यूक्रेन की बर्बादी का नया कदम
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अमेरिकी राष्ट्रपति की अचानक गोपनीय यूक्रेन की यात्रा ने पूरे विश्व को चौंका दिया है। हवाई जहाज से पोलैंड तक और गुप्त तरीके से फिर रेल से कीव पहुंचने की कवायत ने यूक्रेन रूस के युद्ध को आगे बढ़ाने का नया संदेश दिया है। यह घटना युद्ध की आग में घी डालने जैसी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यूक्रेन के राष्ट्रपति के साथ मिलकर गर्मजोशी से उसे करोड़ों डॉलर की सामरिक मदद करने की घोषणा की है जबकि यूक्रेन के राष्ट्रपति हर देश से एयरक्राफ्ट की मांग करते रहे हैं पर किसी देश ने उन्हें एयरक्राफ्ट देना स्वीकार नहीं किया। इसके पहले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक नहीं यूक्रेन यात्रा कर उसे मदद करने का ऐलान किया था। कुल मिलाकर विश्व शांति के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है। यह घटनाक्रम और अमेरिका ब्रिटेन तथा यूरोप के देश युद्ध को खत्म किए जाने की भारतीय पहल को एक सिरे से खारिज कर रहे हैं।
युद्ध और हिंसा क्रोध से शुरू होकर पश्चाताप और दुखों के चिंतन में खत्म होता है। रूस और यूक्रेन युद्ध कि कइ दिनों से ज्यादा के युद्ध की परिणति में शिवाय पश्चाताप के कुछ नहीं हैl रूस अपने सनकी राष्ट्रपति पुतिन की जिद की बलि चढ़ गया है। वह यूक्रेन से जीत कर भी मानसिक और वैचारिक रूप से हार गया हैl रूस अपने को जितना बलशाली, शक्तिशाली समझता था अब उसकी पोल खुल गई है,अनेकों माह से ज्यादा के युद्ध में रूस यूक्रेन जैसे छोटे देश को जीत नहीं पाया हैl यूक्रेन भी अपनी राष्ट्रपति की हठधर्मिता के कारण पूर्ण रूप से बर्बाद हो चुका है. यूक्रेन के 1करोड़40लाख नागरिक देश छोड़कर शरणार्थी बन चुके हैं।
40 हजार इमारतें बर्बाद हुई 20 लाख बच्चे घरों से दूर होकर शिक्षा से वंचित हो गए। ईसी तरह यूक्रेन तथा रूस के लगभग 50 बाजार सैनिक युद्ध में मारे गए है।यह युद्ध की विभीषिका कहां तक जाएगी इसका आकलन करना तो कठिन है पर इसके परिणाम अत्यंत अमानवीय,कारुणिक और आर्थिक नुकसान देने वाले साबित हुए हैं।

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रूस के साथ युद्ध में यूक्रेन के तथाकथित दोस्तों अमेरिका तथा नैटो देशों ने सक्रियता से मैदान में साथ नहीं दिया, केवल दूर से यूक्रेन को शाबाशी देते रहे यूक्रेन अब संपूर्ण बर्बादी के कगार पर है। रूस का उसके अपने ही राष्ट्र में युद्ध के खिलाफ विरोध के स्वर उभर रहे हैं। नोबेल पुरस्कार प्राप्त पत्रकार ने अपने पूर्व में प्राप्त नोबेल पुरस्कार मेडल को बेचने का ऐलान किया है एवं यूक्रेन में मरने वाले हजारों बच्चों के हित में वह धनराशि रेड क्रॉस को प्रदान करेगा। पत्रकार ने कहा कि यूक्रेन पर रूस के आक्रमण का रूस की जनता अंदरूनी तौर पर विरोध करती है एवं भारी असंतोष भी हैl मैं आपको रूस यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि का इतिहास बताता हूं।
यूक्रेन एक छोटा सा राज्य है, उसकी सैन्य शक्ति भी इतनी क्षमतावान नहीं है कि रूस या अन्य शक्तिशाली देश का सैन्य मुकाबला कर सके,पर अमेरिका, ब्रिटेन और नाटो के 30 देशों के बहकावे में आकर उसने रूस को नाराज करना शुरू कर दिया था। यूक्रेन को यकीन था कि रूस के आक्रमण के समय अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इजरायल और नाटो के कई देश उसकी रक्षा करेंगे, पर ताकतवर,शक्तिमान रूस के हमले के सामने ना तो अमेरिका ने अपना सैन्य आक्रमण किया ना ब्रिटेन ने अपनी सेना ही भेजी और ना ही अन्य नाटो देश में रूस के खिलाफ किसी तरह की जंग ही की है ,केवल दूर से बैठकर समझौते करने की बात करते रहे और रूस के आक्रमण की निंदा ही की है। यह आलेख लिखते तक रूस ने कीव पर कब्जा भी कर लिया होगा और उसके समस्त एयर बेस सैनिक अड्डों को नष्ट कर दिया है।
