ज्ञान मात्र एक शब्द नहीं मगर इस शब्द के लगभग गायब हो जाने के बाद हमारी शिक्षा व्यवस्था की पूरी चर्चा में अगर कोई शब्द सबसे अधिक लोकप्रिय हो चला है तो वह है हुनर या स्किल। इसकी वजह भी है कि रोजगार की मृगतृष्णा हर साल शिक्षा के औचित्य को चौराहे पर खड़ा करती है, लेकिन हमारी मेधा के दरवाजे औपचारिक पाठ्यक्रम में ही रोशनी खोजने की मशक्कत करते हैं।
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_ID is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 378
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_count is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 379
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_description is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 380
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_name is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 381
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_nicename is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 382
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_parent is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 383
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_ID is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 378
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_count is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 379
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_description is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 380
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_name is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 381
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_nicename is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 382
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_parent is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 383
“कैसा हुनर कितनी कदर” यह सवाल आज के युवा भारत में बहुत मायने रखता है क्योंकि मोदी सरकार साल 2014 के बाद अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट स्किल इंडिया के जरिए हिंदुस्तान को हुनरमंद बनाने की हिमायती रही है। उनका सारा फोकस हुनर की कदर पर रहा लेकिन हुनर की ट्रेनिंग से पहले ये समझ लेना जरूरी है कि नए इंडिया को आखिर कैसे हुनर की जरूरत है, तभी तो हो पाएगी हुनर की असली कदर।

सवाल यह है कि हुनर क्यों जरूरी है? क्योंकि यही वो रास्ता है जिस पर चलकर भारत अपनी नौजवान आबादी का पूरा फायदा उठा सकता है। सफलता के पायदान पर ऊपर खड़े देशों में जहां स्किल्ड वर्कफोर्स 60-90 फीसदी तक पहुंच गया है, वहीं भारत में ऐसे लोगों की गिनती 5 फीसद से भी कम है, जो किसी एक हुनर पर भी अच्छी पकड़ रखते हों।
यहां समस्या की जड़ को जानना जरूरी है। हमारे यहां देश की जरूरत को समझे बिना कानून बना दिए जाते हैं। एक छोटी-सी बानगी देखिए। पूरे देश में ही हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी है कि किंडरगार्डन में प्रवेश लेने के बाद जब बच्चा नवीं कक्षा में पहुंचता है, वह 14 से 15 साल का हो चुका होता है।
दरअसल, शिक्षक उत्तर पढ़ रहे हैं और छात्र दनादन प्रश्नों के उत्तर लिख रहे हैं और परीक्षाएं पास कर रहे हैं। ऐसी शिक्षा प्रणाली में 35 से 40 नंबर लाना कोई बड़ी बात भी नहीं होती।
आप देखेंगे कि ऐसे बच्चों में से करीब 60 प्रतिशत बच्चों में इतनी क्षमता भी नहीं होती कि वे अंग्रेजी में ठीक-ठाक ढंग से लिख सकें। पांच और चार का जोड़ उनसे पूछिए, वे नहीं बता पाएंगे। हां, इतना जरूर है कि वे अपने पिता से अलग, पतलून-कमीज़ वगैरह पहनना सीख लेते हैं। न वे कभी खेत गए, न उन्होंने कभी बढ़ई का, लोहार का या जो भी उनके पिता का काम है, उसे कभी सीखा। अब 14 साल की उम्र में न तो उनके पास कोई ढंग की शिक्षा है और न ही उनका शरीर इस काबिल है कि वे वापस खेतों में जाकर काम कर सकें, लेकिन हां उनके भीतर शिक्षितों के जैसा रवैया जरूर आ जाता है!

दरअसल हमारी शिक्षा प्रणाली और स्कूल व कॉलेजों की सबसे बड़ी खराबी यही बताई जाती रही है कि यहां पढ़ना लिखना तो सिखा दिया जाता है, मगर उससे आगे कुछ भी व्यवहारिक ज्ञान नहीं दिया जाता। लेकिन जरूरत इस बात की है कि लोग पढ़ने-लिखने के अलावा कुछ ऐसा भी सीखें जो उन्हें किसी नौकरी या खुद के ही किसी काम के लिए एकदम तैयार कर दे, लेकिन तस्वीर दूसरी ही नज़र आती है।
देश में इस तरह के लाखों युवा तैयार किये जा रहे हैं, जिनके पास कोई हुनर नहीं है, लेकिन उनके पास पढ़े-लिखे लोगों जैसा रवैया है। ये लोग सरकारी नौकरियां चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि यह सब करें कैसे! इनमें से कइयों ने तो स्नातक तक की पढ़ाई कर ली। लेकिन इन लोगों को रोजगार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि शिक्षा का बुनियादी ढांचा ही अपर्याप्त है।
हम ये क्यों नहीं देखते कि जब कोई पांच साल का बच्चा अपने पिता के साथ खेत पर जाता था, तो वह सिर्फ बाल श्रम नहीं था, शिक्षा भी थी। ऐसे बहुत सारे तरीके थे जिनसे हुनर एक से दूसरे तक पहुंचता था। बच्चा अपने पिता की दुकान पर बस यूं ही जाता था और बातों-बातों में बढ़ई का काम सीख जाता था। जब तक उसकी उम्र 14-15 साल की होती थी, उसके पास एक हुनर होता था। सिर्फ पुराने हुनर को परंपरागत तरीके से आगे बढ़ाते रहने से कुछ नहीं होगा।

