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भारत को यदि वैश्विक मंच पर एक सशक्त उपस्थिति दर्ज करानी है, तो पहले उसे स्वयं को अंदर से स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनाना होगा। यह तो हो नहीं सकता कि वैश्विक मंच पर हम एक विकसित देश के रूप में स्थापित हो जाएं और राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में अंदर से पाखंड, जाति-भेद, अंधविश्वासों और अलगाव के वायरस से ग्रसित बने रहें।
भारत के लिए इससे अधिक लज्जास्पद और क्या होगा कि संपूर्ण योग्यताओं और संवैधानिक शक्तियां प्राप्त होने के बावजूद मात्र जातिगत पाखंड के कारण देश में ऐसा कई बार हुआ है, जबकि देश की विशिष्ट विभूतियों, जिनमें राष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और संवैधानिक पदों पर आसीन गणमान्य व्यक्तियों तक को हिंदू पूजा स्थलों में प्रवेश नहीं दिया गया।इन्हीं पाखंडों की वजह से भारत की जगहंसाई होती है और स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी भारत एक योग्यताविहीन व्यवस्था के रूप में विपन्नता और अवैज्ञानिकता का पर्याय बना हुआ है।
इस आशय के समाचार पूरे देश और विश्व की मीडिया द्वारा प्रसारित और प्रचारित किए जाते रहे हैं। जब विशिष्ट व्यक्तियों के साथ ऐसे कटु अनुभव होते रहते हैं, तो इस देश में सुदूर गांवों में आज भी जातिगत पाखंड की क्या स्थिति होगी, यह समझना कोई मुश्किल कार्य नहीं है।
यह आश्चर्य का विषय है कि ऐसी हैरतंगेज घटनाओं को भी देश में गंभीरता से नहीं लिया जाता। समाज में इस प्रकार की घटनाओं पर गंभीरता से विचारोत्तेजक चर्चाएं नहीं होतीं। आखिर क्यों ऐसी घटनाएं होने पर देश में हिंदू धमार्चार्य, धर्मगुरु और पुरोहित मुखर रूप से समाज में आदिकाल से व्याप्त जातिगत पाखंड के विरुद्ध खड़े नहीं होते और एक लक्ष्य बनाकर जातिभेद के इस दानव को समाज से क्यों नहीं समूल उखाड़ फेंकते? यह तय है कि जब तक ऐसा नहीं होगा, भारत में संपूर्ण समाज को एकजुट करना कभी भी संभव नहीं हो सकेगा। यह भी सुनिश्चित है कि एक बुरी तरह बंटा हुआ समाज और राष्ट्र कभी भी समर्थ, समृद्ध, सशक्त और पूर्ण विकसित नहीं हो सकता।
झूठे अहंकार और निहित स्वार्थों के लालच में आखिर कब तक जाति-भेद की इस अवैज्ञानिक और राष्ट्र विरोधी सोच को कायम रखा जाएगा? इसके चलते आज तक भारत राष्ट्र और हिंदू समाज वह सम्मानजनक एवं सु.ढ़ स्थिति प्राप्त नहीं कर सका है, जो उसे प्राप्त कर लेनी चाहिए थी। जिस देश में इतने उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन गणमान्य व्यक्ति भी कर्मकाण्ड, पाखंड और अंधविश्वास को रोकने में और उसकी बेड़ियां काटने में असमर्थ हों, वह राष्ट्र कैसे विश्व का सिरमौर बन सकता है और कैसे वह वैश्विक मंच पर एक सशक्त एवं सिद्ध नेतृत्व प्रदान कर सकता है?
विश्व की अन्य सभ्यताओं के विपरीत भारतीय समाज और सभ्यता बुरी तरह जातिवाद के पाखंड में उलझी हुई है।
समय के साथ अब विश्व की विभिन्न सभ्यताओं ने स्वयं को अधिक वैज्ञानिक और तर्कसंगत बना लिया है, परंतु भारतीय समाज आज भी सड़-गल चुकी इस पुरातन, अवैज्ञानिक व्यवस्था को बड़े जतन के साथ छाती से चिपकाए हुए है।
भारत में जिस तरह से लोगों को अपनी औलाद प्रिय होती है, उसी तरह अपनी जाति भी अतिप्रिय होती है। भारत में अच्छे और बुरे, गुण और अवगुण का आंकलन जाति के आधार पर किया जाता है। तार्किकता और वैज्ञानिकता का गला घोंटने का काम भारतीय समाज में जाति आधारित इस व्यवस्था ने किया है। भारत में लोग जहां एक ओर अपनी जाति के डकैतों और कुख्यात अपराधियों की भी पूजा करते हैं और उन्हें नायक मानते हैं, वहीं अन्य जातियों के संतों का तिरस्कार करने में भी इन्हें कोई संकोच नहीं होता।
प्रायः कहा जाता है कि भारत ‘अनेकता में एकता’ का प्रतीक है, तथा यहां की ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ भारत की विशेषता है। इस तरह अनेकता को एक सद्गुण के रूप में प्रचारित करने की कोशिश भारत में की जाती रही है। वास्तव में यह सत्य से परे है। ऐतिहासिक रूप से यह तथ्य सामने आते रहे हैं कि भारत अपनी विविधता के कारण अनेक अवसरों पर एक राष्ट्र के रूप में एकजुट नहीं हो सकता है। इसी अलगाव के कारण भारत अनेक बार पदाक्रांत हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय अनुभव यह सिद्ध करता है कि विश्व मंं सभी विकसित राष्ट्र एकजुट होकर एक ही शासन व्यवस्था में एक ही राष्ट्रवाद के तले एकीकृत हो सके हैं।
