क्याकंपनियां इस मामले में ईमानदार हैं?
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वित्त मंत्रालय ने हाल ही में आश्वासन दिया है कि कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत धन खर्च करने में विफल रहने पर कंपनी के अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही का प्रावधान समाप्त किया जाएगा और यह एक स्वागत योग्य कदम है। किंतु कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व पर 2 प्रतिशत व्यय न करने पर दंड का प्रावधान यथावत है।
किंतु यह ईमानदारी से और स्वेच्छा से होना चाहिए न कि डंडे के बल पर। इस दंड का प्रावधान करने का कारण यह है कि 40 प्रतिशत से अधिक कंपनियां कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा नहीं कर रही हैं और 20 प्रतिशत कंपनियां तो एक भी पैसा खर्च नहीं कर रही हैं और इसका कारण यह है कि इस संबंध में इन कंपनियों में समुचित नीति नहीं है या वे सरकार द्वारा इस संबंध में कठोर कार्यवाही न करने के कारण दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर रहे हैं। अब कंपनियों को पांच साल का वक्त दिया गया है कि वे कंपनी अधिनियम के अनुसार अपने इस दायित्व को पूरा करें।

भारत विश्व के उन गिने चुने देशों में है जहां पर कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व कोल ागू किया गया है और इसका उददेश्य कंपनियों को स्वयं के प्रति हित धारकों के प्रति और जनता के प्रति सामाजिक रूप् से उत्तरदायी बनाना है। कारपोरेट सामाजिक को निभाकर कंपनियां इस बारे में जान सकती हैं कि इसका आर्थिक-सामाजिक पर्यावरणीय सहित सामाजिक पहलुओं पर क्या प्रभाव पड रहा है। जिन कंपनियों का कारोबार 500 करोड या अधिक है और मुनाफा 5 करोड से अधिक है तो उन्हें अपने मुनाफे में से 2 प्रतिशत कारपोरेट सामाजिक पर खर्च करना होता है और इसे खर्च करने की अवधि तीन वर्ष रखी गयी है और इसके बारे में उन्हें शेयरधारकों को बताना होता है।
कारपोरेट सामाजिक उततरदायित्व के स्वरूप् अलग अलग हैं। इससे कंपनियों को भ्ज्ञी लाभ मिल सकता है किंतु अधिकतर कंपनियां इसे प्राथमिकता नहीं देती हैं।
जहां पर कंपनियों ने अपनी फैक्टरियां स्थापित की हैं अगर वे वहां ऐसे कार्यकलापों पर खर्च करते हैं तो उससे कर्मचारियों, कंपनी और समाज के संबंध सुदृढ होते हैं। वर्ष 2010 में आईएसओ ने कंपनियों को कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व लागू करने के लिए स्वैच्छिक मानदंड तय किए थे। आईएसओ 26000 ने मानकों के बजाय दिशा निर्देश हैं और उनका प्रमाणीकरण नहीं किया जा सकता है और आईएसओ 26000 के बारे में अंतर्राष्ट्रीय आम सहमति बनी हुई है। किंतु खबरो ंसे स्पष्ट है कि 50 प्रतिश्ज्ञत से अधिक कंपनियां अपने कुल लाभ या कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व व्यय का ब्यौरा नहीं देते हैं और जो देते हैं तो उसमें बडी विसंगतियां होती हैं।

इससे प्रश्न उठता है कि क्या भारत में कंपनियां कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा कर रही हैं। ये कंपनियां सामाजिक परियोजनाओं पर कितना व्यय करती हैं, किन क्षेत्रों में व्यय करती हैं और किस तरह इस धनराशि को वितरित करती हैं? सच्चाई यह है कि अधिकतर कंपनियां कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व की परवाह नहीं करती और इसका कार्यान्वयन सरकारी निर्देशों के अनुसार नहीं करती हैं। मैं ऐसी कंपनी को भी जानता हूं जो धार्मिक पुस्तकों को प्रकाशित और वितरित करती है जिसे कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं माना जा सकता है। वस्तुतः शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि में कंपनियों को योगदान देना चाहिए और ऐसे व्यय की सामाजिक लेखा परीक्षा होनी चाहिए।
