जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया में चिंता का विषय बना हुआ है। फ़रवरी और अप्रैल के माह में दिल्ली एनसीआर सहित देश के अन्य हिस्सों में ओले बरसना शुभ संकेत तो बिलकुल नहीं हो सकता। इसे मानवीय भूल का एक प्राकृतिक परिणाम जरूर माना जा सकता है।
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इन दिनों दुनियाभर में सर्दी ने कहर बरपा रखा है। कुछ दिनों दिल्ली और उससे सटे इलाकों की जो तस्वीरें देखने को मिलीं उनमें सड़कें और पार्क ओलों से पटे नजर आये। हाल-फिलहाल में तो ऐसा नजारा देखने को नहीं मिला।
इस साल जम्मू कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में बर्फबारी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं। जम्मू कश्मीर में सर्दी का करीब तीन दशक पुराना रिकॉर्ड टूट गया है। इस बार उन पहाड़ी इलाकों में भी बर्फबारी हुई है, जहां पिछले एक दशक में बर्फबारी नहीं देखने को मिली थी। केवल भारत ही नहीं, आधी से ज्यादा दुनिया इन दिनों भीषण सर्दी की चपेट में है। अमेरिका, यूरोप सहित दुनिया के अनेक देश सर्दी का प्रकोप झेल रहे हैं।
कुछ समय पहले जलवायु परिवर्तन को लेकर नासा ने कड़ी चेतावनी देते हुए वर्ष 2018 को अब तक का चौथा सर्वाधिक गर्म वर्ष बताया। नासा के मुताबिक, 2018 में वैश्विक तापमान 1951 से 1980 के औसत तापमान से 0।83 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। अठारवीं सदी की शुरुआत में धरती का औसत तापमान लगभग 13।5 डिग्री सेल्सियस था जो अब 14।5 डिग्री सेल्सियस है।
इसका एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह है कि कार्बन डाइऑक्साइड के वातावरण में जाने के तुरन्त बाद ही तापमान में वृद्धि नहीं होती है। गर्मी का समुद्र में पहुंचना और पूरी सतह के गर्म होने में कुछ वर्षों का अन्तराल रहता है। इसलिये पिछले कुछ दशकों में हमने जो अरबों टन कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि की है उससे उत्पन्न पूरी गर्मी को अब भी महसूस करना बाकी है।
दरअसल पिछले कई दशकों से जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया में चिंता का विषय बना हुआ है और यह समस्या एक अभूतपूर्व पर्यावरण संकट की तरफ बढ़ रही है जो पिघलते ग्लेसियरों, मौसम के बदलते मिजाज, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, बाढ़, चक्रवात, सर्दियों का मौसम अपेक्षाकृत गर्म होना, छोटे द्वीपों का डूबना, आर्कटिक सागर की बर्फ का पिघलना एवं सूखे के रूप में हमारे सामने प्रकट हो रही है।
दुनियाभर के वातावरण में हो रहे इस प्राकृतिक बदलाव को अनदेखा करना समाज के लिए घातक साबित हो सकता है। हाल फिलहाल की घटना पर गौर करें तो पाते हैं दक्षिण कोरिया भी सर्दी की चपेट में है। राजधानी सियोल को 70 वर्षों के बाद के सबसे अधिक हिमपात से जूझना पड़ रहा है। वहां भी कई हवाई अड्डों को बंद कर देना पड़ा। आर्कटिक क्षेत्र में ध्रुवीय तूफान से हवाओं में उतार-चढाव के कारण ही दुनिया के उत्तरी हिस्से में भारी ठंड पड़ी है।
