चाहें 1948 का कबायली हमला हो या 1962 का भारत चीन युद्ध, चाहें 1965 व 1971 का भारत-पाक युद्ध। यहां के वीरों ने मातृभमि की रक्षा हेतू सदैव अपना जीवन बलिदान किया है।
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शूरां निपजे झुंझुनू, लिया कफन का साथ ।
रण-भूमि का लाडला, प्राण हथेली हाथ ।।
उक्त कहावत को चरितार्थ किया है झुंझुनू जिले के वीर जवानों ने। इस वीर भूमि के रणबांकुरों ने जहां स्वतंत्रता पूर्व के आन्दोलनो में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया वहीं स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की लड़ाइयों में भी इस धरती की माटी में जन्में सेनानियों ने हंसते हुये अपने प्राणे की आहूतियां दी है। यहां की धरती ने सदियों से जन्म लेते रहे सपूतों के दिलों में देशभक्ति की भावना को प्रवाहित किया हैं।
शहादत राजस्थान की परम्परा है। यहां गांव-गांव में लोकदेवताओं की तरह पूजे जाने वाले शहीदों के स्मारक इस परम्परा के प्रतीक हैं। 20 साल पहले कारगिल युद्ध तो हमने जीत लिया, लेकिन शहीदों के परिवारों के सामने समस्याओं के कई कारगिल अभी भी मुंह बायें खड़े हैं। जिन पर जीत दर्ज करनी अभी बाकी हैं।
इस जिले के वीरों ने बहादुरी का जो इतिहास रचा है उसी का परिणाम है कि भारतीय सैन्य बल में उच्च पदों पर सम्पूर्ण राजस्थान की ओर से झुंझुनू जिले का ही वर्चस्व रहा है। यहां की धरती को यह वरदान प्राप्त होना प्रतीत होता हैं कि इस पर राष्ट्रभक्ति के कीर्तिमान स्थापित करने वाले लाडेसर ही जन्म लेते हैं। सेना के तीनो अंगो की आन ,बान,शान के लिये यहां के नौजवान सैनिकों के उत्सर्ग को राष्ट्र कभी भुला नही सकता हैं।
इस क्षेत्र के सैनिकों ने भारतीय सेना में रहकर विभिन्न युद्धो में बहादुरी एवं शौर्य की बदौलत जो वीरता पदक प्राप्त कियें हैं वे किसी भी एक जिले के लिये प्रतिष्ठा एवं गौरव का विषय हो सकता हैं। सीमा युद्ध के अलावा जिले के बहादुर सैनिकों ने देश मे आंतरिक शान्ति स्थापित करने में भी सदैव विशेष भूमिका निभाई हैं। सीमा संघर्ष एवं नागा होस्टीलीटीज हो या ऑपरेशन ब्लू स्टार या श्रीलंका सरकार की मदद हेतु किये गये आपरेशन पवन अथवा कश्मीर में चलाया गया आतंकवादी अभियान रक्षक या कारगिल युद्ध। सभी अभियान में यहां के सैनिकों ने शहादत देकर देश में जिले का मान बढ़ाया है।
झुंझुनू जिले में प्रारम्भ से ही सेना में भर्ती होने की परम्परा रही है, यहां गांवों में हर घर में एक व्यक्ति सैनिक होता था। सेना के प्रति यहां के लगाव के कारण अंग्रेजो ने यहां एक सैनिक छावनी की स्थापना कर ‘शेखावाटी ब्रिगेड ‘का गठन किया था। जिले के वीर जवानो को उनके शौर्यपूर्ण कारनामों के लिये समय-समय पर भारत सरकार द्वारा विभिन्न अलंकरणों से नवाजा जाता रहा है। अब तक इस जिले के कुल 117 सैनिकों को वीरता पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। जो पूरे देश में किसी एक जिले के सर्वाधिक हैं।
भारतीय सेना में योगदान के लिये झुंझुनू जिले का देश में अव्वल नम्बर है। वर्तमान में इस जिले के 29 हजार जवान सेना में कार्यरत है। वहीं 45 हजार भूतपूर्व सैनिक व अर्ध सैनिक बलों के जवान हैं। आजादी के बाद भारतीय सेना की और से राष्ट्र की सीमा की रक्षा करते हुये यहां के 457 जवान शहीद हो चुके हैं। जो पूरे देश में किसी एक जिले से सर्वाधिक है। कारगिल युद्ध के दौरान पूरे देश में 527 जवान शहीद हुये थे जिनमें यहां के 22 सैनिक शहीद हुये थे जो पूरे देश में किसी एक जिले से शहादत देने वालों में सर्वाधिक जवान थे।
