सरकारों के बदलने से सबकुछ बदल भी नहीं जाता। सरकारों में अक़सर ऐसा करने की इच्छाशक्ति होती भी नहीं। इसलिए जो समस्याएं 2018 में थीं, वह 2019 में भी कमोबेश वैसी ही हैं बल्कि और अधिक जटिल हो सकती हैं।
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हम वर्ष 2019 में हैं। इसमें पता नहीं क्या-क्या हो रहा है, क्या-क्या होगा, यह ठीक-ठीक कोई नहीं जानता। कोई ज्योतिषीजी तो बिल्कुल भी नहीं। कुछ पूर्वनिर्धारित घटनाएं हर वर्ष होती हैं, जैसे- गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, विभिन्न त्योहार आदि। वैसे इस वर्ष लोकसभा चुनाव निर्धारित समय पर हो रहे हैं। उनका परिणाम क्या होगा है, यह ठीक-ठीक कोई नहीं जानता।
सिर्फ़ अनुमान लगाये जा सकते हैं। ऐसे अनुमान भी हममें से अधिकतर अपनी-अपनी राजनीतिक दृष्टि और इच्छा के मुताबिक लगा रहे हैं। ये अनुमान अपने सार में अंतत: सही भी निकल सकते हैं और ग़लत भी। अधिकांश प्रायोजित सर्वे, जिनके प्रायोजकों का हमें पता भी नहीं है, वे प्रायोजित ढंग से बतायेंगे कि किसे कितनी सीटें मिल रही हैं। इनका उद्देश्य जनमत के ढुलमुल हिस्से को प्रभावित करना भर होता है, न कि आज जो सच्चाई नज़र आ रही है, उसे पेश करना। हालांकि ऐसा बहुत बार होता है कि बड़ी संख्या में लोग अंत तक भी यह तय नहीं कर पाते कि वे किसे वोट देंगे।

यह पांच साल का समय तमाम कठिनाइयों और चुनौतियों के बीच गुजरा है। इसके बावजूद पहले हम सकारात्मक बातों को रेखांकित करते हैं। थोड़ी बारीकी से देखें तो पिछले पांच सालों में लोगों में परिस्थितिवश लोकतांत्रिक चेतना अपेक्षया अधिक आयी है। भारत का किसान इस बीच अधिक जागरूक और संगठित हुआ है क्योंकि धीरे-धीरे स्थितियां, जो इस सरकार के आने से पहले भी खराब थीं और बाद में हालात इतने विकट बना दिये गये हैं कि किसान को खुलकर सामने आना पड़ा है। आप देखेंगे कि जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें आयी हैं, उन्होंने सबसे पहले किसान ऋणमाफी का निर्णय किया या कहें, यह उनकी राजनीतिक बाध्यता बन गयी और बहुत संभव है, यह इस बार का बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है।
अब तक तीन लाख से अधिक किसान ऋण के बढ़ते बोझ के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। हमारे देश में ऐसा कम से कम पिछले पंद्रह साल से हो रहा है और हमारी किसी भी सरकार की आत्मा पर खरोंच तक नहीं लगी है। आज भी सरकारें इस समस्या का कोई गंभीर और दीर्घकालिक हल निकाल नहीं पायी हैं। वहां तक उनकी नज़र ही नहीं जाती है।
सरकारों के सारे प्रयास ऋणमाफी तक जाकर तात्कालिक राजनीतिक लाभ लेने तक सिमट जाते हैं। ऋणमाफी भी कितनी प्रभावी होती है, यह भी हम देख चुके हैं। इसका फायदा भी किसानों को तो शायद ही मिलता है। बीमा कंपनियों की तगड़ी कमाई हो जाती है और यह पैसा दूसरे रास्ते से सत्ताधारी दल की जेब में चला जाता है।
किसानों के नाम पर सरकारी धन की लूट बीमा कंपनियां और सत्ताधारी दल कर लेते हैं। यह बात सामने आने पर भी यथास्थिति बनी रहती है, सरकारी दल और कंपनियां एक कान से सुनकर, दूसरे कान से निकाल देती हैं।
इस बीच पूरे भारत के किसान एकाधिक बार मार्च करने दिल्ली आ चुके हैं, मगर उनकी कोई प्रभावी सुनवाई सत्ता के दरबार में नहीं हुई। अब ऐसी स्थिति बनती लग रही है कि कोई सरकार, कोई राजनीतिक दल उनकी समस्याओं की उपेक्षा अधिक समय तक नहीं कर पायेगा। किसान अब हाशिये के बाहर आते लग रहे हैं।
इस बीच दलित भी अधिक संगठित और मुखर हुए हैं। उनका नया नेतृत्व उभरा है, जो तमाम लोकतांत्रिक ताक़तों के साथ खड़ा है। उनकी प्रतिरोध की ताक़त और गति अब बढ़ी है। दलित अब जमकर जातीय भेदभाव, अपमान और तिरस्कार का जगह-जगह विरोध करने की स्थिति में हैं। आज उसकी इतनी ताक़त है कि उसका आरक्षण छीनने की तरकीबें फेल हो रही हैं। ऐसा लगता है कि दलित अब एक या दूसरी बड़ी पार्टी के हाथों खेलने की मजबूरी से भी बाहर निकल रहे हैं। उन्होंने पुराने नेतृत्व का साथ अभी नहीं छोड़ा है लेकिन वे नये, अधिक संघर्षशील नेतृत्व की ओर भी सधे कदमों से बढ़ रहे हैं।

