माता पिता की अति उच्च महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत साजिशन कच्ची उम्र में स्कूल नाम की जेल में ठेल दिए जाते हैं। वहीं प्राइवेट स्कूलों में नौकरी करती हुई टीचर्स स्कूल प्रशासन के हाथों की कठपुतली से अधिक कुछ नहीं हैं।
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अभी कुछ समय पहले गाज़ियाबाद शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में बतौर मुख्य अतिथि सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ, वह छोटे छोटे नौनिहालों का प्लेस्कूल था। बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया गया। मुदित मन से हमने स्कूल परिसर का जायजा लिया।
प्रवेश द्वार से लेकर अंदर प्रधानाचार्या कक्ष तक ,क्लास रूम की दीवारों से लेकर कांच की खिड़कियों, और यहां तक की स्कूल के गार्डन में लगे सजावटी पौधों तक को कागजी फूल पत्तियों से सज्जित किया गया था। पूरे स्कूल परिसर को ही क्राफ्ट वर्क से सजाया गया था। प्रत्येक क्लास रूम की दीवारों पर चारों तरफ बड़े सैकड़ों पोस्टर चिपके हुए थे।
तभी दिमाग में सवाल कौंधा कि ये स्कूल परिसर की साज सज्जा किसने की है, निश्चित ही ये कार्य उन मासूमों ने किया होगा, या उनके द्वारा किया जाना चाहिए था, लेकिन…. लेकिन चूंकि बच्चे तो नर्सरी केजी के हैं जिन्हें खुद अपना ध्यान रखना ही नहीं आता, जो माता पिता की अति उच्च महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत साजिशन कच्ची उम्र में स्कूल नाम की जेल में ठेल दिए जाते हैं, वह यह क्राफ्ट वर्क जैसा कठिन कार्य कैसे कर सकते हैं।
बहरहाल, कार्यक्रम की औपचारिकता पूर्ण होने के पश्चात हमने प्रधानाचार्या महोदया से पूछा कि ये स्कूल परिसर की खास साज सज्जा की कार्य योजना को अंजाम कैसे दिया गया है और भूरी भूरी प्रशंसा भी की। प्रधानाचार्या महोदया ने हमें बताया ये सभी व्यवस्था हमारे टीचिंग स्टाफ के कारण संभव हो सकी है, जिन्होंने अपनी दिन रात की मेहनत से इस स्कूल परिसर को सजाया है।
उस स्टाफ की ही एक शिक्षिका जो हमारी परिचित भी थी जब उनसे बातें हुईं और साज सज्जा के बाबत जानकारी ली तो वह तो मानो बिफर पड़ी ऐसा लगा जैसे हमने उनकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो।
ऐसा मैंने पहली बार नहीं देखा, पर मुझे ये कहने में बिल्कुल भी गुरेज नहीं है कि आज के समय में जितना शोषण अभिभावकों का हो रहा है उससे कहीं अधिक टीचरों का हो रहा है। प्राइवेट स्कूलों में नौकरी करती हुई ये टीचर्स स्कूल प्रशासन के हाथों की कठपुतली से अधिक कुछ नहीं हैं।
अब असल मुद्दे पर आते हैं……

जिस कार्यक्रम में हमने शिरकत की उसकी साज सज्जा तैयारी यानी क्राफ्ट वर्क करने में उस स्कूल की टीचर्स का ही योगदान था जो हफ्तों से स्कूल की छुट्टी के बाद अतिरिक्त समय देकर इस कार्य में जुटी हुई थीं। ऐसी सजावट किस काम की जिससे न तो बच्चों का हित हो रहा है और न ही टीचर्स का और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण …… अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण का विघटन हो रहा है।
इस तरह कितना कागज बरबाद हो रहा है, इसकी जरूरत हमारी समझ से परे है। जहां एक ओर आज पेड़ों को संरक्षित करने की, पर्यावरण को बचाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है ,वहीं दूसरी ओर इन आधुनिक स्कूलों में सैकड़ों टन कागज की बरबादी हो रही है, क्योंकि कागज तो पेड़ों की छाल से प्राप्त होता है न।
खैर….. ये तो रही टीचर्स की बात, अब आते हैं थोड़े बड़े बच्चों और उनके पेरेंट्स पर, इन बच्चों को स्कूल से रोज रोज कोई न कोई प्रोजेक्ट थमा दिया जाता है, जिसे ये बच्चे अपने पेरेंट्स से पूरा कराते हैं, और कई बार तो पैसे देकर बाजार में पेंटर से भी शीट आदि बनवाते हैं।
मुझे बिल्कुल समझ नहीं आता है कि ये कैसी सृजन शक्ति का विकास हो रहा है बच्चों में? बच्चों के चहुंमुखी विकास और उनकी कल्पना शक्ति विकसित करने के लिए कराए जाने वाले यह प्रोजेक्ट कितने बच्चे पूरा कर पाते होंगे? सच्चाई तो ये है, शिक्षक बच्चों से कहकर और बच्चे माता पिता को अतिरिक्त कार्य भार सौंपकर छुटकारा पा लेते हैं।
मनन चिंतन, कल्पना शीलता का चहुंमुखी विकास कहां और किसका विकसित हो रहा है?
