हिन्दीभाषी सूबों में भाजपा के लिए चुनौतियां बढ़ने की ओर इशारा करती हैं। वहीँ कांग्रेस को भी अपनी राजनीति और रणनीति को नये सिरे से चाक-चौबंद करने की ज़रूरत है। गठबंधन भी इधर से उधर मारा मारा फिर रहा है। इस सबकी रणनीति 2019 के आम चुनाव पर क्या असर डालेगी, यह आम चुनाव के बाद पता चलेगा।
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राजनीति के लिए मुद्दे जरूरी होते हैं और बिना मुद्दे के आम लोगों से जुड़ पाना संभव नहीं है। पिछले एक दशक से लोग कृषि-संकट, बेरोज़गारी, महंगाई, महिलाओं की असुरक्षा आदि समस्याओं से दु:खी और त्रस्त थे। संभवत: इसी कारण आम जनता ने नफरत भरी राजनीति व सांप्रदायिक अभियानों का शिकार होने से इनकार कर दिया। मौजूदा हालातों में भी लोगों के लिए राम और मंदिर से ज्यादा रोज़ी-रोटी मायने रखती है।
हाल के महीनों में किसानों की समस्याएं देश के सामने विकराल रूप धारण किये रहीं। मध्य प्रदेश और राजस्थान में तो किसानों के आंदोलन पर पुलिस की गोलीबारी के भी कई मामले सामने आये, जिनमें अनेक किसानों की मौतें हुईं। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान मुख्यरूप से कृषि आधारित राज्य हैं, जिनकी कृषि-आय देश की जीडीपी में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इसके अलावा व्यापक बेरोज़गारी, आय, कृषि और नोटबंदी के कारण असंगठित क्षेत्र की नौकरियों में कमी जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण भारतीय राजनीति में छाये रहे।
पिछले साल के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने प्रधानमंत्री द्वारा गढ़े गये ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ के सपने को भी ज़मीनी स्तर पर धराशायी कर दिया है। गठबंधन की राजनीति को भी इससे एक नयी दिशा मिली है। और जनता के बीच एक स्पष्ट संदेश भी गया है कि कोई भी विपक्षी गठबंधन राष्ट्रीय पार्टी की मजबूत पहल के बिना सफल नहीं हो सकता।
बहरहाल मतदाताओं ने 2019 के लिए अपना संदेश दे दिया है। संदेश यह कि मोदी को शासन पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपने पद की गरिमा को बनाये रखना होगा। सांप्रदायिक या नफरत भरे भाषणों को छोड़कर अपनी छवि सुधारनी होगी। इसके अलावा, राहुल गांधी को एक परिपक्व और सरोकारों से जुड़े नेता के रूप में अपनी छवि को गढ़ना होगा, जिसकी प्रक्रिया शुरू हो गयी है। हालांकि कांग्रेस भले ही तीन राज्यों में विधानासभा चुनाव जीत गयी है, लेकिन उसे राहुल गांधी को विपक्षी गठबंधन का नेता घोषित करने की ग़लती नहीं करनी चाहिए थी। बीजेपी के मुकाबले विपक्ष को सीधा और सपाट संदेश मिला है कि सभी नेताओं को जनभावना को ऊपर रखना होगा और गठबंधन को बाद में।
आम चुनाव के मद्देनजर बीजेपी अपनी रणनीति में आक्रामक ढंग से परिवर्तन लायेगी। आगामी बजट अत्यधिक लोकलुभावन घोषणाओं से भरा हो सकता है। इसके बाद ध्रुवीकरण होगा। मोदी सरकार ट्रिपल तलाक विधेयक को आगे बढ़ा सकती है। ‘मोदी ब्रांड’ को जोरशोर से फिर उठाया जायेगा, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे अन्य उपाय भी सामने आयेंगे। बीजेपी के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 307 या अनुच्छेद 35 का उन्मूलन, विजय माल्या, ललित मोदी और नीरव मोदी को भारत लाने और राज्य चुनावों को एक साथ कराने जैसे अन्य कदमों को उठाने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी जायेगी।
लेकिन जनमानस में जब विरोध के स्वर उठते हैं, तो यह विरोध अनुमान से भी ज्यादा तेजी से गति पकड़ता है। ऐसा पहले भी देखने को मिला है। शंका तो इस बात की व्यक्त की जा रही है कि बीजेपी के ये कदम कहीं उस पर ही न भारी पड़ जायें, क्योंकि जनभावना की उपेक्षा में ही इंदिरा गांधी की सरकार गिर गयी थी। इसी कारण अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारें भी चुनाव हार गयी थीं। भारत में उस इतिहास को फिर से दोहराया जा सकता है।