कंपनियां इस मामले में हेराफेरी करती हैं। अशोका विश्वविद्यालय द्वारा कराए गए अध्ययन के अनुसार वर्ष 2015-16 में 19184 कंपनियों द्वारा किया गया कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व व्यय केवल 2 कंपनियों रिलाइंस इंडस्ट्रीज और ओएनजीसी के 2018 की पहली तिमाही के कुल लाभ के बराबर था। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि 56 प्रतिशत कंपनियां अर्थात 10674 कंपनियों ने अपने कुल लाभ या कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व व्यय का ब्यौरा नहंी दिया है। 43 कंपनियों ने ऐसी परियोजनाओं को सीधे लागू किया जबकि 37 प्रतिशत कंपनियों ने क्रियान्वयन एजेंसियों की मदद ली।

भारत में कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के नियमों और प्रक्रियाओं का ठीक से कार्यान्वयन नहीं हो रहा है। इसलिए इस संबंध में एक निगरानी तंत्र की आवश्यकता है जो कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व दिशा निर्देशों का पालन करवाए और उल्लंघन करने वालों पर दंड लगाए। यह जानकर दुख होता है कि हमारी कंपनियां केवल दंड के भय से कार्यवाही करती हैं और समाज के गरीब तबकों के लिए कदम उठाती हैं। कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व परियोजनाओं का कार्यान्वयन पेशेवर और प्रभावी ढंग से सुनिश्चित करने के लिए कंपनियों को स्वयंसेवी संगठनों की सहायता लेनी चाहिए किंतु अधिकतर कंपनियां ऐसा नहीं करती हैं। कुछ ही कंपनियां इस संबंध में सही रणनीति बनाती हैं और कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व परियोजनाओं में अनेक विसंगतियां पायी जाती हैं। एक अध्ययन के अनुसार कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व सामाजिक उत्तरदायित्व की 44 प्रतिशत परियोजनाएं महाराष्ट, तमिलनाडू, कर्नाटक और गुजरात तक सीमित हैं जबकि सघन जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश और बिहार की इस मामले में उपेक्षा होती है।
देश में 718 जिलों में से 115 जिले पिछडे हैं और यहां पर कंपनियों की सहायता की आश्यकता है। झारखं डमें 19, बिहार में 13, छत्तीसगढ में 10, मध्य प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में 8-8 ऐसे जिले हैं। किंतु कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व कार्यकमों में से केवल 1 प्रतिशत झारखंड और छत्तीसगढ में तथा 2 प्रतिशत बिहार में और 3 प्रतिशत मध्य प्रदेश में लागू किए जाते हैं। यह कहा जा सकता है कि प्रबंधन में कमी के कारण कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व विफल हो रहा है। इसलिए कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व को प्रबंधन कौशल प्रशिक्षण का अंग बनाया जाना चाहिए और इसे एमबीए पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।

इस संबंध में प्रबंधन नीतियों में बदलाव आवश्यक है और पश्चिमी विधियों का अंधानुकरण नहीं किया जाना चाहिए। हमें अपने देश की दशाओं के अनुसार रणनीति बनानी चाहिए। जब हम प्रबंधन नीतियों की बात करते हैं तो उसमें औद्योगिक इकाई, लघु उद्योग इकाई, शैक्षणिक संस्था और स्वास्थ्य केन्द्र भी ध्यान में रखे जाने चाहिए और प्रबंधकों को दिए गए कार्य में उनकी विशेषज्ञता के अलावा उनकी ईमानदारी और समर्पण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि वे अपने प्रभार के अंतर्गत वर्ग की देखभाल बिना किसी भय के कर सके और इस प्रकार न केवल कंपनी को लाभ पहुंचाए अपितु समाज को भी लाभ पहुंचाएं।
