वह चाहती तो हार मान सकती थी लेकिन टूटे जबड़े के साथ एशियन गेम्स में चौथे नंबर से स्वर्ण पदक तक का सफ़र और अब एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में महिला हेप्टाथलान में रजत पदक को जीतने के लिए जिस पोटास की जरूरत होती है वो इस खिलाड़ी में कूट-कूट कर भरा है। स्वप्ना बर्मन ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के अपने सपने को साकार करने के लिए एक कदम और आगे बढ़ा दिया है। उनकी हाल की उपलब्धि ने भारत में मिसाल कायम कर दी है और ऐसी मिसालों को भुलाया जाना मुमकिन नहीं है………
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घर की माली हालत ख़राब और दोनों पैरों में छह उंगलियां होने के बावजूद अपने खेल करियर के दौरान कई बाधाओं को पार कर सपना बर्मन ने अपनी कड़ी मेहनत और समर्पण के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को गौरवान्वित किया है।
एशियाई खेलों की स्वर्ण पदक विजेता और मौजूदा चैंपियन स्वप्ना बर्मन को इस साल अप्रैल में आयोजित हुई एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप की महिला हेप्टाथलान प्रतियोगिता में रजत पदक से संतोष करना पड़ा। बाईस वर्षीय स्वप्ना ने सात स्पर्धाओं में कुल 5993 अंक बनाये और वह उज्बेकिस्तान की एकटेरिना वोर्निना (6198 अंक) के बाद दूसरे स्थान पर रहीं।
स्वप्ना ने पिछली बार 5942 अंक बनाकर स्वर्ण पदक जीता था और उनका इस बार का प्रदर्शन उससे बेहतर रहा लेकिन पिछले साल जकार्ता एशियाई खेलों के 6026 अंक से वह कम था। गौरतलब है कि 2017 में एशियाई एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में भी वह स्वर्ण जीत कर वापस लौटी थीं।

हालांकि स्वप्ना बर्मन अपने दोहा प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है, “बहुत खुश नहीं हूं, आज सुबह जेवलिन में अपने परिणाम से खुश नहीं हूं। तैयारी अच्छी नहीं थी। मुझे चोट लगी है, आप जानते हैं, टखने में समस्या थी। मैं वास्तव में बेहतर करना चाहता थी।”
प्रतिभाएं विपरीत परिस्थितियों में भी जीत कर जब अपना सर्वश्रेष्ठ देती हैं तभी इतिहास रचा जाता है। एक रिक्शा चलाने वाले की बेटी ने ज़िंदगी की अनेक बाधाओं को पार कर, सात समन्दर पार, जब सात-सात स्पर्धा वाले हेप्टाथलान में स्वर्ण पदक जीता, जिसे सात स्वर्ण के बराबर माना जाता है। यह स्वप्न नहीं हकीकत है। इससे पहले भारत की स्वप्ना बर्मन ने इंडोनेशिया के जकार्ता में खेले गए 18वें एशियाई खेलों में महिला हेप्टाथलन का स्वर्ण पदक जीता। हेप्टाथलन में गोल्ड मेडल जीतने वाली वह पहली भारतीय बनीं थीं।
स्वप्ना के दोनों पैरों में छह-छह उंगलियों हैं, जो अक्सर जूते की सही जोड़ी का पता लगाने में उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती बनती हैं। इतना ही नहीं उसके पैरों की अतिरिक्त चौड़ाई दौड़ते समय उसकी लैंडिंग को और दर्दनाक बनाती है, यहां तक कि वह लंबे समय तक अपने पैरों में जूते भी नहीं पहन सकती थी।
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले की रहने वाली स्वप्ना बर्मन का कहना है, “हर कोई इंसान ख्व़ाब देखना पसंद करता है, लेकिन मैं चाहती हूं कि मेरे ख्व़ाब हरदम मेरे साथ रहें, मेरा पीछा करें!” एक आम कहावत है, “भूखे पेट सुकून भरी नींद नहीं आती है।” यही वह मूल सार था जिसने स्वप्ना के भीतर उर्जा भर दी। उसकी इसी जिद ने अपने सामने आने वाली हर बाधा को दूर करने में उसकी मदद की और विजेता बना दिया।
