अब समय है नेटफ्लिक्स, अमेजन, हॉटस्टार और अल्ट बालाजी का जो सिनेमा पर आश्रित होने के बजाय मनोरंजन की अपनी एक नयी दुनिया खड़ी कर रहे हैं। ये सिनेमा को भी चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं और टेलीविजन को भी। मनोरंजन की दुनिया में इन्हें ओवर द टॉप (ओटीटी) कहा जा रहा है।
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कहा जाता है, यदि फेसबुक कोई देश होता तो यह आबादी के मामले में दुनिया में तीसरे नंबर पर होता और सबसे अधिक ‘कनेक्टिड’ होता। इसे थोड़े व्यापक अर्थों में देखें तो वाकई इंटरनेट ने अपने लिए एक समानांतर दुनिया विकसित कर ली है, जिसकी अपनी नागरिकता है, अपने समाज हैं, अपने सामाजिक नियम हैं, अपनी संस्कृति है, और है मनोरंजन के अपने साधन।
अब समय है नेटफ्लिक्स, अमेजन, हॉटस्टार और अल्ट बालाजी का जो सिनेमा पर आश्रित होने के बजाय मनोरंजन की अपनी एक नयी दुनिया खड़ी कर रहे हैं। ये सिनेमा को भी चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं और टेलीविजन को भी। आश्चर्य नहीं कि मनोरंजन की दुनिया में इन्हें ओवर द टॉप (ओटीटी) कहा जा रहा है।

इस दुनिया का सबसे बड़ा कमाल यह कि यहां जो भी है अंतरराष्ट्रीय है, यहां भौगोलिक सीमाएं मायने नहीं रखतीं, इसलिए ओटीटी की कोशिश होती है कि ऐसे कंटेंट तैयार हों जिसे वैश्विक स्वीकार्यता मिल सके। यही वैश्विक स्वीकार्यता की कोशिश इसकी खासियत भी है, और सीमा भी। शायद इसीलिए जब नेटफ्लिक्स और अमेजन जैसी विदेशी कंपनियां इस क्षेत्र में आयीं तो भारत में बने कंटेंट की ज़रूरत नहीं समझी। हॉलीवुड में बने धारावाहिकों के साथ ही उन्हें दर्शक मिल रहे थे। लेकिन समय के साथ उन्हें महसूस हुआ कि भारत के अंदर तक यदि दस्तक देनी है, तो भारतीय कंटेंट के साथ आना होगा। नेटफ्लिक्स ने अनुराग कश्यप की कंपनी फैंटम पिक्चर्स के साथ ‘सेक्रेड गेम्स’ का निर्माण किया और यह ओटीटी ही नहीं, बल्कि मनोरंजन की पारम्परिक दुनिया को भी झकझोर गयी।
आंकड़ों के अनुसार नेटफ्लिक्स एक्टिव मासिक उपभोक्ता के आधार पर भारत के सबसे लोकप्रिय एप में शामिल है। इस एप पर उपभोक्ता द्वारा बिताये जाने वाले समय के आधार पर यह देश में सातवें स्थान पर है और डाउनलोड के आधार पर चौदहवें स्थान पर।

‘सेक्रेड गेम्स’ की सफलता ने इस बात को गौण कर दिया कि इस नये दिखते डिजीटल प्लेटफॉर्म पर नया क्या है। माफिया, धर्म, राजनीति के साथ हिंसा और सेक्स का तड़का भारत में मनोरंजन की अनिवार्य शर्तों में शामिल माना जाता रहा है। यह मान लिया गया है कि युवाओं के बीच यही लोकप्रिय हो सकता है। सिनेमा ने युवाओं के प्रति अपनी इस समझ का भरपूर उपयोग भी किया और समय-समय पर मिलती सफलता से वह उत्साहित भी होता रहा।
मुश्किल यह रही कि इंटरनेट पर उपलब्ध इस नये डिजीटल प्लेटफॉर्म ने भी अपनी सफलता के लिए इन्हीं शर्तों के सामने समर्पण कर दिया, जिसकी विद्रूप, वीभत्स परिणति ‘सेक्रेड गेम्स’ में दिखायी देती है। वास्तव में 5 इंच के स्क्रीन की हर युवा हाथों में उपलब्धता और इंटरनेट डाटा की घटती कीमतों ने ओटीटी बाज़ार में गलाकाट प्रतियोगिता की शुरुआत कर दी है। 153 अरब डॉलर के साथ नेटफ्लिक्स पहले नंबर पर बढ़त बनाये हुए है, तो अमेजन 151 अरब डॉलर के बाज़ार पर कब्जा जमाये चुनौती दे रही है। इसके अलावे हॉटस्टार, वूट जैसी कई छोटी-बड़ी कंपनियां भी भारतीय बाज़ार के लिए तैयार हैं।
