रिपोर्ट के अनुसार, देश में बाघों की संख्या 2014 की 1400 से बढ़कर 2019 में 2977 हो गई है।मोदी ने कहा, ‘आज हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि भारत करीब 3 हज़ार बाघों के साथ दुनिया के सबसे बड़े और सबसे सुरक्षित पर्यावास में से एक है।’
प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मैं महसूस करता हूं कि विकास और पर्यावरण के बीच स्वस्थ संतुलन बनाना संभव है। हमारी नीति में, हमारे अर्थशास्त्र में, हमें संरक्षण के बारे में संवाद को बदलना होगा।’
उन्होंने कहा कि बीते पांच वर्षों में जहां देश में अगली पीढ़ी के आधारभूत ढांचे के लिए तेजी से कार्य हुआ है, वहीं भारत में वन क्षेत्र का दायरा भी बढ़ रहा है। देश में संरक्षित क्षेत्रों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। मोदी ने कहा कि 2014 में भारत में संरक्षित क्षेत्रों की संख्या 692 थी जो 2019 में बढ़कर अब 860 से ज्यादा हो गई है।
साथ ही सामुदायिक संरक्षित क्षेत्रों की संख्या भी साल 2014 के 43 से बढ़कर अब सौ से ज्यादा हो गई है। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मैं इस क्षेत्र से जुड़े लोगों से यही कहूंगा कि जो कहानी ‘एक था टाइगर’ के साथ शुरू होकर ‘टाइगर जिंदा है’ तक पहुंची है, वो वहीं न रुके। केवल ‘टाइगर जिंदा है’, से काम नहीं चलेगा। बाघ संरक्षण से जुड़े जो प्रयास हैं उनका और विस्तार होना चाहिए, उनकी गति और तेज की जानी चाहिए।’ उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वास है कि भारत आर्थिक एवं पर्यावरण के दृष्टिकोण से समृद्ध होगा।
भारत अधिक संख्या में सड़कें बनायेगा और देश में अधिक संख्या में स्वच्छ नदियां होंगी। भारत में अधिक रेल सम्पर्क होगा और अधिक संख्या में वृक्षों का दायरा बढ़ेगा।
जिन्हें इस बात की चिंता है कि मोदी अब अचानक मध्यमार्ग से वामपंथ की ओर झुक सकते हैं और लोकलुभावनवाद में फंस सकते हैं उनका भय भी निराधार हो सकता है। मोदी ने जिस नये भारत की बात कही है उसका खाका अभी ठीक से सामने आना बाकी है लेकिन एक साफ समझदारी है कि प्रधानमंत्री अब सब्सिडी और रेवड़ियां बांटने वाली संस्कृति से दूर जा रहे हैं। यही उनके अपनाये जाने वाले नये सुधारों का स्पष्ट संकेत है।
हां, गरीबों को देने के लिये अमीरों से ठोक कर लेने में कोई संकोच नहीं करेंगे। उनके इस अभियान में मध्यवर्ग को भी थोड़ी कीमत चुकानी होगी।
इसके अलावा उनकी युवाओं से उम्मीद कि वह रोजगार मांगने के बजाये रोजगार पैदा करें एक और संकेत है। वे चाहते हैं कि यह देश सरकारी नौकरियों की निर्भरता वाली संस्कृति से दूर हटें और वह जाति तथा सम्प्रदायों पर आधारित आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त करने की ओर बढ़ना चाह रहे हैं। मिनिमम गर्वन्मेंट और मैक्सिमम गर्वनेंस का फलसफा अब भारत ही नहीं सारी दुनिया पर सिर चढ़ कर बोल रहा है।
परमानेंट नौकरी पाते ही हरामखोरी और मक्कारी की बुरी आदत ने कुख्यात बाबूडम को जन्म दिया है। बाबूडम या नौकरशाही या लालफीताशाही ने भ्रष्टाचार को घुन की तरह भारतीय समर्थों की नसों में घोल दिया है। अपने विजय संबोधन में मोदी ने कहा था कि इस देश के गरीबों ने अब ऐसे नेताओं को पसंद करने की मानसिकता त्याग दी है जो उन्हें कुछ देता हो। इसकी बजाये गरीब आदमी कठोर मेहनत से तरक्की करना चाह रहा है। वह कह रहा है कि मेरे लिए अवसर पैदा करो मैं मेहनत से उसे पाल पोस कर बड़ा कर दूंगा।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जिस व्यक्ति की मदद की जा रही है वह पूरी तरह निर्भर होने के बजाये खुद अपनी मदद के लिए मेहनत कर रहा है या नहीं। आरंभ में यह सुनिश्चित करने के लिए कि सब्सिडी और रियायतें सही जगह तक पहुंच रहीं हैं या नहीं। प्रधानमंत्री ने जनधन, आधार और मोबाइल वाली जाम की तिकड़ी का सहारा लिया। जनधन के तहत खोले गये पच्चीस करोड़ बैंक खातों, बायोमैट्रिक पहचान और मोबाइल फोन से प्रधानमंत्री ने गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी और लाभों के मामले में छोटी-सी क्रांति की है।
