‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’, ‘ए हैपी वर्ल्ड’ और डिस्टॉपियन विचारक के लेखक, एल्डस हक्सले इंग्लैंड में जन्में एक प्रसिद्ध दार्शनिक थे। वे अपने समय के वैज्ञानिक और तकनीकी विकास से परिचित थे और वह यह भी समझते थे कि भविष्य में उसकी दिशा क्या होगी। उन्होंने ब्रेव न्यू वर्ल्ड के प्रकाशन के 30 साल बाद 1962 में दिए गए अपने कुछ सार्वजनिक में अपनी बेहद उम्दा समझ को साझा किया था। इसे उन्होंने सर्वश्रेष्ठ क्रांति का नाम दिया। यहां क्रांति शब्द का अभिप्राय आतंकी राज के मायनों में विकसित हुआ है। इनमें से एक भाषण 20 मार्च 1962 को अमेरिका के बर्कले लैंग्वेज़ सेंटर में हुआ था, जिसकी रिकार्डिंग बर्कले आर्काइव्स में उपलब्ध है। यहां हम उनके कुछ विचार रखना चाहेंगे जो उनके ही शब्दों में ज्यादा सार्थक नज़र आते हैं:
‘अगली पीढ़ी या उसके बाद, एक ऐसा औषधीय तरीका अपनाया जाएगा जिससे लोग अपनी ग़ुलामी से प्यार करने लगेंगे, बिना आंसुओं के एक तानाशाही स्थापित की जाएगी, कहना चाहिए कि पूरे समाज के लिए एक दुखविहीन अत्याचार स्थल बनाया जाएगा, जहां लोगों की आज़ादी दरअसल उनसे छीनी जाएगी, लेकिन वे उसका आनंद लेंगे, क्योंकि प्रचार या दिमागी भ्रम के ज़रिये उनके भीतर बग़ावत करने की इच्छा को ही ख़त्म कर दिया जाएगा, या औषधीय तरीकों से दिमागी भ्रम को बढ़ा दिया जाएगा।’
क्या यही चीज़ हम आज भारत में देख रहे हैं? इस सवाल का जवाब इतनी आसानी से मिलने वाला नहीं।
हक्सले ने भविष्य की तकनीक के ख़तरनाक इस्तेमाल को लेकर चेतावनी दी थी, ख़ासतौर पर प्रचार और दिमागी भ्रम को फैलाने के लिए संचार तकनीकों के बारे में उनका यह विचार था। भारत में हम इसे विध्वंसक स्तर पर इस्तेमाल होते हुए देख रहे हैं।
वहीं फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्तेयर ने असहमतों के बोलने की आज़ादी का पुरज़ोर समर्थन किया था, उन्होंने हर नागरिक के लिए इस आज़ादी को जरूरी बताया था। कबीर तो उनसे भी आगे निकल जाते हैं। वे कहते हैं कि अपनी समझ को साफ़ रखने के लिए हर मनुष्य को अपने नियरे एक आलोचक रखना चाहिए।
भारतीय सभ्यता की इस समझ से वे लोग अनजान हैं जो फिलहाल सत्तासीन हैं। जनहित में काम करने वाली हुकूमतों के भीतर भी मनमाने तरीके से काम करने और बिना किसी सवाल और जवाबदेही के सत्ता का इस्तेमाल करने की प्रबल इच्छा रहती है। अभिव्यक्ति की आज़ादी उनको कभी रास नहीं आती है। समय-समय पर ऐसी ताक़तों ने कमज़ोर या दंभ से भरे मौक़ों पर अपना यह बदसूरत और दमनकारी चेहरा दिखाया है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले लोगों को अपने रास्ते से हटाने में ज्यादा वक्त नहीं लेती हैं ऐसी शक्तियां। और उन लोगों में खौफ भरने से नहीं हिचकतीं जो शायद कभी इन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
यह सब कुछ बारी-बारी से होता है, ताकि उन लोगों को रोका जा सके जो अपने उपर हुए अत्यचारों को लेकर एक साझा अभियान चलाना चाहते हैं। इसकी शुरूआत उन लोगों से होती है जो सांस्कृतिक रूप से थोड़ा अलग नज़र आते हैं और जो इस वजह से राष्ट्र के उस विचार से सहमत नहीं हो पाते जिसे खोखली और संकुचित सरकारें आगे बढ़ाना चाहती हैं।
