भारत में दशकों से सरकारें बदलती रहीं, लेकिन राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग को पूरा नहीं किया जा सका, क्योंकि गैरहिंदी भाषी राज्यों का विरोध आड़े आ जाता है।
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समय-समय पर हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग पुरजोर तरीके से उठाई जाती रही है। लेकिन इस मांग को पूरा नहीं किया जा सका, क्योंकि गैरहिंदी भाषी राज्यों का विरोध आड़े आ जाता है।
ऐसा कहा जाता है, लेकिन हकीकत तो यही है कि जो हिंदी के कर्ताधर्ता और नाम लेवा हैं वो भी कहीं न कहीं भाषाई ताकत को कमजोर करते नजर आ जाते हैं। इसकी वजह भी वो खुद ही हैं, क्योंकि देखने में यह आता है कि वो अपने ही घर में हिंदी को उचित स्थान नहीं दिला पाते हैं। इस स्थिति में जिन्होंने हिंदी को अपनी
जिंदगी का ओढ़ना और बिछौना बनाने के साथ ही हिंदी को आर्थिक तौर पर घर भरने का माध्यम बना रखा है, वो भी एक खास जगह आकर इसकी मुखालफत करते नजर आ जाते हैं।
ऐसे हिंदी के कथित धुरंधर दूसरों को तो हिंदी पढ़ने और आगे बढ़ाने का लंबा-चौड़ा भाषण दे देते हैं, लेकिन जब खुद अपने बच्चों का सवाल आता है तो उन्हें अंग्रेजी और फ्रेंच जैसी जुबानों का माहिर बनाकर विदेश में पढ़ने के लिए दाखिला दिलवाने वाली लाइन में खड़े नजर आ जाते हैं। ऐसे तमाम हिंदी भाषियों से पूछा जाना चाहिए कि आज देश में जिस दुर्दशा से हिंदी भाषा गुजर रही है, क्या उसकी जिम्मेदारी उनकी अपनी नहीं है। क्या उन चंद अंग्रेजीदां को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना उचित होगा जो हिंदी को कभी दोयम दर्जे से ऊपर आने नहीं देने की मानसिकता के तहत कार्य करते हैं। या फिर हम अपनी ही सोच को जिम्मेदार ठहराएं जो हिंदी की तरक्की के लिए तो कुछ कर नहीं पाते उलटा दूसरी भाषाओं का विरोध कर अनजाने में ही सही लेकिन देश के ही अंदर अन्य राज्यों में भी हिंदी विरोधियों की संख्या में इजाफा कर देते हैं।
यहां यह सब इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि तमिलनाडु में हिंदी को लेकर एक बार फिर हंगामा मचा हुआ है। दरअसल तमिलनाडु में द्रमुक सहित विभिन्न राजनीतिक दलों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे का विरोध कर सड़कों में उतरने की धमकी केंद्र को दे दी है। इस मसौदे में प्रस्तावित तीन भाषा फार्मूले का विरोध हो रहा है। इन विरोध कर रहीं राजनीतिक पार्टियों और उनके नुमाइंदों का कहना है कि यह हिंदी थोपने का प्रयास है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
वहीं दूसरी तरफ तमिलनाडु सरकार का कहना है कि वह दो भाषा फार्मूला जारी रखेगी और किसी विवाद में नहीं उलझेगी।
मतलब केंद्र कुछ भी क्यों न कहे वह तो अपने रास्ते ही चलने वाली है। गौरतलब है कि जानेमाने वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में बनी कमेटी ने जो नीति मसौदा तैयार किया है उसे केंद्र सरकार को सौंपा जा चुका है। इसके साथ ही केंद्र ने भी तीन भाषा फार्मूले को लेकर उपजी आशंकाओं को खारिज करने का काम किया है।
इस संबंध में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने तो यहां तक कह दिया है कि किसी भी राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी। अब विवाद इसलिए उत्पन्न हो रहा है क्योंकि सरकार की वेबसाइट तो यही बतला रही है कि तीन भाषा फार्मूले को पूरे देश में लागू करने की आवश्यकता है। यह सब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे में कहा गया है। सरकार की मंशा की बात करें तो यही कहा जा सकता है कि हिंदी भाषी क्षेत्र के स्कूलों में देश के दूसरे हिस्से की भाषाओं का ज्ञान करवाना चाहती है, ताकि बहुभाषी संवाद क्षमता को प्रोत्साहित किया जा सके, लेकिन हिंदी विरोधियों ने तो इसे हिंदी थोपने के अर्थ में ले रखा है। इसलिए ज्यादातर लोगों को इस फार्मूले से गुरेज है और वो किसी भी हद तक जाएंगे लेकिन हिंदी को अपने राज्यों में पढ़ने-पढ़ाने की कोशिश बर्दाश्त नहीं करेंगे।
सियासी दल द्रमुक के प्रमुख एमके स्टालिन कहते हैं कि प्री-स्कूल से कक्षा 12वीं तक हिंदी की पैरवी करने के लिए लाया जा रहा तीन भाषा फार्मूला एक बड़ा झटका है। इसकी सिफारिश करना सही मायने में देश को बांटने जैसा है। बकौल स्टालिन, ‘1968 से राज्य में दो भाषा फार्मूला लागू है, इसके अंतर्गत तमिल और अंग्रेजी ही पढ़ाई जाती हैं। ऐसे में उनकी पार्टी भी हिंदी को कतई मंजूरी प्रदान नहीं करेगी और यदि जोर-जबरदस्ती हुई तो विरोध स्वरुप सड़कों पर भी उतरेगी।
स्टालिन चेतावनी भरे लहजे में कह जाते हैं कि उम्मीद है कि केंद्र की भाजपा सरकार दूसरा भाषा आंदोलन खड़ा करने का प्रयास नहीं करेगी।
वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ट्वीट करते हुए कहते हैं कि ‘स्कूलों में तीन भाषा फार्मूले का अर्थ क्या है? इसका अर्थ यह है कि वे हिंदी को अनिवार्य विषय बनाएंगे। भाजपा सरकार का असली चेहरा दिखना शुरू हो गया है।’
यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि केंद्र द्वारा इस पर जल्द ही स्थिति स्पष्ट नहीं की गई तो विरोध एक बड़े आंदोलन का रुप ले सकता है और फिर उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे कि मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में लोगों के खान-पान और पहनावे को लेकर कुछ खास संप्रदाय के लोगों को निशाने पर लिया गया और पूरे देश से हिंसक घटनाओं की खबरें आनी शुरु हो गईं थीं। यहां तक कि माव लिंचिंग मामले में तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते देखे गए थे कि ऐसी हत्याएं करने से तो बेहतर है कि पहले उनके सीने में ही गोली उतार दी जाए।
मतलब एक छोटी से भूल का अंजाम देश के शांतिप्रिय नागरिकों को किस तरह से भुगतना पड़ सकता है यह पिछले कार्यकाल में देखा जा चुका है। इसलिए कोशिश की जानी चाहिए कि भाषाई स्तर पर कोई भी कदम उठाने या फैसला लेने से पहले सरकार अच्छी तरह से विचार-विमर्श कर ले और उसके दूरगामी परिणामों को जान ले।
इतिहास पर भी एक नजर जरुर दौड़ा, क्योंकि उसके बाद तो हाथ मलने और पछताने के सिवाय कुछ हासिल होता नहीं है। किसी भाषाई आंदोलन को सकारात्मकता के साथ चलाया जाए तो कोई गुरेज नहीं होना चाहिए, लेकिन थोपने जैसी स्थिति सही नहीं है, इसे कोई समझदार नागरिक मान्य नहीं करेगा।


