नवउदारीकृत आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से आर्थिक गैर बराबरी का फासला और बढ़ा है। दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में हमारे देश के धनकुबेर शामिल हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को भरपेट भोजन तक नहीं रहा है। हकीकत यह है कि देश के लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं।
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संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट की मानें तो दुनियाभर में मोटापा महामारी की तरह फैल रहा है और ऐसे में भारत भी इसमें पीछे नहीं है। विश्व में 2019 में खाद्य सुरक्षा की स्थिति और पोषण पर जारी हुई रिपोर्ट के अनुसार भारत में मोटापे के शिकार लोगों की संख्या 2012 में 2 करोड़ 40 लाख थी वो 2016 में बढ़कर 3 करोड़ 28 लाख हो गई है।
कई सालों से मीडिया के माध्यम से हमें बताया जाता रहा है कि हमारी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर दुनिया में चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। हमें यह भी खुशी हो सकती है कि अब हम दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की बैठकों में बुलाए जाने लगे हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ के विश्व खाद्य कार्यक्रम के आंकड़े भी याद रखने चाहिए कि विश्व के 27 प्रतिशत से ज्यादा कुपोषित लोग भारत में बसते हैं।
एफएओ के महानिदेशक जोस ग्रैजियानो डा सिल्वा ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, ‘दुनिया भर में मोटापे की समस्या तेज रफ्तार से बढ़ रही है। खासतौर से बच्चों में मोटापा महामारी की तरह उभर रहा है। विभिन्न देशों को मोटापे पर अंकुश लगाना होगा और सुनिश्चित करना होगा कि फूड प्रॉडक्ट्स के बारे में सही जानकारी मिले।’
वहीं पिछले साल जारी वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2018 के अनुसार, भारत में कुपोषण खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। पूरी दुनिया में कुपोषण के कारण अविकसित रह जाने वाले बच्चों की कुल संख्या में लगभग 31 प्रतिशत बच्चे भारतीय हैं। कुपोषण पीड़ित बच्चों की संख्या के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है।
इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के अध्ययन पर आधारित इस रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर 5 साल से कम उम्र के 8 मिलियन बच्चे स्टंटिंग और 50.5 मिलियन बच्चे वेस्टिंग का शिकार हैं। वहीं कुपोषण के कारण ओवरवेट होने वाले बच्चों की संख्या भारत में 10 लाख से अधिक है जिसके कारण भारत उन 7 देशों में शामिल है जहां कुपोषण के कारण ओवरवेट बच्चों की संख्या अधिक है।
हालांकि लेकिन सच यह है कि किसी भी देश की सबसे बड़ी ताक़त वहां की जनता यानी मानव संसाधन होता है। जिस देश के पास जितने ज़्यादा काम करने वाले लोग होते हैं, वह देश उतना ही ज़्यादा ताक़तवर और मज़बूत होता है। भारत को हमेशा इसी ख़ूबी का लाभ मिलता रहा है। लेकिन भारत के सामने एक चीज़ है जो हमेशा से ही राह का रोड़ा बनती रही है – वह है कुपोषण।

यदि दुनिया में भूखे लोगों की आबादी में भारत की हिस्सेदारी देखें तो यह कुल 24 फीसदी के करीब बैठती है। इस बारे में दुनिया के विशेषज्ञों की चिंता जायज है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पोषण की अपर्याप्तता के कारण साल 2050 तक भारत की तकरीबन 5.30 करोड़ से अधिक आबादी प्रोटीन की कमी से जूझ रही होगी। उस हालत में जबकि आज भी हमारा देश कुपोषण, भुखमरी, गरीबी, निरक्षरता, लिंगभेद, पर्यावरण विनाश और जानलेवा बीमारियों को नियंत्रित करने व देश की अधिकांश आबादी को पीने का साफ पानी मुहैया कराने में नाकाम है। अगर सच को स्वीकारें तो शुद्ध पेयजल आज भी एक चैलेंज है। इस मामले में लाख दावों के बावजूद लगातार हम पिछड़ते ही जा रहे हैं। जबकि यहां हर साल होने वाली 21 लाख बच्चों की मौत का कारण कुपोषण ही है।