कुछ समय पहले नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने स्किल की कमी और जरूरत पर एक रिपोर्ट तैयार की थी जिसके अनुसार साल 2022 तक देश के चौबीस अहम सेक्टरों में करीब बारह करोड़ नए हुनरमंद लोगों की जरूरत होगी। भारत सरकार के ही आंकड़ों के मुताबिक देश में आज सालाना सिर्फ 35 लाख लोगों के लिए स्किल ट्रेनिंग का इंतजाम है, जबकि चीन में हर साल नौ करोड़ लोग हुनरमंद बनने की ट्रेनिंग ले रहे हैं।
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, मुख्यमंत्री स्किल डेवलेपमेंट योजना, राष्ट्रीय कौशल विकास योजना….ऐसी न जाने कितनी ही योजनाएं युवाओं को ध्यान में रखकर चलाई जा रही हैं। सरकार शिक्षा के साथ हुनर को मिलाकर युवाओं को रोजगारन्मुखी बनाने का दावा भी कर रही है। लेकिन ज़मीनी हकीक़त क्या है?
कुछ ऐसा ही हाल विभिन्न राज्यों की लोक कलाओं से जुड़े हुनर आधारित रोजगार का है। मधुबनी कला इसमें अपवाद स्वरुप है जिसे अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली हुई है। बाकी हुनर आधारित कला और शिक्षा का हाल उत्साहवर्धक नहीं कहा जा सकता। टिकुली आर्ट, मंजूषा कला, पीतल बर्तन निर्माण और ऐसे न जाने कितने हुनर उदासीनता के कारण दम तोड़ रहे हैं।
लेकिन बिहार स्किल डेवलेपमेंट मिशन के सीईओ एवं श्रम संसाधन विभाग के प्रधान सचिव दीपक कुमार सिंह का दावा है कि आने वाले पांच सालों में स्किल डेवलेपमेंट एजुकेशन और ट्रेनिंग कार्यक्रमों से बिहार राज्य के युवाओं को प्लेसमेंट से लेकर स्वरोजगार में भी बहुत मदद मिलेगी।
शिक्षा के स्तर, हुनर के स्तर, उसकी जटिलताएं और ऐसी ही बाकी तमाम चीजों में आप रातोंरात बदलाव नहीं ला सकते। तमाम कानूनों को पश्चिम के मूल्यों के अनुसार पास करने के बजाय हमें धीरज रखना होगा। यह समझें कि जब कोई पिता अपने बेटे को खेत पर ले जाता था, तो वह बाल श्रम नहीं था और ना ही वह उसे श्रमिक की तरह देखता था। वह चाहता था कि बच्चा सब कुछ सीख ले। उसकी कोशिश होती थी कि जो काम मैं कर रहा हूं, मेरा बेटा उसमें महारत हासिल करे ताकि वह मुझसे ज्यादा अच्छी तरह से काम कर सके। यह एक तरह की शिक्षा थी। शिक्षा की इस प्रक्रिया में आपने काम भी किया और यह कोई गलत बात नहीं है।
मेहनत के कामों में अपनी ताकत लगाने से शरीर स्वस्थ रहता है, फिर चाहे वह हथौड़ा मारने का काम हो या घास काटने का। लेकिन इनसे चुस्त-दुरुस्त रहने के अलावा और भी कई फायदे मिलते हैं। क्या आप जानते हैं, टायर पंक्चर हो जाए तो दूसरा टायर कैसे लगाया जाता है या गाड़ी में तेल कैसे बदला जाता है? क्या आप टूटी हुई खिड़की या जाम हुई मोरी को ठीक कर सकते हैं? क्या आप खाना पकाना जानते हैं? क्या आप गुसलखाना अच्छी तरह साफ करके चमका सकते हैं? हर लड़के-लड़की को ऐसे हुनर आने चाहिए क्योंकि एक-न-एक-दिन जब उन्हें अपने बलबूते जीना पड़ेगा तब यही हुनर उनके बहुत काम आएंगे।

युवा चाहे कारोबार के इरादे से या घर के छोटे-मोटे काम निपटाने की गरज़ से मेहनत का कोई काम सीखें, पर इससे देश को फायदा ज़रूर होगा। शायद आपके स्कूल में ऐसा कोई पेशा सिखाया जाता हो। या हो सकता है, आपको अपने ही घर में कुछ ट्रेनिंग मिल जाए। कैसे? घर के काम-काज सीखने के ज़रिए। डॉ. प्रोवेंज़ानो लिखते हैं, “घर के काम-काज खासकर किशोरों के लिए बहुत ज़रूरी होते हैं क्योंकि ये बुनियादी काम-काज उन्हें ‘ज़िंदा रहने के ऐसे हुनर’ सिखाते हैं, जो उनके तब काम आएंगे जब वे अपने मां-बाप से अलग रहना शुरू करेंगे।
सरकारें सोचती हैं कि आप सभी किसानों को कृषि विश्वविद्यालय में भेज देंगे। ऐसा आप कब तक करने की सोच रहे हैं? इसे करने के लिए आपके पास कितने विश्वविद्यालय हैं? क्या ये संभव है कि खेती छोडक़र तीन साल की डिग्री लेने के बाद वे बड़े जानकार किसान बन कर लौटेंगे। जिस चीज की जरूरत है, उसका हमारे पास कोई व्यावहारिक ज्ञान नहीं है। हमें हुनर की जरूरत है, मात्र डिग्री वाली शिक्षा की नहीं। किसी भी समाज में केवल 15 से 20 फीसदी लोग ही ऐसे होते हैं, जो पठन-पाठन प्रक्रिया के लिए उपयुक्त हैं। बाकी लोगों को हुनर की आवश्यकता होती है, वे अपनी आजीविका कमाना चाहते हैं। देश में आर्थिक खुशहाली तभी आ सकती है, जब यहां के लोग हुनरमंद होंगे।


