कोई सिर्फ किसी और को खुश करने के लिए नृत्य नहीं करता है, बल्कि अपनी खुशी के लिए भी करता है। इसलिए असम की संस्कृति को बिहू सिर्फ ही नहीं दर्शाता है, बल्कि हर डांसर भी इसे दर्शाता है। हर बिहू डांसर के पास अपनी नशीली अदाओं से सुनाने के लिए एक कहानी होती है। यह नृत्य शैली अब अंतरराष्ट्रीय ख्याति पा चुकी है।
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वर्ष 2014 में असम के गायक ‘बिहू सम्राट’ खगेन महंत की जब मृत्यु हुई थी, तब असम के तत्कालिन मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने कहा था, ‘महंत ने अपने संगीत से लोगों को एक सूत्र में बांधने की कोशिश की थी। पर हकीक़त में महंत ने सिर्फ इतना ही नहीं किया था, बल्कि उन्होंने बिहू की भावना को एक मूर्त रूप दिया था।
बिहू दो असमी शब्दों से बना है। बिहू को मनाने का अर्थ होता है भगवान से शांति के लिए प्रार्थना करना। बिहू अब सात समुंदर पार जा पहुंचा है। लंदन स्थिति हिडेनीडॉल संस्थान ने पिछले वर्ष अगस्त में लंदन, गुवाहाटी और बॉन्गाईगांव में लगभग 3000 बिहू कलाकारों को एकत्रित कर एक नया रिकॉर्ड बना दिया। सिर्फ इतना ही नहीं, गोरु बिहू के म्यूजिक वीडियो ने पहले ईडीएम आसामी लोक संगीत के तौर पर जिसने करीब 50 अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में चुने जाने के बाद हर तरफ एक लहर-सी पैदा कर दी।
असम के किसानों के बीच यह नृत्य ख़ास तरीके से प्रासंगिक हो गया है। एक्सल हजारिका द्वारा प्रयोग के तौर पर तैयार किया गया यह संगीत वीडियो, बिहू के त्योहार व नृत्य के भविष्य की कल्पना को साकार करने की कोशिश करता है, जब इसे तकनीक द्वारा संचालित परिदृश्य में मनाया जाएगा।

युगों से मानव संस्कृतियों में अधिकांश नृत्यों को अभिव्यक्ति का एक माध्यम माना जाता रहा है। ये अभिव्यक्ति के रुप में विभिन्न संस्कृतियों के बीच संबंध बनाने में मदद करते हैं। यह बात लोक नृत्य जैसे बिहू के मामले में बिल्कुल सटीक बैठती है, जो सिर्फ किसी त्योहार को मनाने का मात्र जरिया नहीं है, बल्कि समाज को एक-साथ लेकर आगे बढ़ने का एक महत्वपूर्ण साधन भी है।
इस लोक नृत्य को असम के तीन प्रमुख बिहू त्योहारों वसंत बिहू, कटी या कंगली बिहू और भोगाली बिहू के दौरान किया जाता है। वसंत बिहू त्योहार को रंगीली या बोहाग बिहू के रुप में जाना जाता है। कटी या कंगली बिहू तीनों बिहू त्योहारों में से सबसे किफायती है और इसे आमतौर पर अक्टूबर के महीने में मनाया जाता है। माघ या भोगाली बिहू किसानों का त्योहार है, जिसे जनवरी में मनाया जाता है।
हालांकि इस देसी लोक नृत्य की जड़ों का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। इस नृत्य शैली से जुड़ा पहला दस्तावेज अहोम राजा रुद्र सिंह के समय मिलता है जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 1694 में रांघर के मैदान में बिहू कलाकारों को रंगीली बिहू मनाने के लिए आमंत्रित किया था। प्राचीन समय में बिहू नृत्यकला का प्रदर्शन सिर्फ वसंत बिहू त्योहार के दौरान किया जाता था जिसे आमतौर पर अप्रैल के महीने में मनाया जाता है। यह असमी नव वर्ष की दस्तक भी देता है।
