सुभाषित कथनावली में अधिकांश रचनाएं दोहे चौपाई छंद की पुरानी शैली में की गई है और कुछ रचनाएं राधेश्याम रामायण तर्ज पर कुंडलियां, सवैया आदि में की गई है
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_ID is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 378
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_count is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 379
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_description is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 380
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_name is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 381
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_nicename is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 382
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_parent is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 383
पूर्व मुख्य आयकर आयुक्त श्री राम आचार्य द्वारा लिखित सुभाषित कथनावाली एक ऐसी कृति है जिसका अध्ययन करके हमें ऐसा लगता है कि रचनावली हमारे जीवन वृत्त के साथ- साथ है, वह हमें पुकारती है, हमारे सुख-दुख, हमारे हर्ष विषाद, हमारी सामूहिकता और नितांत अकेलेपन, हमारे जागरण और निद्रा में हमारे चेतन और अचेतन में उसकी प्रतिछाया मौजूद रहकर संग संग विचरण करती है। उसके भीतर ठहरा हुआ एक स्फटिक समय और काल है, पुस्तक खुलते ही जमा हुआ चलकर हमारे समय के साथ बहने लगता है उसमें गुथा हुआ क्षण हमारे साथ धीरे धीरे चलने लगता है, वह रुकता नहीं हमारी जीवन यात्रा में संग संग चलता प्रतीत होता है।

रायपुर छत्तीसगढ़ 9009 415 415,
किताब -सुभाषित कथनावली,
लेखक कवि राम आचार्य,
रिटायर्ड मुख्य आयकर आयुक्त,
रायपुर छत्तीसगढ़,
प्रकाशक – निखिल पब्लिशर एवं डिस्ट्रीब्यूटर ,आगरा यूपी।
“लिओ टॉलस्टॉय कहते हैं कि हम जिस रचना को पढ़ते हैं और उसे पसंद करते हैं तो उसे पसंद उसके मूल स्वरूप में किया जाना चाहिए उस स्वरूप में नहीं कि हम जैसा पढ़ना चाहते है वैसा पढ़ें” इस कालजई कृति के बारे में मैं यह धारणा बना सकता हूं कि यह रचना समय के कोहासे को चीरती हुई हमारे मानव मस्तिष्क में समा जाती है। इन रचनाओं के संचित सरोकार हर बार हमारे साथ जुड़कर एक नया विस्तार पाती जाती हैं।
हमें किताब से संघर्ष करना पड़ता है उस से पीछा छुड़ाने के लिए, पर किताब हमारे जेहन में कितने गहरे बैठ जाती है कि वह किन्हीं भी संदर्भों में हमसे अलग नहीं हो पाती है और इस रचना वाली की यही सबसे बड़ी विशेषता है एक बार पढ़ लेने के बाद उसका आस्वाद मन मस्तिष्क से बाहर नहीं निकल पाता। कोविड-19 के भयावह काल के समय लेखक द्वारा समय का सर्वाधिक सदुउपयोग करते हुए सुभाषित कथनावली की रचना की गई थी, यह कृति इनकी पूर्व में लिखित दो कृतियों “नयन द्वी शतक” और “लाडली लल्ला” जो विशुद्ध रूप से रीतिकालीन प्रेम रस की रचनाएं थी उनसे हटकर नैतिकता और आध्यात्मिकता जैसे गूढ विषय पर लिखी गई है। भौतिकवादी दृष्टिकोण से परे इसका विषय वस्तु नैतिकता तथा आध्यात्मवाद है।इस कृति में1 ख्याति प्राप्त लोगों के मुहावरों कथनों, उपदेशों का समावेश किया गया है।
