तंबुओं और शामियानों में सिमटी वह कला अब दम तोड़ रही है, जो कभी हमारे मनोरंजन का प्रमुख जरिया हुआ करती थी। जी हां, भारत में सर्कस अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन के अभाव व मनोरंजन के आधुनिक साधनों के आगे सर्कस अपनी पारम्परिक जगह खोता जा रहा है।
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समकालीन कथाकार संजीव का एक बेहद चर्चित उपन्यास है- सर्कस। इसमें उन्होंने सर्कस को एक ऐसी कला माना है, जो कौतूहल की रचना करता है। जहां एक विशाल तम्बू के भीतर शो के शुरू होते ही ज़िन्दगी और खुशी नाचने लगती है। जहां सुख-दुख, आशा-निराशा, यातना और उत्पीड़न का एक भरा-पूरा संसार होता है।
यानी सर्कस सि़र्फ़ शामियाने के भीतर चलने वाला तमाशा भर नहीं है, विराट रूपक भी है जहां कलाकार अपनी-अपनी आकांक्षाओं, द्वन्द्वों और छद्म में सांस लेते हुए दर्शकों का मनोरंजन करता है। लेकिन अफ़सोस मनोरंजन का यह लोकप्रिय जरिया, कला का यह रूपक आज मौत के मुहाने पर खड़ा है। शनै:-शनै: एक कला की सांसें उखड़ रही हैं।
जी हां, बदले हालात और सरकार की बेरुखी के कारण सर्कस की कला आज अपने सबसे दुख भरे दौर से गुजर रही है। मुमकिन है कि कभी मनोरंजन की सबसे लोकप्रिय रही इसी विधा का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए। जाहिर है कि जब सर्कस पर तमाम तरह की बंदिशें लगेंगी, जब उसे दर्शक ही नहीं मिलेंगे, इसके कलाकारों की हौसला अफजाई करने वाले कद्रदान ही नहीं होंगे तो इसका खत्म होना लाजिमी है।
लोग इन कलाकारों को हंसते-गाते, दूसरों को मनोरंजन करते तो देखते हैं, लेकिन इस हंसी के पीछे छिपे उनके दर्द को शायद ही कोई महसूस कर पाता है। न ही उसे महसूस करने की ज़रूरत ही समझी जाती है। सरकारें भी उनकी ओर नहीं देखतीं।
वैसे भी मनोरंजन का यह साधन बड़े ताम-झाम वाला होता है। बड़ी संख्या में खेल दिखाने वाले लोग, अन्य कार्यों का प्रबंधन संभालने वाले कर्मी और करतब दिखाने वाले जानवरों के साथ कलाकारों की इस चलती-फिरती कंपनी को चलाना लाखों-करोड़ों का सौदा है। जब कंपनी को कमाई ही नहीं होगी, खर्चा तक निकालने के टोटे पड़ेंगे, तो भला कोई इसे क्यों चलाना चाहेगा! मजबूरन इसे बंद ही करना होगा।
बीते दशकों में कुछ ऐसा ही हुआ और वह अब भी हो रहा है। सर्कस लगातार बंद हो रहे हैं। वे इतिहास की बात होते जा रहे हैं। देश के कई नामी-गिरामी सर्कस आज अस्तित्व में नहीं हैं। और जो बच रहे हैं, वे भी इसी दिशा में अग्रसर हैं।

सर्कस की दुर्दशा का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि कोई 20 साल पहले जहां देश में 350 से भी ज्यादा सर्कस कंपनियां थीं, आज बमुश्किल 10-12 ही बची रह गयी हैं। उन्हें भी अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए कड़ी जद्दोजेहद करनी पड़ रही है। सरकारी संरक्षण व प्रोत्साहन के अभाव, नित नये नियम-कानूनों और मनोरंजन के नवीन व आधुनिक साधनों के आगे बच रही इन सर्कस कंपनियों की भी हालत ऐसी है कि उनका कभी भी दम निकल सकता है।
