अधिकारियों, राजनेताओं, इंजीनियरों, सलाहकारों और ठेकेदारों को अपने जीवन, वेतन, पदोन्नति और करियर से मतलब है। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि उनके निर्णय और कार्य नदियों को प्रभावित कर सकते हैं कि क्या नदियां प्रदूषित हैं या नहीं? और जो दूषित नदियों से प्रभावित होते हैं उन्हें ऐसे कायदे-कानूनों से कोई मतलब नहीं है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गंगा को अपनी मां कहते हैं। हालांकि, अब हमें यथार्थवादी हो जाना चाहिए। हमारी नदियां संभवत: दुनिया के लगभग सभी देशों की नदियों में सबसे अधिक खराब स्थिति में हैं। यह स्थिति बद से बदतर होती जा रही है’, मोदी शासन में भी यही जारी रहा है। वास्तव में, नदियों को बचाने के लिए कौन सामने आया है?
कुछ आध्यात्मिक व्यक्तियों जैसे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल (स्वामी सानंद) और हरिद्वार में मातृसदन के अन्य स्वामियों व कुछ नागरिक संगठनों को छोड़कर, कोई भी नदियों के संरक्षण के लिए सामने नहीं आया? निश्चित रूप से, नदियों पर आश्रितों में लाखों मछुआरे, नाव, लोग, नदी के किनारे खेती करने वाले किसान हैं। लेकिन, जब नदियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने वाली फसलों की बात आती है तब कौन उनकी खोज-खबर लेता है, या उन्हें विश्वास में लेता है?

सरकार को नदियों का संरक्षक होना चाहिए। सरकारों का नदियों पर पूरा अधिकार भी है लेकिन मूलरूप से हमारी नदियों की स्थिति के लिए भी जिम्मेदार होना चाहिए है। नदियों की दशा यह दर्शाती है कि सरकार अपनी भूमिका का पालन करने के लिए पूरी तरह अयोग्य है। इसलिए उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना को एक व्यक्ति का दर्जा देना की जो बात कही वह नदियों के कई पर्यवेक्षकों और भक्तों को अजीब लग रही थी। सरकार ने किया क्या, बस अपने ही अधिकारिओं को बना दिया इन व्यक्तियों का ‘अभिभावक’।
भारत की न्यायपालिका की दिशा बिलकुल ठीक है। स्वच्छ धारा वाली नदियों का अस्तित्व ही न्यायिक समीक्षा का आदेश है। सुप्रीम कोर्ट में तीन दशकों से स्वच्छ गंगा और 24 सालों से मैली यमुना के मामले निपटाए जाने कि कोशिश जारी है। बहरहाल न्यायालय के होते हुए भी दोनों नदियों की स्थिति लगातार खराब हो रही है।
ऐसी प्रतिष्ठित नदियों के लिए कोई ठोस दीर्घकालिक उपाय नहीं किए गए हैं। भारतीय नदियों की इस दुर्दशा को मीडिया या संसद कैसे निपटाता है, उसकी भी ऐसी ही कहानी है। यहां तक कि कुछ अपवादों को छोड़कर नदियों के सभी उत्सवों, जिनमें हम शामिल होते हैं, हमें यह पता भी नहीं होता है कि वे नदियों के मुद्दों को उठा भी रहे हैं या सिर्फ दिखावे के लिए आयोजित किये जाते हैं।
यह हमारी नदियों की स्थिति को और खराब करने में अपना योगदान करते हैं। वास्तव में वार्षिक कार्यक्रम एक डर के साथ आयोजित किये जाते हैं कि कैसे नदियों में देवी-देवताओं की मूर्तियां सिराई जायेंगी जिसके साथ नॉन-बायोडिग्रेडेबल अपशिष्ट पदार्थ भी होंगे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) जो 44 वर्षों से अस्तित्व में हैं और उन्हें तमाम शक्तियां और परीक्षण सुविधाएं मिली हुई हैं लेकिन सभी नकारा साबित हो रहे हैं। पर मोटे तौर पर हमें यह भी नहीं दिखता कि इन संस्थाओं की प्रणाली ने एक भी नदी या नाले की मानक स्तर पर सफाई करवाई हो। कोई भी उम्मीद नाकाफी है फिर भी हम तलाश में जुटे हुए हैं।
नदी इतनी सुन्दर मगर संरक्षण प्रणाली इतनी जटिल क्यों?
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हमारी नदियों को कौन नियंत्रित करता है?