स्वप्ना बर्मन का जन्म पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के कलियागंज गांव में हुआ था। वह बहुत गरीब परिवार से हैं। पिता पंचानन बर्मन रिक्शा चलाते थे, लेकिन 2013 में एक दिन अचानक दिल का दौरा पड़ने से उसके परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा और उसके पिता ने बिस्तर पकड़ लिया। उस समय उसका परिवार काफी संकट से गुजर रहा था, लेकिन स्वप्ना के दृढ संकल्प और इच्छा शक्ति के सामने इस बुरे समय ने भी आत्मसमर्पण कर दिया।

स्वप्ना के दोनों पैरों में छह-छह उंगलियां हैं, जो अक्सर जूते की सही जोड़ी का पता लगाने में उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती बनती हैं। इतना ही नहीं उसके पैरों की अतिरिक्त चौड़ाई दौड़ते समय उसकी लैंडिंग को और दर्दनाक बनाती है, यहां तक कि वह लंबे समय तक अपने पैरों में जूते भी नहीं पहन सकती थी। किस्मत तब और रूठ गई जब स्वप्ना को अपने टखने और घुटने की चोटों का भी सामना करना पड़ा जिसकी वजह से वह प्रैक्टिस नहीं कर पाती। इन सभी बाधाओं के बावजूद उसने हमेशा अपनी इच्छा शक्ति को मजबूत बनाये रखा और सफलता की राह पर आगे बढ़ने कि हरदम कोशिश करती रही।
स्वप्ना ने एथलीट के रूप में अपने करियर कि शुरुआत 2008 में तब की थी, जब वह कलियागंज उत्तमेश्वर हाईस्कूल में पढ़ रही थी। वहीं पर उनके खेल प्रशिक्षक बिस्वजीत मजूमदार ने उन्हें एथलीट की दुनिया में कदम रखने के लिए प्रेरित किया। जिसके बाद बर्मन ने अपनी प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर कई खेल प्रतियोगिताओं में भाग लिया। उनकी इस प्रतिभा को जलपाईगुड़ी आरएसएस क्लब के सदस्य समीर दास ने जल्द ही ताड़ लिया और 2009 में स्वप्ना को अपनी टीम के लिए चुन लिया। लेकिन कोच सुकांता सिन्हा की देखरेख में ही उनका वास्तविक प्रशिक्षण शुरू हो पाया। उनका पालन-पोषण एथलीट बनने के लिए ही हुआ था।
प्रशिक्षण के दौरान उसने कई राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं और राष्ट्रीय मंच पर पदक जीतकर सफलता हासिल करने लगीं। उनकी सफलता की कहानी को नया आयाम तब मिला जब उन्हें कोलकाता की एसएआई एथलेटिक टीम में चुन लिया गया, जहां सुभाष सरकार उनके मेंटर और कोच थे। उस दिन के बाद से स्वप्ना बर्मन ने पीछे मुड़कर फिर कभी नहीं देखा।
असल में अभाव और अवरोध के बाद भी जो शिखर पर पहुंचे उसे ही सिकंदर कहा जाता है। सोना को जितना तपाया जाए उतना ही वो निखर कर कुंदन बनता है। और कभी कभी यह सोना भी किसी विशेष गले का हार बनकर चमक उठता है।
स्वप्ना ने अपनी प्रतिभा बचपन में ही पहचान ली थी। सात साल की उम्र में ही दौड़ना शुरू कर दिया था। शुरू से उनका रुझान दौड़ने और एथलेटिक्स की तरफ था। फिर जब उन्हें हेप्टाथलॉन के बारे में पता चला तो इसके प्रति समर्पित होकर पूरी लगन के साथ तैयारी शुरू कर दी। हालांकि लोगों ने उनको पीछे खींचने की बहुत कोशिश की लेकिन उन्होंने कभी किसी की बातों की तरफ गौर नहीं किया।

बहुत सारी शारीरिक रुकावटों के बावजूद बर्मन ने कभी भी किसी प्रतियोगिता को छोड़ने के बारे में नहीं सोचा। और आखिर में वह एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतीं और रिकॉर्ड भी तोड़ा। हर व्यक्ति उसके संघर्षों की कहानी नहीं जानता है जो उसे भारत को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने के दौरान झेलनी पड़ी थीं। यहां तक कि एशियन गेम के फाइनल में भी उनके पैरों में गंभीर चोटें आ गई थीं। उन हालातों में भी जब उनके दांत का दर्द किसी अवरोध से कम नहीं था, जब वह एशिया के सर्वश्रेष्ठ एथलीट के सामने अपना प्रदर्शन कर रही थीं। हालांकि, स्वप्ना ने सब कुछ संभाल लिया और आखिर में गोल्ड मेडल जीत लिया।
गरीबी से जूझते हुए भी हार न मानने वाली स्वप्ना बर्मन ने जता दिया कि प्रतिभा और हौसले के आगे मुसीबतें घुटने टेक देतीं हैं। बेटी की इस सफलता पर रिक्शा चालक पिता को बधाई देने वालों का तांता लगा गया था।
