संगीत के जरिये छात्रों को अंग्रेजी व गणित का पाठ पढ़ाने वाले झारखंड के शिक्षक परमेश्वर यादव एक मिसाल हैं। मिसाल इस बात की कि जहां चाह हो, वहां राह खुद-ब-खुद बन जाती है। उन्हें बच्चों को हर हाल में अंग्रेजी और गणित की गुत्थियां समझानी थी, लिहाजा उन्होंने इसका एक अनोखा उपाय ढूंढ निकाला। आज उनके इसी अंदाज़ ने उन्हें देश-दुनिया में चर्चित कर दिया है।
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झारखंड की राजधानी रांची से गिरिडीह ज़िला कोई 200 किलोमीटर के आसपास है। जाहिर है सड़क मार्ग से रांची से ही यहां पहुंचने में कम से कम 4-5 घंटे लग जाएंगे। लेकिन यहां के एक शिक्षक परमेश्वर यादव ने शोहरत की हज़ारों किलोमीटर की दूरी चंद लम्हों में तय कर ली। एक झटके में उनकी प्रसिद्धी देश-दुनिया में फैल गयी। वे सेलिब्रिटी बन गये। इतने चर्चित कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और ख्यात कवि कुमार विश्वास उनके फैन हो गये।
जी हां, सुनने में यह भले ही अजीब-सा लगता है मगर यह एक हक़ीकत है। आज परमेश्वर यादव किसी परिचय के मोहताज नहीं रह गये हैं। देश-दुनिया में उनके प्रशंसक हैं। विद्यार्थियों को पढ़ाने के उनके अलहदा अंदाज़ ने उन्हें नायक बना दिया है।
गौरतलब है कि गिरिडीह के डुमरी प्रखंड के गुलीडाडी गांव का यह शिक्षक बीते दिनों अचानक मीडिया की सुर्खियों में आ गया था। कारण, बच्चों को पढ़ाते हुए उसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। इस वीडियो की खासियत यह थी कि इसमें परमेश्वर यादव को गीत गाकर बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते दिखाया गया था। गीत झारखंड की स्थानीय भाषा खोरठा में था और धुन भी आंचलिक थी।
सामान्यत: बिहार-झारखंड में छठ महापर्व पर जो गीत बजते हैं, उसकी धुन को ही परमेश्वर यादव ने अपने गाने में उतारा था और इसके माध्यम से बच्चों को अंग्रेजी के अल्फाबेट तथा वॉवेल्स और कॉन्सोनेंट का ज्ञान दे रहे थे। कुछ इन शब्दों में कि ‘एबीसीडी 26 अक्षर 26सों अक्षर एलफाबेट होवे रे, नुनू रे पांचों गो भावेल एईआइओयू बाकी सब कोन्सोनेंट होवे रे।’ यानी अंग्रेजी में एबीसीडी जैसे 26 अक्षर होते हैं, जो अल्फाबेट कहलाते हैं। इनमें एईआइओयू 5 वॉवेल्स, बाकी सारे 21 कॉन्सोनेंट होते हैं।
लोकधुन में बच्चों को पढ़ाने की उनकी यह कला जब वीडियो की शक्ल में प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास की नज़रों से गुजरी, तो न सिर्फ़ उन्होंने इसे ट्वीट किया बल्कि इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा भी की। यह कहकर कि ‘काश हमें भावेल और कोन्सोनेंट ऐसे किसी म्यूज़िकल गुरुजी ने पढ़ाये होते, तो हम भी आज शशि थरूर बाबू की तरह फर्राटे मारके अंग्रेजी बोल रहे होते।’ और जब सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की दृष्टि इस वीडियो पर गयी, तो वे भी इससे मुतासिर हुए बगैर नहीं रह सके। उन्होंने भी इसे अपने ट्विटर हैंडल पर टैग कर दिया।
फिर क्या था, परमेश्वर यादव की तो धूम ही मच गयी। लोग गूगल पर, यू-ट्यूब पर उन्हें ढूंढने लगे। उनके वीडियो देखने लगे। एकबारगी वह छा गये। किस्मत के करिश्मे ने उनकी लोकप्रियता को सात समुंदर पार तक पहुंचा दिया। लोग उन्हें फोन करने लगे, उनसे मिलने आने लगे। मीडिया का उनके घर पर जमावड़ा लग गया।

