दिव्यांग जनों की जिजीविषा को प्रणाम
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भारत के दिव्यांग जनों ने जापान 2021 में पैरा ओलंपिक में जिस तरह खेलों में अपना प्रदर्शन दोहरा कर स्वर्ण, रजत और अन्य पदक प्राप्त किए है, उसे देखकर उनकी क्षमता, ऊर्जा, शक्ति और जिजीविषा को दृष्टिगत रखे तो वे राष्ट्र की सलामी और अभिनंदन के हकदार हैं। पूरे विश्व में संयुक्त राष्ट्र संघ की गणना के अनुसार दिव्यांगजन की जनसंख्या लगभग एक अरब है। भारत में ही 2011 की जनसंख्या के अनुसार 2.68 करोड़ दिव्यांगजन निवास करते हैं।
दिव्यांगजन प्राकृतिक रूप से शारीरिक क्षमता में कमी के कारण आम आम नागरिकों की तरह जीवन यापन करने में कठिनाई महसूस करते हैं। दिव्यांग जनों को कई श्रेणी में माना गया है जिनमें दृष्टि हीनता ,बधिरता,मुकता, चलने में असमर्थ, मानसिक कमजोरी , मानसिक रुग्णता, बहु दिव्यांगता आदि होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है की सभी देशों में विकलांगों की समस्याएं अलग-अलग होने के बावजूद उनकी मूल समस्या एक जैसी है, जिसमें आमूलचूल बदलाव लाकर ऐसे व्यक्तियों को सशक्त किया जा सकता है।

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शरीर के किसी अंग अथवा मस्तिष्क के बाधित अथवा अपूर्ण विकास को दिव्यांगता के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो मानव समाज की एक संवेदनशील समस्या है। जिसका सामना विश्व के सभी देशों के दिव्यांग जनों को करना पड़ता है। दिव्यांग जनों को मूलतः शिक्षा,रोजगार, स्वास्थ्य, यातायात आदि तक पहुंच बनाने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जिससे वे सामाजिक आर्थिक व शैक्षिक क्षेत्र में पिछड़ जाते हैं।
इस संदर्भ में दृष्टि हिनता तथा बधिरता से ग्रस्त हेलेन केलर ने कहा कि “दृष्टि हिनों की प्रगति मुख्य बाधा दृष्टि हीनता नहीं, बल्कि दृष्टिहीन लोगों के प्रति समाज की नकारात्मक सोच भी है” भारत सरकार ने इस संदर्भ में काफी विचार-विमर्श कर 1995 में विकलांगों के प्रति समाज के दायित्वों के निर्वहन हेतु विकलांग व्यक्ति अधिनियम पारित किया था, जिसे 1996 में लागू किया गया।
अधिनियम के अंतर्गत दिव्यांगों के लिए शिक्षा रोजगार सामाजिक सुरक्षा के प्रावधान शामिल किए गए हैं। इसके साथ ही शासकीय नौकरी में विकलांगों का पद आरक्षित भी किया गया। इतना ही नहीं 1999 में एक अलग विकलांग राष्ट्रीय कल्याण तथा राष्ट्रीय न्यास का गठन किया गया, जिससे इनकी समस्याओं को समाधान हेतु सुना जा सके। इसके अतिरिक्त दिव्यांग जनों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने वर्ष 2012 में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग बनाया, जिससे इनके लिए अलग से कुछ पैमाने को निर्धारित कर विकास में सहभागी बनाया जा सके ऐसे प्रावधान रखे गए है।

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इसके अतिरिक्त 2015 में दिव्यांगों की शिक्षा नीति बनाई गई जिसमें दिव्यांग व्यक्तियों के लिए शिक्षा के सुरक्षित तथा सम्मानजनक समान अवसर उपलब्ध कराने का प्रावधान रखा गया। इनको शिक्षा से जोड़ने हेतु सुगम में पुस्तकालय नामक ऑनलाइन कोर्स प्रारंभ किया गया ताकि वह बटन क्लिक करने के माध्यम से पुस्तकों को पढ़ सकें, जिसके बाद इनकी नौकरियां व स्वरोजगार क्षेत्र में भागीदारी बढ़ाने हेतु 2016 में विकलांग अधिकारिता विभाग के परामर्श से एक जॉब पोर्टल की भी शुरुआत की गई। जॉब पोर्टल एकल मंच पर निशुल्क नौकरी के अवसर स्वरोजगार ऋण, शिक्षा ऋण व कौशल प्रशिक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।
