लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान तृणमूल कांग्रेस की पहली बार चुनी गईं सांसद महुआ मोइत्रा ने मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा, ‘देश के मौजूदा हालात फ़ासीवाद के शुरुआती संकेत जैसे हैं।’
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संसद में 25 जून को महुआ मोइत्रा ने अपने भाषण में फासीवाद के संकेतों की ओर इशारा करते हुए केंद्र सरकार पर हमला बोला। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के दौरान मोइत्रा ने एनआरसी, बेरोजगारी, फेक न्यूज, मीडिया की स्वतंत्रता, किसान, राष्ट्रवाद समेत तमाम मुद्दों पर अपने तर्कों से मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की।
महुआ ने अपने पहले भाषण में बीजेपी को जीत की बधाई तो दी लेकिन बाद में कहा कि यह चुनाव मुद्दों पर नहीं बल्कि वॉट्सऐप और फेक न्यूज के जरिए लड़ा गया था। उन्होंने मॉब लिंचिंग से लेकर नागरिकता संशोधन बिल, बेरोजगारी का जिक्र अपने भाषण में किया, साथ ही कहा कि देश में आज डर फैलाया जा रहा है।
कौन हैं महुआ मोइत्रा
पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर लोकसभा क्षेत्र से जीतकर आईं महुआ मोइत्रा पहले लंदन में बहुराष्ट्रीय कंपनी जे पी मॉर्गन में इंवेस्टमेंट बैंकर थीं। साल 2008 में बैंकर की नौकरी छोड़ने के बाद महुआ मोइत्रा ने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन की और राहुल गांधी के मिशन ‘आम आदमी का सिपाही’ से जुड़ गईं। लेकिन बंगाल में कांग्रेस की स्थिति को देखते हुए उन्होंने कांग्रेस छोड़ ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी का दामन थाम लिया। बाद में उन्होंने यूथ कांग्रेस में भी कुछ दिन काम किया। पहली बार 2016 में वह करीमपुर विधानसभा से टीएमसी विधायक चुनी गईं। 2016 से ही महुआ मोइत्रा तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं।

विधायक से करियर की शुरुआत करने के बाद महुआ ने 2019 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता। महुआ का शुरुआती जीवन असम और कोलकाता में बीता लेकिन 15 साल की उम्र में वह अपने परिवार के साथ अमेरिका शिफ्ट हो गईं। इसके बाद अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। बाद में उन्होंने राजनीति में आने का मन बनाया और नौकरी छोड़ वापस भारत आ गईं। 25 जून को वह राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव में बोलीं। ये संसद में उनका पहला संबोधन था।
मोइत्रा ने तीखे तंज के साथ कहा कि ‘आप यह कह सकते हैं कि अच्छे दिन आ गए हैं और सरकार ऐसा भारतीय साम्राज्य बनाना चाहती है जिसमें सूरज कभी नहीं डूबेगा, लेकिन आप खोलने पर पाएंगे कि देश के टुकड़े-टुकड़े होने के लक्षण दिख रहे हैं।’
दरअसल अमेरीका के ‘होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूज़ियम’ की मेन लॉबी में साल 2017 में एक पोस्टर प्रदर्शित किया गया था जिसमें फ़ासीवाद के शुरुआती संकेतों की सूची छपी। आपको ज्ञात होगा कि फ़ासीवाद, मेजोरिटेरियनिज़म यानी बहुसंख्यकों के प्रभुत्व से जुड़ा है, जहां ये माना जाता है कि हम जो सोचते हैं वही सही है बाक़ि सब ग़लत और उसको अक्सर जन समर्थन मिलता है, जैसा कि अभी हुआ है।”
मौजूदा हालातों में फ़ासीवाद के शुरुआती संकेत दिख रहे हैं। लोकसभा में महुआ मोइत्रा ने उन 7 बिंदुओं के जरिए यह बताने की कोशिश की कि कैसे बीजेपी सरकार का रवैया ‘तानाशाही’ है।
अंग्रेजी में दिए गए भाषण में उन्होंने क्या कुछ कहा, प्रस्तुत हैं उस भाषण के कुछ अंश।
फ़ासीवाद के 7 संकेत
पहला संकेत
एक बेहद ताकतवर और सतत राष्ट्रवाद की भावना है जो हमारी राष्ट्रीय पहचान को नोच रही है। उसे नुकसान पहुंचा रही है। ये राष्ट्रवाद छिछला है। दूसरों के लिए एक भय बनाने वाली भावना है इसमें। ये संकीर्ण है। इसका मकसद हमें जोड़ना नहीं, बांटना है। देश के नागरिकों को उनके घर से निकाला जा रहा है। उन्हें अवैध घुसपैठिया कहा जा रहा है। पचासों साल से यहां रह रहे लोगों को कागज़ का एक पर्चा दिखाकर ये साबित करना पड़ रहा है कि वो भारतीय हैं।
ऐसे देश में जहां मंत्री कॉलेज से ग्रेजुएट होने का सबूत देने के लिए अपनी डिग्री नहीं दिखाते! और आप गरीबों से उम्मीद करते हैं कि वो अपनी नागरिकता साबित करें! साबित करें कि वो इसी देश का हिस्सा हैं!
