किस्मत ने बेड़िया जनजाति की महिलाओं की ज़िंदगी में अपमान और दुश्वारियां ही लिखी थीं, लेकिन अपने जीवट और साहस से अब बेड़नियां अपना भविष्य संवार रही हैं। परम्परा की बेड़ियों को तोड़कर, वर्जनाओं को धता बताकर।
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शिखा (परिवर्तित नाम) की उम्र अभी 18 साल है। वह पढ़ रही हैं और अपने से छोटे बच्चों को पढ़ा भी रही है। स्कूल जाती है। उसका सपना है कि वह आगे चलकर एक टीचर बने, ताकि अपने समुदाय की लड़कियों में शिक्षा की अलख जगा सके और फिर उसके जैसी किसी लड़की को नथ उतरवाई की रस्म से न गुजरना पड़े।
दरअसल, शिखा मध्य प्रदेश में पायी जाने वाली बेड़िया जनजाति से ताल्लुक रखती है। इस जनजाति की महिलाएं वेश्यावृत्ति करती हैं, जिससे उनके घर का खर्च चलता है। यही इस जनजाति का मुख्य धंधा है। जब शिखा की मां का देहांत हो गया, तो उसके मामा—मामी उसे अपने साथ लिवा लाये। लेकिन मामा—मामी उसे भी वेश्यावृत्ति में धकेलना चाहते थे। एक दिन उसके मामा ने उसे एक ग्राहक को बेच दिया। किसी तरह शिखा उसके चंगुल से भाग गयी। उसे एक एनजीओ ने सहारा दिया और अब वह 12वीं की पढ़ाई कर रही है।
मध्य प्रदेश की बेड़िया जनजाति की महिलाओं का मुख्य पेशा रहा है वेश्यावृत्ति। इसी से उनका और उनके घर का खर्च चलता रहा है। लेकिन अब वे इससे दूर होने की गंभीर कोशिशें कर रही हैं।
बेड़िया जाति सबसे पहले बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में पायी गयी। ऐसा माना जाता है कि इस समुदाय के लोग मोहिदपहड़ में रहते थे और बेद्वंशी राजाओं के वंशज थे। ऐसी भी किवदंतियां हैं कि बेड़िया जाति की उत्पत्ति गंधर्वों से हुई है। इनकी उत्पत्ति को लेकर कई कहानियां हैं, लेकिन यथार्थ में ये कहां से आये, इस बारे में सटीक जानकारी किसी को भी नहीं है।
‘बेड़िया’ शब्द हिन्दी भाषा के ‘बाहाडा’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है जंगल में रहने वाले लोग। बेड़िया जाति को 2011 की जनगणना में अनुसूचित जनजाति में नामित किया। यह जनजाति देश—विदेश में अपने राई नृत्य के लिए प्रसिद्ध है। बुंदेली लोकनृत्यों में शामिल राई नृत्य इनकी समृद्ध परम्परा है। प्राचीन समय में राजा—रजवाड़ों के यहां कोई भी कार्यक्रम बिना राई नृत्य करवाये संपूर्ण नहीं माना जाता था। इस नृत्य को मशाल की रोशनी में घेरा बनाकर किया जाता है और मशाल बुझ न पाये, इसके लिए उसमें राई डाली जाती है। इसलिए इसे राई नृत्य कहा जाता है। इनकी यह समृद्ध परम्परा एक पहलू है, जबकि हक़ीकत में इनकी स्थिति दयनीय है और आज भी इस समुदाय की महिलाएं वेश्यावृत्ति करने को मजबूर हैं। यह वेश्यावृत्ति उनसे उनके परिवार को लोग ही कराते हैं।
परम्परा के नाम पर शोषण