स्त्रियों का ग़रीब वर्ग तो अभी लगभग उसी हालत में है, जिसमें था। उसकी हालत में बदलाव की गति धीमी है, मगर उच्च और मध्यवर्ग की स्त्रियों ने ‘मी टू‘ के जरिए किसी भी स्तर पर कार्यस्थल पर अपने शारिरिक शोषण के विरुद्ध जमकर, सफल विरोध करना सीख लिया है।
सांप्रदायिकता अपनी धार खो रही है। राममंदिर का मुद्दा अब उतना आकर्षक नहीं रहा, ख़ासकर इस बार के आम चुनाव में। इस बीच सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ा है, तो उसका प्रतिरोध भी बढ़ा है। बुनियादी सवालों की चमक कुछ-कुछ लौटती दीख रही है। कठिनाइयां हैं, मगर रोज़गार का सवाल भी अब धार हासिल कर रहा है। हालांकि किसी पार्टी के पास इसे हल करने का कोई निश्चित रोडमैप नहीं है। दरअसल सारी पार्टियों के पास सुदीर्घ नीतियों का अभाव है। उनकी नज़र तत्काल पर रहती है। अब इतना तो थोड़ा उनके सामने स्पष्ट होने लगा है कि पुरानी हो चुकी ‘नयी आर्थिक नीति’ इसका इलाज नहीं हो सकती। ये नीतियां महानगरों के संपन्न वर्ग की चमक बढ़ा सकती हैं, मगर अंदरूनी सड़ांध नहीं मिटा सकती। वे रोज़गारविहीन विकास तो कर सकती हैं, मगर रोज़गार होगा नहीं तो लोगों में खरीदने की सामर्थ्य कहां से आयेगी?
बहुसंख्यक लोगों की निर्धनता किसी भी देश की स्थायी समृद्धि की गारंटी नहीं हो सकती। समृद्ध वर्ग लगभग स्थिर रहता है, असमानताएं बढ़ती हैं तो निर्यात भी कोई मदद नहीं कर सकता। निर्यात भी कई ऐसी बातों पर निरंतर है, जिन पर हमारा बस नहीं। हमारी ज़रूरत रोज़गार सहित विकास है और यह विकास की वैकल्पिक और विकेंद्रीकृत सोच के बगैर संभव नहीं है।
वैसे सरकारों के बदलने से सबकुछ बदल भी नहीं जाता। सरकारों में अक़सर ऐसा करने की इच्छाशक्ति होती भी नहीं। इसलिए जो समस्याएं 2018 में थीं, वह 2019 में भी कमोबेश वैसी ही हैं बल्कि और अधिक जटिल हो सकती हैं। हमारे यहां ऐसे राजनीतिक दल ताकतवर हैं, जो ऐतिहासिक कारणों से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति से बाहर आ ही नहीं सकते। उनका एकमात्र अस्त्र यही है। वैसे भी उन्हें चुनावी रूप से हराया जा सकता है लेकिन उन्होंने बहुत नीचे तक जो बरसों से घुसपैठ की है, उसका प्रभाव रहेगा। वे राजनीति और समाज को बुनियादी समस्याओं से भटकाते रहेंगे, जो पहले भी हुआ है। ऐसी ताक़तों को खुराक सिर्फ़ राजनीति से नहीं मिलती, उससे बाहर भी उनके कई यथास्थितिवादी शक्तिस्त्रोत हैं जो बहुत मजबूत हैं और जिन पर प्रहार करने की ताक़त और संकल्प फिलहाल राजनीतिक दलों में नहीं है। इनसे संघर्ष के सांस्कृतिक-वैचारिक अस्त्र तो बहुत हैं, मगर उन्हें ज़मीन पर उतारने का संकल्प नहीं है। इन ताक़तों से सीधे लड़े बिना भी एक हद तक लड़ा जा सकता है, जिसमें एक रोज़गार के अवसर बढ़ाना भी हो सकता है। लेकिन इसकी एक सीमा है और बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा करने का रास्ता भी तो अभी नहीं है।

इस बीच सांप्रदायिक ध्रुवीकरण इस हद तक हुआ है कि इसका आतंक अभी कायम है, जिसने एक धर्मनिरपेक्ष देश में अल्पसंख्यकों को भी असुरक्षित किया है। आज अधिकांश राजनीतिक दल अल्पसंख्यकों की बात करने से सीधे तौर पर कतराने लगे हैं। उन्हें डर लगने लगा है कि इससे बहुसंख्यक समुदाय नाराज होगा। यह एक तरह से बहुसंख्यक सांप्रदायिकता की उस शर्त को मानना है, जो अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह देखना चाहती है, जबकि हमारे संविधान की नज़र में जो भी इस देश का नागरिक है, वह कानून की नज़र में बराबर है। उसे अपने अधिकारों को हासिल करने का वही हक़ है, जो किसी भी अन्य नागरिक को है।
यह न समझ में आनेवाली बात है कि संविधान के विरुद्ध जाकर नागरिकों के बीच वैमनस्य फैलानेवाले किसी भी दल या दलों को यह स्वतंत्रता आज तक मिली हुई कैसे है, जबकि किसी भी संवैधानिक पद पर बैठने से पहले उसे संविधान की शपथ लेनी होती है। इसे राजनीतिक-कानूनी चुनौती क्यों नहीं दी जा सकती या दी जा रही है? उम्मीद है कि 2019 और बाद में भी इन सवालों के जवाब हमें मिलेंगे जो देश को विकास के पथ पर आगे ले जायेंगे।


