महान् समाज सुधारक, दार्शनिक, शिक्षाविद्, स्वतंत्रता सेनानी, लेखक तथा बंगाल पुनर्जागरण काल की प्रमुख हस्ती माने जाने वाले ईश्वरचंद्रविद्यासागर ने अपने जीवन में कभी कल्पना तक नहीं की होगी कि उनकी मौत के करीब 128 साल बाद वे अपने ही गृहराज्य में इस प्रकार चुनावी मुद्दा बन जाएंगे और चुनाव जीतने के लिए उन पर […]
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महान् समाज सुधारक, दार्शनिक, शिक्षाविद्, स्वतंत्रता सेनानी, लेखक तथा बंगाल पुनर्जागरण काल की प्रमुख हस्ती माने जाने वाले ईश्वरचंद्रविद्यासागर ने अपने जीवन में कभी कल्पना तक नहीं की होगी कि उनकी मौत के करीब 128 साल बाद वे अपने ही गृहराज्य में इस प्रकार चुनावी मुद्दा बन जाएंगे और चुनाव जीतने के लिए उन पर ऐसी ओछी सियासत होगी।
‘अपना काम स्वयं करो’ सिद्धांत के प्रवर्तक ईश्वर चंद्र विद्यासागर के बारे में हम सभी ने चौथी या पांचवीं कक्षा में अपनी पाठ्य पुस्तकों में उनकी संक्षिप्त जीवनी तो पढ़ी ही होगी और यह भी पढ़ा होगा कि एक गरीब परिवार में जन्मे ईश्वर चंद्र ने स्ट्रीट लाइट की रोशनी में अपनी पढ़ाई की और एक मेधावी छात्र बने किन्तु फिर भी अधिकांश व्यक्ति उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते।
26 सितम्बर 1820 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले में धार्मिक प्रवृत्ति के एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में जन्मे ईश्वर चंद्र विद्यासागर का बचपन का नाम ईश्वर चंद्र बंदोपाध्याय था। गांव के स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात् वे अपने पिता के साथ कोलकाता आ गए। पढ़ाई में वे बहुत ही मेधावी छात्र थे, जिसके चलते उन्हें कोलकाता में कई संस्थानों से छात्रवृत्तियां मिली। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही वे संस्कृत भाषा और दर्शन के तो विद्वान माने जाने लगे थे, यही कारण था कि उन्हें विद्यार्थी जीवन में ही संस्कृत कॉलेज ने ‘विद्यासागर’ की उपाधि प्रदान की थी और इस तरह वे ईश्वर चंद्र बंदोपाध्याय से ईश्वर चंद्र विद्यासागर बन गए।
वर्ष 1839 में कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने 1841 में फॉर्टविलियमकॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख के तौर पर कार्यभार संभाला। पांच वर्षों तक यहां अपनी सेवाएं देने के बाद उन्होंने संस्कृत कॉलेज में सहायक सचिव के तौर पर जिम्मेदारी संभाली और शिक्षा पद्धति में सुधार लाने के लिए प्रयास शुरू कर दिए। इसे लेकर उन्होंने कॉलेज प्रशासन को अपनी सिफारिशें देनी शुरू की, जिसके चलते तत्कालीन कॉलेज सचिव रसोमयदत्ता और उनके बीच गंभीर मतभेद पैदा हो गए और उन्हें कॉलेज छोड़ने पर विवश होना पड़ा।
1849 में उन्होंने साहित्य के प्रोफेसर के रूप में संस्कृत कॉलेज में पुनः वापसी की और कुछ समय बाद जब वे इसी कॉलेज के प्रिंसिपल बन गए तो उन्होंने कॉलेज के दरवाजे सभी जातियों के बच्चों के लिए खोल दिए और संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। उनका मानना था कि अंग्रेजी और संस्कृत भाषा के ज्ञान का समन्वय करके ही भारतीय तथा पाश्चात्य परम्पराओं का श्रेष्ठ ज्ञान हासिल किया जा सकता है।
ईश्वर चंद्र विद्यासागर नारी शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। इसीलिए अपने समाज सुधार अभियान के तहत उन्होंने स्थानीय बांग्ला भाषा तथा लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूलों की एक श्रृंखला के साथ कलकत्ता में मेट्रोपोलिटनकॉलेज की स्थापना की।