स्वयं परमेश्वर यादव कहते हैं कि उन्हें तब यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि यह वे ही हैं, जिन्हें लोग फोन कर रहे हैं, मिलने आ रहे हैं और जिनकी कहानी टीवी पर दिखायी जा रही है। वह बताते हैं कि अब तक कई मीडिया वाले उनका इंटरव्यू ले चुके हैं, उनके हुनर को टीवी चैनल, अख़बार-पत्रिकाओं के माध्यम से दर्शकों-पाठकों तक पहुंचा चुके हैं। यही वजह है कि उनके गांव के लोग भी अब अपने इस लाडले को दूसरी नज़र से देखने लगे हैं। गांव के मुखिया भी उनकी तारीफों के पुल बांधते हैं। इससे परमेश्वर के घर वाले भी काफी खुश हैं।
हालांकि स्वयं परमेश्वर जो एक निर्धन किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं, कहते हैं कि ‘इससे मेरी चुनौतियां बढ़ी हैं। अब मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं अपने छात्रों को और मन लगा कर पढ़ाऊं ताकि वे ढंग से पढ़-लिखकर, विषय को समझ कर जीवन के सफर पर मजबूती से आगे बढ़ सकें। वैसे भी मेरी हमेशा से इच्छा रही है कि देश के सुदूर इलाकों के बच्चों को भी अंग्रेजी सीखने का मौका मिले ताकि वे आगे बढ़ सकें। मैं गांव के बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनते देखना चाहता हूं।’
…और छा गये परमेश्वर

बच्चों से बेपनाह प्यार करने वाले शिक्षक परमेश्वर यादव का एक वीडियो, जिसमें वे बच्चों को गीत के माध्यम से अंग्रेजी पढ़ाते देखे गये, ने उन्हें प्रसिद्धी के उस मुकाम पर पहुंचा दिया जहां पहुंचना कतई आसान नहीं होता। दरअसल, परमेश्वर यादव इस वक्त डीएलएड का प्रशिक्षण ले रहे हैं। साथ ही गांव के ही एक प्राइवेट स्कूल में बच्चों को पढ़ाते हैं। वे अब तक खुद के द्वारा तैयार किये गये गीत को लोकधुन में गाकर बच्चों को पढ़ाते रहे हैं। डीएलएड प्रशिक्षण के लिए उनका सेंटर स्थानीय गिरिडीह का प्लस टू उच्च विद्यालय है।
कुछ दिनों पूर्व प्रशिक्षण के दौरान जब उन्हें वहां मौजूद प्रशिक्षु शिक्षकों व प्रशिक्षकों के सामने बच्चों को पढ़ाने का मौका मिला, तो वह गीत गाकर बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने लगे। मधुर स्वर में गाये इस गीत व बीच-बीच में अंग्रेजी के अलफाबेट का विस्तार ब्लैकबोर्ड पर लिखने की उनकी कला से सभी शिक्षक प्रभावित हुए। एक शिक्षक ने तब इसे अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया और सोशल मीडिया पर अपलोड कर डाला। इसके बाद परमेश्वर यादव एक झटके में देश-दुनिया में छा गये। उनके वीडियों को लाखों-करोड़ों ने न सिर्फ़ देखा, बल्कि उनके पढ़ाने के अंदाज़ को काफी पसंद भी किया।
बहरहाल, इस नायक की कहानी में किस्मत की तो कहीं न कहीं भूमिका रही ही कि वह आज लाखों-करोड़ों के चहेते हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने में उसने भी कम मेहनत और संघर्ष नहीं किया है। किसान पिता फागू महतो और मां तिलकी देवी के घर जन्मे इस लाल ने गरीबी झेलते हुए भी गिरिडीह कॉलेज से विज्ञान मे इंटर की पढ़ाई की, यहीं से अंग्रेजी में स्नातक की शिक्षा ग्रहण की और आज डीएलएड का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन यह यात्रा भी कम चुनौतियों भरी नहीं थी। खासकर, एक ऐसे परिवार में जन्म लेने के बाद, जहां उनके माता-पिता के पास संसाधन न के बराबर थे। ऊपर से गिरिडीह के डुमरी प्रखंड के गुलीडाडी गांव का रहवासी होना भी एक चुनौती ही रही। कारण, यह इलाका उग्रवाद प्रभावित रहा है और आये दिन इसे लेकर ही चर्चा में रहता आया है।
जब इस संवाददाता ने उनसे सवाल किया कि जब आपने पढ़ाई के दौरान भविष्य में शिक्षक बनने का इरादा किया तो फिर डीएलएड के बजाय बीएड जैसा कोर्स करने की ज़रूरत क्यों नहीं समझी, तो उनका कहना था कि ‘अर्थाभाव ने मुझे इससे रोका। बहुत मुश्कल से ही डीएलएड भी करने की दिशा में कदम बढ़े। मेरा मानना है कि सुदूर इलाकों में संसाधनों का अभाव और अर्थाभाव कई बार अच्छे विद्यार्थियों को भी आगे बढ़ने से रोक देता है। प्रतिभाएं असमय काल-कवलित हो जाती हैं। मुझे भी पढ़ने के साथ बच्चों को पढ़ाने का काम भी करना पड़ता है, ट्यूशन लेने पड़ते हैं जबकि बड़े शहरों में या साधनयुक्त लोग पहले पढ़ाई पूरी करते हैं, फिर करिअर में उतरते हैं।’