दरअसल, इस जनजाति में एक प्रथा प्रचलित है। इस प्रथा को नथ उतरवाई की रस्म कहा जाता है। इस रस्म का सीधा-सा अर्थ है लड़की को वेश्यावृत्ति के धंधे में धकेलना। इस प्रथा के तहत जब बेड़िया जाति की लड़की को पहली बार माहवारी आती है, तो यह रस्म की जाती है। इस रस्म के दौरान उस लड़की की बोली लगायी जाती है और जो सबसे ज्Þयादा बोली लगाता है, लड़की को उसे सौंप दिया जाता है। वह पुरुष अपनी यौन इच्छा की पूर्ति उस लड़की से करता है और कुछ दिन बाद लड़की को छोड़ देता है। इस तरह एक लड़की को वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है। इस रस्म के बाद उसे रोज़ 10 से 15 पुरुषों के साथ संबंध बनाने पड़ते हैं। फिर चाहे वह इसे अपने मन से स्वीकार करे या न करे।
इस जनजाति की खौफनाक हक़ीकत यह है कि यहां पर पिता, पति, बेटा और भाई ही अपनी मां, बेटी, बहन, पत्नी का सौदा करते हैं। यही कारण है कि जहां आज देश में भ्रूण हत्याएं हो रही हैं, वहीं इस जनजाति में लड़की के जन्म को एक उत्सव के तौर पर मनाते हैं। मध्य प्रदेश में इस जनजाति की जनसंख्या करीब 2 लाख है और यह रायसेन, छिंदवाड़ा, जबलपुर, विदिशा, विजावर, सागर, शाजापुर, ग्वालियर, मुरैना के इलाकों में ज्Þयादा पायी जाती है।
शिक्षा का है अभाव
वेश्यावृत्ति के पीछे इस जनजाति में शिक्षा का काफी अभाव हैं। यहां के पुरुष, महिलाएं शिक्षित नहीं हैं। इसी वजह से इस जनजाति की महिलाओं को पैसा कमाने के लिए अपना जिस्म बेचना पड़ता है। सविता जिस्मफरोशी कर अपने परिवार का खर्च चलाती है। जब उससे एक एनजीओ ने वेश्यावृत्ति को छोड़ने की बात कही, तो उसने कहा कि उसे केवल यही काम आता है। वह पढ़ी—लिखी नहीं है, तो उसे कहीं काम भी नहीं मिल सकता। अब अपने परिवार को भूखा छोड़कर दूसरों के घर में झाड़ू—पोछा करने कैसे जाए। उसका कहना है कि इस काम में पैसे ज्Þयादा मिलते हैं, जिससे उसका घर चलता है। इसलिए वह इसे नहीं छोड़ सकती।

एनजीओ के अधिकारियों का कहना है कि अगर इन बेड़नियों में शिक्षा की लहर जगाई जाए, तो वह इस धंधे को छोड़कर मुख्यधारा में जुड़ सकती हैं।
हो रहा है बदलाव
अब इस बेड़िया जाति में भी बदलाव की बयार चल रही है और बेड़नियां अब नथ उतरवाई जैसी रस्मों को न कह रही हैं। इस समुदाय की कई महिलाए हैं, जिन्होंने वेश्यावृत्ति के धंधे को छोड़ दिया है और अब वह दूसरे कामों को कर रही हैं। कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं, जो खुद तो वेश्यावृत्ति कर रही हैं, लेकिन अपनी बेटियों को इस काम से उन्होंने दूर रखा है और वे बेटियों को शिक्षा दे रही हैं, ताकि आगे चलकर उनकी बेटियां समाज में सिर उठाकर जी सकें।
माधुरी (परिवर्तित नाम) की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। 14 साल की उम्र में उसकी नथ उतरवाई हुई। एक 60 साल के पुरुष ने उसे खरीदा। उस पुरुष के साथ संबंध बनाने के एवज में उसके परिवार को 5000 रुपये मिले। शुरू में तो परिवार के दबाव में वह धंधा करती रही, लेकिन जब उसकी बेटी हुई, तो उसे लगा कि उसके घरवाले बेटी की भी नथ उतरवाई कर देंगे। इसलिए वह वहां से भाग आयी। उसे महिलाओं के एक एनजीओ ने सहारा दिया और अब वह दूसरों के घरों में खाना बनाकर अपना और अपनी बच्ची का पेट पालती है। वह नहीं चाहती कि उसकी बेटी की नथ उतरवाई हो।
