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दिल्ली सरकार ने भोजन की बर्बादी रोकने के लिये एक अच्छी पहल की है जिसकी सराहना की जानी चाहिये। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली सरकार ने राजधानी क्षेत्र के सभी वैवाहिक स्थल, होटल, मोटल और फार्म हाउसों में होने वाली शादी-समारोहों में खाने की बर्बादी रोकने को कमर कस ली है।
दिल्ली में अब शादी समारोहों के लिए आयोजकों को स्थानीय निकायों को सात दिन पहले बताना होगा कि कितने बाराती शादी समारोह में शामिल होगें। कार्यक्रम कितने बजे से शुरू होगा, कितने बजे समाप्त होगा। समारोह में खाना बचता है तो जरूरतमंदों के लिए वे किस संस्था या एनजीओ के पास पहुंचाएंगे, आयोजन कर्ताओं को इस बात की जानकारी भी देनी होगी। साथ ही एनजीओ या संस्था का नाम, पता व टेलीफोन नंबर भी देना होगा।
दरअसल खाने की बर्बादी गरीबों के साथ अन्याय है, उनका हक मरने जैसा ही है और इसकी अनदेखी समाजद्रोह है। हम जो जूठन छोड़ देते हैं, उससे हम कितने गरीबों का पेट भर सकते है। इस विषय पर उदासीनता गरीबों के साथ अन्याय है। इस पर सामाजिक जागरूकता बढऩी ही चाहिए।
भारतीय में अनाज को अन्नदेव का दर्जा प्राप्त है और यही कारण है कि हमारे देश में भोजन झूठा छोडऩा या उसका अनादर करना पाप माना जाता है। मगर आधुनिकता के चक्कर में हम अपने पुराने संस्कार भूल गए हैं। यही कारण है कि शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में रोजाना सैकड़ों टन खाना बर्बाद हो रहा है। देश में यह कैसी विडम्बना है कि एक तरफ करोड़ो लोग खाने को मोहताज है। वहीं लाखों टन खाना प्रतिदिन बर्बाद किया जा रहा है।
भारत में हर वर्ष जितना भोजन तैयार होता है उसका एक तिहाई बर्बाद चला जाता है। बर्बाद जाने वाला भोजन इतना होता है कि उससे करोड़ो लोगों की खाने की जरूरत पूरी हो सकती है। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में बढ़ती सम्पन्नता के साथ ही लोग खाने के प्रति असंवेदनशील हो रहे हैं। खर्च करने की क्षमता के साथ ही खाना फेंकने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। आज भी देश में विवाह स्थलों के पास रखे कूड़ाघरों में 40 प्रतिशत से अधिक खाना फेंका हुआ मिलता है। अगर इस बर्बादी को रोका जा सके तो कई लोगों का पेट भरा जा सकता है।
विश्व खाद्य संगठन के प्रतिवेदन के अनुसार हमारे देश में हर साल पचास हजार करोड़ रूपये का भोजन बर्बाद चला जाता है, जो कि देश के उत्पादन का चालीस फीसदी है।
एक ऑकलन के मुताबिक बर्बाद होने वाले भोजन की धनराशि से पांच करोड़ बच्चों की जिदगी संवारीं जा सकती है।
भूख से मौत वह भी भारत में यह सुनने में कितना अटपटा लगता है। भारत जहां अरबों रुपये के सरकारी अनुदान पर खाद्य सुरक्षा की कई योजनाएं चल रही हैं। जहां मध्याह्न भोजन योजना के तहत हर दिन 12 करोड़ बच्चों को दिन का भरपेट भोजन देने का दावा किया जाता हो। जहां हर हाथ को काम व हर पेट को भोजन के नाम पर हर दिन सरकारी कोष से करोड़ों रूपयें खर्च होता हो। वैसे भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चों के भूख या कुपोषण से मरने के आंकड़े संयुक्त राष्ट्र ने जारी किए हैं।
देश के 51.14 प्रतिशत परिवारों की आय का जरिया महज अस्थाई मजदूरी है। 4.08 लाख परिवार कूड़ा बीन कर, तो 6.68 लाख परिवार भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं।