दरअसल, आधुनिक सूचना-प्रौद्योगिकी के युग में अपनी रेस में सर्कस काफी पीछे छूट गया दीखता है। मनोरंजन के दूसरे माध्यम अवतरित हो गये हैं और वे खासकर सर्कस की ही लोकप्रियता में सेंध लगा रहे हैं। सिनेमा ने तो जैसे-तैसे अपने स्वरूप में, अपने कंटेंट में, अपने प्लेटफॉर्म में बदलाव लाकर अपना अस्तित्व बचाये रखा है पर सर्कस अपनी बेबसी के साथ सिसकियां भरने को मजबूर है। एक लोकप्रिय कला बेमौत मरने की कगार पर है।
जेमिनी सर्कस के मैनेजर अलंकेश्वर भास्कर भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि टेलीविजन और इंटरनेट के दौर में सर्कस को भारत में अपने सबसे बुरे दौर से गुजरना पड़ रहा है। इसके पीछे वह इस क्षेत्र के प्रति सरकार की बेरुखी को सबसे बड़ी वजह मानते हैं।
वह कहते हैं, ’90 प्रतिशत सर्कस तो खत्म ही हो चुके हैं और जो ज़िंदा हैं, वे सर्कस कलाकारों व उन अभिभावकों की वजह से चल रहे हैं, जो अपने बच्चों को आज भी सर्कस से जोड़े रखना चाहते हैं। जबकि लोगों की तो इस कला के प्रति रुचि ही नहीं रही। इस कला की कद्र करने वाले खत्म हो गये हैं। सरकार ने भी तमाम तरह के प्रतिबंधों के जरिये इसकी कमर तोड़ने का काम किया है जबकि उसे इसका संरक्षण करना चाहिए था। इसके कलाकारों की सुध लेनी चाहिए थी।’
यह हकीकत है कि सरकार की उदासीनता ने भी सर्कस के साथ जुल्म किया है। मांग होती रही कि वह सर्कस मालिकों की व्यथा भी सुने, कलाकारों का दुख-दर्द समझे लेकिन वह आंखों पर पट्टी और कान में तेल डाली रही। उलटे इतने नियम कानून लाद दिये कि सर्कस की तो जान ही निकल गयी।
वैसे यह हकीकत है कि सरकार की उदासीनता ने भी सर्कस के साथ जुल्म किया है। मांग होती रही कि वह सर्कस मालिकों की व्यथा भी सुने, कलाकारों का दुख-दर्द समझे लेकिन वह आंखों पर पट्टी और कान में तेल डाली रही। उलटे इतने नियम कानून लाद दिये कि सर्कस की तो जान ही निकल गयी। पहले कुछ चुनिंदा जानवरों को सर्कस में रखने पर रोक लगायी, जो अब हर तरह के जानवर और बच्चों को शामिल करने पर प्रतिबंध तक पहुंच चुकी है। अब जब बच्चे सर्कस का हिस्सा ही नहीं होंगे, तो हुनर सीखेंगे कैसे? कोई अकादमी भी नहीं, जहां इस पेशे में आने के लिए लोग प्रशिक्षण ले सकें। विदेशों में सरकार इन सब बातों का ख्याल रखती है, इसीलिए यह कला वहां ज़िंदा है।
रैम्बो सर्कस के मालिक सूदीप दिलीप भी इस ओर ध्यान देने की वकालत करते हैं और कहते हैं, ‘सरकार को सर्कस अकादमी का गठन करना चाहिए, ताकि विदेशों की तरह यहां भी सर्कस से जुड़ने की इच्छा रखने वाले नये कलाकारों की प्रतिभा को निखारा जा सके। साथ ही रिटायरमेंट के बाद कलाकारों को नौकरियों में आरक्षण दिया जाना चाहिए, क्योंकि इस क्षेत्र में करिअर बहुत लम्बा नहीं होता। ट्रेनिंग सेंटर के गठन से सर्कस में लोगों का मनोरंजन करके अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा गुजार देने वालों को प्रशिक्षक के तौर पर रोजगार भी मुहैया हो पायेगा।