बेड़नियों को ज़िल्लत की ज़िंदगी से बाहर निकालने में उनकी मदद कर रहा है मुरैना स्थित अभ्युदय आश्रम। पिछले 25 सालों में इस आश्रम ने कई बेड़नियों को सहारा दिया, उन्हें नयी ज़िंदगी की ओर मुखातिब किया। इसका परिणाम है कि अब इस समुदाय की बेटियां डॉक्टर, इंजीनियर और सरकारी अधिकारी बन गयी हैं।
अभ्युदय आश्रम बना मिसाल
बेड़नियों को यहां से निकालने का काम मध्य प्रदेश के मुरैना में स्थित अभ्युदय आश्रम कर रहा है। पिछले 25 सालों से यह आश्रम बेड़नियों को सहारा दे रहा है और अब इस समुदाय की बेटियां डॉक्टर, इंजीनियर और सरकारी अधिकारी बन गयी हैं। अभ्युदय आश्रम को बेड़िया समुदाय के ही रामसनेही ने शुरू किया था और अब इसे इसी समुदाय की अरुणा छारी चला रही हैं। पिछले 25 सालों में आश्रम ने करीब 7000 बेड़नियों को वेश्यावृत्ति के चंगुल से निकालकर मुख्य धारा में शामिल किया है। इस आश्रम की अध्यक्ष अरुणा छारी कहती हैं कि अभी तो बहुत रास्ता बाकी है। बेड़नियों को मुख्यधारा में लाना इतना आसान नहीं है। वे कहती हैं कि बुंदेलखण्ड जैसे इलाके में, जहां पर लोगों के सामने दो वक्त की रोटी कमाने की दिक्कत होती है, वहां इस जनजाति की महिलाओं को परिवार का भरण—पोषण छोड़ मुख्यधारा में लाना काफी कठिन होता है।

‘पहले के मुकाबले बेड़िया जाति की महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी हालत काफी दयनीय है। इसका मुख्य कारण ग़रीबी और अशिक्षा है। अगर सरकार इनके परिवार वालों को रोज़गार मुहैया कराये और इन्हें शिक्षित करे, तो इस जनजाति की महिलाओं की स्थिति सुधर सकती है। हालांकि अब महिलाएं खुद ही बेड़ियों को तोड़कर आगे आ रही हैं। यह सुखद है। हम इसके लिए निरंतर प्रयासरत हैं और उम्मीद है कि बेड़नियों की ज़िंदगी की काली रात की भी आज नहीं तो कल एक खूबसूरत सुबह होगी।‘
– अरुणा छारी, अध्यक्ष, अभ्युदय आश्रम, मुरैना
समाज में स्वीकृति की कमी
इतना ही नहीं इन बेड़नियों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि अगर वह वेश्यावृत्ति छोड़ कुछ दूसरा काम करने भी लगें, तो क्या समाज उन्हें उनके दूसरे स्वरूप में स्वीकार करेगा? बेड़िया जाति की एक महिला ने बताया कि उसने अपनी बेटी को स्कूल में पढ़ने भेजा। बच्ची पढ़ रही थी, लेकिन जब उस स्कूल के शिक्षकों को पता चला कि वह बेड़िया जाति से है, तो उन्होंने ही उसका बलात्कार किया और कहा कि यही तुम्हारा काम है, इसे ही करो। इस महिला का कहना है कि वह मुख्यधारा में आना चाहती है, लेकिन समाज उसे स्वीकार नहीं करता। इस बारे में अरुणा ने कहा कि समाज आज भी हमें हेय दृष्टि से देखता है। उन्होंने बताया कि जहां पर आश्रम है, वहां के लोग भी उन्हें स्वीकार नहीं करते और कई बार उनकी राह में रोड़े अटकाने की कोशिश करते हैं।


