जबलपुर रेल्वे स्टेशन पर कुलियों की भीड़ में पीटी शूज पहने तो कभी रबड़ की चप्पल पहने,कमर में दुपट्टा बांधे कुलियों की ड्रेस में कोई दुबली लड़की आपका सूटकेश,थैला या फिर बैग अपने सिर पर ढोने के लिए आपसे पूछे तो चौकियेगा नहीं। जबलपुर के लोग अब इस लड़की को बिल्ला नंबर 23 या फिर कुली लक्ष्मी के नाम से भी जानने लगे हैं। लक्ष्मी मध्य प्रदेश की पहली महिला कुली है।
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एक काम के सिलसिले में मेरा जबलपुर जाना हुआ। मैने लक्ष्मी के बारे में सुन रखा था। स्टेशन पर उतरते ही एक कुली से पूछा बिल्ला नंबर 23 कहां है?
कुली ने एक ओर इशारा करते हुए कहा, वो आ रही है समान लेकर। मैने उधर दृष्टि डाली। एक दुबली, पतली सी लड़की सिर पर सूटकेस दोनों बाहों मे थैला लिए चली आ रही थी। बोझ भारी था,लग रहा था अब गिरी तब गिरी। लेकिन यह सोचना गलत था। उसे बोझ संभालना बखूबी आ गया था। निकट आने पर मैंने उससे कहा, लक्ष्मी मै तुम्हारा इंतजार करूं या किसी और कुली से अपना समान उठवा लूं। उसने जवाब दिया मुझे आने में देर हो जाएगी। आप दूसरा कुली कर लें।
बीकॉम पास होने के बाद भी लक्ष्मी ने कुली का काम चुना। उसने साबित किया कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। जबलपुर स्टेशन पर काम करने वाली लक्ष्मी यहां की पहली महिला कुली है।
लेकिन मै उससे बात करने के लिए अपनी तीव्र इच्छा नहीं दबा पा रहा था। इसलिए मैने वहीं, उसका इंतजार किया। थोड़ी देर में वह वापस आई तो मैने उसे रोककर कहा, लक्ष्मी मुझे तुमसे तुम्हारे इस काम के संबंध में कुछ बातें करनी हैं। वह कशमश में थी। उसका सारा ध्यान स्टेशन पर हो रहे अनाउंसमेंट की ओर था। वह मुझे इंकार करते हुए बोली,साहब, अनाउंसमेंट हो गया है। प्लेटफार्म नंबर एक पर मेल आ रही है। आपसे बात करूंगी तो काम का हर्जा होगा। इतना कहकर वह अन्य कुलियों की तरह प्लेटफार्म नंबर एक की ओर दौड़ पड़ी। मै यहीं इंतजार कर रहा हूं लौट कर मिलो, मैंने चीखकर कहा उससे,वह हाथ से हां का इशारा करते भागती चली गई।

करीब आधे घंटे बाद लक्ष्मी वापस लौटी। सांसे तेज थीं, माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। बावजूद इसके उसके चेहरे पर जो चमक थी,गजब की थी। वह चहककर कह रही थी, हम किसी से मांग कर नहीं खाते।
मैने पहला सवाल किया, इतना बोझ उठाती हो कोई परेशानी या दर्द नहीं होता। वह दार्शनिक अंदाज में बोली, दर्द ही तो जीवन है। दर्द से क्या घबराना। एक क्षण चुप्पी के बाद उसने कहा, दर्द तो होता है। कल का दर्द, अभी भी बना है कमर में। पर क्या करें। इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं है। घर में रोटी तो चाहिए सबको। क्या शादी के बाद भी कुली का काम करोगी, मेरे सवाल पर लक्ष्मी नीचे की ओर देखने लगती है। और फिर उदास स्वर में जवाब दिया ‘‘मुझे नहीं लगता कि कोई मुझसे शादी करेगा। इसकी चिंता नहीं है। सिर्फ अपने मां-बाप की सेवा करना ही मेरा मकसद है।
