हर साल देश का आम बजट जोर शोर से आता है और जब आता है तो उस पर सबसे ज्यादा निगाहें आम आदमी की ही होती हैं। नौकरीपेशा लोगों से लेकर छोटे-मोटे कारोबारी तक बजट से रियायतों और लाभों की आस लगाए रहते हैं। एनडीए सरकार की भारी बहुमत से वापसी के बाद लोगों के […]
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हर साल देश का आम बजट जोर शोर से आता है और जब आता है तो उस पर सबसे ज्यादा निगाहें आम आदमी की ही होती हैं। नौकरीपेशा लोगों से लेकर छोटे-मोटे कारोबारी तक बजट से रियायतों और लाभों की आस लगाए रहते हैं। एनडीए सरकार की भारी बहुमत से वापसी के बाद लोगों के बीच बजट में लुभावनी घोषणाओं की उम्मीदें थीं।
उम्मीदों से परे एक सख्त बजट पेश कर सरकार ने साफ कर दिया कि यह रेवड़ियां बांटने का वक्त नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास को गति देना जरूरी है। बजट में न तो करों में कोई रियायतें दी गईं, न किसी छोटे-मोटे फायदे की गुंजाइश इसमें रखी गई है। लेकिन इस बार का बजट महत्त्वपूर्ण इस मायने में है कि इसमें दूरगामी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बड़े और ठोस कदमों का ऐलान किया गया है।
लेकिन सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती राजस्व जुटाने की भी है। इसके लिए अमीरों की जेब पर हाथ डाला गया है। जिनकी आमदनी दो से पांच करोड़ रुपए सालाना है उन पर तीन फीसद और पांच करोड़ सालाना से ज्यादा आमदनी वालों पर सात फीसद का अधिभार और बढ़ाया है।
इस लिहाज से देखें तो साल 2019-20 का आम बजट आमजन के बड़े हिस्से के लिए निराश करने वाला हो सकता है, क्योंकि भले किसी को रेवड़ियां न बंटी हों, लेकिन अगले दस-बीस साल में देश को विकास के रास्ते पर कैसे ले जाना है, इसकी झलक बजट में साफ दिख रही है। सारा जोर विकास संबंधी योजनाओं पर दिया गया है ताकि देश को अगले पांच साल में पांच लाख करोड़ डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनाया जा सके। जाहिर है, इस लक्ष्य को हासिल कर पाना कोई आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं। किन्तु यह लक्ष्य कई सवाल छोड़ने वाला भी है जिस पर हम सबसे आखिर में बात करेंगे।

सरकार के सामने एक और बड़ी चुनौती है – बाजार में मांग पैदा करना और रीयल, ऑटोमोबाइल और अन्य क्षेत्रों में कायम शिथिलता को तोड़ना । इसी के लिए समाधान के तौर पर होम लोन के ब्याज पर मिलने वाले इनकम टैक्स छूट को साल में 2 लाख से बढ़ाकर 3.5 लाख रुपये कर दिया गया है। यह छूट 45 लाख रुपये तक के मकान पर मिलेगी। इससे रीयल एस्टेट सेक्टर को प्रोत्साहन मिलेगा। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 1.95 करोड़ मकान बनाने का प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण कारक हो सकता है। बैंक ज्यादा से ज्यादा ऋण दे सकें, इसके लिए सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 70,000 करोड़ रुपये की पूंजी डालेगी। वित्त वर्ष 2019-20 के विनिवेश लक्ष्य को बढ़ाकर 1,05,000 करोड़ रुपये किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि अंतरिम बजट में इसे 90,000 करोड़ रुपये रखा गया था।
अपने लक्ष्य को साधते हए प्रस्तावित बजट में सरकार ने उद्योगों का खासतौर से खयाल रखा है। जहां तक उद्योगों को बढ़ावा देने की बात है, बजट में नए कारोबारियों यानी स्टार्ट-अप शुरू करने वालों के लिए सरकार ने नरमी बरती है। ऐसे नए उद्यमियों से आयकर विभाग अब यह नहीं पूछ सकेगा कि उन्होंने काम शुरू करने के लिए पैसा कहां से जुटाया। वहीं छोटे व्यापारियों और खुदरा कारोबार करने वालों को पेंशन का झुनझुना पकड़ाया गया है।
विगत चुनाव के दौरान देशभर की नजरें रोजगार के मुद्दे पर लगीं रहीं पर सत्ताधारी पार्टी ने इसे नजरअंदाज करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। पिछले पांच साल में अर्थचक्र को जो रफ्तार मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली। इसी का नतीजा आज सामने है कि दो साल में बेरोजगारी ने पिछले सारे रेकार्ड तोड़ दिए। बेरोजगारी कैसे दूर होगी, इसके प्रयास बजट में नहीं दिखते।
