वह आदमी धोती पहनता है। अपने माथे पर लाल तिलक लगता है। सालों से हर दिन वह मुंबई के जुहू सर्कल में रोज़ एक तख्ती पकड़े हुए दिखाई देता है, जो संदेश देता है मानवता का सबसे सुन्दर संदेश – सबको प्रेम करो और अपने धर्म पर चलो।
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हर रोज मुंबई के भीड़भाड़ वाले इलाके जुहू सर्कल के एक कोने में धोती-कुर्ता पहने एक छोटे-से व्यक्ति को हाथ में तख्ती पकड़े देखा जा सकता है। वह न तो कोई भिखारी है, न ही कोई उपदेशक, बल्कि वह है शांति का एक निस्वार्थ संदेश वाहक, जो सभी से आपसी भाईचारे की अपेक्षा करता है।
कुछ लोग यह मानकर चलते हैं कि जीवन में उनका उद्देश्य इस दुनिया में एक बदलाव लाना है। वे अपनी क्षमतानुसार वही कार्य करते हैं जो दूसरों पर उनकी छाप छोड़ सके। ऐसे ही एक व्यक्ति हैं कृष्णदास। निश्चित रूप से उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में थोड़ी बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की है, खासकर मुंबईकरों के बीच।
मुंबई में जुहू सर्कल ट्रैफिक सिग्नल पर वह घंटों धूप में खड़े रहते हैं, आने-जाने वाले लोग उन्हें एक तख्ती के साथ मुस्कराते हुए देखते हैं। वहां के लोग उन्हें समाज के लिए दिए गए सरल और सुंदर संदेश देने वाले के रूप में पहचानते हैं। दैनिक यात्रियों का कहना है कि वे कृष्णदास को ट्रैफिक सिग्नल पर अपने साइन बोर्ड के साथ रोज देखते हैं।
वहीं दैनिक यात्रियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए वह संत अपनी तख्ती के साथ चौराहे की रेडलाइट पर एक पैर पर खड़े रहते हैं। उनका यह प्रेरक कार्य शब्दों से परे है। और केवल यही नहीं, कृष्णदास उस चौराहे पर बच्चों के बीच बिस्कुट भी वितरित करते हैं।
वह ऐसा क्यों करते हैं? और वह भी तब हैवी ट्रैफ़िक में भारी शोर के बीच। एक-दूसरे को पीछे छोड़ आगे निकले की होड़ के बीच उनका ऐसा दीवानापन। वहां से गुजरने पर न चाहकर भी मेरे कदम रुक जाते, दिन-प्रतिदिन मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी, मैंने उनको करीब से जानने का फैसला किया।
वह मुंबई में इस लोकप्रिय चौराहे पर नियमित रूप से आते हैं। बिना नागा किये वह हर सुबह ठीक साढ़े सात बजे अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच जाते हैं। झकाझक सफेद धोती, उससे मैच करता कुर्ता और माथे पर लगा रहता है लाल टीका। पैरों में चप्पल भी नहीं।

इस आदमी को आसानी से उसकी अपनी दुनिया में देखा जा सकता है। वह साइकिल से आते हैं। गंतव्य पर पहुंचने के बाद सड़क के एक कोने में साइकिल खड़ी करते हैं। कुछ देर तक आराम से वहां के हालातों का जायजा लेते हैं। फिर अपने मन को एकाग्र करते हैं और अपने सिर के ऊपर संदेश लिखी तख्ती रखते हैं। थोड़ी ही देर में एक संत जैसी मुस्कान उनके होठों पर फैल जाती है। वह लगातार कारों एवं अन्य वाहनों को आते-जाते देखते रहते हैं। साथ ही सड़कों पर रेंगती चकाचौंध से बेखबर अपनी मुस्कान को बिखेरते रहते हैं।