वित्त मंत्रालय ने हाल ही में आश्वासन दिया है कि कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत धन खर्च करने में विफल रहने पर कंपनी के अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही का प्रावधान समाप्त किया जाएगा और यह एक स्वागत योग्य कदम है। किंतु कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व पर 2 प्रतिशत व्यय न करने पर दंड का प्रावधान यथावत है। किंतु यह ईमानदारी से और स्वेच्छा से होना चाहिए न कि डंडे के बल पर। इस दंड का प्रावधान करने का कारण यह है कि 40 प्रतिशत से अधिक कंपनियां कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा नहीं कर रही हैं और 20 प्रतिशत कंपनियां तो एक भी पैसा खर्च नहीं कर रही हैं और इसका कारण यह है कि इस संबंध में इन कंपनियों में समुचित नीति नहीं है या वे सरकार द्वारा इस संबंध में कठोर कार्यवाही न करने के कारण दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर रहे हैं। अब कंपनियों को पांच साल का वक्त दिया गया है कि वे कंपनी अधिनियम के अनुसार अपने इस दायित्व को पूरा करें।
भारत विश्व के उन गिने चुने देशों में है जहां पर कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व कोल ागू किया गया है और इसका उददेश्य कंपनियों को स्वयं के प्रति हित धारकों के प्रति और जनता के प्रति सामाजिक रूप् से उत्तरदायी बनाना है। कारपोरेट सामाजिक को निभाकर कंपनियां इस बारे में जान सकती हैं कि इसका आर्थिक-सामाजिक पर्यावरणीय सहित सामाजिक पहलुओं पर क्या प्रभाव पड रहा है। जिन कंपनियों का कारोबार 500 करोड या अधिक है और मुनाफा 5 करोड से अधिक है तो उन्हें अपने मुनाफे में से 2 प्रतिशत कारपोरेट सामाजिक पर खर्च करना होता है और इसे खर्च करने की अवधि तीन वर्ष रखी गयी है और इसके बारे में उन्हें शेयरधारकों को बताना होता है।
कारपोरेट सामाजिक उततरदायित्व के स्वरूप् अलग अलग हैं। इससे कंपनियों को भ्ज्ञी लाभ मिल सकता है किंतु अधिकतर कंपनियां इसे प्राथमिकता नहीं देती हैं। जहां पर कंपनियों ने अपनी फैक्टरियां स्थापित की हैं अगर वे वहां ऐसे कार्यकलापों पर खर्च करते हैं तो उससे कर्मचारियों, कंपनी और समाज के संबंध सुदृढ होते हैं। वर्ष 2010 में आईएसओ ने कंपनियों को कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व लागू करने के लिए स्वैच्छिक मानदंड तय किए थे। आईएसओ 26000 ने मानकों के बजाय दिशा निर्देश हैं और उनका प्रमाणीकरण नहीं किया जा सकता है और आईएसओ 26000 के बारे में अंतर्राष्ट्रीय आम सहमति बनी हुई है। किंतु खबरो से स्पष्ट है कि 50 प्रतिश्ज्ञत से अधिक कंपनियां अपने कुल लाभ या कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व व्यय का ब्यौरा नहीं देते हैं और जो देते हैं तो उसमें बडी विसंगतियां होती हैं।
इससे प्रश्न उठता है कि क्या भारत में कंपनियां कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा कर रही हैं। ये कंपनियां सामाजिक परियोजनाओं पर कितना व्यय करती हैं, किन क्षेत्रों में व्यय करती हैं और किस तरह इस धनराशि को वितरित करती हैं? सच्चाई यह है कि अधिकतर कंपनियां कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व की परवाह नहीं करती और इसका कार्यान्वयन सरकारी निर्देशों के अनुसार नहीं करती हैं। मैं ऐसी कंपनी को भी जानता हूं जो धार्मिक पुस्तकों को प्रकाशित और वितरित करती है जिसे कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं माना जा सकता है। वस्तुतः शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि में कंपनियों को योगदान देना चाहिए और ऐसे व्यय की सामाजिक लेखा परीक्षा होनी चाहिए।
कंपनियां इस मामले में हेराफेरी करती हैं। अशोका विश्वविद्यालय द्वारा कराए गए अध्ययन के अनुसार वर्ष 2015-16 में 19184 कंपनियों द्वारा किया गया कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व व्यय केवल 2 कंपनियों रिलाइंस इंडस्ट्रीज और ओएनजीसी के 2018 की पहली तिमाही के कुल लाभ के बराबर था। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि 56 प्रतिशत कंपनियां अर्थात 10674 कंपनियों ने अपने कुल लाभ या कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व व्यय का ब्यौरा नहंी दिया है। 43 कंपनियों ने ऐसी परियोजनाओं को सीधे लागू किया जबकि 37 प्रतिशत कंपनियों ने क्रियान्वयन एजेंसियों की मदद ली।