बिहू नृत्य में महिला और पुरुष दोनों समूहों में नृत्य करते हैं। ऐसा माना जाता है कि पुराने समय में सामाजिक कार्यक्रमों के दौरान इसका प्रदर्शन किया जाता था जब महिला और पुरुषों को एक दूसरे से बात करने के लिए एक मंच की जरूरत होती थी। बिहू ने असम के कई जाति समूहों जैसे सोनोवाल कचारिस, देवरिस, मोरन, बोराहिस और चतिया को भी एकजुट कर उनमें भाईचारे को बढ़ाया है।
रंगोली बिहू खेलों का उत्सव है। युवक-युवतियों और महिला-पुरुष कलाकारों द्वारा इस नृत्यकला का प्रदर्शन वसंत और नये साल के आगमन को मनाने के लिए किया जाता है। इसमें शामिल कलाकार परंपरागत रंग-बिरंगे परिधान पहनते हैं जिसमें गमछा और मेखला सादर प्रमुख रूप से होते हैं और विशेष तरह के गाने जैसे मुकोली बिहूस आदि गाये जाते हैं। रंगोली बिहू में लाल रंग को प्राथमिकता दी जाती है। सभी बिहू नृत्यों में यह सबसे अधिक ग्लैमरस और मोहक है।
कोंगली बिहू या कटी बिहू ‘गरीबों का त्योहार’ है। इसे असमी कटी महीने के पहले दिन मनाते हैं। यह एक विरल त्योहार है जो तपस्या और गरीबी का द्योतक है। इसे मध्य अक्टूबर में मनाया जाता है जब खलिहान खाली होते हैं, जबकि खेतों में फसलें हरी रहती हैं। किसानों द्वारा पूरी वेशभूषा के साथ इसका प्रदर्शन किया जाता है। परंपरागत रूप से खेतों में जलाए जाने वाले सरसों के तेल के दीयों को बांस के ऊपर रखकर जलाया जाता है ताकि वे आत्माओं को रास्ता दिखा सकें। समय के साथ दीप प्रज्वलन के साथ बिहू नृत्य का प्रदर्शन शुरू हो जाता है। इसे अच्छी फसल, खुशकिस्मती और समाज की भलाई के लिए किया जाता है।
भोगाली या माघ बिहू, असम का तीसरा और अंतिम बिहू उत्सव है, जिसे भोजन का उत्सव कहा जा सकता है। इसे खलिहानों में मनाया जाता है जब खाने की थालियां भरी होती हैं। यह भोजन का आनंद लेने और एक साथ अच्छा समय बिताने पर केंद्रित होता है। यह मकर संक्रांति से मिलता-जुलता है जिसे इसी समय पर भारत के किसानों द्वारा मनाया जाता है। दोनों त्योहार फसल के मौसम के जाने के प्रतीक माने जाते हैं। त्योहार के दौरान इन ऊर्जावान बिहू नृत्यों को अलाव के चारों तरफ करने की प्रथा है, जिन्हें मेजिस के रूप में जाना जाता है। आज बिहू नृत्य केवल इन तीन त्योहारों के दौरान ही नहीं किया जाता है, बल्कि असम की संस्कृति और इतिहास को मनाने वाले विभिन्न कार्यों और सम्मेलनों में भी किया जाता है।

बिहू नृत्य की अन्य शैलियां
समय के साथ बिहू नृत्य की कुछ और शैलियों का विकास हुआ है। बिहू देओरी, बिहू नृत्य की ही एक प्रकार की शैली है जिसे असम के उपरी इलाकों में रहने वाले तिबेतो बर्मण देओरी समुदाय के गायक, संगीतकार और नर्तक प्रदर्शन करते हैं। बिहू मीसिंग एक अन्य प्रकार की शैली है जिसे असम और अरूणाचल प्रदेश में रहने वाले मीसिंग समुदाय के लोग करते हैं। इसी तरह बिहू नृत्य की एक अन्य खास प्रकार की शैली जेंग बिहू या बुवारी बिहू होती है जिसे शादीशुदा और कुंवारी दोनों प्रकार की महिलाएं करती हैं। मंच बिहू, मंच पर बिहू प्रदर्शन करने की कला है और यह 1931 से प्रचलित है, जब इसे पहली बार गोलाघाट जिले में मंच पर प्रदर्शित किया गया था। 1952 तक, इसकी लोकप्रियता गुवाहाटी तक फैल गई और उसके बाद यह पूरे असम और बाद में शेष भारत में लोकप्रिय हो गया।