हर दिन कई लाख लोगों के भूखे पेट सोने के गैर सरकारी आंकड़ों वाले भारत देश के ये आंकड़े भी विचारणीय हैं कि हमारे देश में हर साल उतना गेहूं बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट हुए गेहूं की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ रुपये होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को सालभर भरपेट खाना दिया जा सकता है। हमारे देश में 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इसलिए बर्बाद हो जाता है, क्योंकि उसे रखने के लिए हमारे पास पर्याप्त भंडारण की सुविधा नहीं है। औसतन हर भारतीय एक साल में छह से 11 किलो अन्न बर्बाद करता है। साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूं खुले में पड़े होने के कारण नष्ट हो जाता है, उससे ग्रामीण अंचलों में पांच हजार वेयरहाउस बनाए जा सकते हैं। बस जरूरत है तो एक प्रयास करने की।
हमारे यहां बचे हुये भोजन को फेंकना भले ही मामूली सी बात प्रतीत हो या फिर किसी बड़े कार्यक्रम की अपरिहार्यता बता कर इससे पल्ला झाड़ लिया जाए, लेकिन यह एक गंभीर समस्या है। इस संदर्भ में विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में खाद्यान्नों के अपव्यय से जुड़ी चुनौतियों का बारीकी से विश्लेषण किया गया है। संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है कि खाद्य अपव्यय को रोके बिना खाद्य सुरक्षा सम्भव नहीं है। इस रिपोर्ट में वैश्विक खाद्य अपव्यय का अध्ययन पर्यावरणीय दृष्टिकोण से करते हुए बताया है कि भोजन के अपव्यय से जल, जमीन और जलवायु के साथ साथ जैव-विविधता पर भी बेहद नकारात्मक असर पड़ता है।
रिपोर्ट के मुताबिक अपव्यय किए जाने वाले इस भोजन की वजह से तीन अरब टन से भी ज्यादा मात्रा में खतरनाक ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित होती है। रिपोर्ट बतलाती है कि हमारी लापरवाही और अनुचित गतिविधियों के कारण पैदा किए जाने वाले अनाज का एक तिहाई हिस्सा बर्बाद कर दिया जाता है।

हमारे यहां शादियों,उत्सवों या त्यौहारों में होने वाली भोजन की बर्बादी से हम सब वाकिफ हैं। इन अवसरों पर ढेर सारा खाना कचरे में चला जाता है। कई बार तो घरों के आसपास फेंके गए भोजन से उठने वाली दुर्गंध एवं सड़ांध वहां रहने वालों के लिए परेशानी खड़ी कर देती हैं। सड़ते भोजन को खाने से पशु-पक्षियों की मौतों की खबर भी हम अक्सर पढ़ते रहते है। शादियों में खाने की बर्बादी को लेकर भारत सरकार भी चिंतित है। खाद्य मंत्रालय ने कहा है कि वह शादियों में मेहमानों की संख्या के साथ ही परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या सीमित करने पर विचार कर रही है। इस बारे में विवाह समारोह अधिनियम, 2006 कानून भी बनाया गया है। हालांकि इस कानून का कड़ाई से कहीं भी पालन नहीं किया जाता है।
आज कल कई शहरो में समाजसेवी लोगो लोगो ने मिलकर रोटी बैंक बना रखा हैं। रोटी बैंक से जुड़े कार्यकर्ता शहर में लोगों के घरो से व विभिन्न समारोह स्थलों से बचे हुये भोजन को एकत्रित कर जरूरत मंद गरीबों तक पहुंचाते हैं। इससे जहां भोजन की बर्बादी रूकती हैं वहीं जरूरत मंदो को भोजन भी उपलब्ध होता है। इस दिशा में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अभियान सोंचे, खाए और बचाए भी एक अच्छी पहल है, जिसमें शामिल होकर की भोजन की बर्बादी रोकी जा सकती है। वर्तमान समय में समाज के सभी लोगों को मिलकर भोजन की बर्बादी रोकने के लिये सामाजिक चेतना लानी होगा। तभी भोजन की बर्बादी रोकने का अभियान सफल हो पायेगा।