प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रणाली ने सुनिश्चित किया है कि सब्सिडी लाभार्थी के खाते में सीधे भेजी जाये ताकि इससे रिसाव और भ्रष्टाचार खत्म हो सके।
इस प्रणाली के तहत अब तक चौरासी योजनाओं और कार्यक्रमों में बत्तीस करोड़ से लाभार्थियों को डेढ़ लाख करोड़ से ज्यादा की धनराशि हस्तांतरित की जा चुकी है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण देश में एलपीजी सिलेडरों का वितरण है। करीब डेढ़ करोड़ लोग ऐसे थे जिन्होंने सब्सिडी छोड़ने की प्रधानमंत्री की अपील को सुना और माना। इससे अपने आप एक हजार आठ सौ करोड़ रुपये की बचत होने लगी। इसके अलावा तीन सौ चार करोड़ फर्जी कनेक्शन खत्म करवाये जिससे बचत में भारी इजाफा हुआ।
प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे जीने वाले डेढ़ करोड़ परिवारों को गैस कनेक्शन दिये जिसमें पहला सिलेंडर मुफ़्त दिया। उत्तर प्रदेश में भारी संख्या में बीपीएल परिवारों को इसका लाभ मिला जिसके कारण अधिकतर परिवारों ने चुनाव में भाजपा को वोट दिया।
मोदी का 2022 तक नये भारत का सपना इस बात पर टिका है कि उन्होंने जो सौ से ज्यादा योजनाएं लागू की हैं उनमें वो कैसा प्रदर्शन करते हैं। मोदी ने इनपुट और आउटपुट के बजाये सारा ध्यान नतीजों पर देना शुरू किया है।
मोदी को अगर किसी ने सबसे ज्यादा झटका दिया है तो वह है नौकरशाही। अब बड़े कार्यक्रमों के लिए मोदी को उच्चस्तरीय व्यवसायिक लोगों की मदद लेनी होगी। मोदी को अपने नये भारत की दृष्टि सामने रखनी चाहिए और क्रियान्वयन के लिए ठोस लक्ष्य तैयार करने चाहिए। इससे ज्यादा अहम सवाल ये है कि इन योजनाओं से कितने रोजगार पैदा होंगे। साथ ही योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों को ही मिले। पता चला है कि इतनी पेशबंदी के बाद भी भ्रष्टाचारी चोर दरवाजे खोल ले रहे हैं। उनमें सत्तासीन भाजपा के लोग भी शामिल हैं। देखना है मोदी सरकार अपनों पर ही अंकुश कैसे लगा पायेगी।
]]>आज़ादी के बाद इस सेवा को भारतीय हुक्मरानों ने शहीद भगत सिंह के शब्दों में ऐसे भूरे साहबों की जमात को बाकायदा मान्यता दे दी और सेवा का नाम आईएएस कर दिया। हालांकि आजादी के बाद भारत को ऐसे हृदयहीन प्रशासकों के बजाय विषय विशेषग्य प्रबंधकों की जरूरत थी जो व्यवस्थित तरीके से देश और देशवासियों को विकास की राह पर ले जा सकें।
देश में 15 अप्रैल 2019 को एक ऐसा ही फैसला किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने उस दिन 9 लोगों को बिना परीक्षा, साक्षात्कार के सीधे आईएएस बनाया और सीनियर आईएएस की पोस्ट दे दी। लेटरल-एंट्री के तहत प्राइवेट सैक्टर से इन 9 प्रोफेशनल लोगों को सीधे ही सरकारी मंत्रालयों में संयुक्त सचिव बनाया गया जिन पर यूपीएससी की परीक्षा, इंटरव्यू के द्वारा आईएएस अधिकारी बनाए जाते रहे हैं। इस प्रक्रिया के तहत बीते हफ्ते मोदी ने दुबारा देश की कमान संभालने के बाद 40 और विषय विशेषज्ञों को सीधे आईएएस बना कर ब्यूरोक्रेसी की इस नयी परंपरा को और बल दे दिया गया।

प्राइवेट सेक्टर के पेशेवरों का स्तर वैसा ही हो, इसलिए निजी क्षेत्र के आईएएस के चयन की प्रक्रिया भी संघ लोक सेवा आयोग ने संचालित की। पहले चरण में जिन्हें आईएएस बनाया गया है वो हैं-अंबर दुबे (नागरिक विमानन), अरुण गोयल (वाणिज्य), राजीव सक्सेना (आर्थिक मामले), सुजीत कुमार बाजपेयी (पर्यावरण, जंगल और जलवायु परिवर्तन), सौरभ मिश्रा (वित्तीय सेवाएं) और दिनेश जगदाले (नई और नवकरणीय ऊर्जा)। इसके साथ ही सुमन प्रसाद सिंह को सड़क एवं परिवहन, हाइवे मंत्रालय में ज्वाइंट डायरेक्टर के तौर पर नियुक्ति मिली है। जहाजरानी मंत्रालय में भूषण कुमार को नियुक्ति दी गई है। साथ ही कृषि, सहयोग और किसान कल्याण मंत्रालय के लिए कोकली घोष को चुना गया है।