यह सोचनीय बात है। शिक्षक बच्चों को आदेश देकर खुश है बच्चे माता पिता को अतिरिक्त कार्य भार देकर, और पेरेंट्स नौकरी पेशा हैं तो वह बाज़ार में पैसे देकर खुश चलो बला टली। लेकिन हमारे पास सोचने का वक्त ही कहां है भई।
लेकिन जब कभी अभिभावकों से बात करो तो उनकी एक ही शिकायत रहती है कि रोज रोज के प्रोजेक्ट मिलने से वह बहुत परेशान हो चुके हैं। किसी भी प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए जितने सामान की आवश्यकता होती है दुकानदार से पूरा ही लेना पड़ता है जैसे एक कलर पेपर शीट या पेंसिल स्केच कलर चाहिए तो पूरा बंडल या डिब्बा ही लेना पड़ता है बाकी का अतिरिक्त सामान बेकार जाता है। अर्थात कीमती समय के साथ ही धन का अपव्यय सो अलग।
खैर अब कुछ लोग कहेंगे कि बच्चों में सृजनात्मक क्षमता विकसित करने के लिए यह जरूरी है। निश्चित ही आवश्यक है लेकिन बच्चे कहां कर पा रहे हैं?
कोई भी व्यक्ति या बच्चा अगर अपनी रूचि के अनुसार कोई कार्य कर रहा है तो वह ठीक है लेकिन उसे जबरदस्ती कोई काम कराया जा रहा है जो उसके रुचि का नहीं है तो यह बात गलत है। वहीं प्रोजेक्ट के नाम पर बच्चों को परेशान भी किया जा रहा है और कुछ ऐसी चीजें जो बच्चे नहीं कर पाते और इसके लिए वे दूसरों का सहारा लेते हैं।

ऐसा नहीं है कि हमने कभी ऐसे प्रोजेक्ट नहीं बनाए, हमें ग्रुप में ऐसा टास्क दिया जाता था और सभी छात्राएं मिलकर उस प्रोजेक्ट पर काम करते थे, हमारी पीढ़ी में ये रोज-रोज फालतू के चोंचले नहीं ही होते थे, और न ही पैसे का अपव्यय कराया जाता था। बच्चों की उम्र और कार्य करने की कुशलता के मद्दे नजर प्रोजेक्ट कार्य सौंपा जाता था जिसमें खुद टीचर्स सहयोग करते थे।
बच्चे अवसाद में है माता-पिता बच्चों से अधिक अवसादित हैं!
कहने को यह बहुत सतही और छोटा सा मुद्दा लगता है लेकिन बढ़ते-बढ़ते यह एक बहुत बड़ी समस्या का रूप ले चुका है । जिसकी गिरफ्त में मासूम बचपन तो दम तोड़ ही रहा है वही पेरेंट्स घोर निराशा और हताशा के माहौल में अपने मासूमों के बचपन से खिलवाड़ करने को मजबूर हैं।
यह एक ऐसी समस्या है जिससे हम सभी अभिभावकों को दो चार होना ही पड़ा होगा। क्योंकि समस्या बच्चों से रिलेटेड है तो समाधान भी पेरेंट्स और शिक्षकों को मिलकर ही करना होगा।