लेकिन अपने बजट में सरकार ने यह स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है कि रोजगार तभी बढ़ेंगे जब अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी। अर्थव्यवस्था में तेजी होगी तो कर राजस्व भी बढ़ेगा। इन्हीं सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने तत्काल राजस्व बढ़ाने के लिए पेट्रोलियम पदार्थो पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने का फैसला लिया है। डीजल की कीमतें बढ़ने से जहां जरूरी वस्तुओं की महंगाई बढ़ेगी, वहीं पेट्रोल कीमतों से मध्यम वर्ग नाराज हो सकता है। लेकिन पेट्रोल की कीमतें बढ़ाकर सरकारें हमेशा अपना खजाना भरती रही हैं।
फिलहाल सरकार ने अपने बजट में सड़क, वॉटरवे, मेट्रो और रेल के विकास के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। जाहिर है ये पूंजी निवेश को आकर्षित करने में भी अहम साबित हो सकते हैं। इसके लिए कई क्षेत्रों में एफडीआई बढ़ाने की बात भी कही गई है। सरकार उड्डयन, मीडिया, एनिमेशन और बीमा में एफडीआई बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार करेगी।
विभिन्न संभावनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए ही मोदी सरकार ने फरवरी 2019 में पेश अपने अंतरिम बजट में अनेक कार्यक्रमों को जमीन पर उतारा था। अब पूर्ण बजट के माध्यम से उन्हें एक निश्चित दिशा और मजबूती देने की कोशिश की गई है। इस बजट में इस बात पर जोर दिया गया है कि साधन संपन्न वर्ग से टैक्स वसूल कर और विनिवेश के जरिए पूंजी जुटाकर उसे गरीबों और किसानों से जुड़ी योजनाओं पर खर्च किया जाए। इस बजट में आधारभूत संरचनाओं को खासी तवज्जो दी गई है क्योंकि इस सेक्टर में रोजगार पैदा करने की संभावनाएं असीम हैं। सरकार पिछले पांच साल बेरोजगारी दूर करने की चुनौती से लगातार जूझती रही है। इसलिए उसने अगले पांच सालों में इंफ्रास्ट्रक्चर को उन्नत करने पर 100 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का फैसला किया है। सरकार का मानना है कि ऐसे प्रॉजेक्ट गांव और शहर के बीच खाई को कम करने का काम करेंगे।

वहीं सरकार यह दावा भी करती नजर आ रही है कि उसने बजट में किसानों पर विशेष फोकस किया है। वित्त मंत्री सीतारमण ने अपने बजट भाषण में कहा कि असल भारत गांव में बसता है। गांव और किसान उनकी हर योजना का केंद्र बिंदु होगा। इसके लिए सरकार कृषि अवसंरचना में निवेश करेगी।
आजादी की 75वीं सालगिरह तक किसान की आय दोगुनी करने की कोशिश की जाएगी। अन्नदाता को ऊर्जादाता बनाने पर तेजी से काम किया जायेगा।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साल 2019-20 का बजट भाषण देते हुए कई बार देश को अगले पांच साल में ‘फाइव ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी’ यानी 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात कही। अब सोचने वाली बात है आखिर भारत साल 2024-25 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला देश कैसे बन सकता है और इसके रास्ते में क्या हैं संभावनाएं और कौन-सी अड़चनें? वित्त मंत्री ने बजट भाषण में दावा किया कि इस वित्त वर्ष में ही भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 3 ट्रिलियन डॉलर का हो जाएगा। इस वक्त 2.7 ट्रिलियन डालर का है। क्या हम जानबूझ कर इस पैमाने को नारे में बदल रहे हैं ताकि बाकी जगहों पर निगाह नहीं जाए और सपने में खो जाएं।
लेकिन हम इन सवालों का जवाब तलाश पाते, काशी में तो पीएम मोदी ने यहां तक कह दिया कि जो लोग अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर की होने पर सवाल कर रहे हैं, वे निराशावादी हैं. लेकिन इस बारे में जानकार पॉजिटिव और निगेटिव दोनों पक्ष उठा रहे हैं।
आपको बताते चलें कि 05 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य की बात को सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही सामने रखा था। 05 ट्रिलियन डॉलर मतलब 340 लाख करोड़ रुपये से 375 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था।
एक कॉमन मैन के लिए यह जानना मुश्किल है कि इसके लिए आधार क्या हैं?
