कुछ दुर्लभ लोग होते हैं जो तबाही से जूझने के बाद इस तरह आगे बढ़ते हैं कि उनका ही नहीं, न जाने कितनों का जीवन सकारात्मक रूप से बदल जाता है। उन्हीं में से एक हैं जादव पायेंग यानी फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_ID is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 378
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_count is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 379
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_description is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 380
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_name is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 381
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_nicename is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 382
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_parent is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 383
हमारी कहानी का नायक जादव पायेंग एक जीता-जागता किरदार है। और उसकी कहानी सौ फीसदी सच। एल्जियर बूफिये की तरह उसे भी पेड़ों से प्यार है। अगाध प्रेम, जिसे आप जुनून का नाम भी दे सकते हैं। और जुनून ऐसा कि उसने अकेले बूते लगभग 1400 एकड़ का जंगल बसा दिया है। वह भी एक ऐसे इलाके में, जो रेत का दरिया था। जहां रेत की नदी बहती थी।
पूर्वोत्तर असम में जोरहाट ज़िले के रेतीले माजुली द्वीप स्थित यह जंगल आज ढेरों वन्य प्राणियों का बसेरा है। साथ ही सैकड़ों किस्म की वनस्पतियों का खज़ाना भी। किसी एक आदमी द्वारा बनाया-बसाया यह दुनिया का सबसे बड़ा जंगल भी है। ‘मोलाई कोठानी’ जंगल। मोलाई कोठानी यानी मोलाई की लकड़ी। मोलाई उपनाम है जादव पायेंग का और उनके सम्मान में स्थानीय लोग इस जंगल को ‘मोलाई कोठानी’ कहते हैं। यह अलग बात है कि दुनिया के लिए यह ‘मिशिंग फॉरेस्ट’ है और पायेंग ‘फॉरेस्ट मैन ऑफ़ इंडिया’। लेकिन हमारे लिए जादव पायेंग ‘वन-पुरुष’ हैं।
रेतीली पट्टी को हरियाली की चादर में तब्दील कर देने की जादव पायेंग की कहानी तो बेमिसाल है ही। 55 वर्षीय जादव पायेंग असम के एक ऐसे इलाके में पैदा हुए थे, बाढ़ जिसकी नियति थी। गुवाहाटी से करीबन 350 किलोमीटर दूर और जोरहाट ज़िला स्थित माजुली द्वीप क्षेत्र के गांव अरुणा सपोरी में। ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ ने यहां तबाही की कई कहानियां लिखी थीं। वैसे भी ब्रह्मपुत्र को ‘पूर्वोत्तर का अभिशाप’ कहा जाता है। उन्हीं कहानियों ने पायेंग के भीतर उस दृढ़ इच्छाशक्ति को जन्म दिया, जिसने उनसे वो काम कराया जिससे वे आज सारी दुनिया में मशहूर हो चुके हैं। उनके कामों की गूंज ब्रह्मपुत्र की लहरों में बहते, सोंधी जंगली हवाओं में महकते, घने पेड़ों की सरसराहट से गुज़रते अब हज़ारों-हज़ार किमी दूर तक पहुंच चुकी है। देश की सरहदों को लांघते हुए फ्रांस और दूसरे मुल्कों तक।
