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क्या आपने कभी उस युवा की आंखों में देखा है, जो बेरोजगारी की आग में अपनी डिग्रियों को जलाकर राख कर देने के लिए विवश है? क्या आपने कभी उस बेरोजगार का हाल पूंछा है जो दिन में दफ्तरों के चक्कर काटता है पर हर बार गेट से ही उसे वापस कर दिया जाता है और रात में घर वापस आकर वह फिर अखबारी विज्ञापनों में रोजगार की खोज करता है? क्या आपने कभी उस बेरोजगार को गले लगाया है घर में जिसे निकम्मा कहा जाता है और समाज में आवारा, जो हर रात निराशा की नींद सोता है और आंसुओं के खारे पानी को पीकर अपना मौन विलाप करता है?
यूं तो रोजगार का मुद्दा समूचे देश में एक ज्वलंत मुद्दा है, लेकिन देश के दूर-दराज़ के इलाकों में यह समस्या और भी गंभीर है क्योंकि स्व-रोजगार की संभावनाएं बहुत कम हैं। छात्रों के पास ले देकर एक ही विकल्प रह जाता है। किसी तरह सरकारी नौकरी हाथ आ जाए।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि रोजगार क्षेत्र के हालात संकट में हैं। शिक्षित युवाओं की फौज तो बढ़ रही है, सरकारें उन्हें रोजगार मुहैया नहीं करा पा रहीं। निजी क्षेत्र में स्थिति और गंभीर है, जहां सिर पर हमेशा छंटनी की तलवार लटकी रहती है।
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार ऐसे विषय हैं जिनसे केंद्र और राज्य की सरकारें मुंह नहीं मोड़ सकतीं। शिक्षित नौजवानों को रोजगार मुहैया कराना सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन हालात और आंकड़े बताते हैं कि इन तीनों मोर्चों पर भारत का सरकारी तंत्र विफल साबित हुआ है। जब चुनाव करीब आते हैं तो हर दल और सरकार के लिए रोजगार एक बड़ा मुद्दा इसलिए बन जाता है कि नौजवान मतदाता बड़े वोट बैंक होते हैं। इसलिए तब हर दल और सरकारें बड़े-बड़े दावे करते हैं, बेरोजगारी भत्ते जैसे प्रलोभन देते हैं, लेकिन चुनाव बाद ये वादे हकीकत में तब्दील होते नजर नहीं आते। लाखों रुपए खर्च करके पढ़ाई करने के बाद काम नहीं मिलना निश्चित रूप से युवाओं में हताशा पैदा करने वाली बात है।
मौजूदा हालात करेला नीम चढ़ा की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। उदारीकरण के बाद भारतीय शिक्षा प्रणाली ऐसी हो गई है कि यह न तो छात्रों को ज्ञानी बनाती है न ही नौकरी देती है। नौकरियां कम हैं और नौकरी चाहने वालों की संख्या करोड़ों में है। उस पर, शैक्षणिक संस्थानों में सीटों में कटौती तथा सरकारी व निजी दोनों ही क्षेत्रों में नौकरियों की कमी ने इन युवाओं के हजारों सपनों को तोड़ दिया है। उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। हालात का मारा बेरोजगार व्यक्ति जो पीएचडी डिग्री के बावजूद चपरासी बनने के लिए तैयार हो जाता है या ठेके पर काम करने वाला नियोजित शिक्षक बनकर रह जाता है।
बेरोजगारी एक दिन की समस्या नहीं बल्कि इसके तमाम कारक हैं जिसमें से वैश्विक प्रतियोगिता एक अहम स्थान रखती है। विश्व प्रतियोगिता में बने रहने के लिए भारत में एक तरफ 30 अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विश्वविद्यालय व 15000 गुणवत्तापरक शिक्षा के आइकान के रूप में श्रेष्ठ कालेजों की जरूरत महसूस हो रही है तो दूसरी ओर निजी विश्वविद्यालयों तथा कालेजों की कुकुरमुत्तों जैसी वृद्धि ने शिक्षा के क्षेत्र में व्यवसायिक शोषण और गुणवत्ता से समझौता करने की आम प्रवृत्तियों को चिन्हित करने की हद तक रेखांकित भी किया है। ऐसी दशा में यह आम सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि शिक्षा का विकास किसके लिये और क्यों? क्या यह विकास शिक्षा के व्यापारियों के लिये है?
बेरोजगारी और इसके आंकड़ों को लेकर देशभर में जो बहस चलती रही है वह सरकार के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कुछ सालों में केंद्र और राज्य सरकार ने अपने यहां लाखों नौकरियां खत्म कर दी हैं।
रोजगार के नाम पर कम पैसे में ठेके पर काम पर रखने की नीति चल पड़ी है। हाल में फिर लाखों नौकरियों के सृजन का दावा किया गया है। सरकार के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) ने साल 2017 जो रिपोर्ट जारी की थी वह हकीकत सामने लाने वाली थी। इसमें कहा गया था कि पैंतालीस साल में पहली बार बेरोजगारी दर छह फीसद से ऊपर निकल गई है। इससे सरकार के हाथ-पैर फूल गए थे और सरकार ने इसे अधूरा करार दिया था। इससे साफ है कि रोजगार को लेकर सरकारी दावे जहां खोखले साबित हो रहे हैं वहीं आंकड़े भ्रम पैदा कर रहे हैं। सवाल है कि अगर लाखों नौकरियां सृजित हो रही हैं, काम के मौके बन रहे हैं तो फिर नौजवानों को काम मिल क्यों नहीं रहा? बेरोजगारों की करुणा किसी भी चुनाव का मुख्य मुद्दा क्यूं नहीं बनती?