वर्षों से कृष्णदास लोगों के लिए एक जानी-पहचानी मूरत बन गए हैं। और जिस दिन उन्हें वहां नहीं देखा जाता है लोगों की उत्सुकता बनी रहती है कि वह व्यक्ति कहां चला गया। लेकिन उनका संदेश नहीं रुकता। यहां तक कि जिस दिन वह अपनी जगह पर मौजूद नहीं होते हैं, वह अपनी तख्ती से अपनी छुट्टी को सुनिश्चित करते हैं।
वहां से गुजरने वाले लोग उनकी तख्ती की देखभाल करते हैं जिस पर लाल रंग में एक आसान सा संदेश लिखा होता है – सबको प्रेम करो, अपने धर्म पर चलो।
पूरे दिन कृष्णदास के चेहरे पर से मुस्कुराहट ख़त्म नहीं होती, वह अपने स्थान पर घंटों खड़े रहते हैं बिना पानी पिये। पोस्टर को हाथ में लिए ही अपनी खड़े होने की स्थिति को बदलते हैं। केवल दोपहर के बाद करीब तीन बजे के आसपास है ही वह अपने हाथों को नमस्कार की मुद्रा में लाकर हाथों को नीचे लाते हैं, फिर अपनी साइकिल पर बैठते हैं और मुस्कराते हुए वहां से चले जाते हैं।
ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने उनके बारे में जानने की बहुत कोशिश की है, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई क्योंकि वह लोगों को ऐसा एहसास कराते हैं कि उन्होंने मौनव्रत धारण कर रखा है। मैं कई सालों से रोज ऐसे ही देख रहा हूं, उनके बारे में कुछ भी ख़ास नहीं बदला है। न तो वह बूढ़े लगते हैं और न ही उनकी मुस्कान बदली है।
दैनिक यात्रियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए कृष्णदास अपनी तख्ती के साथ चौराहे पर एक पैर पर खड़े रहते हैं। उनका यह प्रेरक कार्य शब्दों से परे है। और केवल यही नहीं, वह ट्रैफिक सिग्नल पर बच्चों के बीच बिस्कुट भी वितरित करते हैं।
कुछ समय पहले मैंने फैसला किया कि मैं उनसे मिलूंगा और बात करूंगा कि वह ऐसा कैसे कर पाते हैं। कई बार उनके पास से निकला उस चौराहे पर, लेकिन वह अपने स्थान से जरा हिले भी नहीं और न ही उनको कोई परेशानी हुई। एक दिन शाम को जब वह वहां से जा रहे थे मैंने विनम्र अनुरोध किया कि वो अपने बारे में हमें कुछ बताएं, अपने अनुभवों को हमसे साझा करें। लेकिन वह चुप रहे और कुछ नहीं बोले, बिना जवाब दिए अपने साइकिल पर बैठकर चले गए।
मैं समुद्र के किनारे उनके अगले पड़ाव तक उनके साथ-साथ गया। मैंने भी हार नहीं मानी लेकिन वह फिर भी शांत रहे। हमने उनको मनाने की काफी कोशिश की। और इसी प्रयास में ऑटो से पीछा करते हुए उनके घर तक पहुंच गया। उनके घर में न तो कोई तामझाम था न ही कोई भी सामान था। उनका घर एक झोपड़ी जैसा ही था।
उस दिन शाम के करीब 6 बज रहे थे, सूरज भी डूबने वाला था। हमारे करीब आकर उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाकर पूछा कि मैं उनका पीछा क्यों कर रहा हूं। मैंने उनसे कहा कि आपके जैसा आदमी मैंने और कोई नहीं देखा है। वह मुस्कुराते रहे। मैंने फिर एक सवाल किया कि क्या वह किसी धर्म को मानते हैं। जवाब में उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा, “प्रेम से बढ़कर कोइ धर्म नहीं होता, अभी आप कृपया करके के जा सकते हैं, मेरा पूजा करने का वक़्त हो गया है।” तभी मैंने उनकी झोपड़ी में अंदर झांक कर देखा, बांस की छड़ियों से बनी दीवारों पर किसी भी देवी या देवता की कोई भी तस्वीर नज़र नहीं आई।