पहले आर्थिक सर्वेक्षण और फिर आम बजट में पांच खरब डॉलर के लक्ष्य को अहमियत देने और उस हिसाब से रणनीति का खाका सामने रखने के बाद ये सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वाक़ई मार्च, 2025 तक भारत को ये मुकाम हासिल हो पाएगा? तथ्यों को परखने पर शंका उत्पन्न होती है जैसे सर्वेक्षण ने 2019-20 में जहां जीडीपी बढ़ने की वास्तविक दर 7 फ़ीसदी रहने का अनुमान लगाया और बजट के दस्तावेज कह रहे हैं कि 2020-21 में यह दर 7.3 फ़ीसदी और 2021-22 में 7.5 फ़ीसदी रहने का अनुमान है।
यानी 05 ट्रिलियन डॉलर के लिए शुरुआती तीन सालों में विकास दर सात से साढ़े सात फ़ीसदी के बीच रहेगी। अब ऐसे में बाक़ी बचे तीन सालों 2022-23, 2023-24 और 2024-25 में विकास दर आठ फ़ीसदी से कहीं ज़्यादा और यहां तक कि दोहरे अंक में होनी चाहिए, तब जाकर लक्ष्य कहीं हासिल हो सकता है।

लेकिन इसमें सबसे बड़ी परेशानी यह है कि दुनिया भर में विकास दर की रफ्तार धीमी पड़ रही है। देश में उपभोक्ता मांग और निवेश मांग में अभी भी कमी बनी हुई है। जलवायु परिवर्तन का असर भारतीय कृषि को भुगतान पड़ रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा हिस्सा रखने वाले सेवा क्षेत्र का हाल भी बुरा है। साथ ही कच्चे तेल को लेकर अनिश्चितता हाल-फ़िलहाल ख़त्म होती नहीं दिख रही है।
अब इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां लगातार बढ़ ही रही हैं और जब आठ फ़ीसदी पर सवाल हो तो दोहरे अंक में विकास दर की बात तो बहुत ही दूर की बात है। लेकिन उम्मीद पर तो दुनिया कायम है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अपने बजट भाषण के दौरान कहती हैं, “आज हम लोग तीन ट्रिलियन डॉलर के क़रीब हैं। जब हम पांच ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य की ख्वाहिश रखते हैं तो कई चकित होते हैं कि क्या ये संभव होगा।”
पांच ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य को हासिल करने के बारे में वित्त मंत्री ने खुद से पूछे सवाल का केवल इतना जवाब दिया कि, “हमें अपने नागरिकों पर विश्वास है और उनके पुरुषार्थ और आगे बढ़ने के सपने पर भी। मोदी सरकार के नेतृत्व में हम इस लक्ष्य को ज़रूर हासिल करेंगे।”
गौरतलब है कि अमेरिका को 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी बनने में नौ साल (1979 से 1988) लग गए, जापान को आठ साल (1987 से 1984) और चीन को महज तीन साल (2005 से 2008) लगे थे। इससे यह संदेश मिलता है कि चीन अगर तीन साल में यह मुकाम हासिल कर सकता है, तो भारत पांच साल में ऐसा क्यों नहीं कर सकता। सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के मामले में कुछ समय के लिए तो हमने चीन को पीछे छोड़ दिया था। हालांकि, पिछले कई साल से जीडीपी में बढ़त अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पा रही।