2017 में दिव्यांग जनों की मदद के लिए सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने दिव्यांग साथी मोबाइल ऐप की शुरुआत की जिसका मुख्य उद्देश्य दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग से संबंधित विभिन्न उपयोगी जानकारी जैसे विभिन्न नियमों दिशानिर्देशों योजनाओं छात्र वित्तीय एवं रोजगार संबंधी अवसरों के बारे में दिव्यांग जनों को सरल प्रारूप में जानकारियां उपलब्ध कराना इसका उद्देश्य है। इससे दिव्यांगजन सशक्तिकरण के प्रयासों को वास्तविक रूप से अमलीजामा पहनाया जा सके। केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारें लगातार प्रयास कर रही है कि दिव्यांग जनों को समाज की मुख्यधारा में जोड़कर उन्हें खेलकूद, विज्ञान टेक्नोलॉजी, मेडिकल साइंस,इंजीनियरिंग और प्रशासनिक सेवाओं में पूरा पूरा स्थान प्राप्त हो सके, ऐसे प्रयास निरंतर जारी हो रहे हैं।
और इन्हीं सब का परिणाम है कि आज दिव्यांगों को पहचान कर समाज में उनकी नई पहचान दिलाई जा रही है स्वरोजगार में इनकी संख्या बढ़ रही है शिक्षा के स्तर में वृद्धि हुई है यहां तक कि नौकरियों मेल की भागीदारी काफी बढ़ी है। दिव्यांग व्यक्तियों ने खेल में अपना नाम बहुत ऊंचा किया है 20 18 में भारतीय दिव्यांग क्रिकेटरों ने शानदार खेल का प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तान की टीम को हराकर ब्लाइंड क्रिकेट वर्ल्ड कप अपने नाम किया था और इस तरह देश का नाम ऊंचा किया। माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय विकलांग महिला अरुणिमा सिन्हा का नाम प्रमुख है।
2016 2020-21 पैरा ओलंपिक खेलों में दीपा मलिक ने अनेक पदक जीते उन्हें अर्जुन पुरस्कार भी दिया गया है। इसी प्रकार प्रसिद्ध एथलेटिक खिलाड़ी देवेंद्र झाझरिया का नाम प्रमुख है, जिन्होंने पैरा ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता था। 2020-21 में पैरालंपिक जापान में भारतीय खिलाड़ियों ने जिस कदर ओलंपिक पदकों की भारत के लिए श्रृंखला जीती वह अभूतपूर्व है। इसके अलावा विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले भारतीय क्लासिकल डांसर सुधा चंद्रन,संगीतकार रविंद्र जैन, बैडमिंटन प्लेयर गिरीश शर्मा, ब्लाइंड क्रिकेट में 32 शतक लगाने वाले शेखर नायक, प्रसिद्ध डॉक्टर सत्येंद्र सिंह, कैंसर स्पेशलिस्ट डॉक्टर सुरेश आडवाणी आदि का नाम अत्यंत गौरवशाली सूची में शामिल है ।
जिन्होंने न सिर्फ अपना बल्कि राष्ट्र का गौरव भी बढ़ाया है। यह सब दिव्यांग जनों के लिए अपनी पहचान बनाने के अलावा प्रेरणा स्रोत के रूप में भी तेजी से उभरे हैं। इनकी उपलब्धि से यह स्पष्ट होता है कि दिव्यांगों में अपार क्षमताएं होती हैं तथा वे प्रेरणा दाई भी होते हैं। यदि इनके लिए अवसर और सशक्तिकरण के सफल प्रयास किए जाएं ,आधुनिक तकनीकी से इनकी क्षमताओं में वृद्धि की जाए तो इनमें क्षमताओं की वृद्धि की अपार संभावनाएं निहित हैं। भारत देश में जितने दिव्यांग निवास कर रहे हैं, अभी भी बेहतर परिणाम आना शेष है इसीलिए देश के विकास एवं प्रगति में दिव्यांगों की भूमिका तथा उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए पूरे समाज तथा शासन प्रशासन को आगे आकर इनकी हौसला अफजाई कर सामान्य जीवन की सुविधाओं में इजाफा किया जाना चाहिए।
इसके लिए स्वास्थ्य पेशेवरों, शिक्षकों, स्थानीय समुदाय, छोटी-छोटी संस्थाओं,स्वयंसेवी संस्थाओं तथा आम नागरिकों को आगे आना होगा तभी दिव्यांग जनों को समावेशी विकास में शामिल किया जा सकेगा। यह शुभ संकेत भी है कि न सिर्फ भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिव्यांगों के प्रति संवेदनशीलता मैं काफी वृद्धि हुई है, और यही कारण है कि विकलांगों को दिव्यांग जैसे सम्मान पूर्वक शब्दों से पुकारा जाता है, यदि समाज की भूमिका मानवीय तथा सामंजस्य पूर्ण होती है, तो दिव्यांग जनों को विकास की ओर अग्रसर होने तथा सामाजिक समरसता की मुख्यधारा में जुड़ने से कोई रोक नहीं सकता है।


