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इन दिनों भीषण गर्मी समस्त भारत में कहर बरपा रही है। मैदानी इलाकों के साथ-साथ पहाड़ों में भी तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि के रिकॉर्ड टूट रहे हैं। लू और गर्मी की प्रचण्डता का आलम यह है कि जहां हिमाचल, उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्यों में मौसम विभाग द्वारा यैलोअलर्ट जारी किया गया है, वहीं हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों में तो रेडअलर्ट जारी किया गया है।
राजस्थान के श्रीगंगानगर में तापमान 50 डिग्री के करीब जा पहुंचा और वहां भीषण गर्मी का 75 साल का रिकॉर्ड टूट गया, वहीं चुरू में तापमान 50 डिग्री को भी पार कर गया। लू के थपेड़ों और गर्मी की प्रचण्डता के चलते विभिन्न राज्यों में कई दर्जन लोगों की मौत हो चुकी हैं।
एक ओर जहां देशभर में चारों तरफ गर्मी अपना कहर बरपा रही है, वहीं कुछ ही दिनों पहले के मौसम के मिजाज की बात करें तो रोहतांग, लाहौलस्पीति, शिमला, मनाली जैसे ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में भारी बारिश तथा बर्फबारी के चलते उत्पन्न हुई शीतलहर के साथ-साथ दिल्ली सहित आसपास के इलाकों में हुई ओलावृष्टि ने हर किसी को हतप्रभ कर दिया था। निसंदेह यह सब प्रकृति के बिगड़ते मिजाज और बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के ही भयावह दुष्परिणाम हैं, जिसका खामियाजा हमें बार-बार जान-माल के भारी नुकसान के रूप में चुकाना पड़ रहा है।
देश के कई बड़े शहर इस समय पर्यावरण प्रदूषण के चलते कितनी बुरी तरह हांफ रहे है, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। पिछले कुछ समय में पर्यावरण संबंधी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अनेक रिपोर्टों में स्पष्ट हो चुका है कि भारत के कई बड़े शहरों में प्रदूषण विकराल रूप धारण कर चुका है और देश की राजधानी दिल्ली तो दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार है।

वायु प्रदूषण की दिनों-दिन विकराल होती यही स्थिति हालात को दिन-ब-दिन बद से बदतर बनाने के लिए जिम्मेदार है। समय-समय पर दिल्ली तथा आसपास के इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) का स्तर सारी सीमाएं लांघता नजर आता है। पीएम-10 तथा पीएम-2.5 का स्तर भी कई गुना बढ़ जाता है। कड़ाके की ठंड हो या भीषण गर्मी, प्रदूषण का स्तर अब हर समय खतरनाक स्तर पर ही देखा जाता है।
तय मानकों के अनुसार पीएम-10 तथा पीएम-2.5 की मात्रा वातावरण में क्रमशः 100 व 60माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए लेकिन इनका स्तर वातावरण में सदैव कई गुना ज्यादा बना रहता है, जिन्हें नियंत्रित करने के अभी तक के तमाम प्रयास नाकाफी ही साबित हुए हैं। वायु में पीएम-2.5 और पीएम-10 का स्तर बढ़ जाने से यह प्रदूषित वायु फेफड़ों के अलावा त्वचा तथा आंखों को भी बहुत नुकसान पहुंचाती है।
प्रदूषित हवा के चलते दिल्ली की हालत तो अक्सर गैस चैंबर सरीखी होती रही है, जहां एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। हर साल दिल्ली में करीब पांच हजार लोग वायु प्रदूषण के कारण दम तोड़ देते हैं।
मेडिकल जर्नल ‘द लांसेट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक तो भारत में वायु प्रदूषण के चलते प्रतिवर्ष दस लाख से ज्यादा लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं।
कार्बन उत्सर्जन के मामले में दिल्ली दुनिया के 30 शीर्ष शहरों में शामिल है। पहाड़नुमा कूड़े के ढ़ेरों से निकलती जहरीली गैसें, औद्योगिक इकाईयों से निकलते जहरीले धुएं के अलावा सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या कार्बन उत्सर्जन का बड़ा कारण है और कहा जाता रहा है कि अगर दिल्ली जैसे अत्यधिक प्रदूषित शहर में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाना है तो लोगों को निजी वाहनों का प्रयोग कम कर सार्वजनिक परिवहन को अपनाना चाहिए और साथ ही दिल्ली में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण को बढ़ावा देकर हरियाली बढ़ानी होगी लेकिन इन दिनों दिल्ली में हो क्या रहा है?
