वर्षों पहले की एक दुखभरी रात। एक अदना-सा इंसान दरवाजों पर दस्तक देकर अपनी बीमार मां को अस्पताल पहुंचाने में मदद की गुहार लगाता है लेकिन कोई दरवाज़ा भी नहीं खोलता। टिक-टिक करता समय भी गुजरता जा रहा था। वह वक्त से हार गया। वह अपनी बीमार मां को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचा पाया। इलाज न मिलने से उसकी मां उसे अकेला छोड़ इस बेरहम दुनिया से विदा हो गई। बुरे वक्त के चलते कुछ लोग टूट जाते हैं तो कुछ संभल जाते हैं, वे दूसरों के लिए भी एक मिसाल बन जाते हैं। यह हादसा उसके लिए एक सबक था एक प्रतिज्ञा थी। एक प्रतिज्ञा किसी को बिना इलाज न मरने देने की। हम बात कर रहे हैं उसी महानायक की जिनका नाम है करीमुल हक़। लोग प्यार से उन्हें एम्बुलेंस दादा भी कहते हैं।
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भारत में करीब 25 फीसदी लोग बीमार होने या किसी दुर्घटना की वजह से समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण दम तोड़ देते हैं! खासकर रोड एक्सीडेंट की घटनाओं में तो यह संख्या काफी होती है। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में रहने वाले करीमुल हक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के धालाबाड़ी गांव के रहने वाले करीमुल हक़ मजदूरी किया करते थे| एक दिन देर रात हृदय रोग से पीड़ित उनकी मां जाफुरुन्निशा को दिल का दौरा पड़ा, करीमुल के पास अपनी बाइक भी नहीं थी न ही कोई और वाहन| समय रहते अस्पताल नहीं पहुंचने के कारण उन्हें बचाया न जा सका| इस घटना ने करीमुल को झकझोर कर रख दिया| करीमुल कभी भी अपने मन से अपनी मां की मृत्यु की दुखद घटना को मिटा नहीं सके क्योंकि उन हालातों में अपनी मां को समय पर निकटतम अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस की कमी थी।
करीमुल के जीवन की इस सबसे बड़ी घटना ने उनको तोड़ दिया और वो निराश रहने लगे। उनको इस बात की टीस रहती थी कि अगर मां समय पर अस्पताल पहुंच जाती तो बच जाती। इससे सबक लेते हुए उन्होंने यह संकल्प लिया कि किसी को भी एम्बुलेंस की अनुपलब्धता के कारण न तो मरना चाहिए और न ही पीड़ित रहना चाहिए। यहीं से उनके जीवन को एक नई दिशा मिला और उन्होंने ऐसे लोगों की मदद करने की ठान ली।

हालांकि उनके पास पैसों की कमी थी तो वो अपनी बाइक से ही लोगों को अस्पताल पहुंचाने का काम करने लगे। यहीं नहीं, अस्पताल जाने से पहले अगर किसी को फर्स्ट एड की जरूरत पड़ती है तो वो भी करीमुल मुहैया कराते हैं।
शुरू में तो लोगों ने उनका मजाक उड़ाना शुरू किया कि भला ‘बाइक एंबुलेंस’ क्या चीज हुई। लेकिन जैसे-जैसे करीमुल लोगों के काम आते गए उनकी छवि बढ़ती गई, आज उनके इलाके में लोग उनको भगवान मानते हैं। किसी भी मुसीबत में कभी भी अगर किसी को अस्पताल जाना होता है तो करीमुल को याद करता है। सबसे बड़ी बात करीमुल इस काम के पैसे नहीं लेते।
करीमुल हक मालबाजार में स्थिति एक साधारण चाय बागान में मजदूरी किया करते थे, जिससे उन्हें वेतन के रूप में हर महीने चार हजार रूपए मिलते थे। उनका बचपन गरीबी में बीता, कई दुखद परिस्थितियों का उन्हें सामना करना पड़ा। पैसों की तंगी की वजह से स्कूली शिक्षा आठवीं कक्षा से आगे नहीं बढ़ पाई। करीमुल के परिवार में उनकी पत्नी आंजुवा बेगम, दो बेटे राजेश व राजू और पुत्रवधुएं हैं। बेटे पान और मोबाइल रीचार्ज की दुकान चलाते हैं। करीमुल अपनी आमदनी बाइक एंबुलेंस के ईंधन पर खर्च करते हैं।
