मोदी ने जिस नये भारत की बात कही है उसका खाका अभी ठीक से सामने आना बाकी है लेकिन एक साफ समझदारी है कि प्रधानमंत्री अब सब्सिडी और रेवड़ियां बांटने वाली संस्कृति से दूर जा रहे हैं।
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इस बात पर हैरत नहीं होनी चाहिए कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब अपने दूसरे कार्यकाल में और मजबूत होने के बाद संसद की ओर ज्यादा नहीं देखते। बल्कि वो जनता से सीधे संवाद करते हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय ही बड़े निर्णय करता है। इसमें अब एक तथ्य और जुड़ गया है कि राज्य सरकारों को भी प्रधानमंत्री कार्यालय के फरमान के अनुरूप ही चलना पड़ेगा। इसमें नौकरशाहों की भूमिका प्रमुख होती है।
जिन्हें इस बात की चिंता है कि मोदी अब अचानक मध्यमार्ग से वामपंथ की ओर झुक सकते हैं और लोकलुभावनवाद में फंस सकते हैं उनका भय भी निराधार हो सकता है। मोदी ने जिस नये भारत की बात कही है उसका खाका अभी ठीक से सामने आना बाकी है लेकिन एक साफ समझदारी है कि प्रधानमंत्री अब सब्सिडी और रेवड़ियां बांटने वाली संस्कृति से दूर जा रहे हैं। यही उनके अपनाये जाने वाले नये सुधारों का स्पष्ट संकेत है।
हां, गरीबों को देने के लिये अमीरों से ठोक कर लेने में कोई संकोच नहीं करेंगे। उनके इस अभियान में मध्यवर्ग को भी थोड़ी कीमत चुकानी होगी।
इसके अलावा उनकी युवाओं से उम्मीद कि वह रोजगार मांगने के बजाये रोजगार पैदा करें एक और संकेत है। वे चाहते हैं कि यह देश सरकारी नौकरियों की निर्भरता वाली संस्कृति से दूर हटें और वह जाति तथा सम्प्रदायों पर आधारित आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त करने की ओर बढ़ना चाह रहे हैं। मिनिमम गर्वन्मेंट और मैक्सिमम गर्वनेंस का फलसफा अब भारत ही नहीं सारी दुनिया पर सिर चढ़ कर बोल रहा है।
परमानेंट नौकरी पाते ही हरामखोरी और मक्कारी की बुरी आदत ने कुख्यात बाबूडम को जन्म दिया है। बाबूडम या नौकरशाही या लालफीताशाही ने भ्रष्टाचार को घुन की तरह भारतीय समर्थों की नसों में घोल दिया है। अपने विजय संबोधन में मोदी ने कहा था कि इस देश के गरीबों ने अब ऐसे नेताओं को पसंद करने की मानसिकता त्याग दी है जो उन्हें कुछ देता हो। इसकी बजाये गरीब आदमी कठोर मेहनत से तरक्की करना चाह रहा है। वह कह रहा है कि मेरे लिए अवसर पैदा करो मैं मेहनत से उसे पाल पोस कर बड़ा कर दूंगा।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जिस व्यक्ति की मदद की जा रही है वह पूरी तरह निर्भर होने के बजाये खुद अपनी मदद के लिए मेहनत कर रहा है या नहीं। आरंभ में यह सुनिश्चित करने के लिए कि सब्सिडी और रियायतें सही जगह तक पहुंच रहीं हैं या नहीं। प्रधानमंत्री ने जनधन, आधार और मोबाइल वाली जाम की तिकड़ी का सहारा लिया। जनधन के तहत खोले गये पच्चीस करोड़ बैंक खातों, बायोमैट्रिक पहचान और मोबाइल फोन से प्रधानमंत्री ने गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी और लाभों के मामले में छोटी-सी क्रांति की है।
प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रणाली ने सुनिश्चित किया है कि सब्सिडी लाभार्थी के खाते में सीधे भेजी जाये ताकि इससे रिसाव और भ्रष्टाचार खत्म हो सके।
इस प्रणाली के तहत अब तक चौरासी योजनाओं और कार्यक्रमों में बत्तीस करोड़ से लाभार्थियों को डेढ़ लाख करोड़ से ज्यादा की धनराशि हस्तांतरित की जा चुकी है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण देश में एलपीजी सिलेडरों का वितरण है। करीब डेढ़ करोड़ लोग ऐसे थे जिन्होंने सब्सिडी छोड़ने की प्रधानमंत्री की अपील को सुना और माना। इससे अपने आप एक हजार आठ सौ करोड़ रुपये की बचत होने लगी। इसके अलावा तीन सौ चार करोड़ फर्जी कनेक्शन खत्म करवाये जिससे बचत में भारी इजाफा हुआ।
प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे जीने वाले डेढ़ करोड़ परिवारों को गैस कनेक्शन दिये जिसमें पहला सिलेंडर मुफ़्त दिया। उत्तर प्रदेश में भारी संख्या में बीपीएल परिवारों को इसका लाभ मिला जिसके कारण अधिकतर परिवारों ने चुनाव में भाजपा को वोट दिया।
मोदी का 2022 तक नये भारत का सपना इस बात पर टिका है कि उन्होंने जो सौ से ज्यादा योजनाएं लागू की हैं उनमें वो कैसा प्रदर्शन करते हैं। मोदी ने इनपुट और आउटपुट के बजाये सारा ध्यान नतीजों पर देना शुरू किया है।
मोदी को अगर किसी ने सबसे ज्यादा झटका दिया है तो वह है नौकरशाही। अब बड़े कार्यक्रमों के लिए मोदी को उच्चस्तरीय व्यवसायिक लोगों की मदद लेनी होगी। मोदी को अपने नये भारत की दृष्टि सामने रखनी चाहिए और क्रियान्वयन के लिए ठोस लक्ष्य तैयार करने चाहिए। इससे ज्यादा अहम सवाल ये है कि इन योजनाओं से कितने रोजगार पैदा होंगे। साथ ही योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों को ही मिले। पता चला है कि इतनी पेशबंदी के बाद भी भ्रष्टाचारी चोर दरवाजे खोल ले रहे हैं। उनमें सत्तासीन भाजपा के लोग भी शामिल हैं। देखना है मोदी सरकार अपनों पर ही अंकुश कैसे लगा पायेगी।


