जनसंख्या नियंत्रण के सुझाव मंगाए जाते हैं और वैश्विक पटल पर उन्हें रखकर वाह-वाही की जाती है और उसके बाद किन्तु-परन्तु का सहारा ले, अपने ही प्रयासों को ढाक के तीन पात साबित करने में कोई कमी नहीं रखी जाती है।
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विश्व समेत देश की तेजी से बढ़ती जनसंख्या को लेकर चिंतित होना, वैचारिक धरातल पर इसके लाभ-हानि पर चर्चा करते हुए लोगों में जागरुकता लाना एक बात है और जनसंख्या नियंत्रण के लिए बकायदा कानून बना देना और सख्ती से उन्हें लागू करना दूसरी बात है। इसलिए कहा जाता है कि जब सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ ही साथ रोजगार के अवसर मुहैया कराने में फेल होने लग जाती हैं तो जनसंख्या विस्फोट और जनसंख्या नियंत्रण जैसी बातें की जाने लगती हैं। इनका मकसद दरअसल लोगों का ध्यान असली समस्या से हटाकर दूसरी ओर लगाना होता है।
इस बात में बहुत हद तक सच्चाई है, क्योंकि जनसंख्या वृद्धि कोई आज की समस्या तो है नहीं, बल्कि सालों से इस पर बहस जारी है। जनसंख्या नियंत्रण के सुझाव मंगाए जाते हैं और वैश्विक पटल पर उन्हें रखकर वाह-वाही की जाती है और उसके बाद किन्तु-परन्तु का सहारा ले, अपने ही प्रयासों को ढाक के तीन पात साबित करने में कोई कमी नहीं रखी जाती है।
ऐसा नहीं है कि आज तक जनसंख्या विस्फोट को काबू करने के प्रयास ही नहीं हुए हैं, बल्कि कोशिशें तो बहुत की गईं हैं, जिस कारण भारत के नागरिकों को तो आपातकाल और नसबंदी की याद भी अकस्मात आ ही जाती है। याद करें हिंदुस्तान का 1975 वाला वह दौर जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया, जिसकी याद आज भी भुलाए नहीं भूलती है। उसी दौर में इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी ने नसबंदी का फैसला लिया, जिसकी याद करते हुए लोग कांप जाते हैं। नसबंदी ही नहीं बल्कि आपातकाल थोपने के फैसले के पीछे भी संजय गांधी ही थे। उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के लिए सितंबर 1976 में अनिवार्य नसबंदी कार्यक्रम शुरू किया। इसके चलते जबरन नसबंदी कराई गई। उस समय हालात इस कदर खराब थे कि गैरशादीशुदा लोगों की भी नसबंदी करा दी गई, जिसके अनेक मामले सामने आए, जिसके बाद एक भय का वातावरण भी निर्मित हो गया था। यहां इस वृत्तांत की याद यूं हो आई कि एक बार फिर भारत में जनसंख्या नियंत्रण पर बहस छेड़ दी गई है। इसी के साथ भारत में गरीबी और बेरोजगारी की मुख्य वजह बढ़ती जनसंख्या को मानने वालों की कतार में अब योग गुरु बाबा रामदेव भी आ गए हैं।
बाबा रामदेव ने कहा है कि अब कानून के जरिए ही आबादी पर लगाम लगाई जा सकती है। इसके तहत दो बच्चों की नीति का समर्थन करते हुए उन्होंने तीन बिंदुओं वाला एक फॉर्मूला भी सरकार को सुझाया है।
गौरतलब है कि यह फॉर्मूला जनसंख्या नियंत्रण को परिभाषित करने वाले विषय विशेषज्ञों से थोड़ा हटकर है। दरअसल विशेषज्ञों की राय में कृत्रिम तरीकों को अपनाते हुए जनसंख्या वृद्धि की दर को बदलने के फार्मूले को जनसंख्या नियन्त्रण कहा जाता है। इस दृष्टि से जिन देशों में जनसंख्या क्षेत्रफल की दृष्टि से कम होती है वहां जनसंख्या वृद्धि की दर को बढ़ाने का लक्ष्य रखा जाता है, जबकि गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्या से जूझते देशों की जनसंख्या वृद्धि की दर को कम करना लक्ष्य रखा जाता है।
मूलत: 1950 से 1980 के मध्य में संपूर्ण विश्व की जनसंख्या में वृद्धि और गरीबी, पर्यावरण बिगड़ने एवं राजनैतिक स्थायित्व आदि पर इसके बुरे प्रभावों को देखते हुए ही जनसंख्या वृद्धि की दर को कम करने की कोशिशें शुरु की गईं थीं। भले ही इसके सकारात्मक परिणाम अभी तक देखने को नहीं मिले हों, लेकिन इसकी उपयोगिता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
यही वजह है कि दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई जिसमें केंद्र को जनसंख्या नियंत्रण के लिए कदम उठाने के निर्देश दिए जाने की मांग भी कर दी गई है। इस याचिका में भी यही कहा गया है कि देश में जो अपराध का ग्राफ बढ़ रहा है उसके पीछे जनसंख्या विस्फोट एक प्रमुख कारण है। इसी तरह प्रदूषण बढ़ने और संसाधनों एवं नौकरियों की कमी का मूल कारण भी जनसंख्या विस्फोट है। इसलिए जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता देश में महसूस की जा रही है, जिसके लिए तमाम जिम्मेदारों को आगे आना चाहिए और एक ऐसा निर्णय लिया जाना चाहिए, जिससे जनसंख्या नियंत्रित भी हो जाए और किसी प्रकार का कोई विरोध भी न होने पाए। इसके लिए वैसे तो बहुत पहले अमृत्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक पक्ष को सामने रखते हुए जनसंख्या नियंत्रण करने का फार्मूला सुझाया था, लेकिन उस पर भी सहमति नहीं बन सकी। बहरहाल जनसंख्या विस्फोट एक बार फिर चर्चा का विषय बन चुका है, लेकिन इसे गलत दिशा में मोड़ने वालों से सावधान रहने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसे शरारती तत्व इस मामले को भी धर्म, जाति, संप्रदाय और क्षेत्र विशेष से जोड़कर विवादित बना देते हैं। इससे गुरेज किया जाना चाहिए और कोशिश की जानी चाहिए कि समस्या का समाधान समूल हो, ताकि आने वाली पीढ़ी भी चैन और सुकून से अपनी जिंदगी बसर कर सके।