चाय के बागानों में काम करने वाले करीमुल ने इस काम की शुरुआत तब की थी जब उनकी मां को सही वक्त पर इलाज नहीं मिल पाया था। करीमुल बताते हैं कि काफी समय पहले उनकी मां की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, वे मदद के लिए सबके पास गए लेकिन अपनी मां को अस्पताल नहीं पहुंचा पाए। समय पर एंबुलेंस न मिलने के कारण उनकी मां का निधन हो गया। इसके बाद करीमुल सदमें में चले गए। लेकिन उन्होंने ठान लिया कि अब से गांव के किसी व्यक्ति को एंबुलेंस के अभाव में दम नहीं तोड़ना पड़ेगा।

इस घटना के बाद, उन्होंने प्रण किया कि किसी को भी कभी भी मौत का सामना नहीं करना चाहिए क्योंकि उसने अपने आस-पड़ोस में किसी को भी चिकित्सा उपचार के लिए, यहां तक कि बीमार और जरूरतमंदों को अपनी बाइक पर शारीरिक रूप से ले जाने के लिए अपनी शारीरिक और अन्य मदद को बढ़ाया।
मोटरसाइकिल को एंबुलेंस बनाने का विचार करीमुल को करीब एक दशक पहले चाय बगान में घटित एक घटना के बाद आया था। हुआ यूं की चाय बगान में काम करने के दौरान उनका एक साथी गश खाकर गिर पड़ा। वहां एंबुलेंस या कोई गाड़ी उपलब्ध नहीं थी। तब हक ने अपनी पीठ से उस बीमार को बांध लिया और उसे अस्पताल ले गए। उस बीमार साथी को तुरंत इलाज मिल गया और वह ठीक हो गया।
इस घटना के बाद करीमुल ने एक पुरानी राजदूत मोटर साइकिल ली और और शुरू कर दी 24 घंटे निःशुल्क बाइक एम्बुलेंस सेवा। उनकी बाइक के आगे अंग्रेजी में उलटे अक्षरों में एंबुलेंस भी लिखा है। करीमुल केवल अपने गांव में ही नहीं, बल्कि आसपास के करीब 20 गांवों में इस तरह अपनी सेवाएं दे रहे हैं। गांवों के जरूरतमंदों के लिए वह मसीहा जैसे हैं। कोई बीमार है, अस्पताल पहुंचाना है तो करीमुल हक। प्राथमिक उपचार जरूरी है या दवा चाहिए तो करीमुल हक।

करीमुल 24 घंटे लोगों को नि:शुल्क सेवा देते हैं चाहे ठंड हो, गर्मी हो या फिर बारिश, वह हर समय लोगों की सेवा में लगे रहते हैं। शुरू-शुरू में रिक्शा, ठेला, गाड़ी, बस जो मिलता उसी से वह समय पर रोगियों को अस्पताल पहुंचाने का काम करते रहे। बाद में अपनी बाइक से लोगों की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने लगे। सबसे बड़ी बात यह है कि करीमुल हक न केवल लोगों को अस्पताल पहुंचाते हैं, बल्कि इससे पहले वे उन्हें फर्स्ट एड भी देते हैं। मरीजों को फौरी तौर पर मेडिकल सेवा देना उन्होंने अस्पताल में डॉक्टरों से ही सीखा है। हालांकि धीरे-धीरे ही सही दूसरे अन्य बाइक मालिकों और साइकिलवालों ने करीमुल हक़ के इस अच्छे प्रयास में खुद को जोड़ना शुरू कर दिया और मरीजों को इलाज के लिए अस्पताल पहुंचने में करीमुल की मदद करने लगे हैं। करीमुल अब तक अपने इस प्रयास से करीब 4000 लोगों को समय पर अस्पताल पहुंचाकर उनकी जान बचा चुके हैं।
करिमूल हक ने कुछ ऐसा कर दिखाया जिस पर पूरा हिंदुस्तान को आज नाज़ होना चाहिए, सिलीगुड़ी के ही धालबाड़ी इलाके के करीमूल हक़ निस्वार्थ मानव सेवा के लिए वो काम करते हैं जिसकी हम सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं| उनके इसी जज्बे और सेवा के कारण उन्हें 2017 में तात्कालिक राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया। उस समय पद्मश्री सम्मान से अभिभूत करीमुल हक का कहना था कि उनका हौसला और बढ़ गया है। उनमें और भी ज्यादा उत्साह व ऊर्जा का संचार हुआ है। अब वह और बढ़चढ़ कर समाजसेवा करेंगे।
