी की तकलीफ का अंदाज़ा गृहमंत्री के राज्यसभा में इस बयान से लगा सकते हैं कि वो एक सीमेंट की बोरी की कीमत देश के किसी अन्य भाग के नागरिक से 100 रूपए ज्यादा चुकाता है सिर्फ इसलिए कि वहाँ केवल कुछ लोगों का रसूख़ चलता है? क्या हम इस बात से इंकार कर सकते हैं कि अब जब सरकार के इस कदम से राज्य में निवेश होगा, उद्योग लगेंगे पर्यटन बढ़ेगा तो रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे खुशहाली बढ़ेगी इससे वो कश्मीर जो अबतक 370 के नाम पर अनेक राजनैतिक कारणों से अलग थलग किया जाता रहा अब देश की मुख्यधारा से आर्थिक रूप से जुड़ सकेगा।
इसके अलावा अपने अलग संविधान और अलग झंडे के अस्तित्व के कारण जो कश्मीरी आवाम आजतक भारत से अपना भावनात्मक लगाव नहीं जोड़ पाई अब भारत के संविधान और तिरंगे को अपना कर उसमें निश्चित रूप से एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का आगाज़ होगा जो धीरे धीरे उसे भारत के साथ भावनात्मक रूप से भी जोड़ेगा। बस जरूरत है आम कश्मीरी के उस नैरेटिव को बदलने की जो बड़ी चालाकी से सालों से उसे मीठे जहर के रूप में दिया जाता रहा है भारत के खिलाफ भड़का कर जो उसे भारत से जुड़ने नहीं देता।
आज जरूरत है आम कश्मीरी के मन में इस फैसले के पार एक नई खुशहाल सुबह के होने का विश्वास जगाने की, उनका विश्वास जीतने की। कूटनीतिक और राजनैतिक लड़ाई तो मोदी सरकार जीत चुकी है लेकिन उसकी असली चुनौती कश्मीर में सालों से चल रहे इस रणनीतिक युद्ध को जीतने की है।
यकीनन राज्यसभा में जो भी गृहमंत्री अमित शाह ने कहा और किया यह वाकई बड़ा और बोल्ड कदम है क्योंकि अभी तक मोदी सरकार का रुख यह रहा है कि दो तिहाई बहुमत होने पर धारा 370 को हटाया जाएगा। दूसरी बात यह है कि अभी तक 370 को हटाने के लिए संविधान संशोधन की बात की जाती रही हैं। अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को लेकर कहा था कि सालों से बने रहने के चलते अब यह धारा एक स्थायी प्रावधान बन चुकी है, जिससे इसको खत्म करना असंभव हो गया है इसलिए सरकार के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चेलेंज जरूर किया जाएगा।
गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में जम्मू कश्मीर संशोधन विधेयक 2019 पेश किया और बहस के बाद पास भी हो गया। अनुच्छेद 35 ए और धारा 370 के एक खंड को छोड़कर बाकी को समाप्त कर दिया गया है। जम्मू-कश्मीर को विभाजित कर दिया गया है, अब लद्दाख और जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश होंगे। एक विधानसभा रहित और एक विधानसभा सहित। जहां तक 370 का सवाल है तो जब इसे लागू किया गया था, तभी इसे अस्थायी बनाया गया था। दशकों तक किसी भी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। अब जब सरकार ने इसे खत्म करने का फैसला किया है, तो तमाम राजनीतिक दल हो हल्ला कर रहे हैं। संविधान और कश्मीरी अवाम की दुहाई दे रहे हैं । पर उन्हें इतना तो सोचना ही चाहिए कि सरकार ने अगर इतना बड़ा फैसला लिया है तो संविधानिक और कानूनी पहलुओं का अध्ययन ज़रूर किया होगा।
अब इस फैसले से कई सारे बदलाव भी देखने को मिलेंगे। जम्मू-कश्मीर पहले राज्य था अब केंद्र शासित प्रदेश हो गया। मुख्यमंत्री का पद समाप्त हो गया। राज्यपाल का पद समाप्त हो गया। दिल्ली की तरह उपराज्यपाल का पद होगा और पुलिस केंद्र सरकार के पास होगी। जम्मू कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश होगा। लद्दाख अलग केंद्र शासित प्रदेश होगा। लद्दाख में विधानसभा नहीं होगी।
कश्मीर के मसले पर सरकार का ये क़दम निश्चित ही ऐतिहासिक और अभूतपूर्व तो है। इससे पहले किसी भी सरकार ने अनुछेद 370 को इस क़दर को हटाने का साहस या दुस्साहस कभी नहीं किया था। एक वजह यह भी थी कि बाक़ी सरकारें संवैधानिक तरीक़े से इससे पार पाने का दिखावा करती थीं जबकि इस सरकार ने संविधान के लूपहोल का फ़ायदा उठाकर ऐसा कर दिया। ठीक वैसे ही जैसे आर्टिकल 35-a को लाया गया था। साल 1954 में नेहरु मंत्रिमंडल ने राष्ट्रपति आदेश के ज़रिए इस आर्टिकल को लागू किया था, अब मोदी मंत्रिमंडल ने भी राष्ट्रपति आदेश के ज़रिए ही इसे हटा दिया है।
लेकिन संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है कि प्रस्ताव में अनुच्छेद 370 को पूरी तरह से नहीं हटाया गया है। उनके मुताबिक, अनुच्छेद 370 तीन भागों में बंटा हुआ है। जम्मू-कश्मीर के बारे में अस्थाई प्रावधान है जिसको या तो बदला जा सकता है या फिर हटाया जा सकता है।
वहीं अमित शाह के बयान के मुताबिक 370(1) बाकायदा कायम है सिर्फ 370 (2) और (3) को हटाया गया है। दरअसल 370(3) में प्रावधान था कि 370 को बदलने के लिए जम्मू और कश्मीर संविधान सभा की सहमति चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि 35A के बारे में यह तय नहीं है कि वह खुद खत्म हो जाएगा या फिर उसके लिए संशोधन करना पड़ेगा।
इस आदेश के बाद राज्य के पुनर्गठन की राह भी अब आसान हो चली है जो संघ की पुरानी चाहत है। लेकिन मूल सवाल वहीं खड़ा है। कश्मीर का जो विलय कुछ तकनीकी ख़ामियों के चलते ‘विशेष’ माना जाता है, क्या वह सारी कमियां सिर्फ़ एक राष्ट्रपति आदेश से दूर हो जायेंगी? इस आदेश से आर्टिकल 35a तो ख़त्म हो जाएगा लेकिन कश्मीर को मिले कई अन्य विशेषाधिकार बरक़रार रहेंगे।
इन तकनीकी पहलुओं के अलवा सबसे अहम बात है घाटी का माहौल। ये किसी से छिपा नहीं है कि घाटी में आम युवा ख़ुद को भारत से उस तरह जुड़ा हुआ नहीं मानता जैसे अन्य भारतीय मानते हैं। उसके मन में भारत के प्रति कई सवाल हैं। ऐसी मनोदशा वाले युवाओं के बीच इस फ़ैसले के क्या परिणाम होंगे, अंदाज़ा लगाना ज़्यादा कठिन नहीं है।
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