नारी शिक्षा के लिए गंभीर प्रयास करते उन्होंने बैठुने स्कूल की स्थापना की तथा कुल 35 स्कूल खुलवाए, जिनके संचालन के लिए पूरे खर्च की जिम्मेदारी उन्होंने स्वयं अपने कंधों पर ली। स्कूलों के खर्च के लिए वह विशेष रूप से स्कूली बच्चों के लिए बंगाली में लिखी गई किताबों की बिक्री से फंड जुटाते थे। बांग्ला भाषा के गद्य को सरल बनाने के लिए उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया। बंगाली की कई वर्णमालाओं में संशोधन कर उसे सरल तथा आधुनिक बनाने में उनके अमिट योगदान के कारण उन्हें ‘आधुनिक बंगाली भाषा का जनक’ भी माना जाता है।
वर्ष 1848 में उन्होंने ‘वैताल पंचविंशति’ नामक बांग्ला भाषा की अपनी प्रथम गद्य रचना का प्रकाशन किया था। संस्करण व्याकरण के नियमों पर भी उन्होंने एक किताब लिखी। वर्णमाला के अलावा उन्होंने महाकवि कालिदास के शकुंतला नाटक सहित कई पुस्तकों का संस्कृत से बंगाली में अनुवाद भी किया। उन्होंने न सिर्फ बांग्ला लिपि की वर्णमाला को सरल और तर्कसम्मत बनाया बल्कि बांग्ला पढ़ाने के लिए सैंकड़ों विद्यालयों की स्थापना करने के साथ-साथ रात्रि पाठशालाओं की भी व्यवस्था की।
अपने इन्हीं समाज सुधार कार्यों की बदौलत उन्हें जीवन पर्यन्त गरीबों और दलितों का संरक्षक माना जाता रहा और इन्हीं कार्यों के चलते वे समाज सुधारक के रूप में जाने जाने लगे। सदैव समाज की भलाई के लिए ही सोचने और समाज के लिए कुछ न कुछ नया करते रहते के चलते ही नैतिक मूल्यों के संरक्षक विद्यासागर को महान् समाज सुधारक के रूप में राजा राममोहन राय का उत्तराधिकारी भी माना जाता है। ब्रिटिश शासनकाल में ऐसे कॉलेज विरले ही होते थे, जिनका संचालन पूर्ण रूप से भारतीयों के ही हाथों में हो और जहां पढ़ाने वाले सभी शिक्षक भी भारतीय ही हों किन्तु ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने सन् 1872 में कोलकाता में विद्यासागरकॉलेज की स्थापना कर यह कारनामा भी कर दिखाया था। यही वजह कॉलेज है, जहां गत दिनों उनकी प्रतिमा तोड़ी गई।
ईश्वर चंद्र विद्यासागर वास्तव में एक ऐसी महान् शख्सियत थे, जिन्होंने न केवल नारी शिक्षा के लिए व्यापक जनान्दोलन खड़ा किया बल्कि उन्हीं के अनथक प्रयासों तथा दृढ़संकल्प के चलते ही ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेज 26 जुलाई 1856 को विधवा पुनर्विवाह कानून पारित करने को विवश हुए थे और विधवाओं को समाज में नए सिरे से जीवन की शुरूआत कर ससम्मान जीने का अधिकार मिला था।
दरअसल उस समय हिन्दू समाज में विधवाओं की स्थिति बेहद चिंताजनक थी। इसीलिए उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के लिए लोकमत तैयार किया और उनके इन अटूट प्रयासों की बदौलत ही ‘विधवा पुनर्विवाह कानून’ पारित हो सका।
यह कानून पारित होने के तीन माह बाद ही उन्होंने एक विधवा कमलादेवी का विवाह प्रतिष्ठित घराने के एक युवक के साथ कराया, जो बंगाल का पहला विधवा विवाह था।
1856-60 के बीच उन्होंने 25 विधवाओं का पुनर्विवाह सम्पन्न कराया। वे कथनी के बजाय करनी में विश्वास करते थे, जिसका जीता जागता प्रमाण उन्होंने अपने बेटे इकलौते बेटे नारायण की शादी एक विधवा से कराकर सारे समाज को दिया। स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ-साथ उन्होंने बहुपत्नी प्रथा तथा बाल विवाह के खिलाफ भी आवाज उठाई। 29 जुलाई 1891 को यह महान् शख्सियत चिरनिद्रा में लीन हो गई।




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