आज सरकारी उपेक्षा और समुचित मंच नहीं होने के कारण ही प्रतिभाशाली कलाकार सर्कस से दूर होते जा रहे हैं।’ दिलीप का मानना है कि आर्थिक तंगी से जूझने के कारण ही सर्कस कंपनियां असमय मौत का शिकार हो रही हैं। वह कहते हैं कि मनोरंजन के सभी माध्यमों ने तकनीक की मदद से तरक्की कर ली, लेकिन सर्कस आर्थिक कमजोरी के कारण पीछे रह गया।

ग्रेट जेमिनी सर्कस से जुड़े बीनू गुप्ता एवं मो. श्मीम की भी कुछ ऐसी ही राय है। उनका कहना है कि सरकार का समुचित सहयोग न मिलने के कारण सर्कस खत्म हो रहे हैं। इसके साथ ही सर्कस के कलाकारों की खानाबदोश ज़िंदगी और मौजूदा वक्त में ज़रूरी स्थायित्व की कमी के कारण भी स्थिति बहुत विषम हो गयी है। इस ओर सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है। उल्टे कभी बच्चों-जानवरों के शोषण या कभी कोई और आरोप लगा कर वह सर्कस वालों को परेशान ही करने का काम करती है। लिहाजा, देश में सर्कस की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है।
पहले जब मनोरंजन के बहुत ज्यादा साधन नहीं हुआ करते थे, तब सर्कस में दर्शकों की अपार भीड़ जुटा करती थी। गांव-कस्बों में ही नहीं, बड़े शहरों व महानगरों में भी सर्कस खूब चलते थे। लोग दूर-दूर से सर्कस देखने आया करते थे। उसके शो हाउसफुल जाते थे। लेकिन आज टीवी, इंटरनेट के जमाने में लोगों की मनोरंजन की आदतों और रुचियों में बदलाव के कारण सर्कस को अपना अस्तित्व बचाने के लिए कठिन लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
अगर विदेशों मे यह कला महत्व पाती है तो हमारे यहां क्यों नहीं? ऊपर से सरकार द्वारा सर्कस में जानवरों और बच्चों से काम कराने पर रोक ने सर्कस के ताबूत में अंतिम कील ठोंकने का काम किया है। इसकी आड़ में सर्कस वालों को तो परेशान किया ही जा रहा है, दर्शकों खासकर बच्चों की इसमें रुचि भी बिल्कुल खत्म हो गई है। नतीजतन, सर्कस का बिजनेस 70 प्रतिशत से भी अधिक गिर गया है।
अपोलो सर्कस के जुड़े रहे आरके यादव कहते हैं, सरकार का समर्थन तो सर्कस को नहीं ही मिल रहा है। ऊपर से उसने इतने नियम-कायदे हम पर थोप दिये हैं कि काम करना मुश्किल हो रहा है। बच्चों से हम काम करा नहीं सकते, जबकि हक़ीकत यह है कि कम उम्र में ही इस विधा को सीखा जा सकता है। 14 साल की उम्र तक तो शरीर इतना परिपक्व हो जाता है कि जिम्नाज्म सीखा ही नहीं जा सकता। जानवरों के खेल पर भी रोक लगा दिया गया है। इन वजहों से ही सर्कस को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

सरकार की सख्ती का असर सर्कस की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है। पहले जहां एक बड़े सर्कस में शेर-चीते, घोड़े, हाथी, बाघ और अनेक जानवरों के अलावा 400-500 लोग इसके सदस्य होते थे, आज सौ लोग भी बमुश्किल ही होते हैं। स्वाभाविक है कि जब खर्च के मुकाबले आमदनी कम से कमतर हो जाएगी, तो भला कौन लाव-लश्कर के साथ सर्कस चलाना चाहेगा। यही वजह है कि आज अधिकांश सर्कस मजबूरी में ही गाड़ी खींच रहे हैं। और वह भी सर्कस के लिए अपनी पूरी जिंदगी झोंक चुके प्रौढ़ कलाकारों के बूते। जिनके लिए सर्कस के तंबुओं से अलग ज़िंदगी की ख्वाहिश भी मौत के समान है। वे जाएं, तो जाएं कहां! इसके अलावा वे कर भी क्या सकते हैं!