पहले किसी व्यक्ति विशेष और फिर विशेष समुदाय को मानवता के दुश्मन के तौर पर दिखाने के लिए वे उनके अलग होने का संदेह पैदा करते हैं और बाद में अपने समुदाय के भीतर अपने जनाधार को मजबूत करते हैं। इस तरह दुश्मनों की सूची लंबी होती चली जाती है। लूथरन पास्टर मार्टिन निमोलर ने अपनी एक कविता में इस प्रक्रिया को नाज़ी जर्मनी के संदर्भ में खूबसूरती से दिखाया है। उस कविता का कुछ अंश इस प्रकार है – पहले वे आए सोशलिस्टों के लिए और मैं चुप रहा क्योंकि मैं सोशलिस्ट नहीं था।
अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति का अधिकार लोकतंत्र और मानव सभ्यता के विकास के लिए बहुत ज़रूरी है। कभी-कभी इन अधिकारों के बड़े समर्थक भी इन्हें बचाने के लिए आगे तो आते हैं लेकिन बिना किसी नतीजे पर पहुंचे खुद को अलग कर लेते हैं। दहशत और शर्म का ऐसा कोई पल हमारे उन अधिनायकों के लिए कभी नहीं आता, जब वे अलग तरह की जीवनशैलियों और अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख़िलाफ़ जान लेने वाली भीड़ को लगा देते हैं।
बीसवीं सदी में, ताकतवर यूरोप और तीसरी दुनिया के देशों को एकाधिकारवादी और सर्वसत्तावादी शासनों की दहशत को झेलना पड़ा। अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ रहे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ अम्बेडकर और सरदार पटेल और टैगोर जैसे बहुतेरे जन बुद्धिजीवी इन अनुभवों को लेकर काफी चौकन्ने थे। इसलिए, उन्होंने अहिंसा और अभिव्यक्ति की आज़ादी में अपनी आस्था जताई। अपनी आंदोलनात्मक गतिविधियों के अलावा तिलक, गांधी, नेहरू ने ख़बरों और विचारों को केन्द्र में रखकर प्रकाशनों की स्थापना की और इसकी वजह से या तो उन्हें जेल जाना पड़ा या फिर उनके प्रकाशनों को बंद करवा दिया गया।
अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति के अधिकार को दरकिनार करते हुए गढ़े हुए मुक़दमों, संस्थाओं का फंड रोकने, ब्लैकमेल और मालिकों पर असहमतों की आवाज़ और अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचला जा रहा है। लेकिन इससे ज़्यादा आश्चर्य की बात यह है कि मीडिया के एक बड़े हिस्से और जनता, ख़ासतौर पर शिक्षित मध्यवर्ग में मौजूदा सत्ताधारियों को सक्रिय समर्थन हासिल है। इसका एक कारण यह भी है कि प्रतिक्रियावादी सामाजिक ताक़तों ने कमज़ोर या दंभ से भरे मौक़ों पर अपना बदसूरत और दमनकारी चेहरा दिखाया है ।
]]>सरकार आखिर किस के लिये होती है। लोकतंत्र की परिभाषा तो यही कहती है कि सरकार आम लोगों यानी कॉमनमैन के लिये होती है। सरकार चलाने वालों का धर्म सूर्य के क्रियाक्लाप जैसा होना चाहिये जो समुद्र से जल राशि को सोख ले और बादलों के माध्यम से समान रूप से बरसात करके सभी को बराबर बांट दे। शासक का भाव परमार्थ का होना चाहिये स्वार्थ का नहीं। तभी लोकतंत्र का सही उद्देश्य साकार हो पायेगा। यह दुखद था कि आजादी के बाद से अब तक समय समय पर लोकतंत्र में भी राजतंत्र और राजवंश की कुपरम्पराएं सिर उठाती रहीं हैं।
