वफादार ली कियांग बने प्रधानमंत्री
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द रिपब्लिकन ऑफ चाइना के मुखिया सी जिनपिंग अब अपनी सत्ता के तीसरे दौर में पहुंच चुके हैं, वे अब् और मजबूत हो चुके हैं। उन्होंने अपने विश्वस्त साथी ली कियांग को को प्रधानमंत्री बनाया है। यह पोजीशन चीन में सत्ता के केंद्र में शी जिनपिंग के बाद के बाद दूसरे नंबर की ताकतवर पोस्ट है, उल्लेखनीय है कि ली कियांग को करोना काल में बुरी तरह असफल होने के बाद पूरी दुनिया में आलोचना का शिकार होना पड़ा था। अब उन्हें विश्व की दूसरी आर्थिक ताकत को फिर से पटरी पर लाने का जिम्मा सौंपा गया हैl
अपने विश्वस्त साथी को प्रधानमंत्री बना कर शी जिनपिंग चीन की सत्ता में और भी ताकतवर हो गए हैं। पड़ोसी देश होने के नाते भारत पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ने वाला हैl वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल में चीन की गतिविधियां विगत एक वर्ष से लगातार भारत को बेचैन करने वाली रही है, अब शी जिनपिंग के फिर से चीन के सदर हुक्मरान होने से ना सिर्फ भारत की विदेश नीति बल्कि अमेरिका, रूस, पाकिस्तान, श्रीलंका, उत्तर, दक्षिण कोरिया, बांग्लादेश, तालिबान और अन्य पड़ोसी देशों पर भी इसका प्रभाव ज्यादा पड़ने वाला है।
शी जिनपिंग के फिर से सत्ता में आने तथा उनकी आक्रामक नीति का असर भारत चीन संबंधों पर निश्चित तौर पर पड़ेगा, क्योंकि भारत चीन के साथ लगभग 3500 किलोमीटर लंबी भूमि सीमा लगी हुई है। यह सीमा जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश से होकर गुजरती है, और दोनों देशों के बीच कभी भी सीमा का निर्धारण नहीं हो सकता है। सीमा निर्धारण के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा बनाई गई है पर इस वास्तविक नियंत्रण रेखा का कोई अपना बहुत गहरा प्रभाव नहीं है। शी जिनपिंग के विस्तार वादी मंसूबों और उसकी आक्रामक शैली के कारण सीमा पर विवाद बढ़ने की संभावना नजर आती है, यह तो तय है कि दोनों देश युद्ध नहीं करना चाहेंगे।

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भारत ने चीन की सीमा कानून को एक सिरे से खारिज कर उसकी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़ी निंदा की है। अब सी जिनपिंग की तीसरी पारी में भारत को यह बात खटक रही होगी कि चीन की वास्तविक नियंत्रण रेखा यथा स्थिति बदलने के कदम को सही ठहराने के लिए सीमा कानून नियम का उपयोग न करें, इसके अलावा दक्षिण चीन सागर तथा हिंद महासागर में चीन तथा अमेरिका के बीच सामरिक टकराव बढ़ने की आशंका है। शी जिनपिंग के फिर से सत्ता में आने से अमेरिका के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है क्योंकि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के पास 8 लाख सक्रिय सैनिक हैं, चीन ने सेना में खर्च होने वाला बजट भी 4 गुना कर दिया है, ऐसे में चीन आगामी वर्षों में ताइवान को अपने कब्जे में लेने का प्रयास करेगा।
ताइवान की आजादी के लिए अमेरिका कृतसंकल्पित एवं कटिबद्ध है और यदि चीन ताइवान की आजादी में खलल डालने का प्रयास करेगा तो अमेरिका पीछे नहीं हटने वाला,फल स्वरूप चीन और अमेरिका में तनाव बढ़ने की पूरी संभावना है। चीन पहले से ही उत्तर कोरिया के मिसाइल कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करने में लगा हुआ है ऐसे में अमरीकी प्रशासन के लिए यह विषय चिंता का होगा। शी जिनपिंग के फिर से सत्ता में आने से चीन, तालिबान, पाकिस्तान गठबंधन मजबूती प्राप्त कर वैश्विक शांति के लिए एक बड़ा खतरा बन सकते हैं एवं आतंकवाद को नई बयार मिलने की संभावना है। म्यानमार में पहले से ही लोकतंत्र का गला दबाया जा चुका है।
उत्तर कोरिया की सैन्य हुकूमत ने म्यानमार में तानाशाही हुकूमत काबिज करके रखी है। शी जिनपिंग के ताकतवर होने से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई काफी कमजोर पड़ सकती है क्योंकि जिनपिंग जलवायु परिवर्तन को लेकर बहुत ही नकारात्मक रवैया अपनाए हुए हैं, जिनपिंग ग्लॉसको में हुए जलवायु परिवर्तन की बैठक में हिस्सा लेने के लिए ना तो खुद गए ना ही अपना प्रतिनिधि ही भेजा, यह सर्वविदित है कि चीन दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषण फैलाने वाले देशो में से एक देश है,और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिनपिंग चीन को दुनिया से अलग-थलग कर वहां तानाशाही का शासन लागू कर देगा।
चीन के नागरिक केवल चीन देश के होकर रह जाएंगे। उन्हें बाहरी दुनिया के संपर्क में आने का अधिकार भी नहीं होगा। कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर भी यही हाल रहा है, चीन की खबरें कभी भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर खुलकर नहीं आ पाई हैं। शी जिनपिंग अब एक तानाशाह शासक की तरह पेश आएंगे और चीन पूरी तरह से स्व केंद्रित हो जाएगा।