दरअसल, पायेंग जिस गांव में रहते थे, उसके पास से विशाल ब्रह्मपुत्र नदी बहती थी। ब्रह्मपुत्र जब यहां पहुंचती तो अपने साथ लम्बी दूरी से बहा कर लायी हुई मिट्टी, रेत और पथरीले अवशेष मलबे के रूप में लाती थी। इस कारण उसकी गहराई यहां अपेक्षाकृत कम हो जाया करती थी। मानसून में इसके चौड़े पाट हर साल पेड़-पौधों, फसलों और गांवों को अपने संग बहा ले जाते थे, जिससे इसके किनारे स्थित गांव खासे प्रभावित होते थे। चूंकि यह सिलसिला अरसे से चलता आ रहा था, लिहाजा वह हरियाली रहित बंजर रेतीला तट लगभग रेगीस्तान जैसा हो चुका था। और यह रेत लगातार वहां के वन्य प्राणियों की मौत का कारण बन रही थी। प्रकृति प्रेमी पायेंग इससे दु:खी भी थे और निराश भी। पशु-पक्षियों की घटती संख्या ने उन्हें अंदर तक व्यथित कर दिया था।

बात 1979 की है। तब ब्रह्मपुत्र उस रेतीले इलाके में एक और बाढ़ का बायस बनी। इस बाढ़ ने वहां की हर चीज़ को तहस-नहस कर दिया। जादव पायेंग तब महज 16 साल के थे। इससे पहले बाढ़ के कारण ही उनका परिवार माजुली छोड़ गया था। पायेंग ने बालीगांव में रहते हुए तब तक 10वीं का इम्तिहान दे दिया था। माजुली द्वीप पर जब बाढ़ का पानी सूखा तो पायेंग अपने मवेशियों को लेकर उस बंजर टापू पर पहुंचे। लेकिन वहां उन्होंने जो नज़ारा देखा, उसने उन्हें बुरी तरह बेचैन कर दिया। उन्होंने देखा कि टापू पर सैकड़ों सांप मरे पड़े हैं। आगे बढ़े तो पूरा नदी का किनारा मरे हुए जीव-जन्तुओं से अटा पड़ा एक मरघट-सा लग रहा था।
मृत जानवरों के शव के कारण पैर रखने की जगह तक नहीं थी। इस दर्दनाक दृश्य ने पायेंग के किशोर मन को झकझोर दिया। हज़ारों की संख्या में निर्जीव जीव-जन्तुओं की निस्तेज फटी मुर्दा आंखों ने जादव को कई रात सोने न दिया।
जंगल के कम होते जाने से पशु-पक्षियों की संख्या में कमी से तो पायेंग पहले से ही परिचित थे, लेकिन पेड़-पौधों के अभाव में ऐसी स्थिति भी आ सकती है यह अपनी आंखों से उन्होंने शायद पहली बार देखा था। गांव के ही एक आदमी ने चर्चा के दौरान विचलित जादव से कहा- ‘जब पेड़ पौधे ही नहीं उग रहे हैं, तो नदी के रेतीले तटों पर जानवरों को बाढ़ से बचने का आश्रय कहां मिले? जंगलों के बिना इन्हें भोजन कैसे मिले?’ उन्होंने वन विभाग वालों से कहा कि ‘यहां आप कुछ पेड़ उगा दीजिये। पेड़ों के न होने की वजह से जीव मर रहे हैं।’ लेकिन वन विभाग वालों ने कहा कि ‘यह बंजर ज़मीन है, यहां कुछ नहीं उग सकता। हां, अगर तुम चाहो तो वहां बांस के पौधे उगाकर देख सकते हो।’ वन विभाग वालों ने शायद यह बात मज़ाक में कही थी, पर पायेंग ने इसे गंभीरता से ले लिया।
इंतज़ार का अब कोई मतलब नहीं था और न ही ज़रूरत। पायेंग ने तय कर लिया कि वह पहल करेंगे। लेकिन कैसे? सलाह-सुझाव के लिए वह अपने गांव के बड़े-बुजुर्गों से मिले। उन्होंने पायेंग को समझाया कि ब्रह्मपुत्र के आसपास और बीच में उभर आयी रेतीली पट्टियों पर बांस लगाया जा सकता है। इस किशोर के जेहन में अब कोई संशय नहीं था। उसे रास्ता सूझ गया था। जादव ने बांस के बीज और कुछ पौधे इकट्ठे किये और पहुंच गये नदी के रेतीले किनारे पर उन्हें रोपने। हाईस्कूल में पढ़ रहे जादव ने इसके बाद पढ़ाई छोड़ दी और ज्Þयादातर समय इस टापू पर ही रहने लगे। वह सुबह-शाम इन पौधों को पानी देते और हर दिन कुछ नये पौधे लगाते। कुछ ही सालों में यहां बांस का एक जंगल बन गया। और कुछ साल बीते तो इस जंगल में दूसरे पेड़ भी घने हो गये। आसपास से पशु-पक्षी यहां आने लगे।