केंद्र सरकार के कार्मिक मंत्रालय ने जून 2018 में निजी क्षेत्र से ‘सीधी भर्ती’ व्यवस्था के जरिए ज्वाइंट सेक्रेटरी रैंक के पदों के लिए आवेदन मांगे थे जिसके लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख 30 जुलाई 2018 रखी गई थी। तब मोदी सरकार की काफी आलोचना हुई थी। इसके तहत ऐसे लोगों को आवेदन करने योग्य माना गया है, जिन्होंने संघ लोकसेवा आयोग की सिविल सर्विस परीक्षा पास नहीं की। इन पोस्ट के लिए कुल 6,077 लोगों ने आवेदन किए थे, जिनमें से 9 जनों का चयन किया गया। इससे पहले भी कई अफसरों को इस तरह की जिम्मेदारी दी गई है, किंतु इतने बड़े पैमाने पर पहली बार निजी क्षेत्र से अफसरों का चयन हुआ है।
हालांकि ये कोई एकदम नयी परंपरा नहीं है और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले जिनका चयन हुआ था उनमें प्रमुख निजी क्षेत्र के विशेषग्य डॉ. मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहूवालिया, बिमल जालान, विजय केलकर, आरवी शाही, परमेश्वरन अय्यर और राजेश कोटेचा जैसे लोगों के नाम शामिल हैं।
सब जानते हैं इनमें से डॉ. मनमोहन सिंह बाद में देश के वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री बने। परमेश्वरन अय्यर अभी स्वच्छता सचिव हैं और राजेश कोटचा आयुष मंत्रालय संभालते हैं।
यही नहीं इससे पहले कई बार यूपीएससी को खत्म करने की मांग भी की जा चुकी है। निजी और सरकारी क्षेत्र से ये बात बार बार उठती रही है कि भारत की अफसरशाही अंग्रेजों वाली ब्रिटिश सेवा के लिए बनाई गई थी। भारत की आजादी के बाद इसको खत्म कर देना चाहिए था। सिंगापुर के निर्माता ‘ल्यू क्यू यान’ ने तो भारत की असफलता के लिए इन्हीं ब्यूरोक्रेट्स को जिम्मेदार ठहराया था। आधुनिक युग में किसी योजना या परियोजना के लिए उस कार्य में निपुण विशेषज्ञ की जरूरत होती है।

हमारे देश में सामान्यत: यह कहा जाता है कि जब शहरी विकास की बात आती है तो उस आदमी को चुनो, जो अनुभवी टाउन प्लानर हो। मगर सिविल सेवा में ऐसा नहीं होता है। विडंबना देखिए, जो आज शहरी मंत्रालय देखता है, वही कल यातायात को संभाल रहा होता है। फिर आजकल इंजिनीयरिंग और डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने वाले भी आईएएस की परीक्षा देते हैं क्योंकि इन विषयों को आईएएस में लेकर ज्यादा नंबर ले आते है और आईएएस बन भी जाते हैं।
पर ऐसा करके एक तो वो विशेषग्य डाक्टर या इंजिनियर पर सरकार और मां-बाप और सरकार द्वारा खर्च किये गए पैसे की बर्बादी करते हैं दूसरे अपने विषय से अलग विभागों के मुखिया बन कर बेअक्ली अफसरी झाड़ते हैं। जैसे मानव के शरीर को विशेषज्ञ डॉक्टर के द्वारा रिपेयर किया जाता है, उसी तरह से क्षेत्र के विशेषज्ञ को ही जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए।
यूपीएससी की इस पहल से एक बात स्पष्ट है कि देश को आगे ले जाने के लिए विशेषज्ञ ही चाहिए। इसको लेकर भले ही आरक्षण विरोध शुरू हो जाए, या इस तरह से प्रचारित किया जाने लगे।
अब इस नयी परंपरा से आईएएस सेवा के उम्मीदवारों में खलबली मचना स्वाभाविक है और विपक्षी राजनितिक दलों ने भी इसे राजनितिक चश्मे से देखना शरू कर दिया है। उनका आरोप लगाया है कि अस्थायी प्रकृति की इस बहाली में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया जाएगा तथा यह एक और संवैधानिक संस्था को बर्बाद करने की साजिश है। प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री एम वीरप्पा मोइली कह रहे हैं कि यह संस्थाओं के भगवाकरण का वर्तमान सरकार का प्रयास है।
जब भी कुछ नया होगा तो ये सब तो होगा ही पर विरोध करने वाले ये क्यों भूल जाते हैं कि उन्ही के दल के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव के समय में इस सार्थक परंपरा का श्रीगणेश हुआ था। देशकाल परिस्थिति के हिसाब से आज त्वरित विकास और समावेशी कल्याण के लिए लालफीताशाही की जकड़ को ढीला करना समय की मांग है।
]]>