हमारे यहां मुल्क के प्रति वफ़ादारी की जांच के लिए नारों और प्रतीकों को इस्तेमाल किया जा रहा है। असलियत में ऐसा कोई इकलौता नारा नहीं, ऐसा कोई एक अकेला प्रतीक ही नहीं जिसके सहारे लोग इस मुल्क के प्रति अपनी वफ़ादारी साबित कर पाएं।
दूसरा संकेत
सरकार के हर स्तर पर मानवाधिकारों के लिए तिरस्कार की एक प्रबल भावना नज़र आती है। 2014 से 2019 के बीच हेट क्राइम्स की तादाद में कई गुना इज़ाफा हुआ। इस देश में कुछ ऐसे तत्व हैं, जो इस तरह की घटनाओं को बस बढ़ा ही रहे हैं। दिनदहाड़े लोग भीड़ के हाथों पीट-पीटकर मार डाले जा रहे हैं।
पिछले साल राजस्थान में मॉब लिंच हुए पहलू खान से लेकर झारखंड में मारे गए तबरेज़ अंसारी तक, ये हत्याएं रुक ही नहीं रही हैं।
तीसरा संकेत
मास मीडिया को बड़े स्तर पर नियंत्रित किया जा रहा है। देश के सबसे बड़े पांच न्यूज मीडिया संस्थान आज या तो अप्रत्यक्ष रूप से कंट्रोल किए जा रहे हैं या वो एक व्यक्ति के लिए प्रति झुके हुए हैं। टीवी चैनल्स अपने एयरटाइम का ज्यादातर हिस्सा सत्ताधारी पार्टी के लिए प्रोपगेंडा फैलाने में खर्च कर रहे हैं। सारे विपक्षी दलों की कवरेज काट दी जाती है।
सरकार को रिकॉर्ड देने चाहिए कि मीडिया संस्थानों को विज्ञापन देने में कितना रुपया खर्च किया है उन्होंने। किस चीज के विज्ञापन पर कितना खर्च किया गया। और किन मीडिया संस्थानों को विज्ञापन नहीं दिए गए।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 120 से ज्यादा लोगों को बस इसलिए नौकरी पर रखा हुआ है कि वो रोज़ाना टीवी चैनलों पर आने वाले कार्यक्रमों पर नज़र रखें। इस बात को सुनिश्चित करें कि सरकार के खिलाफ कोई ख़बर न चले। फेक न्यूज़ तो आम हो गया है।
ये चुनाव सरकार के कामकाज या किसानों की स्थिति और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर नहीं लड़ा गया। ये चुनाव लड़ा गया वॉट्सऐप पर, फेक न्यूज पर, लोगों को गुमराह करने पर। ये सरकार जिन ख़बरों को बार-बार दोहराती है, हर ख़बर जो आप देते हैं, आपके सारे झूठ, आप उन्हें इतनी बार दोहराते हैं कि वो सच बन जाते हैं।
कल कांग्रेस पार्टी के नेता ने यहां कहा कि बंगाल में कोऑपरेटिव मूवमेंट नाकामयाब रहे हैं। मैं उनसे कहना चाहूंगी कि वो तथ्यों की दोबारा जांच करें। वो मुर्शिदाबाद के जिस भागीरथी कोऑपरेटिव का ज़िक्र कर रहे थे, वो लाभ में है। मैं ये कहना चाहती हूं कि हम जितनी भी ग़लत जानकारियां देते हैं, वो सब इस देश को बर्बाद कर रही हैं।