जादव कहते हैं, ‘इस जंगल में पशु-पक्षियों को देखकर मुझे जो खुशी महसूस हुई, उसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती। मैं उदयपुर पैलेस में चार-पांच दिन तक रह चुका हूं। वहां राजपरिवार के साथ खाना खाया है, लेकिन वैसा माहौल भी इस खुशी के सामने कुछ नहीं है।’ बहरहाल, 39 साल पुराना वह दिन था और आज का दिन। इन 39 सालों में पायेंग ने बिना किसी सरकारी मदद के करीब 1400 एकड़ का जंगल लगा डाला है। इस जंगल को बसा कर उन्होंने न सिर्फ़ कई विलुप्तप्राय वन्य प्राणियों को उनका प्राकृतिक बसेरा उपलब्ध कराया है, बल्कि इस इलाके को विविध प्रकार के वनस्पतियों से भी आच्छादित कर दिया है। आयुर्वेदिक दवाइयों में इस्तेमाल होने वाले पेड़-पौधे और जड़ी-बूटियों से लेकर फलों के मालदार वृक्ष।
लेकिन उनके इस सफर में दुश्वारियां कम नहीं आयीं। सबसे पहले तो लगाये गये पौधों को पानी देना ही एक बड़ी बाधा थी। इतने सारे पौधों को पानी देना अकेले जादव के बस की बात नहीं थी। नदी से पानी लेकर पौधों को देना असंभव था, क्योंकि पौधे रोपण की जगह विशाल थी। पर पायेंग ने इसका समाधान ढूंढ निकाला। उन्होंने हर पौधे के ऊपर एक बांस की तख्ती रखकर उन पर मिट्टी का घड़ा लगा दिया, जिसमें महीन सुराख थे। इस तरकीब से पौधों को एक हफ्ते तक हर समय बूंद-बूंद पानी मिलता रहता था। जादव ने ब्रह्मपुत्र नदी के बीच एक वीरान टापू पर बीस बांस के पौधे लगाकर शुरुआत की! तीस वर्षों तक हर रोज़ सुबह जागकर वे उस टापू पर पौधे लगाकर आ जाते। जंगलों का क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए सुबह 9 बजे घर से निकलकर पांच किलोमीटर साइकल से जाने के बाद, नदी पार करते और दूसरी तरफ वृक्षारोपण कर फिर सांझ ढले नदी पार कर साइकल से 5 किलोमीटर तय कर घर पहुंचते। जादव बताते हैं, ‘एक समय के बाद मैंने यहां दूसरे पेड़ लगाना शुरू कर दिये। ज़मीन उपजाऊ बनी रहे, इसके लिए गांव से सड़ी-गली पत्तियां और केंचुए लाकर यहां छोड़ता था।’

जादव अपने मिशन में कामयाब तो हो रहे थे लेकिन अब नयी तरह की समस्या आ रही थी। जैसे ही वहां के पौधे पेड़ बनने लगे, जंगली जानवरों ने वहां डेरा डालना शुरू कर दिया। बाघ जैसे जानवर कभी-कभी अपने भोजन के लिए गांव में घुस आते और पालतू जानवरों को उठा ले जाते थे। जंगल के हाथी आसपास के गांव की फसलों को भी बर्बाद करने लगे थे। इससे गुस्साये ग्रामीणों ने कई बार पायेंग से जंगल नष्ट कर देने को कहा। हालांकि समझा-बुझाकर वह ग्रामीणों को जंगल को खत्म न करने के लिए मनाने में कामयाब हो जाते, लेकिन इस समस्या का भी पायेंग ने उपाय खोज लिया। समाधान के तौर पर उन्होंने जंगल में केले के पेड़ लगाने शुरू कर दिये। इसका नतीजा यह हुआ कि हाथियों को उनका पसंदीदा आहार जंगल में ही मिलने लगा और उन्होंने गांवों की तरफ रुख करना छोड़ दिया। जंगल में हिरणों की आबादी भी बढ़ी, जिससे बाघ भी वहीं सीमित हो गये।