विविधता या अनेकता में एकता को खोजना मृग मरीचिका से ज्यादा कुछ भी नहीं है। भारत को इस प्रकार के खोखले आदर्शों से बाहर आना चाहिए। भारत में रहने वाले सभी नागरिकों को एक ही राष्ट्रध्वज के तले राष्ट्र को सशक्त बनाने के एकीकृत लक्ष्य के साथ परस्पर एकाकार होना चाहिए। दुर्भाग्यवश भारतीय समाज में अभी यह परिपक्वता और राष्ट्रभक्ति का ऐसा दृढ़ संकल्पभाव अभी तक उत्पन्न नहीं किया जा सका है। निजी हितों के आधार पर समाज कई खांचों में बंटा हुआ है। कहने को तो सवर्ण और दलित दोनों हिंदू हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यवहार में दोनों में बहुत फर्क दिखाई पड़ता है।
भारत में अनेक सामाजिक परिवर्तनों एवं आर्थिक बदलावों के बावजूद जाति व्यवस्था ने भारतीय समाज में अपना प्रभाव बनाए रखा है। निश्चित रूप से अनेक जातियों, उपजातियों, धार्मिक और जातीय संप्रदायों से बना भारतीय समाज बहुस्तरीय रहा है। हिंदू सामाजिक व्यवस्था, दलित जिसके अमूमन हिस्सा रहे हैं, वह जाति क्रम परंपरा के आधार पर सबसे नीचे स्थित है। इस व्यवस्था ने ऊंची जातियों और निम्न जातियों, पवित्र और अपवित्र जातियों में भेद खड़ा कर दिया। सामान्य भाषा में, जो लोग कभी अछूत, अस्पृश्य थे, उन्हें ही हम दलित कहते हैं। भारतीय संविधान ने इन जातियों को ‘अनुसूचित जाति’ की संज्ञा दी थी, परंतु सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इन जातियों के लोगों को ‘दलित’ कहना शुरू किया।
आज भारत के राजनैतिक, सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में लेखक और विद्वान सभी इसी शब्द का प्रयोग करते हैं। भारतीय संविधान ने अनुसूचित जातियों के उत्थान में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारतीय संविधान में नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(2) के अनुसार, किसी भी नागरिक के साथ उसके धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव (क) दुकानों, रेस्तराओं, होटल और सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों में प्रवेश (ख) कुओं, टंकी, स्नान घाटों, सड़कों और सार्वजनिक विश्राम स्थलों के प्रयोग को लेकर नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 15(4) के अनुसार राज्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े नागरिकों या अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान व व्यवस्थाएं कर सकता है। स्पष्ट है कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने इस बात को भली-भांति समझ लिया था कि हजारों वर्षों से समस्त प्रकार के संसाधनों से वंचित रहे करोड़ों नागरिकों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाए बिना भारत का समग्र विकास संभव नहीं हो सकेगा।
भारतीय व्यवस्था में योग्यता आधारित प्रणाली को प्रोत्साहित नहीं किया गया है। इसके कारण भारतीय प्रशासन और व्यवस्था तंत्र गंभीर दुर्गुणों से निरंतर ग्रस्त बना रहा है।
भारतीय शासन-प्रशासन में बड़े पैमाने पर व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ें भी भारत की सामाजिक दुर्व्यवस्था में ही कहीं छिपी हुई हैं। विशेषाधिकार से संपन्न सवर्ण की इच्छाएं असीम हैं और मानवाधिकार तक से विहीन, विपन्न वंचितों की अपनी इच्छाएं ही मर चुकी हैं। इसलिए सवर्ण अपनी असीम इच्छाओं की पूर्ति के लिए किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार कर सकते हैं और संसाधनों से युक्त सर्वत्र कब्जा जमाए बैठे उनके अपने रिश्तेदार उनके भ्रष्टाचार को छिपा भी सकते हैं।
दूसरी तरफ विपन्न वंचितों की इच्छाएं भी सीमित हैं और उनके छोटे से भ्रष्टाचार को छिपाने वाला उनका कोई रिश्तेदार भी ऊपर नहीं बैठा है। ‘डायवर्सिटी’ के माध्यम से अगर संख्या के अनुपात में सभी को संसाधनों में हिस्सा दे दिया जाये, तो सवर्णों का एकाधिकार कम होगा और वंचितों को भी उनकी संख्या के अनुपात में हिस्सा मिल जायेगा। तब सवर्ण भी भ्रष्टाचार करने में डरेंगे, क्योंकि उन्हें लगेगा कि ऊपर कोई वंचित भी हो सकता है, जो सवर्ण के भ्रष्टाचार को छिपायेगा नहीं।
‘डायवर्सिटी’ से वंचितों को भी उनकी जनसंख्या के अनुपात में ही भागीदारी मिलेगी और वे थोड़े अधिक संपन्न हो सकेंगे। यद्यपि भ्रष्टाचार करने की हिम्मत तब उनकी भी नहीं पड़ेगी। स्पष्ट है कि एक योग्यता आधारित, समतामूलक प्रशासनिक तंत्र की संरचना कर भ्रष्टाचार जैसी अनेक बुराइयों को पनपने से रोका जा सकता है।