यूक्रेन का एयर डिफेंस पूरी तरह चरमरा गया है। यूक्रेन के राष्ट्रपति ने बताया कि रूस ने सभी सैनिक हवाई अड्डों पर रॉकेट लॉन्चर दाग कर उन्हें पूरी तरह नष्ट कर दिया है, यूक्रेन के लगभग 40 सैनिकों को मार भी गिराया है, इसमें 10 निर्दोष नागरिक भी मारे गए हैं। रूस ने दावा किया था कि वह नागरिक ठिकानों पर बमबारी नहीं करेंगा पर मिसाइल तथा गोलियां सैनिकों तथा नागरिकों को अलग-अलग नहीं पहचानती है, और यही वजह है कि सैनिकों के साथ नागरिक भी मारे गए।
वर्ष 1914 में यूक्रेन से रूस ने क्रीमिया को अलग कर अपने अधिपत्य में ले लिया था। रूस का कहना है कि अमेरिका ब्रिटेन और नाटो देश यूक्रेन को एक न्यू क्लियर सामरिक अड्डा रूस के खिलाफ बनाने की तैयारी कर चुके हैं, और इन सभी देशों के साथ यूक्रेन भी रूस की प्रतिरक्षा प्रणाली को बहुत बड़ा खतरा बन गया है। यूक्रेन पर अमेरिकी प्रशासन का पूरा पूरा नियंत्रण है, यूक्रेन प्रशासन केवल कठपुतली मात्र है। इसे संचालित करने वाला अमेरिका तथा ब्रिटेन ही है।

यूक्रेन लगातार नाटो देश की सदस्यता के लिए प्रयास करता रहा है और अमेरिका चाहता है कि यूक्रेन नाटो देश का सदस्य बन कर रूस के खिलाफ एक सामरिक अड्डे की तरह उनके काम आए। तत्कालिक कारणों में रूप द्वारा गैस तथा तेल के लिए बिछाई गई पाइप लाइन जो जर्मन तक गैस तथा तेल पहुंचाने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ थी।
जर्मन एक बहुत बड़ा तेल तथा गैस का बाजार है, यहां से सारे यूरोप में आर्थिक गतिविधि शुरू होकर गैस तथा तेल की सप्लाई की जाती है जो कि एक महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्र है यह गैस पाइपलाइन यूक्रेन के क्षेत्र से होकर जनवरी तक जाती है। इससे नाटो देश को बहुत ज्यादा आर्थिक नुकसान की संभावना भी है।
दूसरी तरफ यूक्रेन, क्रीमिया को अपने पास वापस अपने अधिपत्य में लेना चाहता है, जो वर्तमान में रूस के कब्जे में है, इसके अलावा रूस ने यूक्रेन के दो बड़े क्षेत्र लुहानस्क और डोनट्स रिपब्लिक को राज्य के रूप में मान्यता दे दी है, यह बहुत बड़े क्षेत्र और इन्हीं के माध्यम से उसने अपनी सेना को यूक्रेन में दाखिल भी किया था।
इन दो बड़े रिपब्लिक को देश की तरह मान्यता देने पर अमेरिका तथा ब्रिटेन और नाटो देशों ने अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन की बात कह कर भरपूर सार्वजनिक निंदा भी की है और किसी स्वतंत्र देश की प्रभुसत्ता पर हस्तक्षेप भी बताया है। रूस के इस यूक्रेन पर आक्रमण से भारत की चिंता अपने 20 हजार नौजवान छात्रों को जो युक्रेन में अध्ययन कर रहे थे।
अब वहां फंसे हुए हैं, उन्हें बचाने की भी है। यूक्रेन तथा रूस के बीच शांति स्थापना के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मध्य रात्रि के बीच लगभग 40 मिनट बात कर शांति स्थापना के अपील भी की है एवं नागरिकों को वहां से निकालने की चिंता से भी अवगत कराया है। निश्चित तौर पर भारत के यूक्रेन तथा रूस के साथ अच्छे संबंधों के कारण शांति बहाली की अपील कर रहा है, और इसका असर भी हो सकता है ।
यह तो तय है कि रूस और यूक्रेन के बीच यदि युद्ध में कोई भी विदेशी ताकत हस्तक्षेप करती है, तो विश्व युद्ध की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है। रूस ने यूक्रेन की मदद के लिए किसी भी देश के आने पर भयानक परिणाम होने की चेतावनी भी दे डाली है। यूक्रेन को इस आफत में फंसाने एवं उसे रूस के विरुद्ध उकसाने के लिए अमेरिका ब्रिटेन और नाटो देशों की भूमिका सदैव संदिग्ध ही रही है।