बीते लोकसभा चुनाव में कॉमनमैन ने राजवंशीय प्रवृत्तियों पर जिस तरह से अंकुश लगाने का काम किया है वो भारत के लोकतंत्र के परिपक्व होते जाने का सुखद संकेत है।
नेहरू और इंदिरा के प्रधानमंत्रित्व वाली सरकारों के लम्बे समय बाद 2019 के जनादेश को इस दृष्टि से उल्लेखनीय कहा जा सकता है कि किसी एक राजनीतिक दल की सरकार को पूर्ण बहुमत से काम करने का अवसर मिला है। पर नयी बात ये है कि संघवाद को मजबूत करने के नजरिये से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अन्य समान धर्मी दलों को ही नहीं विपक्ष को भी विमर्श में साथ लेकर चलने की बात कह रहे हैं। साथ का मतलब केवल हां हुजूरी नहीं बल्कि अगर सरकार की नीतियों में कोई खामी है तो विपक्ष उस ओर इंगित करे और सार्थक सुझाव दे ताकि देश तरक्की की राह पर आगे बढ़े।
देश के सामने आज विकास के साथ कई समस्याएं मुंह बाये खड़ी हैं। किसान, नौजवान बेहाल है। किसान की आय दूनी कैसे हो और खासकर नौजवान खेती किसानी से कैसे जुड़े यह एक बड़ी चुनौती सामने है। यह सच है कि मशीनीकरण के दौर में हाथों को काम घटे हैं। ऐसे में शिक्षा के मॉडल को बदल कर ऐसा कैसे बनाया जाये जो नये समय के हिसाब से युवाओं को काम की गारंटी दे सकें।
कॉमनमैन की ही नसों में गहराई से घुस चुके भ्रष्टाचार और दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार कैसे किया जाये। सार्थक शिक्षा और स्वास्थ्य को सबको कैसे सुलभ कराया जाये। जाति, धर्म की दीवारों को मिटा कर कैसे सबके अंदर भारतीयता का भाव जगाया जाये।
इन सबके उपर देश की बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं और उपलब्ध संसाधनों का संतुलन साधा जाये। पंचतत्वों से मिल कर बना शरीर जब बच पायेगा तभी तो वसंुधरा को भोग पायेगा। देश के पानी, वायु, वनस्पति पर खतरा मंडरा रहा है। ये तय मान लीजिये कि सारा काम अकेले कोई सरकार नहीं कर सकती है। एक शब्द है सिविक सेंस यानी नागरिक होने का बोध। इसका मतलब है कि किसी देश के नागरिक होने के नाते यदि हमारे अधिकार होते हैं तो कुछ कर्तव्य भी हैं। भारतीय नागरिक जब विदेश जाते है तो न यहां वहां थूकेंगे, गंदगी फैलायेंगे, न उल्टा चलेंगे, न लालबत्ती जम्प करेंगे। पर यही काम जब वो भारत में करते हुए रोके जायेंगे तो धौंस दिखायेंगे कि जानते नहीं मै कौन हूं।
पहली बार हमारे किसी प्रधानमंत्री ने 2014 से स्वच्छता अभियान को कॉमनमैन का आंदोलन बनाया है और योग के जरिये कॉमनमैन की जनरल फिटनेस की चिंता की है वो काबिले तारीफ है। अब देखना ये है कि अपनी दूसरी पारी में वो कैसे देश की साठ परसेंट से उपर युवा आबादी के हाथों को काम का इंतजाम करते है ताकि वे आतंकवाद और नक्सलवाद के झांसे में न आयें। देखना ये भी होगा कि मोदी सरकार 2.0 दुनिया के साथ खासकर पड़ोसियों से अपने संबधों को कैसे नये सिरे से परिभाषित करती है।
परिस्थितियां तो अनुकूल ही कही जायेंगी क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार तो है ही मैन्यूफैक्चरिंग और लघु ओर मझोले उद्योग क्षेत्र में भारत के विकास की संभावनाएं अनंत हैं। सकारात्मक सोच के लिये गुजाइश तो रखनी ही चाहिये।
