गिरीश कर्नाड बीते चार दशकों से नाटक, लेखन और रंगमंच की दुनिया के एक बड़े नाम थे। उनके निधन के साथ ही साहित्य और सिनेमा के एक युग का अंत भी हो गया।
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दिग्गज साहित्यकार और बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता, लेखक और रंगकर्मी गिरीश कर्नाड ने सोमवार को 81 साल की उम्र में बेंगलूरु में निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उन्होंने बेंगलुरु में आखिरी सांस ली।
गिरीश कर्नाड एकमात्र ऐसे साहित्यकार हैं, जो सिनेमा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में शीर्ष पर रहे और हर तरह की भूमिकाओं में काम किया। गिरीश जीवन के आखिरी वर्षों तक समाज और राजनीति को लेकर एक एक्टिविस्ट के तौर पर भी अपनी बेबाक राय रखते रहे।
गिरीश कर्नाड बीते चार दशकों से नाटक, लेखन और रंगमंच की दुनिया के एक बड़े नाम थे। वे समकालीन मुद्दों पर लिखते हुए इतिहास और पौराणिक कथाओं का इस्तेमाल करने के लिए जाने जाते थे. उनके कई नाटकों का अंग्रेजी और कई भारतीय भाषाओं में मंचन हुआ। लगभग पांच दशक से ज्यादा समय तक गिरीश कर्नाड नाटकों के लिए सक्रिय रहे।
गिरीश कर्नाड के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुख जताया और ट्वीट कर श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘गिरीश कर्नाड अलग अलग तरह के रोल के लिए हमेशा याद किए जाते रहेंगे। उनके कार्य आने वाले समय में भी उतने ही लोकप्रिय रहेंगे।’
गिरीश कर्नाड ने भारतीय सिनेमा की दुनिया में एक अभिनेता, निर्देशक और पटकथा लेखक के रूप में काम किया है। कहते हैं कर्नाटक के एक छोटे-से गांव सिरसी में वाले गिरीश को बचपन में ही लोकनाट्य का चस्का लग गया था। उस दौर में नाटक कंपनियां घूम-घूमकर नाटक किया करती थीं। उनके मेरे पूरे परिवार को नाटक दिखाने ले जाया करते थे। वे नाटक कंपनियां पारसी थियेटर की अनुकृतियां होती थीं। पेट्रोमैक्स की रोशनियों में खेले जाने वाले उन नाटकों की स्मृतियों को कर्नाड साहब कभी भुला नहीं पाए।
फसल
कट जाने के बाद उनका मुख्य शौक अपने नौकर के साथ यक्षगान देखने का होता था क्योंकि यक्षगान ज्यादा पारंपरिक माने जाते थे।
खुली जगह पर मंच बनाया जाता था, जो
काले पर्दे से ढका रहता था और वहां मशालों से रोशनी होती थी। किशोरावस्था तक
पहुंचते-पहुंचते नाटक कंपनियों का आना बंद हो गया था लेकिन पारंपरिक यक्षगान का
आकर्षण हमेशा उन्हें खींचता रहा।
कर्नाड को भारत सरकार ने पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है।
वह चार फिल्मफेयर अवार्ड भी जीत चुके हैं, जिनमें से उन्हें तीन
अवार्ड सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ निर्देशक के रूप में और चौथा फिल्मफेयर अवार्ड पटकथा
लेखन के लिए दिया गया था।

आपको बता दें कि गिरीश कर्नाड ने अपना पहला नाटक कन्नड़ में लिखा था जिसका बाद में अंग्रेजी में अनुवाद हुआ। उनके चर्चित नाटकों में ‘यताति’, ‘तुगलक’, ‘हयवदना’, ‘अंजु मल्लिगे’, ‘अग्निमतु माले’, ‘नागमंडल’ और ‘अग्नि और बरखा’ शामिल हैं। 1960 के दशक में कर्नाड के यायाति 1961, ऐतिहासिक तुगलक 1964 जैसे नाटकों को समालोचकों ने सराहा था, जबकि उनकी तीन महत्वपूर्ण कृतियां हयवदना 1971, नगा मंडला 1988 और तलेडेंगा 1990 ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। 2 पद्म सम्मानों के अलावा 1972 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी, 1994 में साहित्य अकादमी, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था। कन्नड़ फिल्म ‘संस्कार’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।
गिरीश कर्नाड फ़िल्म जगत में अभिनय के एक स्तम्भ थे, साथ ही एक बेहतरीन फ़िल्म निर्देशक भी। कर्नाड ने कई हिन्दी फ़िल्मों में भी काम किया है। इन फ़िल्मों में ‘निशांत’, ‘मंथन’ और ‘पुकार’ जैसी फिल्में उनकी कुछ प्रमुख फ़िल्में हैं। गिरीश कर्नाड ने छोटे परदे के लिए भी कई मशहूर कार्यक्रम और ‘सुराजनामा’ आदि सीरियल बनाये थे।
आपको बता दें कि कर्नाड अपने लेखन शैली को लेकर काफी चर्चित रहते थे। उन्हें इस बात के लिए भी जाना जाता है कि कर्नाड ने ऐतिहासिक पात्रों को आज के संदर्भ में देखा और उससे समाज को रूबरू कराया। उन्होंने कई ऐसे नाटक लिखे हैं जो इस बात के सबूत बनें है, इसमें उनके तुगलक, ययाति व अन्य नाटक शामिल हैं। कर्नाड ने ऐसे कई नाटक और कहानियां लिखी हैं लेकिन उनकी सबसे मशहूर कहानियां मेरी जंग, अपने पराये, भूमिका, डोर स्वामी, एक था टाइगर और टाइगर जिंदा है जैसी फिल्मों में देखने को मिली हैं।
फ़िल्म ‘संस्कार’ से शुरू किया था अपना सिनेमा कैरियर
गिरीश कर्नाड केवल एक सफल पटकथा लेखक ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन फ़िल्म निर्देशक भी भी थे। उन्होंने वर्ष 1970 में कन्नड़ फ़िल्म ‘संस्कार’ से अपने सिने कैरियर को प्रारम्भ किया था। इस फ़िल्म की पटकथा उन्होंने स्वयं ही लिखी थी। इस फ़िल्म को कई पुरस्कार प्राप्त हुए थे। इसके पश्चात कर्नाड ने और भी कई फ़िल्में कीं थीं। उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों में भी काम किया था।
इन फ़िल्मों में ‘निशांत’, ‘मंथन’ और ‘पुकार’ आदि उनकी कुछ प्रमुख फ़िल्में हैं। गिरीश कर्नाड ने छोटे परदे पर भी अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम और ‘सुराजनामा’ आदि सीरियल बनाये थे। उनके कुछ नाटक, जिनमें ‘तुग़लक’ आदि आते हैं, सामान्य नाटकों से कई मामलों में पूरी तरह से भिन्न हैं। गिरीश कर्नाड ने ‘संगीत नाटक अकादमी’ का अध्यक्ष पद भी संभाला था।
कई पुरस्कार से सम्मानित
1972 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
1974 – पद्मश्री
1992 – पद्मभूषण
1992 – कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार
1994 – साहित्य अकादमी पुरस्कार
1998 – ज्ञानपीठ पुरस्कार
1998 – कालिदास सम्मान


