नक्सलवाद मूल रूप से कानूनी समस्या है, या विषमता के आर्तनाद से फूटता हुआ लावा है
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_ID is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 378
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_count is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 379
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_description is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 380
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_name is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 381
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_nicename is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 382
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_parent is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 383
नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन के औपचारिक नाम है,जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के आंदोलन के फल स्वरुप उत्पन्न हुआ था। नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत भारत में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार तथा कानू सान्याल ने सत्ता के खिलाफ एक सशक्त आंदोलन की शुरुआत कर के की थी। नक्सलवाद मूल रूप से कानूनी समस्या है, या विषमता के आर्तनाद से फूटता हुआ लावा है।
विचारको का एक वर्ग जहां इसे यानी नक्सलवाद को आतंकवाद जैसी गतिविधियों से जोड़कर इसे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है,वही दूसरा वामपंथी वर्ग इसे सामाजिक आर्थिक राज नैतिक विषमताओं एवं दमन दोहन और अन्याय की पीड़ा से उपजा एक सादा विद्रोह समझकर इसका पक्ष पुरजोर तरीके से लेता है।
वास्तव में नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलवाड़ी गांव से हुई थी। तत्कालिक रूप से भूमि विवाद को लेकर हिंसक गतिविधि भले ही तनाव की परिणति थी, किंतु विवाद की जडें गहरी समा गई थी। यही कारण है की स्थानीय रूप से पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले से शुरू हुआ आंदोलन धीरे धीरे देश के बड़े आदिवासी क्षेत्रों में फैल गया।
पर तत्कालीन रूप से नक्सल वाडी अवधारणा अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार चाय की खेती ही थी। जमीन को लेकर यहां से विवाद प्रारंभ हुआ क्योंकि बागान के श्रमिक जहां जमीन का स्वामित्व चाह रहे थे। वहीं स्थानीय जमीदार इसका प्रतिरोध कर रहे थे। धीरे-धीरे यह आंदोलन उग्र होता चला गया और उग्रता ने हिंसा का रूप ले लिया। इसी बीच आंदोलनकारियों और पुलिस की झड़प ने कई पुलिसवालों की जान ले ली। पुलिस द्वारा जवाबी हमले में कई आंदोलनकारियों की जान चली गई।
और इस पूरे आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया था। उस समय तत्कालीन किसानों ने हथियार उठाने का निर्णय ले लिया था,और यही हिंसक आंदोलन देश के पूरे बड़े भूभाग में फैल गया और नक्सलवाद से जुड़े कार्यकर्ताओं को नक्सली कहा जाने लगा। वैचारिक स्तर पर देखने से नक्सलवाद का संबंध वामपंथ से है। और इसके समर्थक मुख्यतः चीनी साम्यवादी नेता माओत्से तुंग तथा रूसी क्रांतिकारी नेता लेनिन के विचारों से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। भारत के नक्सलवादी आंदोलन का समर्थन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में भी खुलकर किया था।
गृह मंत्रालय की नक्सलवादी डेस्क के अनुसार नक्सलवाद मुख्यता छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा,बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के वनांचल में फैला हुआ है। इसकी मुख्य बात यह है कि नक्सलवादी आंदोलन के समर्थकों में मुख्य रूप से आदिवासी तथा दलित शामिल होते हैं। अतः स्वाभाविक है कि इससे जुड़ी समस्याएं नक्सलवाद के उद्भव के महत्वपूर्ण कारण बने थे। भारत में दलित और आदिवासी मिलकर देश की एक चौथाई जनसंख्या के प्रतिनिधित्व करते हैं।
साथ में वह अभूतपूर्व रूप से पिछड़े हुए भी रहे हैं, इनकी आजीविका मुक्त प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रही है। किंतु अंग्रेजों के आगमन तथा वन अधिनियम बनने से आदिवासी कर्म से अपने वन्य क्षेत्र से विस्थापित होते चले गए, और यह क्रम निरंतर जारी रहा। नक्सलवादी समर्थक दिल्ली के विचारक यह दलील देते हैं कि विकास के वर्तमान मॉडल में आदिवासियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। आदिवासी अपने क्षेत्र से विस्थापित होकर दूसरे स्थान पर जाने के लिए विवश हो गए हैं।

एक ओर सरकार जहां कानून व्यवस्था बनाने के लिए विकास के कार्यों को नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पहुंचाने का प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी तरफ नक्सली हिंसा को पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों के माध्यम से सामना करने का भी प्रयास कर रही है। सुरक्षा की दृष्टि से 2005 में नक्सलियों के विरुद्ध अंतरराज्य संयुक्त कार्यबल का गठन किया गया था। इसके अतिरिक्त केंद्रीय सशस्त्र बल के साथ कोबरा बटालियन टीम का भी गठन किया गया था।
सरकार द्वारा नक्सली क्षेत्रों में विकास के हर संभव प्रयास को नक्सली गलत बताकर और आदिवासियों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठा कर आदिवासियों की आड़ में ही हिंसात्मक तांडव करने में लगे हुए हैं। केवल छत्तीसगढ़ में ही विगत दो दशकों में हजार से ज्यादा पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों के जवानों की हत्या कर दी गई।
हिंसा सदैव निंदनीय होती है। इसी बीच छत्तीसगढ़बिहार, झारखंड, तथा महाराष्ट्र के नक्सलियों ने पुलिस से से मुठभेड़ कर सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाया एवं सैनिक तथा अर्धसैनिक बलों के जवानों की अनावश्यक हत्या कर हिंसा का तांडव मचाया है।
हिंसा हिंसक आंदोलन कभी भी किसी विचारधारा का अंग नहीं हो सकते है। इस इसके अलावा उत्तर पूर्वी राज्यों में आतंकवादी गतिविधियों को रोकने हेतु राज्य में आत्मसमर्पण सह पुनर्वास योजना 1998 लागू की गई थी जिसके लिए केंद्र सरकार पूरी मदद करती है। आत्मसमर्पण तथा पुनर्वास योजना के चलते हाथ में समर्पित नक्सलियों को धनराशि प्रदान कर स्वरोजगार उपलब्ध कराने के लिए प्रेरित करती है।
सरकार द्वारा समाधान योजना भी लागू की गई है,जिसके अंतर्गत स्मार्ट रणनीति प्रोत्साहन,रोजगार प्रशिक्षण, तथा नक्सलवादियों के वित्तपोषण को रोकने जैसा प्रावधान किया गया। इसके अलावा वर्ष 2019 में छत्तीसगढ़ नक्सलियों की समाप्ति हेतु डेवलपमेंट बेस्ट ऑपरेशन चलाया जा रहा है, साथ ही वर्ष 2022 तक छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है।यह नक्सल उन्मूलन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
नक्सलवादियों को भी हिंसा छोड़कर राज्य सरकार की सलाह पर समझौता वार्ता आयोजित कर एक मध्य मार्ग निकाल कर हिंसा को त्यागना होगा। क्योंकि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता और राज्य सरकारों को भी हिंसा के बदले प्रति हिंसा को त्याग कर उनके प्रति सहानुभूति रखने फिर से नव जीवन जीने का मौका देख कर, उन्हें स्वरोजगार देने की पूरी कोशिश की जानी चाहिए तभी देश के बड़े भू भाग को नक्सल प्रभावित क्षेत्र से निकाला जा सकता है।