भारत में औसतन कोई भी व्यक्ति अधिक पौष्टिक नहीं है। अधिकांश कुपोषण से पीड़ित हैं कारण सामान्य वर्ग को संतुलित आहार नहीं मिलता और निम्म व गरीबों को जब पर्याप्त भोजन नहीं मिलता तो वे कुपोषण की श्रेणी में आते हैं। सभी सरकारों का लक्ष्य रहा है कि कुपोषण से कोई पीड़ित न हो, क्योंकि इसके कारण कुपोषण के कारण शरीर में प्रतिरोधक क्षमता न होने से रोगग्रस्त शीघ्र होते हैं और शीघ्र मृत्यु के शिकार होते हैं। यह स्थिति जन्म के समय से शुरू होती हैं और पांच वर्ष के पहले बहुत से बच्चे मर जाते हैं या बीमार रहते हैं। इसी समय उन्हें पर्याप्त पोषण की जरुरत होती है। हालांकि सरकार लोक कल्याणकारी होने से अलग-अलग प्रकार का पोषण आहारशालाओं में देती है।
कुछ मामलों में पिछले सालों में हमने तरक्की की है, मसलन सफाई और पीने के साफ पानी की स्थिति बेहतर हुई है और बच्चों के बढ़ने पर इनका अच्छा असर हुआ है, लेकिन सही पोषाहार की कमी की दिक्कत वैसी ही बनी हुई है। यह इस वजह से है कि लंबे वक्त से खाद्य सुरक्षा सरकारों की प्राथमिकता में नहीं रही है। सार्वजनिक वितरण व्यवस्था बेहतर होने की बजाय बदतर हुई है, न तो इससे खाद्यान्न की और न उस पर खर्च होने वाले पैसे की बर्बादी रुकी है, न भूखे लोगों तक अनाज पहुंचा है। वह देश आखिरकार मजबूत कैसे होगा, जिसकी एक-तिहाई आबादी अस्वस्थ और कमजोर है।
एम्स के आहार विज्ञान विभाग व राष्ट्रीय पोषण संस्थान द्वारा पांच साल तक के आयु वाले बच्चों पर किया अध्ययन स्थिति की भयावहता को दर्शाता है। उसके अनुसार 63 फीसदी बच्चों का कद उनकी उम्र के मुकाबले कम है, 34 फीसदी बच्चे ज्यादा कमजोर हैं, 51 फीसदी का वजन कम है और 73 फीसदी का बॉडी मॉस इंडेक्स असामान्य है। यानी वह जन्म से ही किसी न किसी बीमारी के चंगुल में हैं। हालिया जन्मे बच्चों में कुपोषण, रक्त अल्पता, नेत्र कमजोरी या अंधता, कम वजन के मामलों में इस अध्ययन में कोलकाता पहले, दिल्ली दूसरे, चेन्नई तीसरे और बंगलुरु चौथे स्थान पर है।
यह क्या साबित करता है कि महानगरों में जहाँ स्वास्थ्य सुविधाएँ अन्य नगरों से बेहतर है, यह हालत है, उस दशा में छोटे नगरों, कस्बों और गांव-देहात की स्थिति की भयावहता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। यह रिपोर्ट प्रमाण है कि देश में 5 साल तक के बच्चों में रक्ताल्पता, एनीमिया, अंधता और कुपोषण का ग्राफ कम होने के बजाय दिनों-दिन तेजी से बढ़ता जा रहा है। आंकड़े सबूत हैं कि ग्रामीण बच्चे ही नहीं, शहरी बच्चे भी कुपोषणता के चंगुल में हैं।
वहीं स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार देश में पांच साल से कम उम्र के 50 फीसदी बच्चे और 30 फीसदी गर्भवती महिलायें कुपोषित हैं। इसमें ज्यादातर वह गरीब परिवार हैं जो अपने भोजन में पौष्टिकता को शामिल नहीं कर पाते। इसका अहम कारण महिलाओं का निम्न जीवन स्तर, उचित स्तनपान न कराया जाना, पूरक आहार का अभाव व उनमें पोषण सम्बन्धी जानकारी का न होना है।
यूनिसेफ की प्रोग्रेस फॉर चिल्ड्रेन रिपोर्ट में चेतावनी देते हुए कहा गया है कि यदि नवजात शिशु को आहार देने के उचित तरीके के साथ-साथ स्वास्थ्य के प्रति कुछ साधारण-सी सावधानियां बरत ली जायें तो भारत में हर वर्ष होने वाली पांच वर्ष से कम आयु के छह लाख से ज्यादा बच्चों की मौत को टाला जा सकता है।
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन का कहना है कि भारत में कुपोषित लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है। जबकि हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी 2022 तक कुपोषण का खात्मा चाहते हैं। वे कहते हैं कि कुपोषण से निपटने के लिये केन्द्र और राज्यों के बीच सभी योजनाओं में समन्वय बहुत जरूरी है।
कुपोषण की स्थिति पर कोई चार साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था- ‘एक ओर देश में हर साल उचित भंडारण के अभाव में लाखों टन अनाज सड़ जाता है जबकि दूसरी ओर करोड़ों भारतीयों को भूखे पेट सोना पड़ता है।’ देश की सर्वोच्च अदालत की इस कठोर टिप्पणी के बाद भी आज तक हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। भंडारण की बदइंतजामी के चलते अनाज के सड़ने और लोगों के भूख से मरने-बिलबिलाने का सिलसिला लगातार जारी है।