उस दिन तो स्वप्ना की मां बासना देवी ने खुद को काली माता के मंदिर में बंद कर लिया। अपनी बेटी की सफलता से गदगद मां के मुंह से शब्द ही नहीं निकल रहे थे। घरवालों के मुताबिक बेटी के लिए सफलता की कामना लिए वह पूरे दिन भगवान से प्रार्थना करती रहीं थीं। यहां तक कि मां ने अपनी बेटी को इतिहास रचते नहीं देखा, क्योंकि वह बेटी के लिए दुआ करने में जुटीं थीं।
एशियाई खेलों के समय स्वप्ना का घर एक छोटा-सा तीर्थ स्थल बन गया था, क्योंकि उसके पैतृक गांव से आने वाले लोग उसे बधाई देने और शुभकामनायें देने उसके घर जाते थे। और वे लोग बर्मन की सफलता का श्रेय उसके परिवार के बलिदान और मजबूत समर्थन को देते नहीं थक रहे थे, जिसने स्वप्ना को तमाम कष्टों के बावजूद सफलता प्राप्त करने में उसकी मदद की थी। पिता के बीमार पड़ने पर उनकी मां बासना देवी ने परिवार की सारी ज़िम्मेदारी अपने कंधे पर उठा रखी थीं। मां ने कभी हार नहीं मानी।
बासना देवी ने बताया, “मैंने एक चाय बागान में काम किया, लेकिन मजदूरी बहुत कम मिलती थी। मेरे परिवार के छह सदस्यों के लिए रोटी का इंतजाम करना बहुत मुश्किल हो रहा था। फिर मैंने घरों में चाकरी करने का फैसला किया। दोहरी शिफ्ट में ओवरटाइम कर करके मैंने अपने परिवार का गुजर बसर करने की कोशिश की। गरीबी की वजह से हम स्वप्ना को उसकी जरूरत के मुताबिक पौष्टिक भोजन नहीं दे पा रहे थे। लेकिन हमने खेल के प्रति स्वप्ना की रुचि को जानने के बाद हमेशा उसका समर्थन करने की कोशिश की। सुभाष सर के मार्गदर्शन के बिना स्वप्ना के लिए सफलता के ट्रैक पर बने रहना संभव नहीं था।
बहुत सारी शारीरिक कठिनाइयों का सामना करने के बावजूद बर्मन ने कोई भी प्रतियोगिता छोड़ने के बारे में कभी नहीं सोचा। और आखिर में उसने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता और रिकॉर्ड तोड़ दिया।

उन्हीं दिनों की याद करते हुए स्वप्ना की मां ने बताया कि जब गांव वाले टेलीविजन पर हमारी बिटिया की प्रतियोगिता देखने हमारे घर पर इकट्ठे हुए, उस समय भी मैं मां देवी काली की पूजा करने में तल्लीन थी। मां काली के सामने मेरे आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे जबकि दूसरी ओर स्वप्ना अपने प्रतिद्वंदियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रही थी, और उस समय स्वप्ना के दांत में असहनीय दर्द भी हो रहा था।
एक समय ऐसा भी था कि स्वप्ना को अपने लिए सही जूतों के लिए संघर्ष करना पड़ता था क्योंकि उनके दोनों पैरों में छह-छह उंगलियां हैं। पांव की अतिरिक्त चौड़ाई खेलों में उसकी लैंडिंग को मुश्किल बना देती, इसी कारण उनके जूते जल्दी फट जाते हैं। हालांकि एक जूता कंपनी ने एशियाई खेलों का स्वर्ण जीतने के बाद उन्हे अपनी पसंदीदा जोड़ी प्रदान की थी, लेकिन वह चोट से मुक्त नहीं रह पाई।
बासना देवी जब अपनी बिटिया की सफलता की कहानी हमारे साथ साझा कर रही थीं, उनकी गर्व भरी आंखों से आंसू छलक रहे थे। यहां तक कि एशियाई खेलों के अंतिम दिन भी स्वप्ना ने अपनी मां से एक बार जकार्ता से टेलीफोन पर बात की थी। सभी शारीरिक कष्टों को झेलते हुए, उसने दृढ़ता से अपनी मां को वचन दिया, ‘चिंता मत करो, मैं इस प्रतियोगिता को जीतने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दूंगी।’
कई रुकावटों के बावजूद उसने एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीता और दुनिया के सामने अपनी क्षमता को साबित कर दिखाया जो निस्संदेह हमें और हमारे देश को गर्व महसूस कराता है। अब बासना देवी उस दिन का इंतजार कर रही हैं जब स्वप्ना ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर अपने देश का नाम रोशन करेगी।