वैसे पायेंग के लिए समस्या दूसरे मोर्चों पर भी थी। उन्हें अपने परिवार के लिए आजीविका भी कमानी थी। उन्हें जंगल से प्यार था और वह इससे दूर नहीं जाना चाहते थे। लिहाजा, उन्होंने दुधारू पशु रख लिए। आज भी वह और उनकी पत्नी व तीनों बच्चे आसपास के गांवों में दूध बेचकर ही अपना जीवनयापन करते हैं। तबाही अक़सर लोगों की हिम्मत तोड़ देती है, लेकिन ज़िंदगी का काम है आगे बढ़ना। कुछ ही दुर्लभ लोग होते हैं जो तबाही से जूझने के बाद भी आगे बढ़ते हैं। दूसरों के जीवन को सकारात्मक बनाने के लिए। जीवन को एक अर्थ देने के लिए। जादव पायेंग उन्हीं लोगों में हैं। उनकी मुहिम की शुरुआत एक तबाही से हुई थी, लेकिन आज उसी तबाही के फलस्वरूप शुरू हुई उनकी मुहिम पर्यावरण संरक्षण की एक अनोखी मिसाल बन गयी है।
पायेंग भी माजुली को लेकर चिंतित हैं। कहते भी हैं, ‘मैं अभी रुकने वाला नहीं हूं और यही एक तरीका है जिससे माजुली को बचाया जा सकता है।’ साइकल पर जंगली पगडंडियों में पौधों से भरे झोले और कुदाल के साथ हरी-भरी प्रकृति की अनवरत साधना में लगे इस नि:स्वार्थ पुजारी को सलाम।
पिछले लगभग 10 सालों में पायेंग देश के बड़े-बड़े शहरों में आयोजित सेमिनारों और बैठकों में भाग ले चुके हैं। यहां तक कि अपने अनुभव बांटने के लिए वे फ्रांस आदि देशों का दौरा भी कर चुके हैं। उनके ऊपर कई डॉक्यूमेंट्री फिल्में बन चुकी हैं। सिर्फ़ हाईस्कूल तक पढ़े पायेंग को ‘वन-पुरुष’ के रूप में उनके इस लम्बे सफर ने एक समझदार पर्यावरणविद् बना दिया है। वह ग्लोबल वार्मिंग, इसके दुष्प्रभाव, इकोलॉजी जैसी बातों को न सिर्फ़ समझते हैं, बल्कि अपनी भाषा में लोगों को समझाते भी हैं। वह कहते हैं, ‘1962 में पर्यावरण पर स्टॉकहोम कॉन्फ्रेंस हुई थी। उसके बाद लोगों ने विकास के लिए पर्यावरण के महत्व को समझा, लेकिन आज पचपन से ज्Þयादा साल गुजÞर गये फिर भी हम पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर संघर्ष कर रहे हैं।’
पायेंग के मिशन और उनकी पहल का ही नतीजा है कि केंद्र सरकार ब्रह्मपुत्र विकास प्राधिकरण का गठन करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। ब्रह्मपुत्र में अमूमन हर साल आने वाली बाढ़ से असम में लाखों लोग विस्थापित होते हैं। भूमि कटाव के कारण नदी के किनारे की सैकड़ों हेक्टेयर ज़मीन भी बर्बाद होती है। पिछले दिनों चर्चा में आये कई अध्ययनों में कहा गया है कि ब्रह्मपुत्र का सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली 15-20 सालों में भूमि कटाव के चलते नदी में समा जाएगा। यदि माजुली पर घना जंगल हो तो इसे बचाना मुमकिन है।

जादव पायेंग के काम को सलाम
2010 – वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर जीतू कलिता ने जादव पायेंग पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनायी ‘द मोलाई फॉरेस्ट’। यह फिल्म देश के नामी विश्वविद्यालयों में दिखायी गयी। आरती श्रीवास्तव ने अपनी फिल्म ‘फॉरेस्टिंग लाइफ’ में उनकी ज़िन्दगी के अनछुए पहलुओं और परेशानियों को दिखाया।
2012 – जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय द्वारा सम्मानित।
2013 – इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ फॉरेस्ट मैनेजमेंट ने पुरस्कार दिया।
2014 – कनाडाई फिल्मकार मैकमास्टर की पायेंग पर ‘फॉरेस्ट मैन’ नाम से बनायी डॉक्यूमेंट्री फिल्म रिलीज हुई, जो विदेशी फिल्म महोत्सव में काफी सराही गयी। कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले।
2015 – भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजे गये।