पारंपरिक परिधान का जश्न
बिहू की पहचान उनके परिधानों से भी की जाती है। बिहू नृत्य के लिए महिला और पुरुष दोनों पारंपरिक परिधान पहनते हैं। पुरुष नर्तक शरीर के निचले हिस्से में धोती पहनते हैं। यह आमतौर पर सूती या रेशम की होती है। और सिर पर गमछा पहनते हैं। अब वे रेशम के कुर्ते भी पहनने लगे हैं जिस पर कभी- कभी कढ़ाई भी होती है। धोती और गमछा दोनों अलग-अलग रंगों के होते हैं।
महिलाएं चादोर और मेखला पहनती हैं। मेखला एक बेलनाकार कपड़े का हिस्सा होता है जो शरीर के निचले हिस्से में पहना जाता है जबकि चादोर को शॉल की तरह शरीर के ऊपरी हिस्से पर ब्लाउज के ऊपर पहना जाता है। इन परिधानों को बनाने में सूती के अलावा अन्य कई अच्छे कपड़े जैसे पाट सिल्क, कॉटन सिल्क और मुगा सिल्क का उपयोग किया जाता है। कई बार इनकी खूबसूरती कढ़ाई के काम की सुंदरता को कई गुना बढ़ा देती है। कभी-कभी महिलाएं साड़ी भी पहनती हैं, खास तौर पर जब आधुनिक बिहू नृत्य करना होता है। इन स्टाइलिश परिधानों के साथ महिलाएं खुद को भारी गहनें और बालों में फूल लगाकर सजाती हैं।
ढोल, पेपा, गगना, टोका, जूटुली, बानही आदि कई परंपरागत वाद्य यंत्रों के साथ बिहू का प्रदर्शन किया जाता है। यह नृत्य इन वाद्य यंत्रों, परिधानों, सजावट, नियमों, संगीत, प्रकाश का मेल है जो पारंपरिक बिहू नृत्य को इतना सुन्दर बनाता है।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि लंदन ओलंपिक्स 2012के दौरान बिहू नृत्य का प्रदर्शन किया गया था और यह विश्वभर में होने वाली लगभग सभी सम्मेलनों में प्रदर्शित किया जाता है। यह असम की सफलता की कहानी को और असम की संस्कृति के जश्न को हर बार दुहराता है।
असम के विभिन्न कॉलेज अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रमों के माध्यम से बिहू की परंपरा को जीवित रखने में मदद कर रहे हैं। इसे वैश्विक दर्शकों के लिए पेश करके बिहू नर्तकियों ने न केवल इसे लोकप्रियता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में मदद की है, बल्कि यह सुनिश्चित किया है कि युवा पीढ़ी अपने पहाड़ी राज्य की उपेक्षा न करें। इंटरनेट ने इन नर्तकियों और संगीतकारों को बिहू की विरासत को संरक्षित करने में मदद की है। दूसरी तरफ, बिहू के कुछ अनुष्ठानों को आधुनिक (जैसे वेशभूषा) या (गायों के श्रृंगार की तरह) बनाया गया है।
आखिरकार, एक डांसर न केवल दर्शकों की खुशी के लिए, बल्कि खुद के लिए भी नृत्य करता है। तो, बिहू न केवल असमिया संस्कृति की अभिव्यक्ति है, बल्कि प्रत्येक नर्तक की भी है। हर बिहू डांसर के पास अपनी नशीली अदाओं से सुनाने के लिए एक कहानी होती है। जैसा कि वेन डायर ने कहा है कि जब आप नृत्य करते हैं, तो आपका उद्देश्य मंजिल पर एक निश्चित स्थान पर पहुंचना नहीं होता है। आप इसके रास्ते में प्रत्येक कदम का आनंद लेने के लिए करते हैं।


