किसी भी राष्ट्र को शक्तिशाली बनने के लिए वहां के अंतिम पायदान पर मौजूद लोगों को सशक्त और समृद्ध बनाना जरूरी है। सैद्धांतिक रूप से यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है।
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किसी भी राष्ट्र को शक्तिशाली बनने के लिए वहां के अंतिम पायदान पर मौजूद लोगों को सशक्त और समृद्ध बनाना जरूरी है। सैद्धांतिक रूप से यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है। हमें आजादी मिले 70 साल हो गए हैं लेकिन रोटी, कपड़ा और मकान का नारा अभी भी चलाया जा रहा है। ऐसे में इस सवाल को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि आखिर कब तक राजनीतिक वर्ग का यह नारा चलता रहेगा? इनको अभी तक कोई दूसरा मुद्दा क्यों नहीं मिला? हर पांच साल बाद जब चुनाव होते हैं हमारे ऊपर वही पुराना घोषणापत्र क्यों थोप दिया जाता है? सरकारें बदल जाती हैं लेकिन गरीबी हटाओ का नारा नहीं बदलता!
गरीबी मिटाने के तमाम कार्यक्रम फाइलों में नत्थी कागजों पर सफलता की गाथा सुनाते हैं, संसद और सरकारी विभागों में आंकड़ों की बाजीगिरी से कोई परहेज नहीं करता है, लेकिन हम समय के साथ उस सच को हमेशा पीछे धकेल देते हैं कि, क्या तमाम योजनाओं का लाभ उनको मिला जिनको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी? दरअसल यह एक गंभीर मुद्दा है और हाल फिलहाल में हमारे सामने इसका कोई प्रत्यक्ष समाधान मौजूद नहीं है?
हमें समझना होगा कि कतार के आखिर में खड़े लोगों को सशक्त बनाने से राष्ट्र को क्या और कैसे लाभ होगा। क्योंकि अब हमारा राष्ट्र अनपढ़, बीमार और अनुत्पादक आबादी का बोझ नहीं उठा सकता। हमें दबे कुचले लोगों को विकास की धारा से जोड़ने के लिए शिक्षा, कौशल और पोषण की जरूरत है, ताकि वे राष्ट्र के विकास और उत्पादकता में अपना योगदान दे सकें ।
सांप्रदायिकता, आतंकवाद, जातीय और क्षेत्रीय विभाजन जैसी सामाजिक बुराइयां हमारी अगली पीढ़ी के लिए कौन-सा अनुकूल वातावरण तैयार करेंगी? हम जो बोयेंगे, हमारी भावी पीढ़ी वही काटेगी। निश्चित रूप से हम सब एक बेहतर समाज चाहते हैं जहां अवसरों की अधिकता हो और खतरे भी सीमित हों। सभी के लिए अवसर पैदा करने की जरूरत है, वरना अमीरी और गरीबी की खाई बढ़ती ही जायेगी। और यह किसी भी नजरिये से समानता का एक अच्छा सूचक नहीं है ।
सरकारें भी मानती रही हैं कि योजनाओं का लाभ हर तबके को मिलना जरूरी है ताकि विकास प्रक्रिया प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सके। अब वे दिन गए जब राजनेता पांच साल बाद आते थे, बड़े-बड़े नारे लगाते थे और आम आदमी को बहला फुसलाकर मना लेते थे। आज सरकारों और राजनेताओं से नतीजे मांगे जा रहे है। आम आदमी यही जानना चाहता है कि सरकार के कामकाज का उसके जीवन पर क्या असर पड़ा। ऐसे सवाल उठना राजनीतिक दलों को काबू में रखने और उनकी जवाबदेही तय करने के लिए यह एक अच्छा संकेत है।
किसी भी योजना को लागू करने की प्रक्रिया में नौकरशाह की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। तकनीकी स्तर पर निगरानी, मजबूत इरादे और सामाजिक पुनरुत्थान प्रक्रिया के माध्यम से ही इस तरह की जवाबदेही संभव है। हमें जमीनी स्तर पर दूर दराज में बसे लोगों तक सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं को पहुंचाने वाले बुनियादी ढांचे, निगरानी युक्तकुशलतकनीक, लक्ष्य निर्धारित प्रशासन,राजनीतिक वर्ग का ईमानदार नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी की जरूरत है।
मेरा मानना है कि अंतिम छोर पर मौजूद व्यक्ति के सशक्तीकरण के लिए कोई विकल्प नहीं है, जबकिराजनीतिक वर्ग ने आजादी के बाद से ही लोगों को हमेशा गुमराह करने की कोशिश की है, लेकिन अब समय आ गया है, जहां हमें अपने लक्ष्य को अंतिम पायदान पर खड़े लोगों के लिए बदलना होगा। संसद में बैठकर और सत्ता के गलियारे से राजनीति नहीं की जा सकती, हर किसी को कतार के आखिर में खड़े आम आदमी और उसकी समस्याओं को जानना होगा, उसका समाधान करना होगा। आइए उस व्यक्ति को अपने साथ जोड़ते हैं।
जय हिंद!



Many people are truly engaged in doing such work but a few of them are recognized promoted by Local MLA MP DC or big Orgn
A list of such volunteers will bring a change