वाकई परमेश्वर का कथन एक जायज और ज़रूरी सवाल को भी समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है। वैसे यह हर्ष का विषय है कि लोकप्रिय होने के बाद उन तक मदद के हाथ भी पहुंच रहे हैं। शायद इससे उनके सपने, उनकी योजना को एक नयी दिशा मिले।

बहरहाल, जब परमेश्वर ने अपने इलाके के ही आरपी प्रोग्रेसिव पब्लिक स्कूल में बच्चों को पढ़ाने की शुरुआत की, तो उनके मन में ढेरों सवाल थे और कई सपने भी। एक सपना अपने जीवन को दिशा देने का, तो दूसरी तरफ अपने छात्रों को भी इस लायक बनाने का कि वे जीवन की दौड़ में मजबूती से न सिर्फ़ खड़े हो सकें अपितु तेज़ रफ्तार से भाग सकें।
गौरतलब है कि परमेश्वर की शादी 2007 में गिरिडीह के करमाटांड़ निवासी सबिता देवी के साथ हो चुकी है और इन दोनों के तीन बच्चे भी हैं। एक पिता और पति के रूप में तो इनकी ज़िम्मेवारियां हैं ही, एक शिक्षक के नाते भी दायित्वबोझ उन पर कम नहीं।
बहरहाल, परमेश्वर को इसका इल्म था कि पढ़ाई के दौरान बच्चों को क्या दिक्कतें आती हैं। क्यों अंग्रेजी और गणित जैसे विषय आसानी से उनकी पकड़ में नहीं आते? जबकि यह उनकी ज़िंदगी को आकार देने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। अर्थाभाव और संसाधन की अल्पता के बावजूद कैसे उन्हें बेहतर ढंग से ज्ञान प्रदान किया जा सकता है। लिहाजा, उन्होंने अपनी तरकीब लगाई। बच्चों के साथ घुल-मिलकर उनकी ही भाषा में उनकी रुचि का ख्याल रखते हुए उन्हें अंग्रेजी के अल्फाबेट और गणित की गुत्थियां समझाने के लिए परमेश्वर ने संगीत को जरिया बनाया। आगाज़ के पीछे अच्छी नियत थी और ईमानदार मेहनत। परिणामस्वरूप नतीजे भी अच्छे दिखे।
परमेश्वर कहते हैं, ‘मैंने पाया कि बच्चे न सिर्फ़ पढ़ाई में रुचि ले रहे हैं बल्कि आसानी से पाठ समझ भी पा रहे हैं। उन्हें पढ़ाई बोझ नहीं लगती, वे खुश होते हैं।’
यहां बताते चलें कि परमेश्वर की पढ़ाई के इस अंदाज़ से बच्चों के अभिभावक भी काफी खुश रहते हैं। परमेश्वर अपने बच्चों को न सिर्फ़ अंग्रेजी बल्कि गणित समझाने के लिए भी नयी-नयी तकनीक अपनाते हैं। उनका सारा जोर इस बात पर रहता है कि बच्चों को पढ़ाने के लिए क्या नया तरीका इस्तेमाल किया जाए ताकि वे विषयों को अच्छी तरह समझ सकें। इसमें उन्हें शिक्षक सह डीएलएड ट्रेनिंग सेंटर के कॉर्डिनेटर सुशील कुमार, विजेंदर सर, सम्पूर्णानंद तिवारी, निर्मला मैम, शीतल मैम जैसों से काफी सहयोग और प्रोत्साहन मिलता है। वे समय-समय पर परमेश्वर का इस दिशा में मार्गदर्शन भी करते हैं। स्कूल में परमेश्वर के लोकधुन पर पढ़ाने की कला किसी को भी अपनी ओर खींच लेती है। बच्चे जब परमेश्वर के लोकधुनों पर स्वर से स्वर मिलाकर पढ़ाई करते हैं, तो इससे गुरुकुल की याद भी ताज़ा हो उठती है।
बहरहाल, म्यूज़िकल गुरु का तमगा हासिल करने के बाद परमेश्वर यादव आत्मविश्वास से भरे हुए हैं। वे पठन-पाठन की दिशा में आगे भी कुछ नया करते रहना चाहते हैं। उनका मानना है कि बच्चों को पढ़ाने के लिए सख्ती नहीं दिखानी चाहिए। बच्चों के साथ प्रेम से, उनके साथ घुल-मिलकर पढ़ाना चाहिए ताकि वे ढंग से शिक्षा ग्रहण कर सकें। देखना शेष है कि गिरिडीह के इस लाल की यह टीचिंग स्टाइल और उनके सपने कहां तक परवाज़ भरते हैं।


