अब इस सरकार को यह कहने का अवसर नहीं मिलेगा कि हमें पुरानी सरकार से घाटा मिला!
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नई सरकार पहले से ही काम कर रही तो अब यह बहाना नहीं चल सकता कि हमें समय नहीं मिला समझने का। चुनाव के पूर्व जो भी सरकारी जानकारियां थी वे दफ़न कर दी गयी थीं और जब वे सामने आयेंगी तो वर्तमान सरकार इस बात से इंकार नहीं कर सकती की ये सब पुरानी सरकार ने किया, पुरानी सरकार का मतलब वर्तमान सरकार।
वर्ष 2017-18 में देश में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी रही जोकि 45 वर्षों में सबसे अधिक रही है। तत्कालीन सरकार यानी वर्तमान सरकार ने ये सब दावे नामंजूर करते हुए हुए कहा था के ये आंकड़े अंतिम नहीं हैं। अब इन आंकड़ों को नए प्रसंग में बताये जा रहे हैं।
शहरों में नौकरी लायक युवाओं में से 7.8 फीसदी बेरोजगार हैं। जबकि गावों में यह संख्या 5.3% है। पूरे देश में पुरुष बेरोजगारों की संख्या 6.2% है जबकि महिलाओं की 5.7% रही। सर्वे के अनुसार शहरों में पुरुषों की बेरोजगारी दर 7.1 फीसदी है और ग्रामीण क्षेत्र में 5.8 फीसदी।
देशभर के शहरों में महिलाओं की बेरोजगारी दर 10.8% है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 3.8% है। सर्वे के मुताबिक हर साल एक करोड़ बेरोजगारों की फौज तैयार हो रही है।

अब आर्थिक क्षेत्र की बात करें तो देश को अर्थव्यवस्था में भी झटका लगा। वर्ष 2018-19 की चौथी तिमाही में देश की विकास दर सुस्त पड़कर 6% से भी नीचे आ गयी। जनवरी से मार्च की तिमाही में आर्थिक गतिविधियां महज 5.8 फीसदी की रफ़्तार से बढीं । पिछल पांच साल की किसी भी तिमाही में विकास दर 6% से कम नहीं रही। इसका मतलब चुनाव में हुआ खर्च का असर बाज़ार पर पड़ा।
हमारे देश के प्रजातंत्र में यह बहुत खूबसूरती हैं कि बिना पढ़ा लिखा व्यक्ति सांसद/विधायक चुन लिया जाय तो वह मंत्री बनने की पात्रता रखता है और इससे भी बढ़कर बिना पढ़ा लिखा व्यक्ति शिक्षा मंत्री बन जाता है, अपराधी प्रवत्ति का व्यक्ति गृह मंत्री बन जाता है, समाज शास्त्र का व्यक्ति वित्त मंत्री बन जाता है, इंजीनियर आदमी स्वास्थ्य विभाग देखता है, असफल वकील कानून मंत्री बन सकता है। कारण यह मानना है कि मंत्री या राष्ट्रपति एक मुहर जैसा होता है बाकी सब काम सचिव निपटाते है।
स्वत्रन्त्र भारत में यदि हम उस दौरान का अवलोकन करें तब उस समय अपने अपने क्षेत्रों में पारंगत अधिकांश मंत्री बनाये जाते थे। यह जरूरी नहीं हैं की कम पढ़ा लिखा व्यक्ति अनुभवी और ज्ञानवान नहीं होता। शिक्षा, ज्ञान, अनुभव का अपना महत्व होता है पर होना यह चाहिए कि जो जिस विषय में होशियार, विद्वान् हो उसे उस विभाग का काम देना चाहिए जिससे विभाग की पकड़ के साथ विषय वस्तु को अच्छे ढंग से प्रस्तुत कर सके ।
देश वासियों की वर्तमान सरकार से यह अपेक्षा है कि जनता की मूलभूत समस्याएं जैसे नौकरी, बेरोजगारी, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थय, कानून व्यवस्था, निर्माण कार्य, औद्योगिक उन्नति के साथ स्थानीय सामग्री का उपयोग कर हम कम से कम आयात करें और निर्यात बढ़ाएं तभी हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे। अन्यथा हर तिमाही में कुछ बढ़ोत्तरी और अधिक घटोत्तरी का सामना करना पड़ेगा और जनता विकल्प रहित रहेंगी, उसकी सुनवाई अगले चुनाव तक होंगी।