वास्तव में डिजीटल प्लेटफॉर्म पर गुजरते हुए सिनेमा की एक नयी दुनिया से परिचित हुआ जा सकता था, जहां न तो दर्शकों के पसंद की चिन्ता की ज़रूरत थी, न वितरकों के दबाव की, न ही बाज़ार की धांधली। यहां प्रमोशन भी नि:शुल्क है और प्रदर्शन के लिए स्क्रीन भी। नीतिन चंद्रा को अपनी दूसरी फिल्म ‘मिथिला मखान’ के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार तो मिले, लेकिन थिएटर नहीं मिले। वितरक आगे नहीं आये तो उन्होंने यू ट्यूब का रुख किया, और पेड वीडियो के रूप में दर्शकों तक पहुंचने की कोशिश की। अभी भी ‘बेजोड़’ के नाम से अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से लोकसंस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय है।
ऐसी ही कोशिश ‘आखर’ के माध्यम से हो रही है, जिसके चैनल पर शॉर्ट फिल्मों से लेकर दुर्लभ लोकगीतों के ढेर उपलब्ध हैं। सत्यजीत रे ने जब वर्षों पहले कहा था, मैं सिनेमा अपने लिए बनाता हूं, तो बॉलीवुड के फिल्मकारों को यह बात कभी समझ में ही नहीं आयी कि आखिर अपने लिए कोई कैसे फिल्म बना सकता है। अब जब इंटरनेट ने उन्हें अवसर उपलब्ध कराये हैं, तो अपने लिए फिल्म बनाने के महत्व का अहसास हो रहा है।

वास्तव में कला कलाकार के सौंदर्यबोध की अभिव्यक्ति होती है, लेकिन हिन्दी सिनेमा ने अपने लिए ऐसी शर्तें तय कर रखी हैं कि वहां दर्शकों के सौंदर्यबोध के अनुसार कृतियां रचनी पड़ती है। वहां शर्तें कला की नहीं, बाज़ार की काम करती हैं। इंटरनेट उनके लिए फिल्म बनाना आसान कर सकती थी, लेकिन डिजीटल प्लेटफॉर्म या कहें ओटीटी के रूप में इसके विकास ने जैसे-जैसे इसमें बाज़ार की संभावनाएं विकसित कीं, यह भी बाज़ार को समर्पित होते चली गयी।
‘सेक्रेड गेम्स’ मनोरंजन की दृष्टि से कितना पवित्र है, यह तो अलग विश्लेषण की मांग रखता है। ‘सेक्रेड गेम्स’ मनोरंजन के इस बाज़ार में किस मजबूती के साथ आया, वह सफलता की गारंटी के रूप में चुने इसके विषय और हिन्दी सिनेमा के नामचीन सितारों की उपस्थिति से भी महसूस किया जा सकता है।
‘सेक्रेड गेम्स’ के लिए निर्माता नेटफ्लिक्स और अनुराग कश्यप द्वारा विक्रम चंद्रा के इसी नाम से 2006 में आये उपन्यास का चयन किया गया। लगभग900 पृष्ठों के उपन्यास में मुंबई अंडरवर्ल्ड को आधार बनाया गया था। जाहिर था अनुराग अंडरवर्ल्ड के अपने सुरक्षित जोनर से निकलने को यहां भी तैयार नहीं थे। वास्तव में नेटफ्लिक्स के पहले भारतीय शो के रूप में इसका आना नेटफ्लिक्स के लिए भी चुनौती थी और सफलता पर कोई भी जोखिम उठाने को वह तैयार नहीं थी।