करिअर की अनिश्चतता के कारण ही इस इंडस्ट्री से नये लोग नहीं जुड़ रहे। जो यहां काम कर रहे हैं, वे भी अपने बच्चों को इससे दूर ही रखना चाहते हैं। नयी लड़कियों को खेल सिखाने वाली ऐसी ही एक प्रौढ़ कलाकार मोना विश्वास कहती हैं, ‘मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी सर्कस और इस कला के नाम समर्पित कर दी। लेकिन अनिश्चतताओं से भरी यहां की ज़िंदगी को देखते हुए मैंने अपनी दोनों बेटियों को इससे दूर रखा। आज मेरी एक बेटी नर्स है और दूसरी टीचर। बहुत संघर्ष से मैंने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है। सबके साथ ऐसा नहीं हो पाता है। मैं खुशकिस्मत थी कि अपने बच्चों को बेहतर ज़िंदगी दे पाई, वर्ना वे भी इन्हीं तंबुओं में कैद होकर रह जातीं।’
सर्कस में जोकर का किरदार निभाने वाले 45 वर्षीय बीजू कहते हैं, ’25 साल से अधिक हो गये मुझे इसका हिस्सा बने। जो कुछ भी हूं, इसी की वजह से हूं। मेरे जैसे कद-काठी के इंसान को कोई क्या नौकरी देता। अब अगर सर्कस भी बंद हो गया, तो मैं कैसे ज़िंदा रह पाऊंगा। कौन करेगा मेरी चिंता? डर ही है कि मैंने अब अपने बच्चों को दूसरा विकल्प चुनने को कह दिया है।’
कुछ ऐसी ही कहानी 46 वर्षीय रशीद की भी है। रशीद उन लोगों में हैं, जिन्हें सर्कस विरासत में मिली। उनके मां-बाप दोनों सर्कस में ढेर सारा पानी पीने और फिर उसे निकालने का करतब दिखाते थे। रशीद भी खुशी-खुशी इसका हिस्सा बन गये। लेकिन आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर उनकी सोच बदल गयी है। वह अपने बच्चों को इससे दूर रखना चाहते हैं। वह कहते हैं, ‘मैं अपने बच्चों को खानाबदोशी की ज़िंदगी नहीं देना चाहता। आज वक्त बदल गया है। ज़रूरतें बदल गयी हैं। इस क्षेत्र में रहकर अब कोई कुछ हासिल नहीं कर सकता। सर्कस मर रहा है। इस मरती हुई कला का हाथ थाम कर कोई ज़िंदा रहने का आखिर सोच भी कैसे सकता है!

