आने वाले समय में पानी का संकट और बड़ा होगा क्योंकि 2032 तक धरती की आधी से ज्यादा आबादी पीने के पानी से वंचित हो सकती है।
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_ID is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 378
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_count is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 379
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_description is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 380
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_name is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 381
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_nicename is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 382
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_parent is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 383
मौजूदा हालातों में देश के लगभग 60 करोड़ लोगों को पीने के साफ पानी के लिए जूझना पड़ रहा है। ये त्रासदी अगले दो सालों में और भयावह होने वाली है। देश-विदेश की विभिन्न संस्थाओं का मानना है कि अगले दो साल में देश की राजधानी दिल्ली, बेंगलुरु और हैदराबाद समेत 21 शहरों में भूजल भंडार सूख जाएंगे। इसी के दृष्टिगत नीति आयोग ने ये भयावह आंकड़े अपनी रिपोर्ट में जारी किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इस जल संकट से लगभग 10 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित होंगे।
नीति आयोग की ‘कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स’ नामक रिपोर्ट को जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में जारी किया है। इस रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि 2030 तक देश में पानी की मांग मौजूदा सप्लाई से लगभग दो गुनी हो जाएगी। इससे करोड़ों लोगों के सामने प्यास से जूझने की नौबत आ जाएगी।
इसका असर देश के विकास पर भी पड़ेगा और जीडीपी में भी भारी कमी आएगी यानी जल संकट का प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिलेगा, जो बेहद चिंता का विषय है।
गौरतलब है इस रिपोर्ट को डेलबर्ग एनालिसिस, फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन (एफएओ) और यूनिसेफ जैसी स्वतंत्र एजेंसियों से मिले आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है। नीति आयोग ने समग्र जल प्रबंधन के आधार पर सभी राज्यों की एक सूची भी बनाई है। इसमें 9 व्यापक क्षेत्र और 28 अलग-अलग सूचक हैं, उदाहरण के लिए, भूजल, जलाशयों की मरम्मत, सिंचाई, खेती के तरीके, पीने का पानी, जल नीति और प्रशासन शामिल हैं। इस सूची में गुजरात सबसे ऊपर है, जबकि झारखंड सबसे निचले पायदान पर है।
इसी तरह कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र ने पानी संकट पर चिंता जाहिर करते हुए एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसके मुताबिक आने वाले समय में पानी का संकट और बड़ा होगा क्योंकि 2032 तक धरती की आधी से ज्यादा आबादी पीने के पानी से वंचित हो सकती है। वहीँ भारत के संदर्भ में यूनीसेफ ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि साल 2050 तक भारत में वर्तमान में मौजूद पानी का 40 फीसदी खत्म हो चुका होगा।
ये सभी रिपोर्टें मात्र शंका जाहिर नहीं कर रही बल्कि हमें चेतावनी भी दे रही हैं कि संभल जाओ वर्ना बिन पानी जिन्दा नहीं रह पाओगे। वैसे भी देशभर से खबरें आ रही हैं – पानी का संकट है, हर तरफ सूखा जैसे हालत बनते जा रहे हैं। तमाम शोधपत्र बता रहे हैं कि साल 2020 में सौ मिलियन यानी दस करोड़ लोगों को पानी की कमी से जूझना पड़ेगा। शासन और लोग दोनों ही कुछ नहीं कर रहे हैं। बादल हर साल उमड़-घुमड़कर आते हैं और पानी लाते हैं, मगर उन्हें अपने पानी को इस धरती पर समाने की कोई जगह ही नहीं मिलती और वो मिट्टी के साथ बह जाते हैं।
वहीं एक अन्य अध्ययन के वर्तमान में करीब 262 जिले पानी के भीषण संकट के दौर से गुजर रहे हैं। गुजरात के मेहसाणा और तमिलनाडु के कोयम्बटूर जिलों में तो भूजल एकदम खत्म ही हो गया है। इतना हो जाने के बाद भी सरकारें अब तक सुस्त रहीं हैं और अपने नकारेपन को छिपाने के लिए राजनीति के साथ-साथ तमाम तरह का ढोंग करती रहीं हैं जिसमें हम सब देशवासी भी शामिल हैं। हमारे देश में हमने इस जल संकट के कई बड़े कारण गिना डाले हैं और उन पर बड़े-बड़े सेमीनार भी आयोजित करते रहे हैं लेकिन नतीजा सिफ़र रहा। चांदी हुई तो बस सेमीनार के आयोजकों की।
हालांकि यूनेस्को का अपने एक रिपोर्ट में स्पष्ट कहना है कि पानी की आपूर्ति राज्य की जिम्मेदारी है, लेकिन केंद्र और राज्य के स्तर पर कई मंत्री इस जिम्मेदारी को शेयर करते हैं। स्थानीय सरकारें अब पानी की आपूर्ति की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को दे रही हैं। इस प्रकार देखा जाए तो यह रिपोर्ट विश्व बैंक के दस्तावेज का इस्तेमाल कर पानी के निजीकरण की बात को स्थापित करने की कोशिश कर रही है। इस रिपोर्ट में निजी पानी कंपनियों की असफलता को नहीं दर्शाया गया है, जो विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल कर पानी को बाजार में बेच रही हैं। इनकी जिम्मेदारे कौन तय करेगा।
अभी नहीं चेते तो फिर कब चेतेंगे। साल 2020 तक भारत के भी कई शहरों के सूखने की संभावना है। क्योंकि अंडरग्राउंड पानी तेजी से घट रहा है, जलाशय सूख रहे हैं और नदियों में पानी का प्रवाह भी प्रभावित हुआ है।
एक अनुमान के मुताबिक, पिछले 20 से 30 सालों में हमने पानी की एक लेयर लगभग खत्म या प्रदूषित कर दी है। संयुक्त राष्ट्र ने तो अपनी रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन और पानी की किल्लत को इस सदी का सबसे बड़ा संकट माना है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2050 तक 80 प्रतिशत डिमांड और भी बढ़ जाएगी और 36 प्रतिशत शहरों में पीने का पानी खत्म हो चुका होगा। जिससे लाखों लोग बिन पानी अपनी जान गंवाने को मजबूर हो जाएंगे।
अगर सरकारें अपने नागरिकों को पीने का पानी भी मुहैया नहीं कर पाती हैं, तो ऐसी सरकार को शासन चलाने का नैतिक आधार कौन प्रदान कर रहा है? इस सवाल को पूछा जाना चाहिए या पानी को ही दोषी ठहराया जाना चाहिए?


