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देश में लोकतांत्रिक शासन के लिये लम्बे चुनाव समर की धूल अब बैठ गयी है। एक दूसरे के खिलाफ खून पसीना बहाने वाले राजनीतिक दलों के अतिबली मुखिया भी थकान मिटा कर अपनी खूबियों और खामियों का मीजान लगाने में जुट गये हैं। समर में जय हो या पराजय जीते और हारे दोनों पर जिम्मेदारियां छोड़ जाती है। विजेता पर जनता से किये वादों को निभाने का बोझ होता है तो विजित पर अपने आप को इतना मजबूत करने की जिम्मेदारी होती है कि वो जनता के जायज मुद्दों को मजबूती के साथ उठा सके। मजबूत विपक्ष ही स्वस्थ लोकतंत्र की खुबसूरती जो है।
सरकार आखिर किस के लिये होती है। लोकतंत्र की परिभाषा तो यही कहती है कि सरकार आम लोगों यानी कॉमनमैन के लिये होती है। सरकार चलाने वालों का धर्म सूर्य के क्रियाक्लाप जैसा होना चाहिये जो समुद्र से जल राशि को सोख ले और बादलों के माध्यम से समान रूप से बरसात करके सभी को बराबर बांट दे। शासक का भाव परमार्थ का होना चाहिये स्वार्थ का नहीं। तभी लोकतंत्र का सही उद्देश्य साकार हो पायेगा। यह दुखद था कि आजादी के बाद से अब तक समय समय पर लोकतंत्र में भी राजतंत्र और राजवंश की कुपरम्पराएं सिर उठाती रहीं हैं।
बीते लोकसभा चुनाव में कॉमनमैन ने राजवंशीय प्रवृत्तियों पर जिस तरह से अंकुश लगाने का काम किया है वो भारत के लोकतंत्र के परिपक्व होते जाने का सुखद संकेत है।
नेहरू और इंदिरा के प्रधानमंत्रित्व वाली सरकारों के लम्बे समय बाद 2019 के जनादेश को इस दृष्टि से उल्लेखनीय कहा जा सकता है कि किसी एक राजनीतिक दल की सरकार को पूर्ण बहुमत से काम करने का अवसर मिला है। पर नयी बात ये है कि संघवाद को मजबूत करने के नजरिये से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अन्य समान धर्मी दलों को ही नहीं विपक्ष को भी विमर्श में साथ लेकर चलने की बात कह रहे हैं। साथ का मतलब केवल हां हुजूरी नहीं बल्कि अगर सरकार की नीतियों में कोई खामी है तो विपक्ष उस ओर इंगित करे और सार्थक सुझाव दे ताकि देश तरक्की की राह पर आगे बढ़े।
देश के सामने आज विकास के साथ कई समस्याएं मुंह बाये खड़ी हैं। किसान, नौजवान बेहाल है। किसान की आय दूनी कैसे हो और खासकर नौजवान खेती किसानी से कैसे जुड़े यह एक बड़ी चुनौती सामने है। यह सच है कि मशीनीकरण के दौर में हाथों को काम घटे हैं। ऐसे में शिक्षा के मॉडल को बदल कर ऐसा कैसे बनाया जाये जो नये समय के हिसाब से युवाओं को काम की गारंटी दे सकें।
कॉमनमैन की ही नसों में गहराई से घुस चुके भ्रष्टाचार और दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार कैसे किया जाये। सार्थक शिक्षा और स्वास्थ्य को सबको कैसे सुलभ कराया जाये। जाति, धर्म की दीवारों को मिटा कर कैसे सबके अंदर भारतीयता का भाव जगाया जाये।
इन सबके उपर देश की बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं और उपलब्ध संसाधनों का संतुलन साधा जाये। पंचतत्वों से मिल कर बना शरीर जब बच पायेगा तभी तो वसंुधरा को भोग पायेगा। देश के पानी, वायु, वनस्पति पर खतरा मंडरा रहा है। ये तय मान लीजिये कि सारा काम अकेले कोई सरकार नहीं कर सकती है। एक शब्द है सिविक सेंस यानी नागरिक होने का बोध। इसका मतलब है कि किसी देश के नागरिक होने के नाते यदि हमारे अधिकार होते हैं तो कुछ कर्तव्य भी हैं। भारतीय नागरिक जब विदेश जाते है तो न यहां वहां थूकेंगे, गंदगी फैलायेंगे, न उल्टा चलेंगे, न लालबत्ती जम्प करेंगे। पर यही काम जब वो भारत में करते हुए रोके जायेंगे तो धौंस दिखायेंगे कि जानते नहीं मै कौन हूं।
पहली बार हमारे किसी प्रधानमंत्री ने 2014 से स्वच्छता अभियान को कॉमनमैन का आंदोलन बनाया है और योग के जरिये कॉमनमैन की जनरल फिटनेस की चिंता की है वो काबिले तारीफ है। अब देखना ये है कि अपनी दूसरी पारी में वो कैसे देश की साठ परसेंट से उपर युवा आबादी के हाथों को काम का इंतजाम करते है ताकि वे आतंकवाद और नक्सलवाद के झांसे में न आयें। देखना ये भी होगा कि मोदी सरकार 2.0 दुनिया के साथ खासकर पड़ोसियों से अपने संबधों को कैसे नये सिरे से परिभाषित करती है।
परिस्थितियां तो अनुकूल ही कही जायेंगी क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार तो है ही मैन्यूफैक्चरिंग और लघु ओर मझोले उद्योग क्षेत्र में भारत के विकास की संभावनाएं अनंत हैं। सकारात्मक सोच के लिये गुजाइश तो रखनी ही चाहिये।