बदले दौर में सर्कस के लिए ऐसी सोच रखने वाले कलाकार ढेरों हैं। ग्रेजुएट हरी बाबू से लेकर मैनेजर बालाकृष्णन, झूले पर खेल दिखाने वाले जयराम, शूटर गजानंद व सीमा पंडा और रिंग मास्टर एस मोहम्मद तक। ये वे लोग हैं, जिन्होंने सर्कस के सुनहरे दिन देखे हैं। वे दिन, जब इसके कलाकारों को पैसा भी मिलता था और प्रसिद्घी भी। भारत में सर्कस का घर कहे जाने वाले केरल के कन्नूर ज़िले से कई ऐसे सर्कस कलाकार आये, जिन्हें दुनिया भर में प्रसिद्घी मिली।
मार्शल आर्ट ट्रेनर और जिमनास्ट कीलेरी कुन्हिकन्नन गुरुक्कल न सिर्फ़ भारत में सर्कस की महान हस्ती थे, बल्कि सात समंदर पार भी उनके प्रशंसक हुए। लेकिन, आज के दौर में पुराने लोग भी सर्कस के भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं। यही वजह है कि प्रतिभाशाली लोग अब इस क्षेत्र में नहीं आ रहे। जो नये लोग आ रहे हैं, वे ग़ैर प्रशिक्षित और अकुशल होते हैं। जिनके लिए सर्कस में आना उनके लिए मजबूरी होती है। महज किसी तरह पेट भरने की मजबूरी। लिहाजा, ज़िंदगी को लेकर स्थायित्व की अनिश्चतता से असली कलाकार सर्कस से दूर होते जा रहे हैं। और साथ ही दर्शक भी। यहां लाईव क्रिकेट देखने के तो शौकीन मिलेंगे लेकिन लाईव एडवेंचर के नहीं। यह अफसोसजनक है। इससे सर्कस दम तोड़ रहा है।
हालांकि केरल में सरकार द्वारा सर्कस के कलाकारों को पेंशन दी जाती है। दक्षिण में सर्कस के कद्रदान भी हैं, पर सिर्फ़ चंद प्रशंसकों के बूते सर्कस जैसी विस्तृत कला को ज़िंदा रख पाना आसान नहीं है। कलाकारों को भी अब यहां अपने वजूद की संभावनाओं की कल्पना बेमानी-सी लगती है।
तभी तमिलनाडु के पुष्पा चक्रवर्ती कहते हैं, ‘आज जवान हैं, काम कर रहे हैं। सर्कस की ज़िंदगी तब तक है, जब तक शरीर में दम। आगे क्या होगा, कुछ नहीं मालूम।’ करीब एक दशक पहले गाज़ियाबाद में एक सर्कस शो के दौरान एक कलाकार झूले पर खेल दिखाते गिर कर अपनी जान गंवा बैठा। इस घटना ने वृताकार क्षेत्र में ऊंचे तने शामियाने के भीतर चकाचौंध कर देने वाली रोशनी और आर्केस्ट्रा की तेज धुनों के बीच अपना गम भुला कर लोगों के जीवन में रस घोलने वाले मजबूर कलाकारों की ज़िंदगी के अंधेरे को बयां कर दिया।
वह दर्द, जो इन तंबुओं में ही कैद होकर रह जाता है। लोग इन कलाकारों को हंसते-गाते, दूसरों को मनोरंजन करते तो देखते हैं, लेकिन इस हंसी के पीछे छिपे उनके दर्द को शायद ही कोई महसूस कर पाता है। न ही उसे महसूस करने की ज़रूरत ही समझी जाती है। सरकारें भी उनकी ओर नहीं देखतीं। सर्कस कला के लुप्त होते जाने के पीछे राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव एक बड़ी वजह है। यदि सरकार चाहे तो इस कला का पुनर्जीवन हो सकता है लेकिन शायद अन्य कुछ कलाओं की तरह यह भी लुप्त हो जाने के लिये अभिशप्त है।
मशहूर फिल्मकार राज कपूर ने कभी सर्कस और इसके कलाकारों को लेकर एक फिल्म बनायी थी- मेरा नाम जोकर। उस वक्त यह फिल्म सुपर फलॉप साबित हुई थी। लेकिन, राज कपूर की मौत के बाद जब दोबारा इसे प्रदर्शित किया गया, तो इसे बेजोड़ सफलता हासिल हुई। तब कहा गया था कि अक्सर लोग किसी की मौत के बाद ही उसकी असली अहमियत समझते हैं। कुछ ऐसा ही इस फिल्म का विषय-वस्तु रहे सर्कस के साथ दोहराया जा रहा है। मुमकिन है कि मनोरंजन की इस विधा का अस्तित्व ही खत्म हो जाए। और शायद तभी इस ओर लोगों का ध्यान जाए।