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हाल के महीनों में किसानों की समस्याएं देश के सामने विकराल रूप धारण किये रहीं। मध्य प्रदेश और राजस्थान में तो किसानों के आंदोलन पर पुलिस की गोलीबारी के भी कई मामले सामने आये, जिनमें अनेक किसानों की मौतें हुईं। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान मुख्यरूप से कृषि आधारित राज्य हैं, जिनकी कृषि-आय देश की जीडीपी में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इसके अलावा व्यापक बेरोज़गारी, आय, कृषि और नोटबंदी के कारण असंगठित क्षेत्र की नौकरियों में कमी जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण भारतीय राजनीति में छाये रहे।
पिछले साल के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने प्रधानमंत्री द्वारा गढ़े गये ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ के सपने को भी ज़मीनी स्तर पर धराशायी कर दिया है। गठबंधन की राजनीति को भी इससे एक नयी दिशा मिली है। और जनता के बीच एक स्पष्ट संदेश भी गया है कि कोई भी विपक्षी गठबंधन राष्ट्रीय पार्टी की मजबूत पहल के बिना सफल नहीं हो सकता।
बहरहाल मतदाताओं ने 2019 के लिए अपना संदेश दे दिया है। संदेश यह कि मोदी को शासन पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपने पद की गरिमा को बनाये रखना होगा। सांप्रदायिक या नफरत भरे भाषणों को छोड़कर अपनी छवि सुधारनी होगी। इसके अलावा, राहुल गांधी को एक परिपक्व और सरोकारों से जुड़े नेता के रूप में अपनी छवि को गढ़ना होगा, जिसकी प्रक्रिया शुरू हो गयी है। हालांकि कांग्रेस भले ही तीन राज्यों में विधानासभा चुनाव जीत गयी है, लेकिन उसे राहुल गांधी को विपक्षी गठबंधन का नेता घोषित करने की ग़लती नहीं करनी चाहिए थी। बीजेपी के मुकाबले विपक्ष को सीधा और सपाट संदेश मिला है कि सभी नेताओं को जनभावना को ऊपर रखना होगा और गठबंधन को बाद में।
आम चुनाव के मद्देनजर बीजेपी अपनी रणनीति में आक्रामक ढंग से परिवर्तन लायेगी। आगामी बजट अत्यधिक लोकलुभावन घोषणाओं से भरा हो सकता है। इसके बाद ध्रुवीकरण होगा। मोदी सरकार ट्रिपल तलाक विधेयक को आगे बढ़ा सकती है। ‘मोदी ब्रांड’ को जोरशोर से फिर उठाया जायेगा, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे अन्य उपाय भी सामने आयेंगे। बीजेपी के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 307 या अनुच्छेद 35 का उन्मूलन, विजय माल्या, ललित मोदी और नीरव मोदी को भारत लाने और राज्य चुनावों को एक साथ कराने जैसे अन्य कदमों को उठाने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी जायेगी।
लेकिन जनमानस में जब विरोध के स्वर उठते हैं, तो यह विरोध अनुमान से भी ज्यादा तेजी से गति पकड़ता है। ऐसा पहले भी देखने को मिला है। शंका तो इस बात की व्यक्त की जा रही है कि बीजेपी के ये कदम कहीं उस पर ही न भारी पड़ जायें, क्योंकि जनभावना की उपेक्षा में ही इंदिरा गांधी की सरकार गिर गयी थी। इसी कारण अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारें भी चुनाव हार गयी थीं। भारत में उस इतिहास को फिर से दोहराया जा सकता है।
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