आज करीमुल हक यानी ‘एंबुलेंस दादा’ का नाम कौन नहीं जानता। सिर्फ बंगाल में ही नहीं बल्कि यह नाम अब देशभर में मशहूर हो चुका है। मानवता की सेवा में उन्होंने अपने जीवन को लगा दिया है। उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल को एंबुलेंस बना लिया ताकि जरूरतमंदों को वक्त पर अस्पताल पहुंचाकर उनकी जिंदगी बचा सकें। वह 1998 से ही राजाडांगा, धोलाबाड़ी, क्रांति, चेंगमारी इलाके के लोगों की नि:स्वार्थ भाव से सेवा कर रहे हैं।
हालांकि इतने लोगों की समस्याओं का समाधान करने वाले करीमुल को पद्मश्री पुरस्कार जरूर मिल गया, लेकिन उनकी जिंदगी में कोई खास सुधार नहीं आया। वे आज भी उसी चाय बागान में मजदूरी कर रहे हैं। तमाम घरेलू समस्याओं के बावजूद करीमुल अपने इलाके के गरीब लोगों की मदद करने से पीछे नहीं हटते।
गौरतलब है कि एम्बुलेंस दादा की कहानी ने फिल्म निर्माताओं, कहानीकारों, मीडिया आदि से जुड़े लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। उन पर एक ‘बायोपिक’ बनाई जा रही है, एक किताब भी लिखी जा रही है जिसके बारे में पद्मश्री करीमुल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा। आज उनके कार्य और सेवाओं ने उन्हें ‘एक चाहने वाला आदमी’ बना दिया है, चाहें वे बॉलीवुड के निदेशक हों या रक्षा सुविधाओं के माध्यम से इसी तरह की सेवाओं की खोज करने और उन्हें लागू करने वाला रक्षा मंत्रालय हो।
सूत्रों के अनुसार फिल्म डाइरेक्टर विनय मुदगिल जलपाईगुड़ी के एंबुलेंस दादा के नाम से मशहूर करीमुल हक पर ‘एंबुलेंस मैन’ नामक फिल्म बनाएंगे। फिल्म में करीमुल की जिंदगी और उनके द्वारा गरीबों की मदद के लिए किए जा रहे काम को पेश किया जाएगा। अपने जीवन पर बनने जा रही फिल्म के बारे में करीमुल हक बताते हैं, “बहुत खुशी हुई की मेरे जीवन पर फिल्म बनने जा रही है। इस बनने वाली फिल्म से लोग गरीबों और असहायों की मदद के लिए प्रेरित होंगे। फिल्म बनने के बाद जो भी पैसा मिलेगा उससे मैं एक अस्पताल, एक स्कूल और एक अनाथालय बनवाऊंगा।” देश के लोग इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि बायोपिक कब बनेगी और उनकी जीवनी कब प्रकाशित की जाएगी।
इस बीच पद्मश्री करीमुल नई दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस परेड समारोह में शामिल हुए। इसी दौरान पीएम मोदी बैरिकेड से बाहर आए और उन्होंने करीमुल से उनका हालचाल जाना। इस दौरान करीमुल हक ने सेल्फी लेने के लिए मोबाइल बाहर निकाला लेकिन वे सेल्फी लेने की हिम्मत नहीं कर पाए। जिसके बाद मोदी ने खुद ही पूछ लिया कि क्या मैं सेल्फी ले सकता हूं? फिर मोदी ने करीमुल हक के हाथ से मोबाइल लेकर उनके साथ खुद सेल्फी ली। करीमुल हक के मुताबिक- ‘‘मैं प्रधानमंत्री मोदी के साथ सेल्फी लेना चाहता था, मगर मोबाइल फ्रेंडली न होने के कारण ले नहीं पा रहा था, जिस पर मोदी ने खुद मोबाइल लेकर सेल्फी ली।”
सेवा प्रदान करने के अपने इन प्रयासों में करीमुल को अपनी कमाई का अधिकांश हिस्सा खर्च करना पड़ा है, उसका जीवन और परिवार दूसरों के लिए राहत और मुस्कुराहट लिए हमेशा उनके साथ खड़ा रहा है। यह ‘मनुष्य मनुष्य के लिए ही है’ का एक जीवंत उदाहरण है, जो भारतरत्न भूपेन हजारिका द्वारा रचित एक प्रसिद्ध गीत है।


