प्राप्त खबरों के अनुसार महाराष्ट्र की 289 सदस्यीय विधान सभा में कांग्रेस और शरद पवार की राकांपा 123 और 125 सीटों पर चुनाव लडेंगे और शीर्ष सीटें अपने सहयोगी दलों के लिए छोडेंगे। पिछले चुनावों में दोनों ने अलग-अलग चुनाव लडे थे और कांग्रेस केवल विपक्षी दल बनने लायक 42 सीटें जीत पायी थी।
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लगता है कांग्रेस के सितारे गर्दिश में है। इस वर्ष आम चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी लगातार सुर्खियों में है किंतु इसका कोई अच्छा कारण नहीं है। विभिन्न राज्यों में पार्टी के बडे नेता पार्टी छोड रहे हैं और महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में विधान सभा चुनावों से पूर्व ऐसा हो रहा है। हाल ही में भाजपा अध्यक्ष और गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि महाराष्ट्र में कांग्रेस के नेता भाजपा में शामिल होने के लिए कतारों में खडे हैं और यदि पार्टी नताओं के लिए अपने द्वार खोल दे तो फिर कांग्रेस में केवल पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ही बचेंगे।
वर्तमान में महाराष्ट्र में कांग्रेस छोड रहे नेताओं की संख्या को देखते हुए लगता है कि शाह की बात सही साबित हो रही है। हाल ही में मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष कृपा शंकर सिंह और पूर्व कैबिनेट मंत्र हर्षवर्धन पाटिल पार्टी छोडकर भाजपा में शामिल हो गए हैं। पूर्व बाॅलीवुड अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर ने भी कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया है जिन्होंने लोक सभा चुनावों से पूर्व राहुल गांधी की उपस्थिति में पार्टी की सदस्यता ली थी और मुंबई उत्तर सीट से लोक सभा चुनाव लडा था। हालांकि उर्मिला ने अभी अपने अगले राजनीतिक कदम का संकेत नहीं दिया है। किंतु उन्होंने कांग्रेस छोडने का कारण पार्टी में आंतरिक राजनीति को बताया।

उर्मिला पार्टी में नई नेता थी और उन्हें राजनीतिक समझ नहंी थी और उनको टिकट मिलने के कारण कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी नाराज हो गयी थी इसलिए उन्होंने पार्टी छोड दी थी और शिव सेना मे शामिल हो गयी थी। इसलिए उर्मिला के त्यागपत्र से राजनीतिक प्रभाव नहीं पडेगा किंतु वे पार्टी को सुर्खियों में रखती थी और यह बताता है कि कांग्रेस महाराष्ट्र में अपने संगठन को ठीक से नहीं चला पा रही है। राज्य में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं और ऐसे त्यागपत्रों से मतदाताओं में यह भावना पैदा होती है कि कांग्रेस राज्य में सबसे बडा विपक्षी दल भी नहीं बन पाएगा। भाजपा गठबंधन को हरान तो बहुत दूर की बात है।
प्राप्त खबरों के अनुसार महाराष्ट्र की 289 सदस्यीय विधान सभा में कांग्रेस और शरद पवार की राकांपा 123 और 125 सीटों पर चुनाव लडेंगे और शीर्ष सीटें अपने सहयोगी दलों के लिए छोडेंगे। पिछले चुनावों में दोनों ने अलग-अलग चुनाव लडे थे और कांग्रेस केवल विपक्षी दल बनने लायक 42 सीटें जीत पायी थी। जबकि राकांपा को 41 सीटें मिली थी। कांग्रेस को 18 प्रतिशत और राकांपा को 17.2 प्रतिशत वोट मिले थे। आम चुनावों में कांग्रेस केवल एक सीट जीत पायी। जबकि राकांपा ने चार सीटों पर जीत दर्ज की। राज्य में कई वर्षों बाद कांग्रेस को इतना बडा झटका लगा है। एक जमाने में महाराष्ट्र कांग्रेस का गढ था और 1960 से 191 तक अधिकतर समय राज्य में कांग्रेस का ही शासन रहा है।
वर्तमान संकट और खराब प्रदर्शन तथा नए पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में अनिश्चितता के कारण पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य नहीं दिखायी दे रहा है और इसलिए उसके नेता पार्टी छोड रहे हैं। वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व में पथ्वीराज चव्हाण और अशोक चव्हाण को ऐसे शक्तिशाली नेताओं के रूप में नहीं देखा जाता जो मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस के नेतृत्व में भाजपा-शिव सेना गठबंधन से सत्ता छीन ले। भाजपा आम चुनावों में अपने प्रदर्शन से खुश है और महाराष्ट्र में भी वह इस जनादेश पर निर्भर है। इससे पार्टी को राज्य सभा में अधिक सीटें प्राप्त करने में भी मदद मिलेगी। दूसरी ओर कांग्रेस को दोहरा जोखिम है। अगर वह इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं करती है तो वह राज्य में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा खो देगी और साथ ही राज्य सभा में अपने सदस्य भी नहीं भेज पाएगी। जिससे राष्ट्रीय राजनीति में उसका प्रभाव और कम हो जाएगा और इसी भय के चलते उसने राकांपा के साथ गठबंधन किया।

किंतु राकांपा की स्थिति भी अच्छी नहीं है। उसके नेता भी पार्टी छोड रहे हैं। राकांपा विधायक संदीप नाइक, शिवेन्द्रसिंह खोसले, वैभव पिछाड और राज्य महिला विंग की अध्यक्ष चित्रा वाघ भाजपा में शामिल हो गए हैं। पिछले माह राकांपा की मुंबई इकाई के अध्यक्ष सचिन अहीर और शाहपुर के विधायक पांडुरंग बरोरा शिव सेना में शामिल हो गए। इसके अलावा प्रकाश अंबेडकर के वंचित बहुजन अगाडी ने विपक्षी गठबंधन में शमिल होने से इंकार कर दिया है जिससे राजग गठबंधन को मदद मिलेगी।
वर्तमान में देश में कांग्रेस की स्थिति को देखते हुए महाराष्ट्र चुनाव उसके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है विशेषकर इसलिए कि अब पार्टी उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी दल तक नहीं रह गयी है और निकट भविष्य में भी इसकी आशा नहीं है। यही नहीं ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी पार्टी ने मुख्य विपक्षी दल का दर्जा खो दिया है। इसीलिए अब उसे केवल महाराष्ट्र से उम्मीद है और यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह न केवल राष्ट्रीय राजनीति में अपितु राज्य की राजनीति में भी कांग्रेस के ताबूत में एक और कील का काम करेगा।

बिहार में राजद, पश्चिम बंगाल में भाजपा, उत्तर प्रदेश में सपा, आंध्र में तेदेपा और तेलंगाना में एआईएमआईएम मुख्य विपक्षी दल हैं और उन्होंने यह दर्जा कांग्रेस से छीना है। आंकडे बतते हैं कि तीसरे और चैथे स्थान पर पहुंचने के बाद कांग्रेस की वापसी के आसार कम हैं और इसलिए अब वह भाजपा-शिव सेना की चुनौती का मुकाबला करने के बजाय पर्दे के पीछे अपनी सहयोगी राकांपा के साथ संघर्ष करेगी। सबकी निगाहें अब महाराष्ट्र पर लगी हुई है कि वहां से कांग्रेस के लिए क्या नतीजे आते हैं।


