इस चर्चा में समुदाय आधारित आपदा प्रबन्धन के छोटे छोटे सफल प्रयासों के संकलन, संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए बड़े स्तर पर सम्भावित घटनाओं हेतु समन्वित प्रयास पर चर्चा हुई।
उड़ीसा के फैनी साइक्लोन का उदाहरण रखते हुए सरकारी या गैरसरकारी संस्थाओं के सहयोग से जो ऐतिहासिक कार्य किया गया है और जनधन की न्यूनतम हानि से प्रेरणा लेकर भविष्य में उत्तर प्रदेश में भी गैरसरकारी संस्थाओं के साथ समन्वय की कल्पना की गयी।
इस समन्वय मे राज्य, जिला, तहसीलऔर ग्राम पंचायत स्तरों पर संयुक्त प्रयासों, अच्छे अनुभवों को साझा करना तथा विजन बिल्डिंग को ध्यान में रखकर नियोजन की प्रक्रिया पर भी बल दिया गया जिससे प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री के नेतृत्व में समन्वित प्रयास हेतु सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं की साझा रणनिति तैयार हो, जिसमें आंकड़ों का आदान प्रदान, कौशल विकास, क्षमता वृद्धि, आवश्यक संसाधनों की पूर्ण जानकारी एवं उपयोग सम्भव हो।
आगामी दिनों मे उत्तरप्रदेश में ‘‘बाढ़ का पानी एक वरदान है या श्राप’’ विषयक कार्यशाला आयोजित करने पर भी चर्चा हुई ताकि वर्ष जल का सही ढ़ंग से संचयन सम्भव हो सके। बाढ़ के सन्दर्भ में राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण ने पिछले दिनो एक कार्ययोजना जारी किया जिसके बारे में उपाध्यक्ष ने विस्तार से बताया और सभी विभागों एवं संगठनों से सहयोग की अपेक्षा की।
प्रत्येक जिलों में उपलब्ध आपदा प्रबन्धन योजना को अधिक उपयोगी बनाने के लिए समीक्षा बैठको के आयोजन पर भी चर्चा की गयी। विशेषज्ञों ने बताया कि बुन्देलखण्ड के 7 जिले तथा मिर्जापुर और सोनभद्र जिलों में 80 प्रतिशत कुएंऔर 60 प्रतिशत हैण्डपम्प अनुपयोगी हो गये है जिस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री ने सूखा क्षेत्र मे सहयोग के लिए समस्त हितभागियों को पत्र लिखा है जिसका लाभ प्रत्येक नागरिक को पहुँचाने हेतु हम सभी को प्रयास करने की आवश्यकता है।
बहराइच और कुशीनगर का उदाहरण देते हुए बताया गया कि बाढ़ के बाद विस्थापित होने से लगभग 27000 परिवारों की पहचान खो गयी जिन्हें किसी भी प्रकार के सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने की सम्भावना कम प्रतीत हो रही है।
कृषि विशेषज्ञों ने कम वर्षा के कारण होने वाले नुकसान को ध्यान में रखते हुए किसानो के लिए वैकल्पिक फसल, योजना हेतु नियोजन की बात कही तथा स्थानआधारित उपयोगी साहित्य/एडवाइजरी का सुझाव दिया।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों मे अनियोजित भूजल दोहन के कारण फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन सहित मेटल और मिनरल की पेयजल में बढ़ती हुई मात्रा, समुदाय मे चिन्ता का कारण बनती जा रही है। यह भी सम्भव है कि जे0ई0 और ए0ई0एस0 जैसी बीमारियां जो गोरखपुर और मुजफरपुर मे कोहराम मचा रही हैं, के नियंत्रण में आने वाली बाधाएं भी हमारी कम समझ और अनियोजित शोध का परिणाम है।
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स्टाइलिश रेनकोट खरीदें
मॉनसून आते ही मार्केट में सबसे ज्यादा वैराइटी रेनकोट की ही नजर आती है। ये आपको हर डिजाइन, साइज व प्रिंट में मिल जाएंगे।
वॉटरप्रूफ घड़ियां