जब भी हम कोयला, लकड़ी और खनिज तेल को जलाते हैं, तो उसमें मौजूद कार्बन वातावरण में उपस्थित ऑक्सीजन से मिलकर कार्बन डाइऑक्साइड गैस का निर्माण करते हैं। ऑक्सीजन के विपरीत इसमें सूर्य के कुछ विकिरण को रोककर सोख लेने की क्षमता होती है जोकि पृथ्वी की सतह से टकराने के बाद लौटकर वापस जा रही होती है।
कुछ अन्य गैस भी ऐसा ही करती हैं जैसे मीथेन (प्राकृतिक गैस के जलने से उत्पन्न) एवं नाइट्रस ऑक्साइड (रासायनिक खाद के उपयोग से उत्पन्न) लेकिन कार्बन डाइऑक्साइड सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वातावरण में हजारों सालों तक बनी रहती है। इन गैसों में सौर विकिरण को रोककर वातावरण को गर्म करने की इस क्षमता को अंग्रेजी में ग्रीनहाउस प्रभाव एवं इन गैसों को ग्रीनहाउस गैस कहा जाता है एक हद तक कार्बन डाइऑक्साइड प्रकृति में संतुलन बनाए रखने व धरती पर मानव जीवन के लिये आवश्यक तत्व भी है।
यूरोपीय वैज्ञानिकों के अनुसार, 2014 से 2023 के दशक में यानी अगले पांच साल सर्वाधिक गर्म रहने के आसार हैं। पूर्वानुमानों से जाहिर है कि दुनिया में तापमान में तेजी से वृद्धि होगी और औसत वैश्विक तापमान में 1।5 डिग्री तक की वृद्धि का अनुमान है।
असमय बारिश और ओलावृष्टि भारत में जलवायु परिवर्तन के घातक परिणामों की रूप में उभरे हैं। आजकल बारिश तब होती है जब नहीं होनी चाहिए और जब होनी चाहिए तब नहीं होती है। कुछ स्थानों पर दक्षिण पश्चिम मानसून जल्दी आने लगा है और अन्य जगहों पर काफी देर से प्रवेश करता है।
किसान बारिश की आस में फसल बोते हैं पर या तो वह नहीं आती है या देर से आती है, या फिर फसल कटने या खलिहान के समय बहुत तेज बारिश होती है जो खड़ी या कटी फसल और चारे को नुकसान पहुंचाती है। ओलावृष्टि में भी पहले से वृद्धि हुई है, उस क्षेत्र में भी जहाँ पहले कभी नहीं हुई। 2015 में इसने 15 राज्यों में 1।8 करोड़ हेक्टेयर जमीन की फसल, जो कि पूरे रबी फसल के रकबे की विशाल 30 प्रतिशत है, को तबाह किया एवं इस कारण से 20,000 करोड़ रुपए का घाटा हुआ। इससे किसानों की आत्महत्याओं की जैसे बाढ़ आ गई जो लगातार बढती ही जा रही है। किसानों को लगातार इन संकटों से मुकाबला करना पड़ रहा है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि देश का एक डिग्री तापमान बढ़ने से पैदावार में 3 से 7 फीसदी की कमी आ जाती है। पर्यावरण का मसला सीधे तौर से खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है। इसलिए इसकी अनदेखी की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
आपको याद होगा पिछले साल दक्षिणी राज्य केरल में पिछले 100 साल की सबसे विनाशकारी बाढ़ आयी थी। वैसे जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव एक ही साथ सभी क्षेत्रों में भी देखे जा सकते हैं जैसे तटीय क्षेत्रों में समुद्र तल का ऊंचा होना तो दूसरी जगह सूखा, उसके आस-पास ही बाढ़, ओलावृष्टि और तेज बारिश हो सकती है। इन हालातों में ग्लोबल वार्मिंग से मुकाबला करने के लिये तत्काल कार्यवाई जरूरी हो जाती है। इसकी वजह से ग्लोबल वार्मिंग के सारे प्रभाव जब एक साथ बड़े पैमाने पर देश-दुनिया पर पड़ेंगे तब मानव के लिये इन गम्भीर और खतरनाक समस्याओं से बचना मुमकिन नहीं होगा।