लक्ष्मी से बातचीत में पता चला कि वह स्नातक है और कुली बनने से पहले वह एक स्कूल में टीचर थी। लेकिन टीचर की नौकरी में उसे इतना पैसा नहीं मिलता था कि अपने दो भाई जिसमें एक की मानसिक हालत ठीक नहीं है और बूढे अभिभावकों की जरूरतें पूरा कर सके। कोई दूसरा काम भी नहीं मिला,जिसमें इतनी तनख्वाह मिल जाए कि सबके पेट की रोटी मिल सके। लिहाजा उसने कुलीगिरी का काम उठा लिया।
लक्ष्मी कहती है, “मुझे लगता है कि टीचर की नौकरी से यह काम अच्छा है। मै खुश हूं। संतुष्ट हूं। इसमें जितनी मेहतन, उतना पैसा है। आज मेहनत से कमाई कर रही हूं तो कोई दो बातें सुनाने से पहले सोचता है। नौकरी करने की सोची लेकिन बिना कम्प्यूटर या कोई अन्य कोर्स के अभाव में नौकरी नहीं मिली, ऐसे में यह काम क्या बुरा है। रोज घर में मेरी मेहनत की कमाई आती है, घर के खर्चे में सबका हाथ बंटाती हूं। घर वाले खुश हैं,मुझे और क्या चाहिए। निजी स्कूल के टीचरों को मिलता ही क्या है। सरकार को चाहिए कि निजी स्कूल के टीचरों को भी एक निश्चित वेतन देना अनिवार्य करे। महिला कुलियों के लिए भी सरकार को कुछ करना चाहिए। ताकि जो महिला कुली बनना चाहती हैं, उनकी राह आसान हो सके।“

महिला सशक्तिकरण का एक रूप यह भी है। जहां लक्ष्मी जैसी लड़कियां किसी की दया की मोहताज नहीं हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है जब पूरे देश में महिला दिवस मनाया जाता है, महिलाओं के हक में सेमिनार चलते हैं, मीडिया में बड़ी बड़ी बातें होती हैं, चर्चाएं होती हैं, लेकिन लक्ष्मी जैसी लड़कियों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। पुरुष कुलियों की टोली के साथ लक्ष्मी स्टेशन पर ट्रेन की सीटी के साथ सारा दिन भागती दौड़ती फिरती है। अन्य कुलियों की तरह उसकी निगाहें भी आने वाली ट्रेन के इंतजार में पटरियों पर चिपकी रहती है। ट्रेन आते ही वह दौड़ पड़ती है।
आज लक्ष्मी सारी दुनिया का बोझ अपने सिर पर उठा रही है ताकि, अपने घर का बोझ उठा सके। वह शासन की उस नपुंसक व्यवस्था का भी बोझ उठा रही है जहां लाडली लक्ष्मी योजना के नाम पर भांजियों को छला जा रहा है। जहां आए दिन लड़कियां यातनाओं का शिकार हो रही हैं। भीख मांगने के लिए विवश हैं या फिर मजबूरी उन्हें देह व्यापार के लिए दलदल में धकेल रही है। लेकिन लक्ष्मी उन महिलाओं में से नहीं है। उसने दया की भीख नहीं मांगी। मजबूत इरादों और हौसलों के साथ एक ऐसे काम में जुट गई जो अभी तक सिर्फ पुरूष ही करते आए हैं। भले ही मध्य प्रदेश में वोट बैंक बनाने के लिए सरकार की दर्जनों योजनाएं चल रही हों,लेकिन ऐसी कोई योजना नहीं है जिसमें एक स्नातक पास लड़की को अपने पैरों पर खड़े होने लायक नौकरी मिल सके। आखिर मध्य प्रदेश की लक्ष्मी बिल्ला नंबर 23 के नाम से कब तक जानी जाएगी?