वॉचेज आपकी जरूरत भी होती है और फैशन सिंबल भी, लेकिन बारिश में परेशानी इस बात की होती है कि कही ये भीग ना जाए। इसलिए मॉनसून के आते ही बाजार में वॉटरप्रूफ वॉचेज की वैरायटी नजर आने लगती है। इसलिए मानसून की शॉपिंग में अपनी वॉटरप्रूफ वॉच खरीदना न भूलें।
डिजाइनर छाते
मॉनसून में छाता हमारी जरूरत का हिस्सा बन जाता है। छाते के बिना हम बारिश में बाहर नहीं निकल सकते। इसलिए बारिश में आप छाते की शॉपिंग कर सकती है। वैसे भी इस मौसम में छातों की बहार आ जाती है। यही वजह है कि आपको तमाम कलर , साइज व पैटर्न के में छाता मिल जाएंगे। इसमें आपको कई तरह के डिजाइन मिल जाएंगे। इनमें आपको वन फोल्डर , टू फोल्डर व थ्री फोल्डर छाते मिल जाएंगे। अगर आप चाहते हैं कि छाता बैग में कैरी करें, तो आप थ्री फोल्डर छाता ले सकती हैं।
फैंसी फुटवियर्स
मानसून के मिजाज को ध्यान में रखते हुए फुटवियर्स खरीदे क्योंकि बारिश में सबसे ज्यादा डर स्लीपर्स के टूटने का होता है। इन दिनों बाजार में प्लास्टिक से बने स्लीपर्स मिलते हैं। इनकी खूबी यह होती है कि ये गीली होने के बावजूद भी नहीं टूटेंगी। ये स्लीपर्स आपको हर रंग में मिल जाएंगी।
इस साल जम्मू कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में बर्फबारी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं। जम्मू कश्मीर में सर्दी का करीब तीन दशक पुराना रिकॉर्ड टूट गया है। इस बार उन पहाड़ी इलाकों में भी बर्फबारी हुई है, जहां पिछले एक दशक में बर्फबारी नहीं देखने को मिली थी। केवल भारत ही नहीं, आधी से ज्यादा दुनिया इन दिनों भीषण सर्दी की चपेट में है। अमेरिका, यूरोप सहित दुनिया के अनेक देश सर्दी का प्रकोप झेल रहे हैं।
कुछ समय पहले जलवायु परिवर्तन को लेकर नासा ने कड़ी चेतावनी देते हुए वर्ष 2018 को अब तक का चौथा सर्वाधिक गर्म वर्ष बताया। नासा के मुताबिक, 2018 में वैश्विक तापमान 1951 से 1980 के औसत तापमान से 0।83 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। अठारवीं सदी की शुरुआत में धरती का औसत तापमान लगभग 13।5 डिग्री सेल्सियस था जो अब 14।5 डिग्री सेल्सियस है।
इसका एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह है कि कार्बन डाइऑक्साइड के वातावरण में जाने के तुरन्त बाद ही तापमान में वृद्धि नहीं होती है। गर्मी का समुद्र में पहुंचना और पूरी सतह के गर्म होने में कुछ वर्षों का अन्तराल रहता है। इसलिये पिछले कुछ दशकों में हमने जो अरबों टन कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि की है उससे उत्पन्न पूरी गर्मी को अब भी महसूस करना बाकी है।
दरअसल पिछले कई दशकों से जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया में चिंता का विषय बना हुआ है और यह समस्या एक अभूतपूर्व पर्यावरण संकट की तरफ बढ़ रही है जो पिघलते ग्लेसियरों, मौसम के बदलते मिजाज, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, बाढ़, चक्रवात, सर्दियों का मौसम अपेक्षाकृत गर्म होना, छोटे द्वीपों का डूबना, आर्कटिक सागर की बर्फ का पिघलना एवं सूखे के रूप में हमारे सामने प्रकट हो रही है।
दुनियाभर के वातावरण में हो रहे इस प्राकृतिक बदलाव को अनदेखा करना समाज के लिए घातक साबित हो सकता है। हाल फिलहाल की घटना पर गौर करें तो पाते हैं दक्षिण कोरिया भी सर्दी की चपेट में है। राजधानी सियोल को 70 वर्षों के बाद के सबसे अधिक हिमपात से जूझना पड़ रहा है। वहां भी कई हवाई अड्डों को बंद कर देना पड़ा। आर्कटिक क्षेत्र में ध्रुवीय तूफान से हवाओं में उतार-चढाव के कारण ही दुनिया के उत्तरी हिस्से में भारी ठंड पड़ी है।