आठ एपीसोड के इस वेब धारावाहिक या कंटेंट के लिए निर्देशन अनुराग के साथ ‘लुटेरा’ जैसी फिल्म में अपना लोहा मनवा चुके विक्रमादित्य मोटवाणे ने किया। ‘सेक्रेड गेम्स’ में मुख्य भूमिका में सैफ अली खान, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राधिका आप्टे जैसे दिखते चेहरे ने बॉलीवुड का जादू जगाये रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इंटरनेट पर भारतीय ही नहीं, किसी भी तरह के सेंसर की बाध्यता के नहीं होने का लाभ उठाने में अनुराग और विक्रमादित्य की जोड़ी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। भरपूर अश्लील गालियों के साथ विद्रूप हिंसा, न्यूडिटी और सेक्स की भरमार ने युवाओं के बीच इसकी जबर्दस्त माउथ पब्लिसिटी की और खास तौर पर ‘सेक्रेड गेम्स’ देखने लोगों ने नेटफ्लिक्स के एप डाउनलोड किये। ‘सेक्रेड गेम्स’ की लोकप्रियता पर तो नेटफ्लिक्स को संदेह नहीं होगा, लेकिन आठ एपीसोड की यह वेब सीरिज हमारे मनोरंजन के मायने बदल देगी, यह उम्मीद तो नेटफ्लिक्स को भी नहीं होगी।

वास्तव में इंटरनेट के माध्यम से मनोरंजन के पारम्परिक संसाधनों के मुकाबले एक नये माध्यम को स्थापित करने की यह कोशिश कोई नयी नहीं। भारत में इसकी शुरुआत 2015 से हो गयी थी। कहते हैं जब टेलीविजन पर ‘नागिन’ धूम मचा रही थी, उसी समय ओटीटी पर ‘नारकोश’ युवा दर्शकों को आकर्षित कर रहा था। मनोरंजन बाज़ार की गंभीर समझ रखने वाली एकता कपूर ने अल्ट बालाजी के नाम से वेब कंटेंट के लिए एक नयी कंपनी ही लांच कर दी। आज अल्ट बालाजी के एप पर 20 से अधिक ऑरिजनल हिन्दी शो मौजूद हैं, जिसमें निम्रत कौर, राजकुमार राव जैसे कलाकार भी देखे जा सकते हैं।
आश्चर्य नहीं कि 2018 में ‘वेब पर्सन ऑफ द इयर’ के रूप में एकता कपूर को सम्मानित भी किया गया। लेकिन अल्ट बालाजी के कंटेंट को देखें तो बॉलीवुड स्टाइल में सेक्स के अतिरेक से अधिक कुछ भी नहीं मिलता। न तो कहानी, न तकनीक। ‘रागिनी एमएमएस रिटर्न’, ‘देव डीडी’, ‘बेवफा सी वफा’ और सबसे बढ़ कर ‘गंदी बात’ जैसे वेब सीरिज सिर्फ़ सेक्स के प्रति भारतीय दर्शकों की भूख का दोहन करते दिखते हैं।
कमाल यह कि ‘गंदी बात’ के साथ पहली बार कोई वेब कंटेट ग्रामीण और कस्बाई दर्शकों को टार्गेट करता दिखा। अल्ट बालाजी पर अभी 150 घंटे से अधिक का कंटेंट उपलब्ध बताया जा रहा है, जिसे इस साल के अंत तक 250 घंटे करने की योजना है। जाहिर है प्लेटफॉर्म कोई हो, कोई जोखिम क्यों उठाना चाहेगा।
अनुराग कश्यप की टीम भी ‘सेक्रेड गेम्स’ के पहले ‘लस्ट स्टोरिज’ के साथ आयी थी। ‘लस्ट स्टोरिज’ टाइटिल से ही कंटेंट की कल्पना की जा सकती है। इसमें अलग-अलग एपीसोड अनुराग कश्यप के अलावे जोया अख्तर, दिवाकर बनर्जी, करण जौहर ने निर्देशित किये थे। रामगोपाल वर्मा तो अपने हिंसा और सेक्स के अतिरेक के लिए जाने ही जाते रहे हैं। सेंसर के बंधन से मुक्त मनोरंजन की यह दुनिया मिली तो अपने ‘गन्स और थाइज’ जैसे वेब सीरिज में इस स्वतंत्रता का वे खुलकर उपयोग करते दिखे।
भारतीय बाज़ार की समझ होने के कारण अल्ट बालाजी जैसी कंपनी सेक्स के भद्दे चित्रण के बावजूद टॉपलेस दृश्यों से परहेज करती दिख रही थी, वर्मा और अनुराग उस सीमा को भी लांघते दिखे।
सवाल है कि क्या वैकल्पिक माध्यम का यही उपयोग हो सकता है? क्या सेक्स और हिंसा से परे हम मनोरंजित नहीं हो सकते? भारतीय दर्शकों की पहली पसंद संवेदना रही है। यहां ऐसी दुनिया रची जा रही है, जहां संवेदना के सिवा सबकुछ है। जाहिर है इसे लम्बे समय तक भारतीय मन पर राज करना है, सेंसर मुक्त होने का जश्न सिर्फ़ सेक्स और हिंसा के साथ विचारों के साथ भी मनायें।