स्वप्ना के बचपन के कोच सुकांत सिन्हा के मुताबिक, “स्वप्ना को अपने खेल संबंधी महंगे उपकरण खरीदने में काफी परेशानी होती है। मैं 2006 से 2013 तक उसका कोच रहा हूं, वह काफी गरीब परिवार से है और इस पर उसे अपनी ट्रेनिंग का खर्च उठाना काफी मुश्किल होता है। जब वह चौथी क्लास में थी तब ही मैंने उसमें प्रतिभा को पहचान लिया था, इसके बाद मैंने उसे प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया था।” वह आगे बताते हैं कि “स्वप्ना बेहद जिद्दी है और यही बात उसके लिए अच्छी भी है। मैं बता नहीं सकता कि मैं कितना खुश हूं।”
स्वप्ना बर्मन के करियर को उड़ान तब मिली जब वह अपने प्रमुख प्रशिक्षिक सुभाष सरकार की सानिध्य में आयीं। 20 साल का अनुभव रखने वाले सुभाष जलपाईगुड़ी स्थिति घूघुडांगा के रहने वाले हैं। एक बार अपनी छुट्टी बिताने के लिए वह जलपाईगुड़ी में गए हुए थे। वहां उन्होंने स्वप्ना बर्मन के बारे में सुना। उसकी लगन को जानकार वह इतने उत्साहित हो गए कि खुद को उसके गांव जाने से नहीं रोक सके।
वहां सुभाष यह देखकर दंग रहे गए कि स्वप्ना ने अपने पिता द्वारा बनाये गए बांस के एक लट्ठे की मदद से ऊंची कूद के अपने अभ्यास को कैसे जारी रखा है। तभी उन्होंने स्वप्ना को उचित मार्गदर्शन देने की ठानी। कोच सुभाष ने जलपाईगुड़ी खेल परिसर में स्वप्ना को तकनीकी रूप से प्रशिक्षित किया। बाद में सुभाष स्वप्ना बर्मन को कोलकाता ले आये। 2011 में स्वप्ना का चयन भारतीय खेल प्राधिकरण में हो गया।

‘मैं केवल सुभाष सर के मार्गदर्शन में अपनी प्रैक्टिस जारी रखना चाहती हूं, अन्यथा मैं अपने जुनून को छोड़ दूंगी’।’
सपना बर्मन
स्वप्ना ने करियर में आगे बढ़ते हुए हमेशा सुभाष सरकार के मार्गदर्शन का अनुसरण किया, उनके प्रति अपनी आस्था बनाये रखी। ऐसे ही एक मौके पर अंतर्राष्ट्रीय खेलों के लिए पटियाला कोचिंग कॉम्प्लेक्स में शामिल होने से इनकार करते हुए उन्होंने अपने कोच के प्रति अपना आभार प्रकट किया। स्वप्ना का कहना था कि, ‘मैं केवल सुभाष सर के मार्गदर्शन में अपनी प्रैक्टिस जारी रखना चाहती हूं, अन्यथा मैं अपने जुनून को छोड़ दूंगी’। अपने कोच के प्रति उसके विश्वास और कृतज्ञता ने दोहा में भी उसको पदक दिलाया।
आजकल फिल्म जगत में खिलाड़ियों पर बायोपिक बनाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। तमाम खेल सितारों पर बनी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़े हैं। इसी कड़ी में अब एक और खेल सितारें की जीवनी पर फिल्म बनाने की तैयारी चल रही है।
साल 2018 में हुए 18वें एशियाई खेलों की हेप्टाथलन प्रतियोगिता में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर देश को गौरवान्वित करने वाली पहली महिला हेप्टाथलान स्वप्ना बर्मन ने यह कारनामा कर दिखाया था। जानकारी के मुताबिक स्वप्ना के जीवन संघर्ष पर फिल्म बनाई जाएगी। पश्चिम बंगाल स्थित जलपाईगुड़ी जिले की रहने वाली 22 वर्षीय स्वप्ना की जीवनी को जल्द ही हम रुपहले पर्दे पर साकार होते देख सकेंगे।
स्वप्ना बर्मन अब कोई फिल्मी परदे की नकली नायिका नहीं बल्कि ज़मीन की वो स्वर्णपरी हैं जो भारत के आसमान पर ध्रुव तारे की तरह आने वाली पीढ़ियों का पथप्रदर्शन करेंगी। समाज को ऐसी ही नायकों की आवश्यकता है।
फिलहाल मैं अपनी प्रैक्टिस के अंतिम ट्रैक पर हूं। भारतीय खेल प्राधिकरण प्रशिक्षण केंद्र में अपने कोच सुभाष सर के उचित मार्गदर्शन में तैयारी कर रही हूं। मुझे स्वयं पर भरोसा है और सबसे अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद भी है!