कृष्णदास के बारे में बताया जाता है कि ये मोरारी बापू के बड़े भक्त हैं, उन्हें अपना गुरु मानते हैं। उन्हीं के बताये रास्ते पर चलते हैं और सभी को ऐसा करने के लिए प्रेरित करते हैं। कृष्णदास किसी से कोई मदद नहीं लेते, लेकिन एक मारवाडी होटल का व्यक्ति उसे दोपहर का खाना नि:शुल्क देता है।
हमारे करीब आकर उस संत ने मेरे कान में फुसफुसाकर पूछा मैं उनका पीछा क्यों कर रहा हूं। मैंने उनसे पूछा कि क्या वह किसी धर्म को मानते हैं। जवाब में उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा, ‘प्रेम से बढ़कर कोइ धर्म नहीं होता’।
कुछ महीने पहले मेरे मन में कृष्णदास का संदर्भ फिर से ताजा हो गया, जब मैंने दफ़्तर जाते समय एफएम पर आरजे से उनके बारे में सुना। आरजे ने जब मानव धर्म या धर्म के बारे में उनसे पूछा तो उन्होंने इसकी अद्भुत व्याख्या की। कृष्णदास ने कहा, “धर्म हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है। ये कृत्रिम मानव निर्मित सामाजिक विभाजन हैं। धर्म तो अनंत, निरंतर, अथाह, विशाल, अविभाज्य, अंधाधुंध है जैसे आकाश, पृथ्वी या महासागर। इन प्राकृतिक तत्वों की कोई शुरुआत या समाप्ति नहीं है, वे अपनी जाति, पंथ या धर्म के बावजूद सभी मनुष्यों को अपना लाभ या गुण प्रदान करते हैं।”
वह संदेश जो कृष्णदास अपनी तख्ती से देना चाहते हैं कि आप अपने धर्म से प्यार करते हैं, जो मानवता है, क्योंकि तभी आप अन्य मनुष्यों से प्यार कर सकते हैं।

मैंने उनके बारे में कुछ और जानने की आख़िरी कोशिश की, उनके पड़ोसियों के पास जाकर पूछा। लेकिन एक बार फिर निराशा हाथ लगी। पर कहते हैं न कि जब तक उम्मीद है कोई न कोई रास्ता निकल ही आता है। मैं भी अपनी कोशिश में लगा रहा। एक दिन कृष्णदास की झुग्गी के ही करीब रहने वाले एक बुजुर्ग व्यक्ति ने एकाएक मेरे पास आकर पूछ ही लिया कि मैं इतने सालों से कृष्णदास के बारे में क्या जानना चाहता हूं।
मेरे विनम्र अनुरोध के बाद उस व्यक्ति ने बताया कि किसी समय कृष्णदास मुंबई के एक प्रमुख उपनगर में एक छोटी से जमीन का मालिक था। शेट्टी नाम के एक व्यक्ति ने धोखे से उसकी ज़मीन को हड़प लिया और वहां पर एक रेस्तरां युक्त बार बनाया। कृष्णदास ने अपनी जमीन को शांतिपूर्ण तरीके से वापस पाने की बहुत कोशिश की, लेकिन शेट्टी हमेशा उन्हें धमकाता रहता। निराश हो कर कृष्णदास ने मुंबई छोड़ दी और कुछ समय बाद इस नए अवतार में वापस आया, जो आज तक नहीं बदला। उनमें गजब का आत्मविश्वास है, वह कभी किसी से भीख नहीं मांगते न ही उधार लेते हैं क्यूंकि उनका अटूट विश्वास है कि – प्रेम और धर्म पर चलने वालों को पैसों की क्या जरूरत है।
अगली सुबह, मैंने फिर से उनका ध्यान खींचने की कोशिश की, लेकिन उनके चेहरे पर सदा की तरह मुस्कुराहट बरकरार थी, उन्होंने ऐसे व्यवहार किया कि जैसे मुझे पहले कभी नहीं देखा हो। वह अपनी साइकिल पर बैठे और आगे बढ़ गए। मैं उनको ताकता रहा जब तक कि वो मेरी नज़र से ओझल नहीं हो गए।