कुछ दृष्टांत पौराणिक कथाओं, रामायण, महाभारत, गीता तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों जैसे वेद, पुराण, उपनिषद आदि से उद्धृत वाक्यों श्लोकों और छंदों का भरपूर मात्रा में प्रयोग किया गया है। लेखक ने चाणक्य नीति की अवधारणा को जिसमें यह उद्धृत किया गया है
कि:

e-mail: infocom.krc@gmail.com
Know More | Apply Here
शास्त्र अनंत हैं विद्या अनेकों प्रकार की है किंतु जीवन बहुत थोड़ा है, बाधाएं अनेक हैं ,इसीलिए जो साबुत है उसे ग्रहण कर लेना चाहिए जैसे हंस दूध और पानी से दूध पी लेता है बाकी शेष छोड़ देता है” उसी तरह श्री राम आचार्य जी ने वेदों, उपनिषदों रामायण, महाभारत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों से चुनिंदा उदाहरणों ,दृष्टांतों के श्रेष्ठ संदर्भों को संकलित कर नवीन तरीके से इस कृति में पिरोया है, इस रचना में सभी छंद नैतिकता से बंधे हुए और आध्यात्मिकता से अच्छादित भी हैं,जिसमें स्पष्ट रूप से जीवन की पद्धति उचित साधनों का मनोरंजक वर्णन एवं मार्गदर्शन भी है।
सुभाषित कथनावली में अधिकांश रचनाएं दोहे चौपाई छंद की पुरानी शैली में की गई है और कुछ रचनाएं राधेश्याम रामायण तर्ज पर कुंडलियां, सवैया आदि में की गई है। यह केवल इस उद्देश्य से की गई है कि कठिन विषय को सरल तरीके और मनोरंजन, बोधगम्य तरीके से पाठकों के समक्ष रखा जा सके। यह तो स्पष्ट है की रचनाएं दूसरों के कथन पर आधारित जिसमें विषय अध्यात्म दर्शन पहले से विद्यमान है और इन्हीं विषयों और भावों और विचारों को लेखक ने अपनी शैली में विभिन्न छंदों और भावों विचारों में डालकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। किसी भी काव्य प्रयोजन को मनोरंजन के साथ-साथ उद्देश्य एक उपदेश भी होना चाहिए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का मर्म होना चाहिए।
मैथिलीशरण गुप्त जी की इस बात के अनुसरण में इस रचना यात्रा में नैतिकता एवं आध्यात्मिकता जैसे कठिन और कठोर विषय पर रची गई रचनाओं को साधन मनुष्यों के लिए बोधगम्य बनाकर तो बंधों के साथ रचा गया है,जिससे पाठक वृंद मनोरंजन के रसास्वादन के साथ आनंदित भी होते हैं। पाठकों की सुविधा की दृष्टि से इसे बोधगम्य सरल सुलभ बनाने हेतु महान पुरुषों, संतों, महात्माओं के प्राचीन किस्से कहानियां भी उदाहरण स्वरूप उद्धृत किए गए हैं जिसमें बोधगम्यता बनी रहे। यह एक ऐसी कृति है जो अपने को कालजई स्तर पर खड़ा होने की कोशिश करती है यह एक सार्वभौमिक की धारणा को लेकर आगे चलती है इसके उदाहरण जरूर सनातनी और द्वापर तथा त्रेता युग के पात्रों के संदर्भ में है पर रचनाओं को नए युग के साथ अनमोल रिश्ता बनाते देखते हैं।

Follow Us
एवं यह रचनाएं नवीन संदर्भों की प्रतीत होती है ऐसा नहीं है कि रचनाएं तथा संदर्भ पुराने होने से संपूर्ण किताब प्राचीन काल की प्रतीत हो ऐसा कदापि नहीं है इस किताब को पढ़कर हम नए नए संदर्भों को विस्तार भी देते हैं। इस किताब को पढ़कर प्राचीन संदर्भों का स्मरण हो आता है जैसे धर्मवीर भारती का अंधा युग या शिवाजी सावंत का उपन्यास मृत्युंजय का कई अर्थों में पुनर परीक्षण और उसका तमाम सामाजिक सरोकारों के साथ विस्तारीकरण ही होता पाया गया है।