चौथा संकेत
जब मैं छोटी थी, तब मेरी मां कहती थी कि ऐसा करो वैसा करो, नहीं तो काला भूत आ जाएगा। अभी देश का ऐसा माहौल है कि जैसे सारे लोग किसी अनजान से काले भूत के ख़ौफ़ में हों। सब जगह डर का माहौल है। सेना की उपलब्धियों को एक व्यक्ति के नाम पर भुनाया और इस्तेमाल किया जा रहा है। हर दिन नए दुश्मन गढ़े जा रहे हैं। जबकि पिछले पांच सालों में आतंकवादी घटनाएं काफी बढ़ी हैं। कश्मीर में शहीद होने वाले जवानों की संख्या में 106 फीसद इज़ाफा हुआ है।
पांचवां संकेत
अब इस देश में धर्म और सरकार एक-दूसरे में गुंथ गए हैं। क्या इस बारे में बोलने की ज़रूरत भी है? क्या मुझे आपको ये याद दिलाना होगा इस देश में अब नागरिक होने की परिभाषा ही बदल दी गई है। एनआरसी और नागरिकता संशोधन (सिटिजनशिप अमेंडमेंट) बिल लाकर हम ये सुनिश्चित करने में लगे हैं कि इस पूरी प्रक्रिया के निशाने पर बस एक खास समुदाय आए। इस संसद के सदस्य अब 2।77 एकड़ ज़मीन (राम जन्मभूमि के संदर्भ में) के भविष्य को लेकर चिंतित हैं, न कि भारत की बाकी 80 करोड़ एकड़ ज़मीन को लेकर।
छठा संकेत
ये सबसे ख़तरनाक है। इस समय बुद्धिजीवियों और कलाकारों के लिए समूचे तिरस्कार की भावना है। विरोध और असहमतियों को दबाया जाता है। लिबरल एजुकेशन की फंडिंग दी जाती है। संविधान के आर्टिकल 51 में साइंटिफिक टेम्परामेंट की बात करता है। मगर हम अभी जो कर रहे हैं, वो भारत को अतीत के एक अंधेरे दौर की तरफ ले जा रहा है। स्कूली सिलेबस की किताबों में छेड़छाड़ की जा रही है। उन्हें मैनिपुलेट किया जा रहा है। आप लोग तो सवाल पूछना भी बर्दाश्त नहीं करते, विरोध तो दूर की बात है। मैं आपको बताना चाहती हूं कि असहमति जताने की भावना भारत के मूल में है। आप इसे दबा नहीं सकते।
मैं यहां रामधारी सिंह दिनकर की लिखी कविता यहां उधृत करना चाहूंगी- हां हां दुर्योधन बांध मुझे। बांधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है? सूने को साध न सकता है, वह मुझे बांध कब सकता है?
सातवां संकेत
हमारे चुनावी तंत्र की आज़ादी घट रही है। इन चुनावों में 60 हज़ार करोड़ रुपये खर्च हुए। इसका 50 फीसद एक अकेली पार्टी ने खर्च किया। 2017 में यूनाइटेड स्टेट्स होलोकास्ट मेमोरियल म्यूजियम ने अपनी मुख्य लॉबी में एक पोस्टर लगाया। इसमें फासीवाद आने के शुरुआती संकेतों को शामिल किया गया था। मैंने जो सातों संकेत यहां गिनाए, वो उस पोस्टर का भी हिस्सा थे।