कैग की एक रिपोर्ट पर नजर डालें तो दिल्ली पहले से ही करीब नौ लाख पेड़ों की कमी से जूझ रही है और दूसरी तरफ शहरीकरण की कीमत पर सरकारी आदेशों पर साल दर साल हजारों हरे-भरे विशालकाय वृक्षों का सफाया किया जा रहा है। पिछले 5-6 वर्षों के दौरान दिल्ली में नए आवासीय परिसर, भूमिगत पार्किंग, व्यापारिक केन्द्र खोलने और मार्गों को चौड़ा करने के लिए करीब बावन हजार छायादार वृक्षों का अस्तित्व मिटाया जा चुका है और इन्हीं पांच वर्षों के प्रदूषण के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि इस दौरान हरियाली घटने से दिल्ली में वायु प्रदूषण करीब चार सौ फीसदी बढ़ा है।

कैग की रिपोर्ट के अनुसार 2015-17 के बीच दिल्ली में 13018 वृक्ष काटे गए थे और उसके बदले 65090 पौधे लगाए जाने थे किन्तु लगाए गए मात्र 21048 पौधे और इनमें भी बहुत सारे सजावटी पौधे लगाकर खानापूर्ति कर दी गई। पेड़ों को काटने के बदले जो पौधे लगाए जाते हैं, उनमें से महज दस फीसदी ही बचे रह पाते हैं और ये छोटे-छोटे पौधे प्रदूषण से निपटने तथा वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने में मददगार साबित नहीं होते।
मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है, जलवायु संकट गहरा रहा है और इन पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने का एक ही उपाय है वृक्षों की अधिकता। वायु प्रदूषण हो या जल प्रदूषण अथवा भू-क्षरण, इन समस्याओं से केवल ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाकर ही निपटा जा सकता है।
ऊंचे और पुराने वृक्ष काटे जाने से दिल्ली में पक्षियों की 15 प्रजातियों का जीवन भी खतरे में है। दरअसल दिल्ली में पक्षियों की 15 प्रजातियां ऐसी हैं, जो ऊंचे दरख्तों पर घोंसला बनाती हैं और अपने खान-पान तथा रहन-सहन की आदतों के चलते ऊंचे पेड़ों पर ही रहना पसंद करती हैं, इनमें कुछ प्रजातियां दुर्लभ पक्षियों की भी हैं। ऐसे ऊंचे वृक्ष काटे जाने से इन पक्षियों का घर भी उजड़ता है।
पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि ऊंचे दरख्तों की कमी की वजह से पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पक्षियों की कई प्रजातियां दिल्ली का रूख करने से कतराने लगी हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी हाल ही में अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि दिल्ली कभी पक्षियों की आबादी को लेकर मशहूर हुआ करती थी किन्तु आज स्थिति विपरीत है, पेड़-पौधों व पक्षियों के लिए यहां जगह कम होती जा रही है।
हालांकि सुखद स्थिति यह है कि आमजन में पर्यावरण संरक्षण और वृक्षों के महत्व को लेकर जागरूकता आने लगी है, जो पिछले दिनों उत्तराखण्ड के करीब पांच दशक पुराने चिपको आन्दोलन की तर्ज पर दिल्ली में भी देखने को मिली थी, जब पेड़ों से चिपककर लोगों ने इन्हें जीवनदान देने के लिए आन्दोलन शुरू किया और सरकार को हजारों पेड़ काटने का अपना आदेश वापस लेना पड़ा। इन तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि दिल्ली में यहां की आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से नौ लाख पेड़ों की कमी है और यहां स्वस्थ जीवन के लिए प्राणवायु अब बहुत कम बची है। स्वच्छ प्राणवायु के अभाव में लोग तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं, उनकी प्रजनन क्षमता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है, उनकी कार्यक्षमता भी इससे प्रभावित हो रही है। कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का संक्रमण, न्यूमोनिया, लकवा इत्यादि के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा इन बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है।