भारत में कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के नियमों और प्रक्रियाओं का ठीक से कार्यान्वयन नहीं हो रहा है। इसलिए इस संबंध में एक निगरानी तंत्र की आवश्यकता है जो कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व दिशा निर्देशों का पालन करवाए और उल्लंघन करने वालों पर दंड लगाए। यह जानकर दुख होता है कि हमारी कंपनियां केवल दंड के भय से कार्यवाही करती हैं और समाज के गरीब तबकों के लिए कदम उठाती हैं। कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व परियोजनाओं का कार्यान्वयन पेशेवर और प्रभावी ढंग से सुनिश्चित करने के लिए कंपनियों को स्वयंसेवी संगठनों की सहायता लेनी चाहिए किंतु अधिकतर कंपनियां ऐसा नहीं करती हैं। कुछ ही कंपनियां इस संबंध में सही रणनीति बनाती हैं और कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व परियोजनाओं में अनेक विसंगतियां पायी जाती हैं। एक अध्ययन के अनुसार कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व सामाजिक उत्तरदायित्व की 44 प्रतिशत परियोजनाएं महाराष्ट, तमिलनाडू, कर्नाटक और गुजरात तक सीमित हैं जबकि सघन जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश और बिहार की इस मामले में उपेक्षा होती है।
देश में 718 जिलों में से 115 जिले पिछडे हैं और यहां पर कंपनियों की सहायता की आश्यकता है। झारखं डमें 19, बिहार में 13, छत्तीसगढ में 10, मध्य प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में 8-8 ऐसे जिले हैं। किंतु कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व कार्यकमों में से केवल 1 प्रतिशत झारखंड और छत्तीसगढ में तथा 2 प्रतिशत बिहार में और 3 प्रतिशत मध्य प्रदेश में लागू किए जाते हैं। यह कहा जा सकता है कि प्रबंधन में कमी के कारण कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व विफल हो रहा है। इसलिए कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व को प्रबंधन कौशल प्रशिक्षण का अंग बनाया जाना चाहिए और इसे एमबीए पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।
इस संबंध में प्रबंधन नीतियों में बदलाव आवश्यक है और पश्चिमी विधियों का अंधानुकरण नहीं किया जाना चाहिए। हमें अपने देश की दशाओं के अनुसार रणनीति बनानी चाहिए। जब हम प्रबंधन नीतियों की बात करते हैं तो उसमें औद्योगिक इकाई, लघु उद्योग इकाई, शैक्षणिक संस्था और स्वास्थ्य केन्द्र भी ध्यान में रखे जाने चाहिए और प्रबंधकों को दिए गए कार्य में उनकी विशेषज्ञता के अलावा उनकी ईमानदारी और समर्पण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि वे अपने प्रभार के अंतर्गत वर्ग की देखभाल बिना किसी भय के कर सके और इस प्रकार न केवल कंपनी को लाभ पहुंचाए अपितु समाज को भी लाभ पहुंचाएं।
जहां पर कंपनियों ने अपनी फैक्टरियां स्थापित की हैं अगर वे वहां ऐसे कार्यकलापों पर खर्च करते हैं तो उससे कर्मचारियों, कंपनी और समाज के संबंध सुदृढ होते हैं। वर्ष 2010 में आईएसओ ने कंपनियों को कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व लागू करने के लिए स्वैच्छिक मानदंड तय किए थे। आईएसओ 26000 ने मानकों के बजाय दिशा निर्देश हैं और उनका प्रमाणीकरण नहीं किया जा सकता है और आईएसओ 26000 के बारे में अंतर्राष्ट्रीय आम सहमति बनी हुई है। किंतु खबरो ंसे स्पष्ट है कि 50 प्रतिश्ज्ञत से अधिक कंपनियां अपने कुल लाभ या कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व व्यय का ब्यौरा नहीं देते हैं और जो देते हैं तो उसमें बडी विसंगतियां होती हैं।
इससे प्रश्न उठता है कि क्या भारत में कंपनियां कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा कर रही हैं। ये कंपनियां सामाजिक परियोजनाओं पर कितना व्यय करती हैं, किन क्षेत्रों में व्यय करती हैं और किस तरह इस धनराशि को वितरित करती हैं? सच्चाई यह है कि अधिकतर कंपनियां कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व की परवाह नहीं करती और इसका कार्यान्वयन सरकारी निर्देशों के अनुसार नहीं करती हैं। मैं ऐसी कंपनी को भी जानता हूं जो धार्मिक पुस्तकों को प्रकाशित और वितरित करती है जिसे कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं माना जा सकता है। वस्तुतः शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि में कंपनियों को योगदान देना चाहिए और ऐसे व्यय की सामाजिक लेखा परीक्षा होनी चाहिए।