लेखक ने इतनी कठिन तथा विशेष वर्ग के लिए अपनी काव्यात्मक कृति लिख कर आलोचना,समालोचना को खुले तौर पर आमंत्रित भी किया है क्योंकि यह कृति विद्वतजनों को ही रास आएगी, लेखक का मानना है की हिंदी साहित्य में रीतिकाल के पश्चात ही भक्तिकाल आया क्योंकि रीति की अधिकता को मानव समाज पचा नहीं पा रहा था और इसके कारण पतन की ओर अग्रसर हो गया था इसी तरह इन्हें आशा है की वर्तमान में समाज भौतिकवादिता से ऊबकर नैतिकता तथा आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख होगा और इसी संदर्भ में इनकी रचनाओं में इस भाव का आदित्य प्रस्फुटित दिखाई देता है ।
नैतिकता तथा आध्यात्मिकता इन रचनाओं के उद्देश्य हो सकते हैं पर इनकी रचनाएं मनोरंजन का आस्वाद भी लेकर चलती हैं इस किताब में काव्य रचनाओं का शुभारंभ गणेश तथा सरस्वती की वंदना से होकर 112 काव्य पुष्प ,आत्म ज्ञान ही सर्वोच्च ज्ञान हैं नामक रचना से खत्म होता है। इन्होंने चाणक्य नीति मैं माता को सत्य, पिता को ज्ञान ,धर्म को भ्राता, दया को मित्र बताया है। इसी तरह जीवन के चार सुखों में सर्वोत्तम निरोगी काया को ही बताया है एवं अर्धांगिनी को भी सर्वश्रेष्ठ इंगित किया है और चरित्र के कलंक को सबसे बड़ा कलंक दर्शाया है जो सत्य भी है। कलंक या अपमान को गोस्वामी तुलसीदास ने अपने शब्दों में कहा यद्यपि जग रुदन दुख नाना, सबसे कठिन जाति अपमाना।
एक काव्य रचना में लेखक ने कहा है भगवान की मर्जी ही भक्तों की मर्जी उन्होंने ईश्वर की आराधना में लिखा है प्रभु जो तेरी इच्छा जो मेरी इच्छा जो तू चाहे वही करूं कर लो थोड़ी प्रतीक्षा, सामवेद में ईश्वर के प्रति अच्छी व्याख्या की गई है उन्होंने लिखा है “ईश्वर ना तो हमसे बहुत दूर है और ना ही कठिनाइयों से प्राप्त होता है, वह तो आपके हृदय के भीतर ही है और आत्मानंद के रूप में प्रत्यक्ष है” किताब में उल्लेखित 112 काव्य रचनाओं का उल्लेख करना यह संभव नहीं है पर यह तो तय है की विचारधारा लेखनी और शिल्प के संदर्भ में श्री राम आचार्य एक बड़े योद्धा हैं यह कृति उनके भाषा साहित्य की अंतिम परिणति नहीं है यह प्रगतिशील लेखन कला अभी और भी प्रगति को प्राप्त होगी।
इनकी हर रचना एक नए उदित प्रकाश को जन्म देती है और नई दिशा दर्शन की ओर ले जाती है श्री राम आचार्य के साहित्य काल का मूल्यांकन समकालीन कवियों के साथ बड़े सम्मानजनक तरीके से किया जा सकता है। किताब में बोधगम्यता का काव्यात्मक रूप प्रस्तुत किया गया है। संपूर्ण किताब आध्यात्मिक सनातन उद्देश्य को लेकर चली है जोकि समाजिक परिष्करण का बीड़ा उठाकर नए परिवेश में कविताओं को जन्म देती है ऐसे में थोड़ा भटकाव भी आ जाता है आज कविता केवल मनोरंजन के लिए लिखी जा रही है छायावाद में उद्देश्य पर कविताएं लिखी जाती रही थी। प्रिंटिंग कमाल की है और अशुद्धि न्यून है। इसकी कीमत ₹500 आम पाठक की पहुंच से बाहर है। पुस्तक काफी कष्ट साध्य के बाद पाठकों के हाथ में आई है। पाठकों को मेरी यही सलाह होगी कि वे खरीद कर ही पढ़े और उसका संपूर्ण आनंद ले।