यहां के जवानों ने सेना के सर्वोच्च पदों तक पहुंच कर अपनी प्रतीभा का प्रदर्शन किया है। जिले के एडमिरल विजय सिंह शेखावत भारतीय नौ सेना में सेना अध्यक्ष रह चुकें हैं। वहीं स्व. कुन्दन सिंह शेखावत थल सेना में लेफ्टिनेन्ट जनरल व भारत सरकार के रक्षा सचिव रह चुके हैं। जे.पी.नेहरा, सत्यपाल कटेवा सेना में लेफ्टिनेन्ट जनरल पद से सेवानिवृत हुये हैं। इसके अलावा यहां के काफी लोग सेना में मेजर जनरल, ब्रिगेडियर, कर्नल,मेजर सहित अन्य महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत है। देश में झुंझुनू एकमात्र ऐसा जिला हैं जहां सैनिक छावनी नहीं होने के उपरान्त भी गत पचास वर्षो से अधिक समय से सेना भर्ती कार्यालय कार्यरत है। जिससे यहां के काफी युवकों को सेना में भर्ती होने का मौका मिल पाता है।
यहां के हवलदार मेजर पीरूसिंह शेखावत को 1948 के कश्मीर में कबायली युद्ध में अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन करते हुये शहादत देने पर वीरता के लिये देश का सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया जा चुका है। परमवीर चक्र पाने वाले पीरूसिंह शेखावत देश के दूसरे व राजस्थान के पहले सैनिक थे। यहां के सैनिकों ने द्वितीय विश्व युद्ध में भी बढ़चढ़ कर भाग लिया था। आज भी जिले में द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लेने वाले कई पूर्व सैनिकों या उनकी विधवाओं को सरकार से पेंशन मिल रही है।
जिले में इतने अधिक लोगों का सेना से जुड़ाव होने के उपरान्त भी सरकार द्वारा सैनिक परिवारों की बेहतरी व सुविधा उपलब्ध करवाने के लिये कुछ भी नहीं किया गया है। कारगिल युद्ध के समय सरकार द्वारा घोषित पैकेज में यह बात भी शामिल थी कि हर शहीद के नाम पर उनके गांव में किसी स्कूल का नामकरण किया जायेगा। मगर जिले में कई शहीदों के नाम पर अब तक सरकार ने स्कूलों का नामकरण कई वर्ष बीत जाने के बाद भी नहीं किया है। कई स्कूलों का नामकरण किया भी गया मगर उन स्कूलों को बाद में बंद कर दिया गया।
3 जुलाई 1999 को कारगिल के द्रास सेक्टर में शहीद हुये जिले के शीथल गांव के शहीद मनीराम महला के पुत्र दीपक महला ने बताया कि उनके गांव के सरकारी स्कूल का नामकरण उनके पिता के नाम पर किया गया था मगर दो साल पूर्व अचानक स्कूल को ही बंद कर दिया गया। 28 जून 1999 को सियाचिन में शहीद हुये बंधा की ढ़ाणी के लांस नायक भगवान सिंह की पत्नी विजेश देवी का कहना है कि मैंने पति के शहीद होने पर सरकारी नौकरी न लेकर अपने बेटे के लिये रिजर्व रखी थी। सरकार ने बेटे को नौकरी देने का वायदा भी किया था मगर नौकरी के लिये सरकार के पास चक्कर लगा कर थक चुके हैं। नंगली गुजरान के खडग़ सिंह गुर्जर 12 मई 1999 को कारगिल युद्व में राजस्थान से पहले शहीद हुये थे।
6 जुलाई 1999 को कश्मीर में मश्कोह घाटी में शहीद हुये नौरंगपुरा के शीशराम की पत्नी विमला देवी ने बताया कि वह अपने दोनों बेटो को पति की तरह ही सेना में भेजना चाहती थी ताकि उनके बेटे भी अपने पिता की तरह सेना में शौर्य गाथा लिखे। मगर कई प्रयासो के बाद भी दोनों बेटों को सेना में जाने का मौका नहीं मिला। जिसका उसे जिंदगी भर मलाल रहेगा। अब दोनो बेटे सेना में जाने की उम्र पार कर चुके हैं। शहीदों के और भी कई ऐसे परिवार हैं जिनको सरकार की घोषणाओं के पूरा होने का आज भी इंतजार है।
सरकार झुंझुनू जिले को सैनिक जिला घोषित कर यहां के सैनिक परिवारों को सुविधायें उपलब्ध करवाने की तरफ पर्याप्त ध्यान देवे तो आज भी झुंझुनू क्षेत्र से अनेक पीरूसिंह पैदा होकर देश के लिये प्राण न्योछावर कर सकते हैं।