कंपनियां इस मामले में हेराफेरी करती हैं। अशोका विश्वविद्यालय द्वारा कराए गए अध्ययन के अनुसार वर्ष 2015-16 में 19184 कंपनियों द्वारा किया गया कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व व्यय केवल 2 कंपनियों रिलाइंस इंडस्ट्रीज और ओएनजीसी के 2018 की पहली तिमाही के कुल लाभ के बराबर था। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि 56 प्रतिशत कंपनियां अर्थात 10674 कंपनियों ने अपने कुल लाभ या कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व व्यय का ब्यौरा नहंी दिया है। 43 कंपनियों ने ऐसी परियोजनाओं को सीधे लागू किया जबकि 37 प्रतिशत कंपनियों ने क्रियान्वयन एजेंसियों की मदद ली।
भारत में कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के नियमों और प्रक्रियाओं का ठीक से कार्यान्वयन नहीं हो रहा है। इसलिए इस संबंध में एक निगरानी तंत्र की आवश्यकता है जो कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व दिशा निर्देशों का पालन करवाए और उल्लंघन करने वालों पर दंड लगाए। यह जानकर दुख होता है कि हमारी कंपनियां केवल दंड के भय से कार्यवाही करती हैं और समाज के गरीब तबकों के लिए कदम उठाती हैं। कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व परियोजनाओं का कार्यान्वयन पेशेवर और प्रभावी ढंग से सुनिश्चित करने के लिए कंपनियों को स्वयंसेवी संगठनों की सहायता लेनी चाहिए किंतु अधिकतर कंपनियां ऐसा नहीं करती हैं। कुछ ही कंपनियां इस संबंध में सही रणनीति बनाती हैं और कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व परियोजनाओं में अनेक विसंगतियां पायी जाती हैं। एक अध्ययन के अनुसार कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व सामाजिक उत्तरदायित्व की 44 प्रतिशत परियोजनाएं महाराष्ट, तमिलनाडू, कर्नाटक और गुजरात तक सीमित हैं जबकि सघन जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश और बिहार की इस मामले में उपेक्षा होती है।
देश में 718 जिलों में से 115 जिले पिछडे हैं और यहां पर कंपनियों की सहायता की आश्यकता है। झारखं डमें 19, बिहार में 13, छत्तीसगढ में 10, मध्य प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में 8-8 ऐसे जिले हैं। किंतु कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व कार्यकमों में से केवल 1 प्रतिशत झारखंड और छत्तीसगढ में तथा 2 प्रतिशत बिहार में और 3 प्रतिशत मध्य प्रदेश में लागू किए जाते हैं। यह कहा जा सकता है कि प्रबंधन में कमी के कारण कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व विफल हो रहा है। इसलिए कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व को प्रबंधन कौशल प्रशिक्षण का अंग बनाया जाना चाहिए और इसे एमबीए पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।
इस संबंध में प्रबंधन नीतियों में बदलाव आवश्यक है और पश्चिमी विधियों का अंधानुकरण नहीं किया जाना चाहिए। हमें अपने देश की दशाओं के अनुसार रणनीति बनानी चाहिए। जब हम प्रबंधन नीतियों की बात करते हैं तो उसमें औद्योगिक इकाई, लघु उद्योग इकाई, शैक्षणिक संस्था और स्वास्थ्य केन्द्र भी ध्यान में रखे जाने चाहिए और प्रबंधकों को दिए गए कार्य में उनकी विशेषज्ञता के अलावा उनकी ईमानदारी और समर्पण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि वे अपने प्रभार के अंतर्गत वर्ग की देखभाल बिना किसी भय के कर सके और इस प्रकार न केवल कंपनी को लाभ पहुंचाए अपितु समाज को भी लाभ पहुंचाएं।