जब भी हम कोयला, लकड़ी और खनिज तेल को जलाते हैं, तो उसमें मौजूद कार्बन वातावरण में उपस्थित ऑक्सीजन से मिलकर कार्बन डाइऑक्साइड गैस का निर्माण करते हैं। ऑक्सीजन के विपरीत इसमें सूर्य के कुछ विकिरण को रोककर सोख लेने की क्षमता होती है जोकि पृथ्वी की सतह से टकराने के बाद लौटकर वापस जा रही होती है।
कुछ अन्य गैस भी ऐसा ही करती हैं जैसे मीथेन (प्राकृतिक गैस के जलने से उत्पन्न) एवं नाइट्रस ऑक्साइड (रासायनिक खाद के उपयोग से उत्पन्न) लेकिन कार्बन डाइऑक्साइड सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वातावरण में हजारों सालों तक बनी रहती है। इन गैसों में सौर विकिरण को रोककर वातावरण को गर्म करने की इस क्षमता को अंग्रेजी में ग्रीनहाउस प्रभाव एवं इन गैसों को ग्रीनहाउस गैस कहा जाता है एक हद तक कार्बन डाइऑक्साइड प्रकृति में संतुलन बनाए रखने व धरती पर मानव जीवन के लिये आवश्यक तत्व भी है।
यूरोपीय वैज्ञानिकों के अनुसार, 2014 से 2023 के दशक में यानी अगले पांच साल सर्वाधिक गर्म रहने के आसार हैं। पूर्वानुमानों से जाहिर है कि दुनिया में तापमान में तेजी से वृद्धि होगी और औसत वैश्विक तापमान में 1।5 डिग्री तक की वृद्धि का अनुमान है।
असमय बारिश और ओलावृष्टि भारत में जलवायु परिवर्तन के घातक परिणामों की रूप में उभरे हैं। आजकल बारिश तब होती है जब नहीं होनी चाहिए और जब होनी चाहिए तब नहीं होती है। कुछ स्थानों पर दक्षिण पश्चिम मानसून जल्दी आने लगा है और अन्य जगहों पर काफी देर से प्रवेश करता है।
किसान बारिश की आस में फसल बोते हैं पर या तो वह नहीं आती है या देर से आती है, या फिर फसल कटने या खलिहान के समय बहुत तेज बारिश होती है जो खड़ी या कटी फसल और चारे को नुकसान पहुंचाती है। ओलावृष्टि में भी पहले से वृद्धि हुई है, उस क्षेत्र में भी जहाँ पहले कभी नहीं हुई। 2015 में इसने 15 राज्यों में 1।8 करोड़ हेक्टेयर जमीन की फसल, जो कि पूरे रबी फसल के रकबे की विशाल 30 प्रतिशत है, को तबाह किया एवं इस कारण से 20,000 करोड़ रुपए का घाटा हुआ। इससे किसानों की आत्महत्याओं की जैसे बाढ़ आ गई जो लगातार बढती ही जा रही है। किसानों को लगातार इन संकटों से मुकाबला करना पड़ रहा है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि देश का एक डिग्री तापमान बढ़ने से पैदावार में 3 से 7 फीसदी की कमी आ जाती है। पर्यावरण का मसला सीधे तौर से खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है। इसलिए इसकी अनदेखी की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
आपको याद होगा पिछले साल दक्षिणी राज्य केरल में पिछले 100 साल की सबसे विनाशकारी बाढ़ आयी थी। वैसे जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव एक ही साथ सभी क्षेत्रों में भी देखे जा सकते हैं जैसे तटीय क्षेत्रों में समुद्र तल का ऊंचा होना तो दूसरी जगह सूखा, उसके आस-पास ही बाढ़, ओलावृष्टि और तेज बारिश हो सकती है। इन हालातों में ग्लोबल वार्मिंग से मुकाबला करने के लिये तत्काल कार्यवाई जरूरी हो जाती है। इसकी वजह से ग्लोबल वार्मिंग के सारे प्रभाव जब एक साथ बड़े पैमाने पर देश-दुनिया पर पड़ेंगे तब मानव के लिये इन गम्भीर और खतरनाक समस्याओं से बचना मुमकिन नहीं होगा।
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