सरकार की बचत वाले बिंदु पर तो रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का यह शगूफा अच्छा साबित हो सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत में यह समस्या को बढ़ाने वाला प्रतीत होता है, जिस पर गहन चिंतन की आवश्यकता है।
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देश में बढ़ती बेरोजगारी और गरीब वर्ग पर लगातार पड़ती महंगाई की मार तो बहस का मुद्दा था ही, लेकिन मोदी सरकार ने संसद में जो आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट पेश की उसने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। दरअसल इस रिपोर्ट में सरकार को दिशानिर्देश स्वरुप बतलाया गया कि रिटायरमेंट की उम्र बढ़ा दी जाए।
इस रिपोर्ट की सलाह को मानना या नहीं मानना सरकार का काम है, लेकिन जो बहस शुरु हुई है उसमें तो सभी शामिल हो गए हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि इस आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट ने रिटायमेंट की उम्र वाली बात कहकर सभी का ध्यान ना चाहते हुए भी अपनी ओर खींच लिया है। इसके साथ ही अब सभी अपनी बुद्धी और विवेक के मुताबिक यह बतलाने का प्रयास करते देखे जा रहे हैं कि यदि केंद्र सरकार ने रिटायरमेंट की उम्र 60 से बढ़ाकर 70 कर दी तो इसका असर किस पर कितना और क्यों होगा।
इससे पहले कि बहस और बयानों पर ध्यान जाए आपको बतलाते चलें कि देश की पहली पूर्णकालिक महिला वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश कर इतिहास रचने जैसा काम कर दिखाया है।
इससे एक दिन पहले मुख्य सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम द्वारा तैयार किए गए आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट को वित्तमंत्री सीतारमण ने संसद में पेश करने का अहम काम किया। इस आर्थिक सर्वेक्षण को देश की आर्थिक स्थिति और दिशा बतलाने वाला बतलाया गया है, जिसमें देश के सामने संभावित आर्थिक चुनौतियों के साथ ही देश की अर्थव्यवस्था के मजबूत रहने का अनुमान भी है। अब चूंकि आर्थिक सर्वे महज सिफारिश मानी जाती है जिसे लागू करने की कोई कानूनी बाध्यता भी नहीं होती है, अत: सरकार भी इसे निर्देशों के तौर पर ही लेती आई है, लेकिन जहां उसे लगता है कि इससे कुछ बेहतर बात बन सकती है उसे संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया में लाने का प्रयास भी करती है। इसलिए जिसे अधिकांश लोग शगुफा करार दे रहे हैं वही रिटायरमेंट उम्र की सीमा तय करने वाला यह मामला गरमाया हुआ है।

इस आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि भारतीय नागरिक के 60 साल तक स्वस्थ रहने की आस होती है, जबकि उसे कोई गंभीर बीमारी या खतरनाक चोट न लगी हो। जबकि बीते कुछ सालों में देखने में यह आया है कि यह उम्र पुरुष और महिला दोनों के संदर्भ में बढ़ गई है।
सर्वे के मुताबिक बीते कुछ सालों में महिलाओं की उम्र जहां 13.3 साल और पुरुषों की 12.5 वर्ष तक बढ़ गई है। अर्थात् अब पुरुष और महिला 60 साल तक नहीं बल्कि करीब 72 साल तक स्वस्थ रहते हैं। इसे देखते हुए रिटायरमेंट की उम्र 70 साल किए जाने की बात कही गई है। दावा किया जा रहा है कि इसका सीधा लाभ सरकार को आर्थिक तौर पर होगा।
दरअसल आर्थिक आधार पर यदि देखा जाए तो 60 साल के रिटायरमेंट के बाद सरकार को एक ही पोस्ट पर दो-दो खर्चे उठाने पड़ते हैं। एक तो वह शख्स जो रिटायर्ड हुआ है उसे पेंशन देनी होती है, जबकि उसकी जगह किसी अन्य को पूर्णवेतन पर रखना होता है। इस प्रकार एक ही पोस्ट के लिए सरकार दो-दो लोगों पर खर्च करती है।
अब यदि सरकार रिटायरमेंट की उम्र बढ़ा देती है तो उसे किसी और को इस पोस्ट के लिए नियुक्त नहीं करना होगा और न ही पेंशन के तौर पर अतिरिक्त व्यय ही करना होगा। इससे होगा यह कि सरकार बड़े खर्च से अपने आपको दस साल तक बचा सकती है, जबकि एक अनुभवी व्यक्ति जिस कार्य को कम समय में कर सकता है वह नया व्यक्ति नहीं कर सकता है। इस धारणा के आधार पर दस साल बाद किसी व्यक्ति को उस पोस्ट के लिए तैयार करना होगा। इस प्रकार काम भी समय पर होता रहेगा और अन्य खर्चों से भी बचा जा सकेगा।
इस धारणा के विरोध में जो बातें सामने आती हैं वो यह कि इससे युवाओं में बेरोजगारी की दर बढ़ जाएगी, क्योंकि देश में वैसे ही सरकारी नौकरियों का टोटा है और उस पर यदि इस तरह से दस साल के लिए इन पोस्टों को भरे रहने दिया गया तो युवा कहां जाएंगे और क्या करेंगे? यह एक गंभीर विचारणीय सवाल है। यही नहीं बल्कि जरुरी नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति 60 साल की उम्र के बाद बेहतर काम करने की स्थिति में हो। काम के ज्यादा दबाव के कारण उसके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव भी पड़ सकता है, ऐसे में जहां कार्य प्रभावित होगा वहीं विकास अवरुद्ध होने की आशंका भी बनी रहेगी। इसलिए सरकार को आर्थिक लाभ पाने के लिए रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने के प्रति उदाररुख अख्तियार करने की आवश्यकता नहीं है।
वैसे यह सच है कि वृद्धजनों की बढ़ती संख्या और पेंशन के बढ़ते दबाव को देखते हुए अनेक समृद्ध देशों ने रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का काम किया है, लेकिन भारतीय परिदृश्य में यह स्थिति बिल्कुल अलग है।
यहां बेरोजगार युवाओं की बढ़ती संख्या सबसे बड़ी समस्या है, जिस पर पहले ध्यान केंद्रित करना होगा और कोशिश करनी होगी कि प्रत्येक हाथ को काम वाली योजना लागू हो, जिससे देश भी तेजी से विकास करे। इसके बाद देखना होगा कि रिटायरमेंट की आयु को किन क्षेत्रों में, किस तरह से, चरणबद्ध योजना के तहत लागू किया जा सकता है, क्योंकि इसके बगैर तो संपूर्ण देश में अफरा-तफरी का माहौल बन जाएगा।
दरअसल रिटायरमेंट की आयु बढ़ने के साथ ही गरीब बेरोजगार युवा जहां नौकरियों की मांग करते हुए सड़कों पर उतरेगा वहीं पेंशन चाहने वाले भी अपनी मांगों पर अड़ते नजर आ जाएंगे।