उमीद के विपरीत छोटा जवाब – कोई नहीं, जब तक कि कोई ऐसा संस्थान न आ जाए जो हमारी नदियों की स्थिति के लिए जिम्मेदार हो। वास्तव में न तो निगरानी संभव है और न ही नदियों की स्थिति पर भारत सरकार की कोई एक रिपोर्ट सफलता का सोपान हो सकती है।
नदियां आमतौर पर बांध, हाइड्रोपावर परियोजना, विविधता, जलग्रहण क्षरण, अतिक्रमण, सतत खनन, प्रदूषण, अनियमित भूजल का उपयोग, पानी की बढ़ती मांग, शहरीकरण, अन्य कारणों से प्रभावित होती है। बर्फबारी और बारिश के बदलते स्वरूप, ग्लेशियरों के पिघलने, बाढ़ और सूखे के बढ़ते स्तर और बढ़ते समुद्र के स्तर के साथ जलवायु परिवर्तन बिगड़ रहा है, इसके अलावा बढ़ते तापमान के कारण भी पानी की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है।
ऐसी व्यवस्था पर धिक्कार है
यह किसी का मामला नहीं है कि हम नदियों का उपयोग नहीं करते हैं। हालांकि, हम नदियों के स्थायी अस्तित्व को तभी सुनिश्चित कर सकते हैं जब हम नदियों का उपयोग करेंगे। नदियों को प्रभावित करने वाली प्रतिकूल परियोजनाओं के बारे में निर्णय लेने से पहले हमें यह समझना होगा कि नदियां क्या हैं और वे हमें क्या सेवाएं देती हैं।
उदाहरण के लिए हम बांध को ले सकते हैं। बांध जैसी बड़ी परियोजनाओं के लिए केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) से तकनीकी-आर्थिक मंजूरी लेनी पड़ती है, जिसमें लागत लाभ विश्लेषण (सीबीए) भी शामिल रहता है। किसी भी बांध के सीबीए को देखें और लागत के बदलाव को देखें। आप पाएंगे कि स्टील, सीमेंट, मजदूर, मशीन, जमीन, पेड़ आदि की कीमत देख सकेंगे, मगर नदी की कीमत क्या है? नहीं, बिल्कुल भी नहीं। बांध के ऊपर और नीचे दोनों तरफ, बांध नदियों और उनके प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। तो इसका क्या मतलब निकला जाये?
अगर कहा जाए तो सरकार के लिए हमारी नदियों का महत्व शून्य है। यही हकीकत है। दुर्भाग्य से, सीडब्लूसी की विचारधारा पर्यावरण को छोड़ दें तो इससे उसका नकारापन ही झलकता है। अब हमें यह समझना चाहिए कि बांध क्यों बनवाये जाते हैं। भारत के 5,700 बड़े बांधों में से लगभग 97% बांध सिंचाई कार्य के लिए बनवाये जाते हैं। शुद्ध राष्ट्रीय सिंचित क्षेत्र के लिए एमएंडएम परियोजनाओं के योगदान में वास्तव में पिछले 25 वर्षों में गिरावट आई है।
बाकी के बड़े बांध जलविद्युत परियोजना के लिए बनाये जाते हैं, और भारत व विदेश में स्टेकहोल्डरों में इस बात की आम सहमति बढ़ती जा रही है कि अब बड़े जलविद्युत परियोजना व्यवहारिक रूप से सही नहीं है। वर्तमान और पूर्व दोनों जल संसाधन सचिवों ने भी इंडिया रिवर्स वीक, 2018 में इसी बात पर जोर दिया कि बड़े हाइड्रो अब व्यवहार योग्य नहीं है। इसके साथ ही यह सहमति भी बढ़ती जा रही है कि बांध, बाढ़ को रोकने में सहायक न होकर बाढ़ का कारण बन सकते हैं, अगर उनका संचालन ठीक से नहीं हुआ तो वैसा ही होगा जैसा पिछले वर्ष मानसून के दौरान केरल में हुआ। विश्व स्तर पर, बांधों के विघटन और नदियों के लिए जगह बनाने के लिए एक तरह का आंदोलन चल रहा है। इसके बावजूद भारत सरकार क्यों बड़े बांध बनाने और नदियों को आपस में जोड़ने पर जोर देती रही है?
निष्कर्ष निकालने के लिए, अधिकारियों, राजनेताओं, इंजीनियरों, सलाहकारों और ठेकेदारों को अपने जीवन, वेतन, पदोन्नति और करियर से मतलब है। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि उनके निर्णय और कार्य नदियों को प्रभावित कर सकते हैं कि क्या नदियां प्रदूषित हैं या नहीं? और वे लोग जिनका जीवन और आजीविका स्वच्छ पानी की नदियों पर निर्भर है, असल में नदियों को प्रभावित करने वाले निर्णयों या कार्यों से उनका लेना-देना कुछ भी नहीं है।
हम भारत में इस विभाजन को कब मिटाएंगे? क्या यह रडार पर भी है? क्या हम इस विभाजन को खत्म किए बिना अपनी नदियों की स्थिति में सुधार कर सकते हैं? इसीलिए, यह सवाल फिर से उठता है कि हकीकत में नदियों की जरूरत किसे है?



